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Sunday, 29 December 2024

धर्मांतरण (Religious Conversion) रोकने हेतु उपयुक्त उपाय

 धर्मांतरण हमारे देश में धार्मिक विवाद का एक प्रमुख कारण है। इस कार्य को ईसाई मिशनरी प्रमुखता से अंजाम देते रहे हैं विशेष रूप से ब्रिटिश काल से। इन ईसाई मिशनरियों के मुख्य target होते हैं तथाकथित हिंदू समाज के तथाकथित दलित और आदिवासी जनता। तरह तरह के प्रलोभन देकर वे भोली भाली जनता को ईसाई धर्म में धर्मांतरण करते हैं। अपने धर्म की ओर लोगों को आकर्षित करने के लिए हमारे देश के ऐसे क्षेत्र जहाँ बुनियादी सुविधाएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि नहीं पहुँच पाए हैं, में उपलब्ध कराकर खुद को उनके लिए सरकार से बेहतर साबित कर अपने धर्म की ओर लाने का प्रयास करते हैं।

अधिकांश धर्मांतरित करने वाले व्यक्ति की गणना हिंदू वर्णव्यवस्था के अंतर्गत शुद्र या अस्पृश्य जातियों, जनजातियों में की जाती है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा जीवन के अंतिम पड़ाव में बौद्ध धर्म अपना लेने के बाद से अस्पृश्य जातियों से संबंधित उनके अनुयायी प्रति वर्ष नागपुर में बौद्ध धर्म भी अपना कर बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या लगातार बढ़ा रहे हैं। हिंदू कट्टरपंथियों को यह धर्मांतरण फूटी आंख नहीं सुहाती है। विशेष रूप से ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण। झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ आदि में जैसे ही इन्हें खबर मिलती है, ये पहुँच जाते हैं, उस धर्मान्तरित व्यक्ति के शुद्धिकरण के लिए।

आखिर कारण क्या है इस धर्मांतरण का? और अधिकांश धर्मांतरण तथाकथित हिंदुओं के ही क्यों होते हैं? क्या तथाकथित हिंदू बहुसंख्यक हैं, इसलिए हिंदू धर्मांतरण की ही खबरें हमें मिल पाती हैं? कोई मुस्लिम व्यक्ति के ईसाई बनने के उदाहरण देखने को मिलते हैं क्या? उत्तर है संभवतः नहीं। अपवाद स्वरूप कुछ उदाहरण हो सकते हैं। इतिहासकार इरफान हबीब मध्यकालीन भारत पर लिखे अपनी पुस्तक में बताते हैं कि दलित जातियों को मुस्लिम शासकों से मिले स्नेह के कारण वे स्वेच्छा से इस्लाम में धर्मांतरित हुए। कुछ हद तक ये बात तार्किक लगती है। संभवतः यही मुख्य कारण हैं लोगों के ईसाई धर्मांतरण के। जिन इलाकों में ईसाई धर्मांतरण अधिक हुआ है वहां से भी जातिगत भेदभाव व खराब आर्थिक स्थिति इस बात पर मुहर लगाते हैं। यही कारण है कि अपने सामाजिक-आर्थिक स्थिति से असंतुष्ट लोग धर्मांतरण का रास्ता अपनाते हैं। हालांकि ये चमत्कार से रोगी को ठीक करने के लिए शिविर आयोजित करते हैं, जो कि केवल एक पाखंड, झूठ होता है और कुछ नहीं।

वैसे तो भारतीय संविधान अपने नागरिको को अपनी पसंद के धर्म चुनने की आजादी देती है, लेकिन धर्मांतरण रोकने वाले लोग इन नियमों से अनजान होते हैं। यदि हिंदू धर्म के तथाकथित उच्च जातियों के लोग SC, ST के साथ जाति के नाम पर भेदभाव ऐसे ही करते रहे, जैसा भारतीय संविधान बनने के पूर्व करते रहे थे, तो धर्मांतरण रुकने से रहा। लोग चोरी छिपे आज या कल धर्मांतरण करेंगे ही, क्योंकि उन्हें लगता है कि जीस नए धर्म को ये लोग अपनाने जा रहे हैं, वह उन्हें समानता का अधिकार देता है। हालांकि यह बात एक मृग मरीचिका जैसी है। इस्लाम हों या ईसाई इन लोगों को मूल धर्म वाले अलग नजर से ही देखते हैं। तथाकथित हिंदू समाज के तथाकथित उच्च जाति के लोग इन सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को घृणा की नजर से यदि देखना बंद कर दें, धर्मांतरण रुक जाएगा। किसी को शुद्धिकरण की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी।

Tuesday, 9 May 2023

महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा बौद्ध धर्म में प्रचलित झूठी मान्यताओं पर कटाक्ष

यायावरी साहित्यकार के नाम से प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन की गणना ऐसे महान विद्वानों के साथ किया जाता है जिन्होंने कहानीकार, संस्मरणकार, इतिहासकार के रूप में हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। साहित्य की शायद ही कोई विधा उनसे अछूती रही हो। अपनी लेखनी से जहां इन्होंने हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध किया वहीं यायावरी जीवन के माध्यम से बौद्ध साहित्यों के संरक्षण के लिए इन्हें पूरी दुनिया सम्मानित नज़र से देखती है। इस योगदान के लिए प्रेमचंद मई 1933 में उनकी प्रशंसा करते हुए में लिखते हैं, राहुल जी कदाचित वह पहले बौद्ध सन्यासी हैं, जिन्होंने तीन वर्ष तिब्बत में रहकर पालि का ज्ञान प्राप्त किया और वहाँ से बौद्ध साहित्य की लगभग 10 हज़ार प्राचीन पुस्तकें लेकर भारत लौटे[1] ज्ञात हो कि बौद्ध धर्म पर शोध के दौरान उन्होंने भारत, तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका, चीन, जापान, ईरान, रूस, इंग्लैंड आदि देशों की यात्रा किया, वहां के इतिहास, भूगोल, संस्कृति को जाना समझा, वहाँ के साहित्यों को भारत लाया, इसका अध्ययन किया एवं इसके संबंध में अपने यात्रा वृतांत में लेखबद्ध किया। इन साहित्यों को भारत लाने के लिए उन्होंने तिब्बत व अन्य देशों के उन दुर्गम स्थानों की भी यात्रा की जहां पैर रखने का कोई भी साहस नहीं कर सका था, जहां जाने में लोग भय खाते थे।[2] अलग-अलग देशों से लाए इन साहित्यों को पटना संग्रहालय में देखा जा सकता है। 9 अप्रैल 1893 ई. को पंदहा गाँव आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे राहुल सांकृत्यायन जी को बचपन में केदारनाथ पांडे के नाम से जाना जाता था। यायावर जीवन जीते हुए 1930 में श्रीलंका यात्रा के दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तब उनका नाम 'राहुल' हो गया। साथ ही संकृति गोत्र से संबंधित होने के कारण अपने नाम के अंत में 'सांकृत्यायन उपनाम लगाते थे। इससे पूर्व कुछ दिनों तक बाबा रामउदार के नाम से परसा (बिहार) स्थित एक मठ के उत्तराधिकारी के रूप में भी कार्य किया। अपने 70 वर्षों के जीवन में उन्होंने 140 प्रकाशित रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक विशिष्ट मुकाम दिया। इसके उप्लक्ष्य में 1958 ई. में उन्हें साहित्य जगत के शिखर पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार से एवं 1963 ई. में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

          राहुल सांकृत्यायन की गिनती साहित्यकार, इतिहासकार के साथ-साथ अपने समय के एक प्रसिद्ध तर्कशास्त्री के रूप में की जाती है। अपने वैज्ञानिक चिंतन एवं तार्किक कौशल का उपयोग करते हुए उन्होंने समाज से अंधविश्वास उन्मूलन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। 1914- 15 ई. के दौरान वे आर्य समाज के संपर्क में रहे जिसके पश्चात समाज में प्रचलित धर्म संबंधी मिथ्या धारणाओं के खंडन करने की प्रवृति उनमें जागृत हुई। वे ईसाई, इस्लाम, यहूदी, बौद्ध के साथ-साथ हिंदू धर्म के अनेक संप्रदायों को झूठा धर्म, वेद एवं विज्ञान के प्रकाश में शीघ्र ही लुप्त हो जाने वाला धर्म समझते थे। वे उपयुक्त तर्क एवं दलील द्वारा प्रतिद्वंदी को अपने रास्ते पर लाने के पक्षपाती थे।[3] अपने कालपी प्रवास के दौरान राहुल सांकृत्यायन द्वारा एक आर्यसमाजी विचारक के रूप में ईसाई पादरियों, एवं सनातन धर्म के विद्वानों से शास्त्रार्थ में भाग लिए जाने का उल्लेख जगदीश प्रसाद बरनवाल राहुल सांकृत्यायन पर लिखे जीवनी में करते हैं।

एक आर्यसमाजी के रूप में राहुल सांकृत्यायन ने हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी काफी गहराई के साथ समझा। बौद्ध धर्म के संपर्क में वे पहली बार तब आए जब उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। 29 अक्टूबर 1922 को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री चुने जाने के पश्चात प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की गया में हुई बैठक में 16 दिसंबर 1922 को शामिल होते हुए यह प्रस्ताव रखा थी बोधगया का महाबोधि मंदिर बौद्धों का है उन्हें वापस मिलना चाहिए। इस घटना के पश्चात उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति एक सहानुभूति पैदा हुई। इसके कुछ दिन पश्चात ही जनवरी 1923 ई. में जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री पद से इस्तीफा देने के पश्चात नेपाल की यात्रा पर वे निकल गए। इस यात्रा के दौरान वे वहां के अनेक बौद्ध स्थल, बौद्ध धर्म गुरु के संपर्क में आए। यात्रा से वापस आने के पश्चात पुनः वे राजनीतिक जीवन में सक्रिय हुए। इसी क्रम में 1925 ई. में उनका परिचय बौद्ध भिक्षु भदंत आनंद कौशल्यायन से हुआ।

बौद्ध धर्म संबंधित अध्ययन के उद्देश्य से तिब्बत यात्रा के दौरान न केवल वहां के बौद्ध सांस्कृतिक-एतिहासिक विरासतों को काफी गहराई से समझने का प्रयास किया बल्कि वहाँ बौद्ध धर्म में व्याप्त झूठी धारणाओं, मान्यताओं जो तार्किकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, पर भी प्रहार किया। 5 अगस्त 1934 को तिब्बत यात्रा के दौरान लिखे एक पत्र में उन्होंने तिब्बत के साथ-साथ अपने देश भारत में भी बौद्ध धर्म में मौजूद झूठे मान्यताओं पर कटाक्ष किया है। अपने यात्रा वृतांत को इस पत्र में लिखते हुए वे कहते हैं 'सभी धर्म स्थान झूठ के अड्डे हैं। शायद उतनी झूठी कथाएं और जगह नहीं मिलेंगे, जितनी धर्म के दरबार में। धर्म वस्तुतः झूठ की आयु को लंबा करने में बड़ा सहायक होता है' तिब्बत के एक स्थान (रे- दिङ लामा से संबंधित) का उल्लेख करते हुए राहुल सांकृत्यायन वहां प्रचलित एक दंतकथा का उल्लेख करते हैं। वह कहते हैं कि रे- दिङ लामा (जिनकी आयु उस दौरान 22 वर्ष की थी) के पैर का एक काले पत्थर पर निशान कांच के भीतर रखा हुआ है। श्रद्धालु भक्तों से कहा जाता है कि बचपन में लामा रिंपो छे ने पैर को महज स्वभाव से पत्थर पर रख दिया था और उस पर यह निशान उतर आया। यदि समंतकूट और नर्मदा नदी की पहाड़ी पर बुद्ध के बड़े-बड़े पद चिन्ह उतर सकते हैं, तो यहां एक अवतारी लामा के छोटे से पद चिन्ह के उतरने में कौन सी असंभव बात हो सकती है’?[4]

राहुल सांकृत्यायन 25 नवंबर 1904 को अपने लिखे एक अन्य पत्र में तिब्बती लामा (ग्य-गर लामा) द्वारा उनके मेजबान रहे एक स्थानीय बूढ़े-बूढ़ी की कांच की मालाओं में जप को और पुण्यदायी बनाने के उद्देश्य से फूँक मारने के प्रकरण पर सवाल उठाते हैं।[5]



[1] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 9  

[2] वही, पृष्ठ सं. 9

[3] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 16

[4] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 23

[5] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 39

 

Saturday, 15 April 2023

अंधविश्वास के मकड़जाल से मुक्त होने का समय

 ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।

          इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी।  

          सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है। 

Sunday, 19 December 2021

गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में कब से माना जाने लगा?

 छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य से गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था। यही कारण है कि इस दौर या इसके बाद में लिखे गए पौराणिक ग्रंथों या अन्य ग्रंथ (11वीं शताब्दी में क्षेमेन्द्र द्वारा लिखित दशावतारचरित एवं 12 वीं शताब्दी में जयदेव द्वारा लिखित गीत गोविंद) या अभिलेखों में ही केवल इन बातों का वर्णन मिलता है। इन्हीं ग्रंथों के आधार पर 11वीं शताब्दी में हिंदुस्तान आए अलबेरूनी भी गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतार मानते हैं।[1] रोचक बात यह है कि इससे पूर्व के brahmanical texts में बुद्ध को नास्तिक या चोर बताया गया है। अश्वमेध यज्ञ कराने के लिए इतिहास में जाना जाने वाला ऐतिहासिक चरित्र पुष्यमित्र शुंग ने तो इनके अनुयायियों को मारकर लाने के एवज में पुरस्कार देने की घोषणा कर दी थी।



[1] D N Jha, ‘Brahmanical intolerance in Early India’ Social scientist, May-June 2016, Page No. 4

 

 

सहिष्णु या असहिष्णु धर्म नहीं व्यक्ति होता है।

वर्तमान में हमारे देश में एक तरफ बड़ी संख्या में हिंदू धर्मावलंबी खुद को शान से हिंदू कहते हुए अपने ही देश के अन्य नागरिक विशेष रुप से मुसलमान, इसाई धर्मावलंबियों को अपने देश/धर्म के लिए खतरा मानते हैं, और इनके खिलाफ दिन रात आग उगलते रहते हैं। दूसरी तरफ कुछ मुसलमान भी पूरे जोश में हिंदुओं के खिलाफ इतिहास पलट कर देख लेने जैसे अनाप-शनाप बातें उगलते रहते हैं। इस कड़ी में आप उन धर्म या जाति के लोगों को भी शामिल कर सकते हैं जो बिल्कुल इन दोनों के नक्शे कदम पर चलते हैं।

          कोई शक नहीं कि दोनों ही समूह अपने-अपने धार्मिक समूह के नफरत के सौदागर हैं। इनसे यदि इनके अपने धर्म संबंधी विचार पूछा जाए तो दोनों के जवाब बिल्कुल एक जैसे होंगे। एक कहेगा कि हिंदू जैसा सहिष्णु धर्म दुनिया में और कोई नहीं है। तो दूसरा समूह अपने धर्म को दुनिया का सबसे अधिक अमन, चैन, शांति चाहने वाला धर्म बता देंगे। तीसरा समूह जिसे आप शामिल कर रहे हैं उनका भी जवाब ऐसे ही होने की पूरी गारंटी है। ऐसे लोगों को ही उस धर्म का कट्टरपंथी समूह कहा जाता है। इन्हें सिर्फ अपना ही दही मीठा लगता है। और सामने वाले का खट्टा। यहां दही शब्द से तात्पर्य धर्म से और मीठे का सहिष्णु या अमन चैन पसंद से है। इनको यह नहीं पता होता कि दही किसी की भी हो उसके स्वाद की प्रकृति एक जैसी ही खट्टी होती है। ऐसे में उसे मीठा बतलाना सत्य से मुंह मोड़ना है। इन दोनों समूहों के दही को कोई खट्टा कहे यह उन्हें बर्दाश्त नहीं है। वह मरने और मारने पर उतारू हो जाते हैं। उनका सहिष्णु धर्म तुरंत असहिष्णु हो जाएगा।

          दरअसल उन्हें यह नहीं पता होता कि किसी के प्रति सहिष्णु या असहिष्णु होने का संबंध धर्म से नहीं बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व से होता है। पूरी दुनिया को यदि वह जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग के आधार पर भेद करने के परीक्षा प्रेम भरी नजर से देखता है तो वह सहिष्णु है। अन्यथा ...

Saturday, 18 December 2021

प्राचीन रीति रिवाजों में संसोधन या त्याग करने का समय

किसी भी धर्म चाहे वह हिन्दू हो या इस्लाम, के हजारों वर्ष पूर्व बनाई धार्मिक व्यवस्था को आंख मूंदकर follow करना कोई बुद्धिमानी नहीं है। परिस्थितियां हमेशा एक सी नहीं होती। उस समय कुछ थी आज कुछ और है। तब प्राचीन काल या आरंभिक मध्यकाल का दौर था। उस दौर में हम उतने तार्किक नहीं थे जो इन रीति रिवाजों की प्रासंगिकता को आलोचनात्मक नज़रिये से देख सकें। आज हम आधुनिक काल में जी रहे हैं। हमारे देश में इसकी शुरुआत हुए 200 वर्ष हो चुके हैं। इन दो सौ वर्षों में अनेक धर्म/समाज सुधारकों ने कुछ अनर्गल प्रथाओं के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए उसे कानूनन बंद करवाया। आज भी ऐसे कई कुप्रथाओं (व्रत, त्योहार) को हम जरूरी रीति रिवाज या नियम कानून मानकर उसे ढोए जा रहे हैं। जिसकी कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

          ऐसे रीति-रिवाजों, मान्यताओं को या तो खत्म कर देना चाहिए या समय की प्रासंगिकता के अनुसार इनमें संसोधन होते रहना चाहिए, जैसा संविधान का होता है।

 

 

Tuesday, 14 December 2021

उफ़्फ़ ये धर्म के ठेकेदार

 धर्म के ठेकेदारों की मानें तो प्रत्येक घटना के पीछे भगवान, ईश्वर, अल्लाह, खुदा का हाथ होता है। यानी अच्छे काम से लेकर बुरे काम तक सब भगवान, ईश्वर, अल्लाह की मर्जी से होता है। बिना उसकी मर्जी के कोई पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसा कह कर वह धर्म का ठेकेदार सामने वाले के दिमाग में अपने ईश्वर की सर्वोच्चता को स्थापित कर रहा होता है। अप्रत्यक्ष रूप से उस अदृश्य शक्ति से सामने वाले व्यक्ति को इतना डरा दिया जाता है कि इस पर कोई भी सवाल उठाने की हिम्मत नहीं करता। बस सभी लोग गुणगान करने में जुट जाते हैं। हास्यास्पद बात यह है कि सारे काम जब उनकी मर्जी से हो रहे हैं तो फिर स्वर्ग, नरक, जन्नत, जहन्नुम का लालच या डर दिखाने का क्या मतलब? कोई आदमी यदि किसी की हत्या कर रहा है तो वह अपराध कैसे हुआ? वह तो भगवान, ईश्वर, अल्लाह की मर्जी का पालन कर रहा है। ऐसे में गंगा, जमजम स्नान करने, तीर्थ यात्रा या हज करने जैसे फर्जी कर्मकांड करा कर केवल इंसानों के खून पसीने की कमाई लूटने का क्या मतलब?  

            क्या झूठ के नाम पर यह लूटपाट, कमाई उन धर्म के ठेकेदारों के लिए पाप नहीं है? इन पाखंडीयों को खुद के पाप दिखते नहीं, चले हैं दूसरे का पाप देखने और समाधान करने।

Wednesday, 21 April 2021

डर : धर्म के व्यवसाय का आधार

 संत रामपाल की एक पुस्तक 'ज्ञान गंगा' पढ़ रहा हूँ। उनका भक्त बनने के लिए नहीं बल्कि आखिर किन शिक्षाओं के बिना पर ऐसे तथाकथित साधु-संत अपने असीमित भक्त बनाते हैं जो उनकी बातों को आंख कान मूंदकर स्वीकार कर लेते हैं? इस अध्ययन के दौरान दिमाग में एक सवाल चल रहा है, कि कितना आसान है लोगों को मूर्ख बनाना, उनसे अपनी बात मनवाना। यकीन मानिए मैं एक आम आदमी हूं। लेकिन सामने वाले व्यक्ति को यदि मैं विश्वास दिला दूं कि पिछले 25 वर्ष से हिमालय में रहकर, तप-साधना कर ज्ञान अर्जित किया हूं तो वह व्यक्ति शीघ्र ही मेरा भक्त बन जाएगा। और यदि मैं उससे कहूं कि मंदिर के आगे बैठे भिखारी के बारे में मनगढ़ंत बात बताऊँ कि पिछले जन्म में उसने अपने गुरु के सिखाए बातों को मानने से इंकार कर दिया इसीलिए इस जन्म में वह दर-दर की ठोकर खा रहा है। उस भिखारी के बारे में मेरे द्वारा कही गई बात में भले ही नाम मात्र की भी सत्यता नहीं हो लेकिन इस बात की पूरी गारंटी है कि वह मेरा भक्त आंख कान मूंदकर बन जाएगा क्योंकि मैंने उसके दिमाग में यह बात भर दी कि मैं एक सिद्ध व्यक्ति हूं और यदि तुम मेरी बात नहीं माने तो अगले जन्म में तुम्हारा भी यही हाल होगा। 

          अर्थात किसी को अपना भक्त बनाने के लिए सबसे मजबूत आधार डर होता है। यह डर कुछ भी हो सकता है, भगवान या परमात्मा द्वारा दिए जाने वाले तथाकथित दंड का डर, अगले जन्म में विकृत रूप में पैदा होने का डर आदि। ‘ओ माय गॉड फिल्म के अंतिम दृश्य में भी इस डर के दम पर यह जाने वाले व्यवसाय को दिखाने का प्रयास किया गया है जब धर्मगुरु जाते जाते एक संवाद बोलता है ' these are not god loving people, these are god fearing people.



Sunday, 11 October 2020

लाखामंडल (उत्तराखंड) पांडव गुफा : मिथक एवं यथार्थ

दिनांक 3 अक्टूबर 2016, अपने मां-पिताजी के साथ गंगोत्री, यमुनोत्री यात्रा के लिए हर की पौड़ी, हरिद्वार से एक ट्रेवल एजेंसी के वाहन से निकला। वैष्णो देवी की यात्रा के बाद यह दूसरा मौका था जब मां-पिताजी के साथ तीर्थस्थल भ्रमण के लिए निकला था। तब मैं भी धार्मिक हुआ करता था। इससे पूर्व एक ऐसा भी समय था जब उठने के बाद गायत्री मंत्र के उच्चारण से दिन की शुरुआत होती थी। शाम को बिना गायत्री चालीसा पढ़े सोता नहीं था। आगे चलकर ऐसा भी समय आया जब गायत्री जी की कृपा पाने के लिए गायत्री मंत्र को जपना छोड़कर अखिल भारतीय गायत्री परिवार संस्थान, शांतिकुंज (हरिद्वार) द्वारा प्रकाशित मंत्र लेखन पुस्तिका में प्रतिदिन कम से कम दो पेज अर्थात लगभग 50 बार गायत्री मंत्र लिखा करता था। परिवार या जीवन में जब भी कोई समस्या या विषम परिस्थिति आती तो यह काम 2 – 4 गुणा बढ़ जाता। ऋग्वैदिक काल की प्रमुख देवी गायत्री जी के प्रति लगाव बचपन से ही था, क्योंकि हमारे दादा जी गायत्री परिवार के सदस्य थे। और उनके संपर्क में रहकर हम लोग भी गायत्री उपासना में लीन हो गए। हालांकि इतिहास विषय से एम. ए. करने के दौरान अलग-अलग धर्म-संप्रदायों के क्रमबद्ध विकास के इतिहास, उनके आपसी टकराव, उस टकराव को रोकने में विफल इन देवी-देवताओं संबंधी तथ्यों ने मेरे बंद चक्षु को थोड़ा बहुत खोलने का काम किया। इसी दौरान ही 2010 में बाबरी मस्जिद विध्वंस पर आए फैसले ने मुझे सोचने को मजबूर किया कि जिस राम जी के सेवक हनुमान जी को हिंदू धर्म का एकमात्र जीवित देवता माना जाता है, जिन के डर से भूत पिशाच तक नजदीक नहीं आते हैं, आखिर उनके रहते उनके आराध्य देव राम जी का मंदिर कोई कैसे तोड़ सकता है, वह भी उनकी तथाकथित जन्मभूमि अयोध्या पर बना हुआ मंदिर। यदि वास्तव में उनका अस्तित्व है तो राम या हनुमान जी की कृपा से 500 साल पहले उस मंदिर को टूटना नहीं था। यदि टूट भी गया तो अगले दिन उनके प्रभाव या चमत्कार से स्वयं ही वह मंदिर बन जाना था जैसे हमारे जमुई (बिहार) के सिमेरिया गांव स्थित महादेव मंदिर को अपरूपी (रातों रात विश्वकर्मा भगवान के चमत्कार से निर्मित) कहा जाता है (जो कि एक मिथक है, वास्तविकता कुछ और है। कभी इसके भी मिथक और यथार्थ पर लिखने की योजना है क्योंकि हमारे देश में ऐसे मनगढ़ंत चमत्कारिक किस्से भरे पड़े हैं जो केवल अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं)। लेकिन अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

          इस दौरान सभी धार्मिक आख्यानों को संदेह भरी नजरों से देखने, उन्हें तार्किकता की कसौटी पर कसने तथा उसकी वास्तविकता का पता लगाने की प्रवृत्ति मुझमें विकसित होने लगी। धीरे-धीरे मेरे अंदर यह धारणा मजबूत होती गई कि इस तरह आँख मूंदकर किसी धार्मिक आख्यान को सच तो नहीं मानूँगा, बल्कि उसकी तह तक जाकर क्या सही है? क्या गलत? खोजकर निकालूँगा। 2012 के पश्चात धार्मिक अंधभक्ति को त्यागते हुए धार्मिक भ्रष्टाचार को नजदीक से समझना शुरू कर दिया। ज्ञान चक्षु खोलकर सही को सही और गलत हो गलत कहने का कौशल खुद में विकसित कर रहा था। इस दौरान घर पर कुछ कर्मकांड कराने आए पंडितों से भी किसी भी बात को खोद-खोद कर पूछते हुए झगड़ बैठता था। इन पंडितों से गुस्सा इसलिए भी आता था कि मेरे वैवाहिक जीवन में क्लेश की वजह राहु और शनि की दशा से जोड़कर इन ग्रहों की शांति के लिए अलग-अलग जाप करवाने को लेकर छह-छह हज़ार रुपए ठग लिए। इस मंत्र जाप से कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि पति-पत्नी का संबंध विच्छेद ही हुआ।

          इसी दौरान 2016 में मां-पिताजी ने चार धाम यात्रा करने की इच्छा जाहिर की। तब तक मैं बहुत हद तक धार्मिक रीति-रिवाजों से किनारा करना शुरू कर दिया। लेकिन मां-पिताजी की इच्छा का सम्मान करते हुए, साथ ही साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में घूमने की मेरी दिली इच्छा के कारण रेलवे टिकट बुक किया और हरिद्वार पहुंच गए। तत्पश्चात पहला पड़ाव यमुनोत्री की ओर निकल पड़ा।

          ऋषिकेश से पहाड़ों की चढ़ाई शुरू हो जाती है। सर्पीले रास्ते, मनमोहक नजारे, ऊपर से वैन में लगे डॉल्बी डिजिटल साउंड में 'मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी' जैसे मधुर भक्ति गाने का तड़का यात्रा के आनंद को दोगुना कर दिया। मसूरी घाटी में कुछ समय बिताने के पश्चात आगे बढ़ा। रास्ते में ही पड़ने वाला केंपटी फॉल ने मन तो मोह ही लिया, उसी मार्ग में एक ऐसा भी भव्य मंदिर मिला जहां बड़े-बड़े शब्दों में स्पष्ट रूप से दान देने को मना करने संबंधी निर्देश लिखे । अपनी छोटी सी ज़िंदगी में मैंने पहला ऐसा मंदिर देखा जहां दान देने की मनाही थी, साथ ही प्रसाद मुफ्त में ही दिया जाता था। वैन का ड्राइवर बहुत ही मिलनसार था। कौन से ढाबे पर बढ़िया खाना मिलता है उन्हें अच्छी तरह पता था। पूरे रास्ते वह बढ़िया बढ़िया खाना-नाश्ता कराते गया। हरिद्वार से मसूरी तक हम दोनों बहुत ही अच्छे से घुल-मिल चुके थे। बात-बात में ही हमने उनसे आग्रह किया कि रास्ते में यदि कोई अन्य भी तीर्थ या पर्यटक स्थल मिले तो वहां भी हमें जरूर ले चलें। मसूरी से आगे बढ़ते ही उन्होंने बताया कि रास्ते में ही 60 किलोमीटर दूर एक लाखामंडल जगह है जहां केदारनाथ की तरह ही बहुत प्राचीन शिव मंदिर है। यहां एक ऐसा भी शिवलिंग है जिसपर जल चढ़ाने पर आपको अपना परछाई उस शिवलिंग में दिखेगा। इतना ही नहीं यही वह जगह है जहां दुर्योधन ने पांडवों की हत्या करने के लिए लाख निर्मित महल बनवाया था। यहां ले जाने के लिए ड्राइवर महोदय ने 500 अतिरिक्त पैसे की मांग की। ऐसे चमत्कारी जगह को देखने से हम चूकना नहीं चाहते थे इसलिए बिना शर्त उनकी बात मान लिया। यमुनोत्री की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग से यमुना नदी पार कर लगभग 3 से 5 किलोमीटर की दूरी तय कर हम लोग लाखामंडल ग्राम स्थित उस वीरान पड़े मंदिर में पहुंचे। नागर शैली में पूर्णतः पत्थर से निर्मित इस मंदिर की भव्यता का प्राचीन व बिना रंग-रोगन के बावजूद कोई जवाब नहीं था। यह बहुत ही प्राचीन मंदिर था जो एक पाँच फीट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर 1-2 एकड़ भूमि के दायरे में काले स्लेटी रंग के पत्थर से निर्मित था। मंदिर को देखते ही मेरे अंदर का इतिहासकार जाग उठा। मां-पिताजी जहां पूजा पाठ करने में लग गए वहीं मैं मंदिर के इतिहास को खंघालने में लग गया। प्लेटफॉर्म के बाईं छोर पर मंदिर का गर्भ गृह स्थित था जहां एक शिवलिंग के अतिरिक्त पत्थर की भित्ति पर कई देवी देवताओं की मूर्तियाँ खुदी थी बिल्कुल ऐसा जैसे भोरमदेव (छत्तीसगढ़) का शिव मंदिर। अंतर बस इतना था कि भोरमदेव (छत्तीसगढ़) के मैथुन मूर्तियों की जगह अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण थी। चारों तरफ से अलग-अलग देवताओं जैसे विष्णु, गणेश, कार्तिकेय आदि की मूर्तियों के बीच में एक शिवलिंग था। मैं मंदिर से लेकर उन सभी देवी देवताओं की तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर ही रहा था कि मंदिर के मुख्य पुजारी की आवाज़ आई 'कहां से आए हैं’? हम ने जवाब दिया, बिहार से और यमुनोत्री जा रहे हैं, इस मंदिर के बारे में भी सुना तो चले आए इसके पश्चात वह पुजारी हमें मंदिर से दाहिनी ओर खुले आसमान के नीचे  स्थित एक विशाल शिवलिंग के पास ले गया। उस विशाल शिवलिंग से थोड़ी दूर पर पत्थर निर्मित दो आदमक़द आकार के द्वारपाल स्थित थे। हमने जब पुजारी से इस विशाल शिवलिंग के बारे में पूछा तो वह हमें वास्तविक इतिहास बताने की जगह मिथक में लेते चला गया। पुजारी के अनुसार, जब पांडव अज्ञातवास में थे तो उसी समय इसी स्थान पर धर्मराज युधिष्ठिर ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इस लिंग के सामने पश्चिम की ओर मुख कर दो द्वारपाल खड़े हैं। इस शिवलिंग की यह विशेषता थी कि कोई भी मृत्यु को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति इन द्वारपालों के सम्मुख रख दिया जाए तो पुजारी के द्वारा अभिमंत्रित किया हुआ जल छिड़कते ही वह जीवित हो जाता, मृत्यु को प्राप्त करते समय मुख से राम राम नहीं कहा तो राम-राम शब्द का उच्चारण कर ले, गंगाजल नहीं पिया तो पी ले, इस प्रकार जो भी मृत प्राणी यहां लाया जाता वह कुछ पलों के लिए जीवित हो जाता है फिर बैकुंठ धाम प्राप्त कर लेता है पुजारी पूरे तन-मन से मिथकीय कहानी बताता जा रहा था और मैं उसके इस बकवास से पीछा छुड़ाने के लिए उससे अलग होने की नाकामयाब कोशिश कर रहा था। क्योंकि मुझे पता था कि मृत्यु के बाद कोई भी व्यक्ति एक पल के लिए भी पुनर्जीवित नहीं होता है। और यदि वास्तव में यह वैसा चमत्कारी स्थान होता तो गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ छोड़कर श्रद्धालु पहले यहां आते। यह मंदिर परिसर इतना वीरान नहीं होता। देवघर (झारखंड) में रावण के द्वारा स्थापित शिवलिंग की वास्तविकता, असम में हिडिंबा के वंशजों की कपोल कल्पित कहानियों को मैं पहले से जानता था इसलिए इस युधिष्ठिर द्वारा स्थापित शिवलिंग की मनगढ़ंत थ्योरी को नकारने में मुझे कोई भी दुविधा नहीं हुई। इसके आगे पुजारी जी ने बताया कि यहीं पर दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाख से निर्मित महल बनवाया था। सभी पांडव यहां से एक गुप्त रास्ते से निकलने में कामयाब हुए। इस गुप्त रास्ते को थोड़ी दूर पर स्थित एक गुफा के रूप में देखा जा सकता है। समय के प्रभाव के कारण यह गुप्त रास्ता बंद हो गया

पुजारी के इतना कहते ही मेरा मन जल्द से जल्द उस गुफा को देखने का करने लगा। इसके पश्चात वह पुजारी हमें एक अनोखी शिवलिंग के पास ले गया जिसके बारे में ड्राइवर ने पहले ही बताया था कि जल चढ़ाने के बाद इस शिवलिंग में आपको अपनी परछाई दिखेगी। खुली छत के नीचे स्थित इस शिवलिंग को देखने मां-पिताजी, पुजारी और ड्राइवर के साथ मैं भी वहां पर पहुंचा। माँ और पिताजी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के हैं, इसलिए तुरंत उन्होंने अपने बैग से पीतल की एक छोटी सी लोटकी निकाली, उसमें जल भरा और ध्यान लगाते हुए उस जल को शिवलिंग पर अर्पित किया। देखकर तो बिल्कुल आश्चर्य हुआ कि शिवलिंग पर जल चढ़ाते ही आसपास के सभी लोगों की अख्श उस शिवलिंग में दिखने लगा था।


मां पिताजी हैरान हुए पर मै बिल्कुल नहीं। मां पिताजी इसे चमत्कार मांनते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े थे, तो वहीं मेरे आंख और दिमाग उस कारण को ढूंढने में लगे हुए थे जिसके कारण शिवलिंग में परछाई दिख रही थी। इतना सोचते-सोचते मेरी नजर थोड़ी दूर पर स्थित कई खंडित या अर्ध निर्मित शिवलिंग पर पड़ी। मैंने पुजारी से पूछा, 'यहां एक ही जगह इतनी इतनी शिवलिंग क्यों हैं'? पुजारी ने बताया यह सभी अलग-अलग आकार के शिवलिंग यहां खुदाई में मिले हैं जिसे एक जगह इकट्ठा कर दिया गया। यहीं से मुझे इस चमत्कार का कारण समझ में आ गया। इतनी संख्या में अलग-अलग आकार के शिवलिंग को देखकर मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि यह युधिष्ठिर द्वारा स्थापित शिवलिंग या शैव क्षेत्र नहीं बल्कि एक प्राचीनकालीन शिवलिंग तथा अन्य देवी देवताओं की मूर्ति निर्माण कला का प्रसिद्ध केंद्र रहा होगा। और यह सभी अर्ध निर्मित शिवलिंग, अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, यह तथाकथित चमत्कारी शिवलिंग इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उस चमत्कारी शिवलिंग में अक्स उभरना कोई चमत्कार नहीं था बल्कि कारीगरी का उत्कृष्ट प्रदर्शन था। चूंकि यह स्थान शिवलिंग तथा मूर्ति निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा था, इसलिए कारीगरों द्वारा इस शिवलिंग को इतनी बारीकी से घिसकर तराशा गया कि वह इतना चिकना हो गया कि उस पर पानी पढ़ते ही सामने खड़ा वस्तु या व्यक्ति उस में प्रतिबिंबित होने लगता है।

          पुजारी की एक और बात मेरे मन में खटकी वह यह थी कि यह सभी शिवलिंग खुदाई में प्राप्त हुए हैं यह सोचते हुए कि यदि इस ग्राम में खुदाई हुई है तो जरूर किसी न किसी को यहां के इतिहास का पता होगा। कम से कम भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग को तो जरूर। उत्सुकता वश मैंने पुजारी से पूछा, 'इस ऐतिहासिक क्षेत्र के इतिहास पर क्या किसी ने कुछ लिखा है क्या’? पुजारी ने यह भाँपते हुए कि मैं उनकी मिथकीय कहानियों को विश्वास करने में कोई रुचि नहीं ले रहा हूँ, नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ, मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। और वह किसी दूसरे काम में लग गया। इसके पश्चात हम चारों लोग घूम-घूम कर पूरे मंदिर का भ्रमण करने लगे।


इतने में ही मेरी नजर एक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक लेख पर पड़ी। इसे पढ़कर मेरी जिज्ञासा थोड़ी शांत हुई। इस अभिलेख के अनुसार,

'भगवान शिव को समर्पित नागर शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण लगभग 12वीं 13वीं शताब्दी में हुआ था। क्षेत्र से बहुतायत में पाए स्थापत्य अंगों/ वास्तु अंगों तथा मूर्तियों के अवशेषों से ज्ञात होता है कि पूर्व में यहां अनेक शिव मंदिर रहे होंगे परंतु वर्तमान में केवल यही मंदिर शेष बचा। प्रस्तर निर्मित पिरामिड आकार संरचना के नीचे के स्तर में पाए गए ईंटों द्वारा निर्मित संरचना के आधार पर लाखामंडल की प्राचीनतम तिथि पांचवी से आठवीं शताब्दी ईस्वी जाती है।  मंदिर परिसर से ही प्राप्त छठी शताब्दी के एक प्रस्तर अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि सिंहपुर के राजपरिवार से संबंधित राजकुमारी ईश्वरा ने अपने पति चंद्रगुप्त जो जालंधर के राजा का पुत्र था, के निधन पर सद्गति एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु इस शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।

अधीक्षण पुरातत्वविद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

पूरा मामला यह था कि लाखामंडल स्थित इस शैव मंदिर का संबंध महाभारत काल से नहीं बल्कि आरंभिक मध्य काल से था, उस दौर में यह मूर्ति निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा होगा यही कारण है कि यहां पर काफी संख्या में अर्ध निर्मित शिवलिंग के साथ-साथ अच्छी तरह पॉलिश कर बनाए गए शिवलिंग देखे जा सकते हैं। बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में इस स्थान पर सिंहपुर राज परिवार की राजकुमारी ईश्वरा ने अपने पति चंद्रगुप्त के सम्मान में यह शैव मंदिर बनवाया। हालांकि यह अभी शोध का विषय है कि सिंहपुर राज परिवार किस क्षेत्र से संबंधित हैं।

          अब बात करते हैं पांडव के लाखगृह से एक गुफा होकर बच निकलने की। मंदिर के मुख्य गेट के नजदीक ही एक और बोर्ड देखा जा सकता है जिसमें इस मंदिर के नाम का उल्लेख मरड़ेश्वर महादेव मिलता है। इस बोर्ड में ही यह उल्लेख किया गया है लाखामंडल में पांडवों को जीवित जलाने हेतु लाक्षागृह का निर्माण कराया गया था। मंदिर के मुख्य पुजारी भी इस बात को दोहराते हैं। महाभारत में यह प्रसंग इस प्रकार है,

जब भीष्म पितामह धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करने के लिए कहते हैं। तो दुर्योधन धृतराष्ट्र से कहते हैं कि 'पिताजी एक बार यदि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो जाएगा तो यह राज्य सदा के लिए पांडवों का हो जाएगा और हम कौरवों को उनका सेवक बनकर रहना पड़ेगा। इस पर धृतराष्ट्र कहते हैं कि युधिष्ठिर हमारे कुल की संतानों में सबसे बड़ा है इसलिए इस राज्य पर उसी का अधिकार है। इसके अलावा भीष्म तथा प्रजाजन भी उसी को राजा बनाना चाहते हैं। इसलिए हम इस विषय में कुछ नहीं कर सकते, तुम उनके रुकने का प्रबंध करो। दुर्योधन ने पांडवों को जलाकर मार देने के लिए षड्यंत्र रचा। उसने पांडवों के रुकने के लिए एक विशेष प्रकार का गृह बनवाया जिससे लाख, सूखी घास, मूंज आदि ज्वलनशील पदार्थों से बनाया गया था। संजोग से दुर्योधन के इस षड्यंत्र का पता विदुर को चल गया, विदुर ने पांडवों को आकर सारी बात बताई। आत्मरक्षा के लिए पांडवों ने महल के अंदर से ही एक गुप्त रास्ता ढूंढ निकाला। और आग लगने के पूर्व ही पांडव उस गुप्त मार्ग से बाहर निकल गए।

          इस मिथक को तार्किकता की कसौटी पर परखने पर सभी बातें हवा-हवाई साबित होती है।  पांडव जिस सुरंग से लाक्षागृह से बाहर निकले थे उसे वर्तमान में उस गांव से थोड़ी ही दूर पर बाहर निकलने वाले मुख्य मार्ग के बाईं और देखा जा सकता है। वापसी में हम लोग भी उस गुफा के पास आकर रुके और थोड़ी दूर गुफा के अंदर भी गए।


वहां पर दो साधु पहले से मौजूद थे। उनमें से एक के हाथ में टॉर्च था। हमने उनसे पूछा - क्या गुफा के अंदर भी जा सकते हैं? टॉर्च वाले साधु ने सिर हिलाते हुए हां का इशारा किया। मेरे साथ-साथ वह भी चल दिया। गुफा में प्रवेश करने के साथ ही 20 से 25 फीट अंदर तक श्रद्धालुओं के आने-जाने के लिए एक पक्का रास्ता बना हुआ था। इसके बाद वह रास्ता संकरा होता हुआ बंद हो जाता था। मैंने पुजारी से पूछा कि यह रास्ता तो आगे बंद हो गया है पुजारी का जवाब था इसी रास्ते होते हुए पांचो पांडव लाख गृह से बाहर निकले थे। साथ ही इसका सबूत मिटाने के लिए उन्होंने इस मार्ग को बंद कर दिया। उस साधु की बातों पर मुझे जरा भी विश्वास नहीं था। 10 मिनट तक मैं उस गुफा में रहा, हर तरफ से निहारता रहा, उस साधु से टॉर्च लेकर सकरी गुफा की तरफ देखता, निरीक्षण करता रहा। टॉर्च की रोशनी में थोड़ी दूर पर मुझे उस गुफा से पानी का रिसाव दिखा। मैंने उस साधु से पूछा यह पानी का रिसाव कहां से हो रहा है’? साधु का जवाब था कि इस पहाड़ी के ऊपर पानी जमा हो जाता है। बारिश के दिनों में इस मार्ग से पानी का अत्यधिक रिसाव होने लगता है, सर्दी के दिनों तक यह रिसाव बंद हो जाता है इतना सुनते ही मैं वहां से तुरंत निकल आया। उस साधु ने कुछ दान मांगा। वैसे तो मैं दान देने में विश्वास नहीं करता लेकिन उसने मुझे बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी दी इसलिए बिना कुछ सोचे-समझे जेब में हाथ डाला तो 20 रुपए का नोट मिला मैंने उसे दे दिया। वहां से निकलने के साथ ही पिताजी ने मुझे पूछा- 'बहुत गौर से देख रहे थे उस गुफा को? पुजारी से भी बात किए तो क्या जानकारी मिला इस क्षेत्र के बारे में'? मैंने कहा कि सुनने में थोड़ा बुरा लग लग सकता है आपलोग को लेकिन ये लोग दुनिया को मूर्ख बना कर उनकी अंधआस्था का फायदा उठाकर उन्हें ठग रहे हैं।  इस क्षेत्र का महाभारत काल से कोई लेना देना नहीं है। न पांडव यहां कभी आए, न शिवलिंग को स्थापित कर उसका उपासना किए, न ही यहां कोई लाखगृह था, न ही पांडव इस गुफा से निकले? मां-पिताजी मेरी बात को सुनकर गुस्से में लाल हो गए, ड्राइवर को भी मेरी बात बहुत अटपटी लगी। ड्राइवर ने मुझे तुरंत रोका कि देवस्थान के बारे में ऐसा नहीं कहते। ड्राइवर के ऐसा बोलने पर मां-पिताजी भी मेरा साथ छोड़कर ड्राइवर की बात का साथ देते हुए मुझे डांट फटकार कर समझाने लगे।

मैंने ड्राइवर से कहा मैं यह बात हवा में नहीं कर रहा हूं मैं इसे साबित भी कर सकता हूं अब ड्राइवर को भी उत्सुकता होने लगी। अपनी बात को साबित करने के लिए मैंने मोबाइल से गूगल मैप खोला। और ड्राइवर और पिताजी से 2 प्रश्न पूछे – (1) कौरव-पांडव की राजधानी कहां थी? (2) महाभारत की लड़ाई कहां हुई? ड्राइवर की तरफ से कोई जवाब नहीं आया शायद उनको पता नहीं हो। पिताजी ने उत्तर दिया - पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर में थी, और यह लड़ाई कुरुक्षेत्र में हुई। मैंने तुरंत एक और प्रश्न पूछा - वर्तमान समय में यह कुरुक्षेत्र कहां पड़ता है? इस प्रश्न पर कोई उत्तर नहीं आया।


इसके पश्चात मैंने गूगल मैप से वर्तमान में दिल्ली और लाखामंडल के बीच की दूरी को दिखाया। 357 किलोमीटर थे। इसके पश्चात मैंने उनसे एक और सवाल किया कि क्या आपको लगता है कि दुर्योधन अपनी राजधानी से 350 किलोमीटर दूर एक वीरान जंगल पहाड़ में यह लाख गिरी बनवाया होगा। अभी जब इतना वीरान है यह क्षेत्र तो उस समय कल्पना कीजिए कितने घने जंगल रहे होंगे इस क्षेत्र में? वर्तमान में पूरे भारत में इतनी घनी जनसंख्या है तब जाकर इन पहाड़ों वाले क्षेत्र में पांच 5 किलोमीटर दूरी पर एक एक गांव स्थित है। तो आज से लगभग 3000 वर्ष पहले इस क्षेत्र में कितने लोग रहते होंगे?

मेरी इन बातों से पिताजी सहमत नहीं थे लेकिन ड्राइवर कुछ हद तक सहमत हुआ था। इसके पश्चात उसने मुझसे एक सवाल पूछा कि यदि ऐसा नहीं है तो फिर इस क्षेत्र के साथ महाभारत काल का संबंध क्यों जोड़ा जाता है’? इस सवाल के जवाब में मैंने एक ऐतिहासिक तथ्य रखा। मैंने उनसे पूछा, आपको पता है कि कैलाश पर्वत से रावण जब शिवलिंग उठाकर लंका की ओर चला तो उसने उस शिवलिंग को कहां रखा’? पिताजी ने तुरंत उत्तर दिया, ‘देवघर (झारखंड)। मैंने तुरंत उनसे पूछा क्या आपको पता है कि यह कहानी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित गोला गोकरण नाथ धाम के साथ जोड़ा जाता है मैंने वहां के पुजारी से इस बारे में बातचीत की तो उन्होंने देवघर वाली मान्यता को खारिज कर दिया। और रावण और शिवलिंग की यही कहानी हिमाचल प्रदेश के एक और मंदिर के लिए भी प्रयुक्त की जाती है। अब आप बताइए रावण के द्वारा कैलाश से लाया हुआ वास्तविक शिवलिंग कौन सा है? सारे लोग कंफ्यूज हो गए कि किसे सत्य माने? पिताजी से एक और सवाल पूछा, क्या आप यह मानते हैं कि देवघर का शिवलिंग रावण द्वारा स्थापित शिवलिंग है? थोड़ी देर सोच विचार करने के पश्चात पिताजी ने मना कर दिया क्योंकि कुछ दिन पहले ही मैंने उनको श्यामनन्द प्रसाद सिंह द्वारा लिखित एक पुस्तक 'जमुई का इतिहास और पुरातत्व' पढ़वाया जिसमें ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट लिखा था कि इस मंदिर का निर्माण गिद्धौर के चंदेल राजा महाराजा रावणेश्वर प्रसाद सिंह ने करवाया।

कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे देश में ऐसा गोरखधंधा चलता है कि अपने क्षेत्र के किसी मंदिर को प्रसिद्धि दिलाना हो तो उसे रामायण या महाभारत के मिथकीय चरित्रों के साथ जोड़ दो। हमारे देश की जनता इतनी धर्मांध है कि वह कभी सोचेगी ही नहीं कि क्या सत्य है और क्या गलत? रही बात इस पांडव गुफा की तो यह कोई गुप्त रास्ता नहीं है बल्कि पहाड़ के ऊपर स्थित जलाशय या पहाड़ द्वारा अवशोषित वर्षा जल के इस स्थान से रिसने के कारण इस संकरी होती गुफा का निर्माण हुआ है। हिमालय क्षेत्र में ऐसी आपको बहुतायत गुफाएँ मिलेंगे। भौगोलिक ज्ञान की कमी के कारण ये साधु लोग आपको बेवकूफ बनाकर दान के नामपर पैसे ऐंठते हैं।

इसी तरह इस मौके पर विचार विमर्श करते हम लोग यमुनोत्री की ओर बढ़ते चले गए।

शिव मंदिर, लाखामंडल 




Sunday, 9 August 2020

कोरोना महामारी के दौर में मंदिर-मूर्ति पर विमर्श क्यों?

 

पिछले 8 माह के दौरान कोरोना वायरस ने सभी धर्मों के देवी-देवताओं के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। त्रस्त जनता को देखकर कष्ट से उबारने या किसी न किसी रूप में आकर लोगों की जान बचाने के लिए जाने जाने वाले देवी-देवताओं को भी अपने भक्तों की चिंता नहीं है। ऐसा इन देवी-देवताओं के सबसे बड़े पुजारी या भगवान, ईश्वर, अल्लाह के सबसे करीब होने का दावा करने वाले लोगों के संक्रमित होने के आधार पर कहा जा सकता है। उन्हें अपने ही आराध्य की अलौकिक शक्ति पर विश्वास नहीं है। इसीलिए अपनी रक्षा के लिए ये लोग खुद तो मास्क पहन रहे हैं, मंदिर-मस्जिद में सैनीटाइजर का प्रयोग कर रहे हैं ही, साथ ही अपने आराध्य को भी मास्क पहना रहे हैं। कई मंदिरों में तो मंदिर प्रबंधन समिति को यहाँ तक डर है कि श्रद्धालुओं द्वारा मूर्ति को हाथ लगाने से उनके आराध्य न संक्रमित हो जाएँ व अन्य को संक्रमित कर दें। इसलिए श्रद्धालुओं को मूर्तियों को हाथ तक नहीं लगाने दे रहे हैं। दूर से प्रणाम कर यथाशीघ्र दर्शन कर गर्भगृह से निकलने का निर्देश दे रहे हैं। अधिकांश मंदिरों के कपाट इस महामारी ने बंद करवा दिये हैं। यदि खुले भी हैं तो गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है। पूरे विश्व के कट्टर धार्मिक समुदायों में हाहाकार मचा हुआ है, क्योंकि कर्मकांड करने/कराने के एवज में मिलने वाले परिश्रमिक/दान से होने वाली आय से महरूम हो गया है। विज्ञान की आलोचना करने वाले ये कट्टर धार्मिक वर्ग आज वैज्ञानिकों की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं कि कब इसका टीका मिले और हालात सामान्य हो। नास्तिक (भगवान, ईश्वर, अल्लाह के अस्तित्व को नहीं मानने/चुनौती देने वाले) लोग मौके का फायदा उठाते हुए इन धार्मिक कट्टरपंथियों को छेड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। इससे पूर्व से ही वे इस तथ्य के आधार पर भगवान, अल्लाह के अस्तित्व को नकार रहे हैं कि 500 वर्ष पूर्व जब मंदिर टूटा तो खुद राम भी अपने जन्मस्थान स्थित मंदिर को टूटने से बचा नहीं पाए। एकमात्र अमर देवता राम के परम भक्त हनुमान भी मंदिर को टूटने से बचा नहीं सके। इसी तरह 1992 में मस्जिद को टूटने से अल्लाह भी नहीं बचा सके। नहीं बचा सके तो भी कोई बात नहीं। अगले दिन खुद की अलौकिक शक्ति से ही बनवा कर अपने अस्तित्व का प्रमाण देते। लेकिन वह भी नहीं हुआ। यह हाल है पूरे दिन भर देवी-देवताओं, अल्लाह, ईश्वर, वाहेगुरु की उपासना करने वाले पुरोहित वर्ग का।

          दूसरी तरफ हैं हमारे देश के शासक वर्ग अर्थात सत्तानसीं संवैधानिक पदों पर बैठे अलग-अलग पार्टियों, विचारधारा के जनप्रतिनिधि। ऐसा नहीं है कि उपरोक्त परिस्थितियों से वे परिचित नहीं हैं। बावजूद इसके वे स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी जैसे जन-समस्याओं को दरकिनार कर मीडिया चैनलों, समाचारपत्रों के माध्यम से धार्मिक मुद्दों को उछालने और इसपर विमर्श करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ताकि खुद को संबंधित धर्म के लोगों का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर सकें। इनके इस रवैये के कारण अन्य पार्टियों को भी चाहे-अनचाहे इस तरह के विमर्श में कूदना ही पड़ता है खुद को उस धर्म विशेष का हितैषी बताने के लिए। पार्टी विशेष द्वारा समर्थित मीडिया विपक्षी पार्टियों को इस विमर्श में भाग लेने को मजबूर कर देता है। क्योंकि कोई भी पार्टी बहुसंख्यक वोट बैंक को चाहे-अनचाहे खोना नहीं चाहती। परिणामस्वरूप मीडिया के साथ-साथ आम जनता में विमर्श की धारा ही बदल जाती है। और वे समस्याएँ दब जाती है जिनपर बात किया जाना चाहिए और सत्तारूढ़ सरकार को उस समस्या के समाधान की बात पहुंचानी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हाल ही की घटना 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु भूमि पूजन समारोह को लें तो पूरे देश में हिंदू लोग इस दिन को जश्न के रूप में मनाए जो स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जैसे ही घोषणा की कि अयोध्या से 3 किलोमीटर दूर सरयू नदी के तट पर स्थित एक गाँव में भगवान श्री राम की 251 मीटर ऊंची मूर्ति बनाई जाएगी, इसी राज्य के दो प्रमुख विपक्षी पार्टियां समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी विकास दुबे एनकाउंटर के बाद भाजपा से नाराज ब्राह्मण वोटरों को खुश करने के लिए क्रमशः परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित करने, परशुराम के नामपर अस्पताल बनवाने की घोषणा कर दी। रोचक बात यह है कि कभी मायावती ने ही दलितों व पिछड़ों का वोट पाने के लिए तिलक, तराजू का नारा दिया था। और अब ...। 2022 में कौन सी पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाती है कौन नहीं? इसका फैसला तो जनता करेगी। लेकिन यह उपयुक्त समय नहीं है मूर्ति निर्माण पर बात करने का। क्योंकि इस अनावश्यक विमर्श से देश में विमर्श का मुद्दा परिवर्तित हो जा रहा है। जिसे देखो राम मंदिर, मस्जिद, मूर्ति पर बहस कर रहा है। कोरोना महामारी कितनी तेजी से अपने पैर फैला रहा है, इससे मजदूर वर्ग, निर्धन किसान, डॉक्टर, छोटे-छोटे व्यवसायी किस तरह परेशान हो रहे हैं जैसे मुद्दे चर्चा से गायब हो गए।

          मीडिया चैनलों में जहां विमर्श अस्पताल, स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने, बेरोजगारी की मार झेल रही जनता को रोजगार या नौकरी देने, शिक्षा से दूर होते देश के भावी भविष्य के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने पर होनी चाहिए, उसका स्थान मंदिर-मूर्ति निर्माण ले लेता है। आनेवाले समय में कोरोना महामारी से उपजे हालात के कारण जहां देश की जीडीपी में जबरदस्त गिरावट आने की भविष्यवाणी अर्थशास्त्री कर रहे हैं, ऐसे में हमारे प्रतिनिधियों द्वारा 2 वर्ष बाद रोजगार सृजन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की बात न कर बड़े-बड़े मूर्तियों को बनाकर देश की अर्थव्यवस्था डुबाने की बात करना कोई बुद्धिमानी वाली बात नहीं है। वह भी तब जब जनता यह जान चुकी है कि कोरोना से लड़ने के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं युक्त अस्पताल की आवश्यकता है मंदिर, मस्जिद या मूर्तियाँ बनाने से हमें कोई लाभ होने वाला नहीं है।  अतः जनता भी यह मांग करे कि सरकार, जनप्रतिनिधि सैकड़ों एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर इतने ऊंचे मूर्ति निर्माण पर व्यय होने वाली कम से कम हजारों करोड़ रुपए जैसी बड़ी धनराशि स्वास्थ्य सुविधा सुधार हेतु करे। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो आने वाले चुनाव में देश की जनता को आने वाले विषम हालात को ध्यान में रखते हुए ऐसे मानसिक दिवालिये जनप्रतिनिधियों को आने वाले चुनाव में सबक सिखाने की जरूरत है। उनको चुनने की जरूरत है जो जनता के इन बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज़ उठाए।    

Monday, 3 August 2020

हिंदू धर्म में नदियों के उद्गम तथा संगम स्थल को अत्यधिक महत्व क्यों दिया जाता है?


गंगोत्री (गंगा का उद्गम), यमुनोत्री (यमुना का उद्गम), केदारनाथ (मंदाकिनी का उद्गम) बद्रीनाथ (अलकनंदा का उद्गम) अमरकंटक (सोन व नर्मदा का उद्गम) की यात्रा करने के बाद भी एक सवाल का उत्तर नहीं मिला कि आखिर हिंदू/सनातन धर्म में नदियों के उद्गम तथा संगम स्थान को इतना अधिक मान्यता क्यों दिया जाता है? इसका उत्तर आज गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित, रामेश्वर मिश्र 'पंकज' जी की एक पुस्तक 'नदियां और हम' पढ़ते हुए मिला -
ऋग्वेद के एक श्लोक (आठवां मंडल, छठा सूक्त, अट्ठाईसवां श्लोक) के अनुसार, 'बोध की प्राप्ति हमारे पूर्वजों को पर्वतों की घाटियों और नदियों के संगम पर हुई"। (उपह्वरे गिरिणाम संगथे च नदीनाम् । धियो विप्रो अजायत्॥ इस संकेत में यह निहित है कि जो भी व्यक्ति गिरी आश्रय में या नदी के संगम में ध्यान मनन अवधारण करेगा, उसे बोध की, पवित्र धी (बुद्धि) की प्राप्ति होगी।

Saturday, 20 June 2020

संस्कृत ग्रंथों में वर्णित 10 दिशाएँ (Ten Directions) एवं उसके स्वामी


ऋग्वेद में 4 दिशाओं पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण का वर्णन मिलता है, जबकि इनके बाद रचित पौराणिक ग्रंथों में 10 दिशाओं तथा उनके स्वामी का उल्लेख मिलता है जो निम्न हैं -
पूरब – इंद्र
पश्चिम – वरुण (जल का स्वामी)
उत्तर – कुबेर (धन का स्वामी)
दक्षिण – यम
आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) – अग्नि
नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) – नीरित
वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) – मारुत (वायु/पवन देव)
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) – ईशा
आकाश – ब्रह्मा
पाताल – शेषनाग