Saturday, 17 January 2026

मूर्तियों के चक्कर लगाता कुत्ता : भक्ति या भीतर की बेचैनी?

राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 हमें अपने आने वाली पीढ़ी में 21 वीं सदी के कौशल विकसित कर देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने की बात करती है। उनमें आलोचनात्मक चिंतन करने के कौशल विकसित करने को प्रयासरत हैं। यहाँ आलोचनात्मक चिंतन से तात्पर्य है - भावनाओं में बहकर प्रभावित हुए बिना किसी भी विचार, घटना को तर्क, प्रमाण और विवेक के आधार पर गहराई से सोच समझकर परखना फिर उसे स्वीकार करना। सरल शब्दों में यदि इसे समझा जाए तो आलोचनात्मक चिंतन सोचने की वह कला है जिसमे हम हर बात को तर्क और प्रमाण के आधार पर परखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाहता है कि हमारे देश के नागरिको में आलोचनात्मक चिंतन का कौशल नगण्य/नहीं के बराबर है। इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं

बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव नंदपुर स्थित मंदिर में एक कुत्ता वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करने लगता है। कई मीडिया रिपोर्टस स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर बताते हैं कि यह कुत्ता 12 जनवरी को मंदिर में आया था और लगातार 36 घंटे तक बिना कुछ खाये पिए हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करता रहा। इसके बाद कुछ देर के लिए यह कुत्ता बाहर चला गया। फिर वापस 14 जनवरी को यह मंदिर में आता है और माँ दुर्गा की परिक्रमा करने लगता है। इसके बाद वह कुत्ता एक स्थान पर स्थिर बैठा हुआ है। लोग उस कुत्ते को हनुमान जी के एक बहुत बड़े भक्त मानकर उसके ऊपर फूल मालाएं चढ़ाकर उनकी पूजा करना शुरू कर दिए हैं।   

किसी भी व्यक्ति/जीव की पूजा करना, उस पर फूल, माला चढ़ाना गलत नहीं है। अक्सर किसी के सामान्य से हटकर किये गए कार्य को सम्मान देने के लिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह सम्मान भी तभी जायज है जब उस सामान्य से हटकर किये गए कार्य को करने के लिए किसी ने लंबे समय तक अथक मेहनत कर कोई मिसाल कायम किया हो तो। यहाँ बात जीस कुत्ते की हो रही है, जिसे लोग हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त समझकर फूल माला चढ़ाकर पूजा करने लग जा रहे हैं, इससे पूर्व इसके द्वारा कभी भी हनुमान जी की परिक्रमा करने का दावा नहीं किया गया। क्योंकि कुत्ता भी जो कुछ भी कर रहा है उसके पीछे भक्ति नहीं एक मानसिक विकृति है। पशु चिकित्सक इस मानसिक विकृति को अच्छी तरह समझते हैं।  

आलोचनात्मक चिंतन कौशल का उपयोग करते हुए मैंने जानवरों के ऐसे व्यवहार का थोड़ा अध्ययन किया तो पाया कि जैसे उम्र बढ़ने के साथ इंसान के दिमाग में कई प्रकार की विकृतियाँ जैसे अल्जाइमर आने लगती है। जिसके कारण इंसान का व्यवहार बदल जाता है। इसी प्रकार जानवरों में भी इस प्रकार की विकृति उम्र के साथ आती है। कुत्तों में भी उम्र बढ़ने के साथ एक बिमारी देखने को मिलती है। जिसे Dog Dementia के नाम से जाना जाता है। वैसे कुत्तों की औसत आयु 10 से 12 वर्ष होती है ऐसे में 8-10 वर्ष की अवस्था के दौरान उनमें यह बिमारी देखने को मिल सकती है। इस बिमारी के कारण वे अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। जैसे -

·       उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है, परिचित लोगों को भी नहीं पहचान पाते हैं।

·       बिना वजह रात को लगातार भौंकते हैं।

·       उदासी, चिड़चिड़ापन से ग्रसित हो जाते हैं।

पहले हनुमान जी, फिर दुर्गा जी की परिक्रमा कर उदासी की अवस्था में बैठे इस कुत्ते के साथ भी संभवतः यही समस्या हो सकती है। पशु चिकित्सक इसकी बेहतर जांच कर कुत्ते को सुकून भरा जीवन दे सकते हैं। इस अंधविश्वास में जीते हुए कि यह कुत्ता भगवान का भक्त है, हम उसकी पूजा अर्चना कर उसके साथ ज्यादती करें, इससे अच्छा उसे पशु चिकित्सक को दिखाना ज्यादा आवश्यक लगना चाहिए।

इस घटना से मेरी एक और भ्रांति भी दूर हुई। रात को कई बार बेवजह कुत्तों को भौंकते हुए देखा सुना है। अन्य लोगों के साथ-साथ मुझे भी लगता था कि कुत्तों को आत्माएं दिखती है इस कारण से वे उस दिशा में मुंहकर भौंकते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि ‘यहाँ कोई है’। आप समझ आया कि कोई कुत्ता यदि रात को बेवजह भौंक रहा है तो इसका अर्थ है – वह कुत्ता Dog Dementia बिमारी की चपेट में है न कि उसे कोई आत्मा दिख रही है।

याद रखें आलोचनात्मक चिंतन ही वह कौशल है जो हमें अंधविश्वास से मुक्त कर सकती है।

Saturday, 3 January 2026

आईपीएल में बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद: असली मुद्दा या ध्यान भटकाने की चाल?

पिछले कुछ दिनों से राजनेता से लेकर कई कथा वाचक जैसे देवकीनंदन, रामभद्राचार्य आदि बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान पर अलग-अलग सभाओं, मीडिया बाइट्स देने के दौरान भड़कते नजर आए। वे उन्हें ‘गद्दार’ से लेकर कई तरह के अपमानजनक उपमाओं से नवाज़ रहे हैं। ऐसा कहने के पीछे उनके पास कोई ठोस आधार नहीं है। उनको भड़काने का काम कई मीडिया चैनल से लेकर न्यूज एजेंसी कर रही है। ये भड़कने-भड़काने का खेल शाहरुख खान के किसी फ़िल्म को लेकर नहीं था बल्कि शाहरुख खान की मालिकता वाली टीम ‘कोलकाता नाइट राइडर्स’ (जिसमें उनकी 55% हिस्सेदारी है, बाकी के 45% हिस्सेदारी मेहता ग्रुप के पास है) में बांग्लादेश के खिलाड़ी ‘मुस्ताफिजुर रहमान’ को आईपीएल सीज़न 2026 में अपनी टीम की ओर से खेलने के लिए 9.20 करोड़ में खरीदने के कारण था।

हालांकि यह पहला मौका नहीं था जब बांग्लादेशी क्रिकेटर्स को किसी टीम ने खरीदा था। जिस खिलाड़ी को लेकर विवाद शुरू हुआ है वह इससे पूर्व 2016 में सनराइजर्स हैदराबाद, मुंबई इंडियन्स (2018) और दिल्ली कैपिटल्स (2022, 2023 एवं 2025) चेन्नई सुपर किंग्स (2024) जैसे टीम के साथ भी इससे पूर्व जुड़े रहे हैं। सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ दिनों ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह विरोध ट्रेंड करने लगा, मीडिया इसे प्रमुखता देने लगी? आइए इसे समझने का प्रयास करते हैं।  

 दिनांक 16 दिसंबर 2025 को आईपीएल 2026 के लिए देश विदेश के क्रिकेट खिलाड़ियों की नीलामी होती है। जिसमें शाहरुख खान की टीम द्वारा बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्तफिजूर रहमान को खरीदा जाता है। इसके 2 दिन बाद बांग्लादेश में 18 दिसंबर 2025 को कुछ कट्टरपंथियों द्वारा एक हिंदू व्यक्ति दीपू दास की हत्या कर दी जाती है। इस घटना से बांग्लादेश के प्रति भारत के लोगों का आक्रोश बढ़ जाता है। इस घटना का निष्पक्ष अवलोकन करें तो सवाल यह बनता है कि इसमें शाहरुख खान की क्या गलती? पहली बात तो ये है कि मुस्तफिजुर रहमान की नीलामी दीपू दास की हत्या के 2 दिन पूर्व हो चुकी थी। यानी भारतीय लोगों की भावनाएँ भड़कने के 2 दिन पूर्व ही इसकी नीलामी हो चुकी थी। दूसरी बात - खिलाड़ियों को नीलामी में शामिल करने का फैसला आईपीएल को आयोजित करने वाले समिति का था। ऐसे में यदि किसी देश के खिलाड़ी को नीलामी की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है तो इसके लिए उत्तरदायी आईपीएल आयोजित करने वाली समिति है। न कि किसी टीम का मालिक।

ऐसे में सवाल उठता है कि किसी देश के खिलाड़ी को किसी क्रिकेट टूर्नामेंट के खेलाने के लिए ये बीसीसीआई या आप आईपीएल आयोजन समिति का विरोध क्यों नहीं करते? क्या यह अज्ञानता में ऐसा कर रहे हैं? या कोई सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है। मेरा मानना है कि बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद को फालतू मुद्दा बनाने, और बढ़ावा देने के पीछे संगीत सोम, देवकीनंदन, रामभद्राचार्य से लेकर NDTV जैसे घटिया चैनल की सोची समझी साजिश है। मैं यह बात कोई हवा हवाई नहीं कर रहा हूँ, बल्कि इसके पीछे कुछ आधार हैं। पिछले 10 दिन के घटनाक्रम का अवलोकन करें तो पाते हैं कि जो कुछ भी देश भर में घटित हुआ है वह बीजेपी के लिए कलंक की तरह है। इस विमर्श में जो भी राजनेता से लेकर कथावाचक शामिल रहे हैं वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे होते हैं।

अब पिछले 2-3 सप्ताह की घटनाओं का अवलोकन करते हैं।

·       उन्नाव रेप कांड में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सजा प्राप्त पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर की सजा का निलंबन। इस दौरान बीजेपी समर्थित नेताओं/लोगों द्वारा कुलदीप सेंगर का पक्ष लेना (जिससे क्रुद्ध होकर देश की जनता ने बीजेपी को target करते हुए खूब खरी खोटी सुनाई)।

·       अंकिता भंडारी मर्डर में बीजेपी नेता का नाम आना,

·       बीजेपी शासित उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून में नार्थ ईस्ट के student का मर्डर कांड,

·       क्रिसमस के अवसर पर बीजेपी समर्थित संगठनों की गुंडागर्दी और उसपर बीजेपी नेताओं की चुप्पी,

·       इंदौर में दूषित जल से हुई मृत्यु पर बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय द्वारा एक पत्रकार को अपशब्द कहा जाना।

ये घटनाएं बीजेपी के लिए अभिशाप बन रही थी। सोशल मीडिया पर बीजेपी की खूब आलोचना हो रही थी। ऐसे में विमर्श को भटकाने के लिए ये नया शिगूफा छोड़ा गया है। ताकि विमर्श का मुद्दा बदल जाए साथ ही बंगाल चुनाव तक हिंदू मुसलमान मुद्दा जीवित रह सके।

Saturday, 6 December 2025

पांच दिवसीय नवीन पाठ्यपुस्तक उन्मुखीकरण कार्यशाला का समापन

 शासकीय माध्यमिक शाला खिलोरा (बेमेतरा) में दिनाँक 2 से 6 दिसंबर 2025 तक पूर्व माध्यमिक शाला के शिक्षकों के लिए नवीन पाठक पुस्तक उन्मुखीकरण कार्यशाला आयोजित की गई। इस पांचदिवसीय कार्यशाला में बेमेतरा विकासखंड के पूर्व माध्यमिक शालाओं के 200 से अधिक शिक्षकों को वर्ष 2025 में लाए गए विज्ञान (जिज्ञासा), सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन), अंग्रेजी (पूर्वी), संस्कृत (दीपकम) विषय के नवीन पाठ्यपुस्तकों का उन्मुखीकरण किया गया। इन विषयों के अतिरिक्त नए जोड़े गए पाठ्यपुस्तक जैसे - खेल एवं योगशिक्षा (खेल यात्रा), कला शिक्षा (कृति 1), व्यावसायिक शिक्षा (कौशल बोध) से भी शिक्षकों को परिचित कराया गया।

शासकीय माध्यमिक शाला, खिलोरा के चार अलग-अलग कमरों में आयोजित इस कार्यशाला में सभी शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मुख्य प्रावधनों से परिचित कराते हुए इसके क्रियान्वयन हेतु बनाए गए दस्तावेज राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) 2023 से परिचित कराया गया। तत्पश्चात इसमें उल्लेखित सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, अंग्रेजी, संस्कृत आदि विषयों को पढ़ाने के उद्देश्य, पाठचर्या के लक्ष्य, शिक्षण विधि, इस हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले शिक्षण सहायक सामग्री, संबंधित सीखने के प्रतिफल, आदि को गतिविधियों के माध्यम से करके बताया गया। शिक्षकों को प्रत्येक विषय का अध्याय वार डेमो कराकर विषय पर गहराई से समझ विकसित करने का प्रयास किया गया।

इन पांच दिनों के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के एक प्रमुख लक्ष्य – ‘बच्चों को 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने’ को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त गतिविधियों पर समझ विकसित किया गया। इन बिंदुओं पर चर्चा केंद्रित रही -

·       कक्षा में अलग-अलग विषय वस्तु पर छोटे-छोटे प्रोजेक्ट देकर बच्चों को स्वयं से समझ के साथ किसी अवधारणा को सीखने के किस प्रकार मौके दिए जा सकते हैं?

·       सीखने की प्रक्रिया में रोचकता लाने के लिए अलग अलग प्रकार की विधियों जैसे - टीएलएम के प्रयोग, रोल प्ले, वाद-विवाद, बातचीत के मौके देकर उनमें आलोचनात्मक चिंतन इसका कौशल लाया जाए?

·       बच्चों के सीखने में शिक्षकों के साथ-साथ समुदाय के विषय विशेषज्ञ की एक स्रोत व्यक्ति के रूप में किस प्रकार सेवाएं लिया जा सकता है?

·       अलग-अलग अवधारणाओं पर समझ बनाने में कक्षा का प्रिंट समृद्ध माहौल किस प्रकार सहायक है?

·       प्रत्येक पाठ शिक्षण के दौरान किन अलग अलग प्रकार के शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जा सकता है?

कार्यशाला के समापन पर पांचवें दिन BEO- Bemetara, BRC – Bemetara एवं DIET, Bemetara के faculty शिक्षकों का उत्साहवर्धन करने हेतु शामिल हुए। सभी शिक्षकों को सक्रिय सहभागिता हेतु सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया। चारों विषय के कुल 12 मास्टर ट्रेनर ने सत्र को संचालित किया। इस कार्यशाला में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, बेमेतरा के तीन सदस्य नेहा (विज्ञान) श्रेया (अंग्रेजी) एवं साकेत (सामाजिक विज्ञान) विषय में शामिल हुए।


Thursday, 2 October 2025

सोनम वांगचुक : Rote Learning से Learn By Doing की ओर ले जाने वाला शिक्षाविद

दिनांक 24 सितंबर 2025 को लेह-लद्दाख के लोगों द्वारा किया जा रहा है आंदोलन अचानक से हिंसक हो जाता है। लेह लद्दाख के लोगों द्वारा अपनी मांगों के समर्थन में किया जा रहा है ये आंदोलन कोई नया आंदोलन नहीं था, बल्कि यह 5 अगस्त 2019 को कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद से ही चलना शुरू हो गया था। भूख हड़ताल जैसे तरीकों से चलाया जा रहा है यह आंदोलन शांतिपूर्ण था, इसीलिए भी स्थानीय मीडिया को छोड़कर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की नज़र इस ओर नहीं गई, गई भी तो भी कोई खास प्रमुखता नहीं मिली। इस हिंसा के लिए लेह-लद्दाख के अति चर्चित शिक्षा सुधारक व क्लाइमेट एक्टिविस्ट के नाम से मशहूर सोनम वांगचुक को जिम्मेदार माना जाता है। वे पिछले 5 वर्षों से लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने एवं पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए गांधीवादी आदर्शों पर चलते हुए अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण आंदोलन करते रहे थे।[i] इस हिंसक आंदोलन के दौरान भी वे भूख हड़ताल पर थे।

एक शांतिपूर्ण आंदोलन के हिंसक रूप ले लेने से 4 लोगों की मौत एवं 80 से अधिक लोग घायल हो जाते हैं।[ii] हिंसा से चिंतित होकर सोनम वांगचुक भूख हड़ताल खत्म कर देते हैं। इसी क्रम में पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनके खिलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जोधपुर (राजस्थान) जेल भेज दिया जाता है। साथ ही सोनम वांगचुक के NGO ‘Himalayan Institute of Alternatives Ladakh’ का FCRA लाइसेंस रद्द कर उनपर वित्तीय अनियमितताओं एवं विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाया जाता है।[iii]    

इसके पश्चात् केंद्र सरकार समर्थित मीडिया चैनलों (जिसे गोदी मीडिया के नाम से जाना जाता है) आईटी सेल ने सोनम वांगचुक की छवि पर कीचड़ उछालने के लिए शैक्षणिक उद्देश्यों को लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश की यात्रा से संबंधित फोटो/विडिओ, अनसन के दौरान किए जा रहे संवादों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर उल-जुलूल आरोप लगाने लग जाते हैं। मज़े की बात यह है कि जिस फोटो/विडिओ का ये इस्तेमाल करते हैं, वह सभी सोनम वांगचुक के सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म से ही लिए गए। सोचने वाली बात यह है कि गलत इरादे से यदि कोई व्यक्ति पाकिस्तान या बांग्लादेश की यात्रा करता है, तो वह इससे संबंधित फोटो या वीडियो क्यों साझा करेगा? वह तो इसे यात्रा को गुप्त रखना चाहेगा। सोनम वांगचुक जैसे तार्किक व्यक्ति से ऐसी उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है।

इनकी रिपोर्टिंग ऐसी है कि आपको लगेगा सोनम वांगचुक ने लद्दाख के युवाओं (जिसे ये Gen-Z संबोधित करते हैं) ने सड़क पर हिंसा फैलाने का आह्वान किया हो।[iv] हालांकि अच्छी बात यह है कि पत्रकारिता की लाज रखने वाले बहुत सारे निष्पक्ष पत्रकारों ने गोदी मीडिया की इस हरकत की चीर फाड़ करते हुए इनकी घटिया हरकतों को लोगों के सामने ला दिया। इनके द्वारा साझा किए जा रहे फोटो वीडियो की वास्तविकता जानने के लिए रवीश कुमार, ध्रुव राठी आदि के बनाये हुए वीडियो देखा जा सकता है।

कौन हैं सोनम वांगचुक

हम सभी ने राजकुमार हिरानी के लेखन-निर्देशन में 2009 ई. में बनी कॉमेडी-ड्रामा ‘थ्री इडियट’ फ़िल्म देखी होगी। उस फ़िल्म में एक करेक्टर फुनसुक वांगड़ू का है, जो लेह-लद्दाख में एक स्कूल चलाता है, बच्चों को नए नए आविष्कार करने के लिए प्रेरित करता है। फुनसुक वांगड़ू का ये करेक्टर सोनम वांगचुक से ही प्रेरित था। फ़िल्म में उनके कई वास्तविक आविष्कारों को दिखाया गया था।[v]

इंजीनियरिंग की पढ़ाई किए सोनम वांगचुक के कार्यों ने देश-दुनिया के लोगों को प्रभावित किया। यही कारण है कि देश-विदेश के लोगों/संस्थाओं के साथ कार्य से प्राप्त अनुभवों को सेमीनार, चर्चा जैसे अलग-अलग आयोजनों के माध्यम से साझा करने हेतु देश-विदेश की यात्रा भी करते रहते हैं। शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में इनके उल्लेखनीय योगदान हैं। दोनों ही क्षेत्र के योगदान एक दूसरे से गुंथे हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए योगदान से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज के साथ साथ पर्यावरण का हित भी जुड़ा होता है। शिक्षा के क्षेत्र में सोनम वांगचुक के कार्यों को यहाँ संक्षेप में जानने समझने का प्रयास आइए करते हैं।

Students Educational and Cultural Movement of Ladakh(SECML) के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

जब हमारे देश में पारंपरिक शिक्षा प्रणाली (जिसमें स्मरण को महत्त्व दिया जाता है) प्रमुखता से प्रचलित था, तब इस प्रणाली से अलग हटकर सोनम वांगचुक ने व्यावहारिक शिक्षा देने के उद्देश्य से लेह के ‘फे’ गाँव में 1988 ई. एक स्कूल Students Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECML) शुरू किया था।[vi] इस स्कूल की शुरुआत विशेष रूप से उन बच्चों के लिए की गई थी जो 10 वीं कक्षा में फेल हो जाने के कारण आगे बढ़ नहीं पाते थे या किसी अन्य कारणों से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते थे, या आर्थिक रूप से कमजोर होते थे।

बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान देने की वकालत करने वाली इस संस्था ने शुरुआत में बच्चों के लिए कार्य किया ही। कालान्तर में सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक सुधार के लिए भी कार्य किया। वर्ष 1998 ई. में जब लद्दाख के 95 % छात्र/छात्राएं 10वीं कक्षा में फेल हो गए थे तो इस संस्था ने सरकार के साथ मिलकर सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की योजना बनाई। 2007 तक संस्था ने स्थानीय सरकार के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने का कार्य किया।[vii] संस्था के शिक्षा सुधार हेतु प्रयास का ही फल था कि 2003-2006 के बीच 50% छात्र/छात्राएं 10वीं की परीक्षा में सफल हुए। इस दौरान संस्था ने शिक्षा क्षेत्र के सक्रिय भागीदारी के बदौलत कई समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान दिलाया। जैसे –

·      पाठ्यपुस्तकों के बच्चों की मातृभाषा में न होने के कारण बच्चों को होने वाली समस्याएँ (प्राथमिक शालाओं में पाठ्यपुस्तक की भाषा उर्दू में, जबकि उच्च प्राथमिक शालाओं में भाषा अंग्रेजी होती थी। इसके विपरीत बच्चों की भाषा लद्दाखी होती थी)

·      पाठ्यपुस्तकों में स्थानीय संदर्भ के शामिल न होने से बच्चों को होने वाली समस्याएं (पाठ्यपुस्तक दिल्ली से प्रकाशित होते थे जिसमें अलग अलग राज्यों के संदर्भ तो होते थे। लेकिन लेह-लद्दाख के नहीं, इससे बच्चे उस पाठ से जुड़ाव महसूस नहीं करते थे)

·      शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था न होने से शिक्षा की गुणवत्ता पर होने वाले प्रभाव (शिक्षक शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक आदि से परिचित नहीं होते थे)  

·      शिक्षकों के प्रत्येक दो वर्षों में होने वाले स्थानांतरण से होने वाली समस्या (प्रत्येक दो वर्ष में शिक्षकों को स्थानांतरित कर दिया जाता था)

·      अभिभावकों का स्कूल से जुड़ाव[viii]

संस्था ने शिक्षा के क्षेत्र की समस्याओं से न केवल स्थानीय सरकार को परिचित कराया बल्कि उस समस्या के समाधान के लिए भी प्रयास किया। उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए संस्था ने 1994 में Operation New Hope (ONH) कार्यक्रम चलाया। उद्देश्य था –

·      Village Education Committee (VECs) बनाकर ग्राम समुदाय को स्कूल से जोड़ना।

·      शिक्षकों को गतिविधि आधारित प्रशिक्षण देना ताकि सीखने की प्रक्रिया को रुचिकर बनाया जा सके।

·      लद्दाख के स्थानीय परिवेश एवं भाषा को ध्यान में रखते हुए शिक्षण सामग्री का निर्माण करना/कराना।

·      शिक्षकों को स्कूल में समर्पण भाव से कार्य करने हेतु प्रेरित करना।

वर्ष 2007 तक इस संस्थान ने शिक्षा के क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के साथ-साथ शालाओं में शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने का हर संभव प्रयास किया। 2007 में लेह के जिलाधिकारी के साथ विवाद के पश्चात् संस्था पर लगाए गए ‘Anti National’ गतिविधियों के आरोप के बाद शिक्षकों की गुणवत्ता पर इस संस्था ने कार्य करना बंद कर दिया। वर्ष 2013 में कोर्ट ने इन आरोपों को बेबुनियाद पाते हुए सोनम वांगचुक को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

यह संस्थान वर्तमान में भी कार्यरत है। यहाँ रहना, खाना, पढ़ाई सभी या तो निःशुल्क होती है, या इसके लिए बहुत ही न्यूनतम पैसे लिए जाते हैं। जीवन जीने के लिए आवश्यक कौशल व मूल्य जैसे जिम्मेदारी, समस्या समाधान, सामूहिक सहयोग, आत्मनिर्भरता, योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन, नेतृत्व कौशल जैसे बिंदुओं पर कार्य किया जाता है। बच्चों में जिन कौशल को विकसित करने की बात भारत सरकार ने हाल-फिलहाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से की गई है, उस पर सोनम वांग्चुक 1990 के दशक से ही कार्य कर रहे हैं। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने हेतु या संस्था लगातार प्रयासरत है।

Students Educational and Cultural Movement of Ladakh(SECML) एक तरह से महात्मा गाँधी के नई तालीम की तर्ज पर विकसित किया गया यह स्कूल है, जहाँ बच्चों को 21वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने की योजना पर कार्य किया जा है। यह स्कूल यहाँ के छात्र/छात्राओं के द्वारा ही चलाया जाता है। खाना बनाने, साफ सफाई, बिजली-पानी की देखरेख के साथ-साथ अन्य कई कार्य यहाँ के छात्र/छात्राओं के द्वारा ही किये जाते हैं।

‘सूर्य की गर्मी को संरक्षित कर ठंडे इलाकों में रहने लायक घर बनाना’ ‘पानी के संरक्षण के लिए कृत्रिम ग्लेशियर बनाना’ ‘ग्रीन हाउस फार्मिंग’ जैसे परियोजना कार्य में सोनम वांग्चुक के साथ-साथ यहाँ के छात्र/छात्राओं की भूमिका को पूरी दुनिया जानती है।

Himalayan Institute of Alternative Ladakh’ (HIAL) के माध्यम से शिक्षा, पर्यावरण के क्षेत्र में योगदान

सोनम वांगचुक ने 2017 में ‘Students Educational and Cultural Movement of Ladakh(SECML) से प्राप्त अनुभवों के आधार पर Himalayan Institute of Alternative Ladakh’ (HIAL) नामक एक गैर सरकारी संगठन (NGO) एवं संस्थान की स्थापना की जो पर्यावरण के क्षेत्र में नवाचार के साथ-साथ सामाजिक कार्यों (सामाजिक जागरूकता) को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। करके सीखने (Learning by Doing) के एप्रोच पर यह संस्था कार्य करती है। सोनम वांगचुक इसे ‘रेजिस्टर्ड चैरिटेबल ट्रस्ट’ की संज्ञा देते हैं। सोनम वांग्चुक के अनुसार इस संस्था से अभी तक 400 से अधिक छात्र/छात्राएं पढ़ाई पूरी कर चूके हैं। इस संस्था ने पानी संकट से निपटने के लिए ‘आइस स्तूप प्रोजेक्ट’  जैसी सफल पहल की है।[ix] संस्थान के उल्लेखनीय कार्य के लिए हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री इस संस्था की तारीफ कर चूके हैं।[x]

लेह लद्दाख में हुए हिंसा के लिए सोनम वांगचुक कितने जिम्मेदार हैं, उनपर NSA लगाना कितना जायज है? यह तो अदालत ही तय करेगी। लेकिन उपरोक्त आधार पर यदि हम सोनम वांगचुक के कार्यों को विष्लेषित करें तो उनके कार्य उन्हें एक दूरदर्शी सोच वाला, एक अद्भुत शिक्षाविद, पर्यावरण हितैषी, विदेशों में भारतीयता का मान-सम्मान को बढ़ाने वाला, देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति के रूप में स्थापित करते हैं। उम्मीद करते हैं कि जिस तरह 2007 में इनपर लगे Anti-National गतिविधियों में लिप्त होने के आक्षेप से 2013 में मुक्त हुए और शिक्षा के क्षेत्र में पुनः लेखनीय योगदान देना शुरू किए। वैसे ही वर्तमान में भारत सरकार द्वारा लगाये गए आक्षेपों से शीघ्र ही मुक्त होकर देश को एक सकारात्मक दिशा में ले जाने में योगदान दे रहे होंगे।


Saturday, 13 September 2025

कभी कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग ने एक साथ सरकार चलाया था।

1946 में ब्रिटिश हुकूमत के समय हमारे देश में एक अंतरिम (अस्थायी) सरकार बनी थी। उद्देश्य था - आजादी से पहले भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू करना। ब्रिटिश सरकार ने भारत को आजादी देने के लिए एक कैबिनेट मिशन जिसे क्रिप्स मिशन भी कहा जाता है, को भारत भेजा। इस आयोग ने एक संविधान सभा बनाने और तब तक एक अंतरिम सरकार चलाने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव के तहत 1946 में प्रांतीय विधानसभाओं में चुनाव कराए गए। कुल 1585 सीटों पर चुनाव हुए।

कांग्रेस पार्टी को 923 सीट, मुस्लिम लीग को 425 सीट एवं अन्य पार्टियों या स्वतंत्र उम्मीदवार को 237 सीट मिली। कांग्रेस को गैर मुस्लिम क्षेत्रों में बहुमत मिला तो वही मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों में 90% से ज्यादा सीट पर जीत दर्ज की। इससे मुस्लिम लीग को मुसलमानों के एक मात्र प्रतिनिधि होने का अभिमान आ गया।  

इस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे काँग्रेस पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। इस तरह 2 सितंबर 1946 को कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में अंतरिम सरकार बनी। तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड वेवेल एवं उनके पश्चात् लॉर्ड माउंटबेटेन इस अंतरिम (अस्थायी) सरकार की अध्यक्ष थे। जबकि जवाहर लाल नेहरू इसके उपाध्यक्ष थे। यह सरकार 15 अगस्त 1947 तक स्थायी सरकार बनने तक चली।

मजेदार बात यह है कि इस सरकार में पक्ष और विपक्ष (कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि) दोनों शामिल किए गए थे। एक सिख प्रतिनिधि को भी शामिल किया गया था। सभी प्रतिनिधियों को कुछ इस प्रकार से जिम्मेदारियां प्राप्त थी -

·       जवाहरलाल नेहरू (कांग्रेस) के पास विदेशी मामलों की जिम्मेदारी थी।

·       सरदार वल्लभ भाई पटेल (कांग्रेस) के पास गृह विभाग था।

·       डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद (कांग्रेस) के पास खाद्य एवं कृषि विभाग की जिम्मेदारी थी।

·       सी राजगोपालाचारी (कांग्रेस) के पास शिक्षा विभाग को संभालने की जिम्मेदारी थी।

·       जॉन मथाई (कांग्रेस) के पास उद्योग एवं आपूर्ति विभाग, रफ़ी अहमद किदवई (कांग्रेस) के पास संचार विभाग,  

·       बल्देव सिंह (सिक्ख प्रतिनिधि) को रक्षा विभाग संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी।

अक्टूबर 1946 में मुस्लिम लीग के कुछ सदस्यों को भी ब्रिटिश सरकार द्वारा अंतरिम सरकार में शामिल कर लिया गया और उन्हें भी कुछ विभागों की जिम्मेदारी दी गई। जो इस प्रकार थे –

·       लियाकत अली खान (मुस्लिम लीग) को वित्त विभाग

·       अब्दुर रब निश्तर को डाक एवं हवाई विभाग

·       आई आई चुंदरीगर को वाणिज्य विभाग

·       जोगेंद्र नाथ मंडल को विधि (law) विभाग एवं गजनफर अली खान को स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मिली।

यहाँ पर सवाल उठता है कि 1946 की अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के नेताओं को शामिल क्यों किया गया था? इसके पीछे का तर्क क्या था? इसके पीछे 2 मुख्य कारण थे –

1.     चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी दावा करती थी कि वह पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर (विशेष रूप से जो मुसलमानों के लिए आरक्षित थे) मुसलिम लीग के शत प्रतिशत बहुमत ने यह साबित कर दिया कि ‘कांग्रेस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है’। इस चुनाव के परिणाम ने मुसलिम लीग एवं कांग्रेस को बराबरी की स्थिति पर ला खड़ा कर दिया। एक को मुसलमानों का बहुमत प्राप्त था तो दूसरे को गैर मुसलमानों का। ऐसे में ब्रिटिश सरकार को दोनों ही पी पार्टियों के प्रतिनिधियों को अंतरिम सरकार में शामिल करने का निर्णय लेना पड़ा। शुरुआत में मुस्लिम लीग चूंकि पाकिस्तान की मांग पर अड़ी थी। इसीलिए कांग्रेस के साथ सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं थी। लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव एवं सत्ता में हिस्सेदारी की चाह ने अक्टूबर 1946 में अंतरिम सरकार में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा।   

2.     दूसरा एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि उस दौरान मुस्लिम लीग के सर्वोच्च नेता मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग काफी बलवती थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी शुरुआती विरोध के बाद मजबूरन चाहने लगी कि यदि मुस्लिम लीग को सरकार में हिस्सा दिया जाए तो शायद वह विभाजन की मांग से पीछे हट जाएगी या नरम पड़ जाएगी। इसलिए कांग्रेस ने भी पी अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग को शामिल करने के फैसले का कोई खास विरोध नहीं किया।  

कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद थी कि मुस्लिम लीग से सहयोग मिलेगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। मुस्लिम लीग के लियाकत अली को कांग्रेस ने वित्त विभाग दिया। लेकिन लियाकत अली ने अलग अलग विभागों के वित्तीय आवंटन में बार बार अड़चन लगाने के साथ साथ कई अन्य मौकों पर पी ऐसे कार्य किए जिससे कांग्रेस को अपनी नीतियों के लागू करने में अड़चन आया। अधिकांश मौकों पर मुसलिम लीग केवल यह दिखाने का असफल प्रयास करती रही कि मुसलमानों का वास्तविक रहनुमा मुस्लिम लीग है, कांग्रेस नहीं। इस प्रकार अंतरिम सरकार में रहते हुए भी मुस्लिम लीग तोड़फोड़ की राजनीति करती रही। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के नेताओं को यह लगने लगा कि विभाजन ही अंतिम रास्ता बचा है।

उपरोक्त घटनाओं का यदि हम विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने देश को विभाजित होने के प्रयासों को रोकने का हर संभव प्रयास किया, मुस्लिम लीग को सरकार में जगह दी सिर्फ इसलिए कि पाकिस्तान का राग अलापना ये छोड़ दें। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और मजबूरन उसे देश विभाजन को स्वीकार करना पड़ा।