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Monday, 26 January 2026

उच्च शिक्षा में समानता की लड़ाई: क्यों खटक रहे हैं UGC Equity Regulations 2026?

जाति, धर्म, वर्ग, जेंडर, रंग, भाषा, संस्कृति आदि के नाम पर भेदभाव हमारे वैश्विक समाज की एक कड़वी सच्चाई है। ईश्वर/अल्लाह/भगवान की नज़र में सभी मनुष्यों को सामान मानने वाले लोग/समाज सैद्धांतिक रूप से भले ही कितना भी बड़े-बड़े दावे करे कि हमारा समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त है लेकिन निष्पक्ष रूप से उस समाज का अवलोकन करने पर यह बात हवा-हवाई लगेगी। यह भेदभाव तब और बढ़ जाता है जब उस क्षेत्र में दो अलग-अलग प्रकार के मानव समूह की मौजूदगी हो, दोनों के रंग रूप अलग-अलग हो। दोनों में सांस्कृतिक विविधताएँ हों। वहाँ आपको रंग/वर्ग (अमीर/गरीब) मूल निवासी/विदेशी, संस्कृति आदि के आधार पर भेदभाव देखने को मिलेगा। उदाहरण के रूप में अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका में श्वेत एवं अश्वेत नागरिकों के बीच भेदभाव देखा जा सकता है।  

हमारा देश भारत भी इस भेदभाव/छुआछूत की बिमारी से अछूता नहीं है। सैद्धांतिक रूप से भले ही हमारा देश हर एक नागरिक को समानता का अधिकार (सभी नागरिक एक समान है) देता है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। विवाह में घोड़ी चढ़ने, मूंछ रखने, जनेऊ पहनने आदि से संबंधित समाचार पत्रों में छपने वाले न्यूज इस बात की पोल खोलते नजर आएँगे कि हमारे देश में सभी नागरिक एक समान है। इस वास्तविकता के पीछे आखिर कौन जिम्मेदार है? सरकार या समाज के लोग? सरकार की यदि हम बात करें तो हमारी सरकार के सभी अंग जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि भलिभांति अवगत है कि सभी नागरिक शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से अभी एक समान नहीं है, सभी को समानता की एक पंक्ति में लाने के लिए उन समाज के लोगों को अनेक प्रकार के लोककल्याणकारी योजनाएं, सेवा क्षेत्र की नौकरियों में ला रही है। संवैधानिक संस्थाओं को समावेशी बनाने की हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में पंचायत व्यवस्था में आरक्षण द्वारा राजनीति में समावेशन, शिक्षा एवं सेवा के क्षेत्र में आरक्षण के प्रावधान से समाज में समावेशन के सफल प्रयास को समझा जा सकता है।

समानता का अधिकार मिले 7 दशक (77 वर्ष) हो जाने के बाद भी हमारे देश के नागरिक कितना एक दूसरे की नज़र में समान हैं, इस बात की झलक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की एक विनियम ‘UGC Equity Regulations 2026’ में देखने को मिला। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी 2026 से भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए नियम लागू किये हैं जिसका उद्देश्य है - उच्च शिक्षा में जाति, धर्म, दिव्यंगता आदि के आधार पर हो रहे भेदभाव को रोकना/खत्म करना (समता का संवर्द्धन)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित समता एवं समावेशन को ध्यान में रखते हुए सभी जाति, धर्म, वर्ग, के छात्र-छात्राओं/संकाय सदस्य के हित को ध्यान में रखते हुए इस नियम को लाया गया।

इन नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान (कॉलेज/यूनिवर्सिटी) को एक Equal Opportunity Centre (EOC)/समान अवसर केंद्र बनाना अनिवार्य होगा। यह सेंटर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, दिव्यांग वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को दर्ज करेगा, काउंसलिंग करेगा, जागरूकता फैलाएगा, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की सिफारिश भी करेगा। अपने कैंपस में सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित भी करेगा। 2012 से ही उच्च शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार के सेंटर स्थापित हैं। उन्हें ही संसोधित कर सक्रिय किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त हर संस्थान में समान अवसर केंद्र के अंतर्गत ही एक Equity Committee/समता समिति बनाई जाएगी, जिसमें संस्था प्रमुख, शिक्षक, संस्थान का ही एक गैर शिक्षकीय कर्मचारी, दो छात्र प्रतिनिधि, व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक समाज के दो प्रतिनिधि आदि शामिल होंगे। इस समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा। सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा। यह कमेटी भेदभाव के शिकायत की जांच करेगा, 30 से 60 दिनों में फैसला देगा तत्पश्चात इसकी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगा। संस्था यदि इस संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही करती है या मामले को नजरंदाज करती है तो यूजीसी उस पर कार्रवाई कर सकती है, पाबंदियाँ लगा सकती है। समता समिति उन कार्यों की एक सूची भी तैयार और प्रसारित करेगी जो भेदभाव की श्रेणी में आते हैं। इसके लिए भेदभाव को व्यापक तरीके से परिभाषित किया गया है। इन बिंदुओं को ‘भेदभाव’ के दायरे में रखा गया है –

·       जाति/धर्म/लिंग के आधार पर अपमान या अनुचित व्यवहार

·       मौखिक या मानसिक उत्पीड़न

समता समिति शिकायतकर्ता की सुरक्षा का भी ध्यान रखेगी। इसके लिए वह भेदभाव की सूचना देने वाले हितधारक की पहचान उसके अनुरोध पर गोपनीय रखेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगी कि उसे किसी भी प्रकार से डराया धमकाया नहीं जाए। यदि ऐसा होता है तो यूजीसी उस संबंधित संस्थान पर कार्रवाई कर सकता है। जैसे - यूजीसी संचालित योजनाओं में संस्था के भाग लेने से वंचित करना, कोर्स की मान्यता रद्द करना, उच्च शिक्षा संस्थान के लिस्ट से संस्था को हटाना, आदि।

यूजीसी द्वारा लाए गए इन 8 पृष्ठों वाले नियमों से सवर्ण जाति के लोग/छात्र/छात्राएं/शिक्षक जहाँ चिंतित हैं वहीं आरक्षित वर्ग के लोग हर्षित हैं। आरक्षित वर्ग के लोग इस कदम को सामाजिक भेदभाव खत्म करने/रोकने की दिशा में एक बढ़िया कदम मान रहे हैं। आरक्षित वर्गों के कॉलेज एवं विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राएँ विशेष रूप से हर्षित हैं क्योंकि वे कॉलेज, विश्वविद्यालय में जाति, धर्म, जेन्डर के नाम पर होने वाले भेदभाव की वास्तविकता से भली भाँति परिचित हैं। इस तरह के भेदभाव में सहपाठियों के साथ-साथ शिक्षक, गैर शिक्षकीय कर्मचारी से भी प्रताड़ित हो रहे होते हैं जो उनके उपनाम देख कर उनके साथ व्यवहार में परिवर्तन लाते हैं। सोशल मीडिया से यह समझ आया कि बहुत से सवर्ण बुद्धिजीवी यूजीसी के इस स्टेप की सराहना कर रहे हैं क्योंकि वे समाज में जाति आधारित भेदभाव की वास्तविकता को जानते समझते हैं।

सवर्ण जाति के लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि

·       आरक्षित वर्ग के छात्र/छात्रा इस नियम का गलत उपयोग कर उनकी/उनके बच्चों की छवि, मानसिक स्वास्थ्य और कैरियर का नुकसान कर सकते हैं।

·       उनके बीच हमेशा एक डर का माहौल रहेगा।

·       एक दूसरे के बीच स्वस्थ संवाद की चुनौती रहेगी।

इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस नियम व्यवस्था से दोनों वर्गो के बीच स्वस्थ संवाद की प्रक्रिया बाधित होगी, थोड़ी कमी आएगी। लेकिन इस दौरान सबसे अच्छी बात यह रहेगी कि  उनके आपसी बातचीत में सामन्ती मानसिकता/जातीय दंभ वाले व्यवहार में कमी आएगी। आरक्षित वर्गों के युवाओं को नौकरियों के साक्षात्कार में जिस तरह से Not found suitable (NFS) बता कर आगे बढ़ने की दौड़ से किनारा कर दिया जाता था, उस पर विराम लगाया जा सकेगा। ऐसे भ्रष्ट आचरण करने वाले समता समिति से डरेंगे और भ्रष्टाचार करने से पहले 10 बार सोचेंगे। जाति देखकर Not found suitable (NFS) करने वाले बेनकाब हो रहे होंगे।

इस आठ पृष्ठों वाले नियमों को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि सवर्णों का इससे डरना बेवजह है। यूजीसी के इस कदम का उद्देश्य देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक बहिष्करण को खत्म कर सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है, ताकि सभी नागरिको में एक समतामूलक समाज निर्माण की भावना विकसित हो और 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में हम खुद को और आने वाली पीढ़ी को विकसित करने की दिशा में अग्रसर हो। किसी पर बेवजह भेदभाव के आरोप लगाकर उसका नुकसान करना इस नियम का बिलकुल भी उद्देश्य नहीं है।

यूजीसी के इस प्रावधान की सार्थकता को POSH (Prevention of Sexual Harassment) के नियमों से समझा जा सकता है। 2013 में लाए गए इस कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि ‘कार्यस्थल (स्कूल, कार्यालय, कॉलेज, अस्पताल आदि) पर महिलाएं सुरक्षित महसूस कर बेफिक्र होकर कार्य कर सकें’। इस नियम में ‘सेक्शुअल हैरेसमेंट’ को इतनी गहराई से परिभाषित किया गया है कि इसके समक्ष ‘भेदभाव’ की परिभाषा सतही लगेगी। इस कानून के अनुसार निम्न व्यवहार को ‘Sexual Harassment’ के दायरे में रखा गया –

·       अनचाहा शारीरिक संपर्क या निजी दायरे का उल्लंघन,

·       यौन संबंधों या यौन सेवाओं की मांग करना,

·       बुरी नजर या अनुचित ढंग से देखना,

·       जबरन किए गए सेक्शुअल आचरण, यौन संबंध या हमले,

·       अभद्र प्रदर्शन या यौनिक तौर पर प्रकट हाव-भाव,

·       अनुचित, अंतरंग, सेक्सुल या सेक्सिस्ट बातचीत: ऑनलाइन या ऑफलाइन,

·       अनचाही फ्लर्टिंग, रोमैन्टिक या यौनिक पेशकश या गिफ्ट, आमंत्रण जैसे हाव-भाव,

·       स्त्री के शरीर, कपड़ों, या सेक्शुअल रुझान पर टिप्पणी या सलाह,

जिन कार्यस्थलों/कार्यालयों में इन नियमों के पालन कड़ाई से कराए जाते हैं वहाँ सभी जेंडर (स्त्री, पुरुष, थर्ड जेंडर) के बीच स्वस्थ संवाद की कोई चुनौती ही नहीं होती, बल्कि यथा संभव स्वस्थ संवाद ही होता है। स्वस्थ संवाद के कारण दोनों पक्षों के बीच किसी भी प्रकार के अवांछित/अनुचित व्यवहार भी नहीं होता है। सभी अपने कार्य में लगे रहते हैं। हाँ ! थोड़ा डर का माहौल भी जरूर होता है लेकिन यह डर सहकर्मी स्त्रियों के साथ अनुचित व्यवहार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा होता है। धीरे-धीरे सभी इस माहौल में रहने के आदि हो जाते हैं और इस बात को भी बेहतर तरीके से समझने लगते हैं कि इस प्रकार के तथाकथित कड़े नियम-कानून की हमारे समाज में आवश्यकता क्यों है?  

UGC Equity Regulations 2026’ Prevention of Sexual Harassment act 2013 जैसे नियम कानून हमारे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को और बेहतर करने के लिए ही बनाए जाते हैं। ऐसे में अच्छे नियम-कानून का विरोध करने, इसे वापस लेने की मांग, को किसी भी तरीके से उचित नहीं ठहराया जा सकता। ये सभी प्रावधान हमारे देश के नागरिकों को ही संवैधानिक मूल्यों को समझने, इस अनुसार आचरण करने का समय विकसित कर रहा होगा। फिर भी किसी वर्ग विशेष को यदि इसके अत्यधिक दुरुपयोग होने की संभावना लगती है तो यूजीसी को इसके नियमों को थोड़ा और व्यवस्थित करना चाहिए। हालांकि समता समिति में शामिल सदस्यों को इतना भी कमतर आंकना उपयुक्त नहीं माना जाना चाहिए। 

Sunday, 3 December 2023

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा - 2005 (National Curriculum Framework - 2005) के आईने में सामाजिक अध्ययन विषय

 

किसी भी देश के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या एक मानचित्र की तरह होती है जो देश द्वारा तैयार शिक्षा नीति को सफल बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है। संबंधित देश की सभ्यता-संस्कृति, भौगोलिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या निर्मित की जाती है। हमारे देश भारत में भी सांस्कृतिक-भौगोलिक-भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा निर्मित की गई है। हमारे देश में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या कैसा हो? इसकी रूपरेखा बनाने का पहला प्रयास 1973 ईस्वी में शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा किया गया। 1975 ईस्वी में यह बनकर पूर्णता तैयार हुआ। 10 वर्षों के लिए इसे देश की सभी शालाओं के लिए लागू किया गया। इसके पश्चात 1988, 2000, एवं 2005 ईस्वी में इसको विस्तार दिया गया। 1975 में निर्मित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में उच्च प्राथमिक शालाओं के साथ-साथ सामाजिक अध्ययन विषय के लिए इसमें कुछ नियमावली थे। जैसे-

·       कक्षा 6 से 8 उच्च प्राथमिक शाला के अंतर्गत होंगे। हालांकि इसके बावजूद आंध्र प्रदेश में केवल कक्षा 6 और 7, असम, गोवा, केरल आदि राज्यों कक्षा 5 से 7, पश्चिम बंगाल में कक्षा 5 से 8 उच्च प्राथमिक शाला के अंतर्गत आते थे।

·       एक सप्ताह में 48 घंटों का अध्यापन समय होगा।

·       30 से 40 मिनट का एक पीरियड होगा।

·       सामाजिक अध्ययन के लिए 6 पीरियड रखा होगा।

·       पूरे सप्ताह कुल शाला समय का 20% समय सामाजिक अध्ययन शिक्षण को दिया जाएगा।

·       1988 पाठ्यचर्या में इसके समय को 20% से घटाकर 15% कर दिया गया।

      सामाजिक विज्ञान, सामाजिक अध्ययन सब एक ही विषय के नाम हैं। प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर के लिए देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से इस विषय को संबोधित किया जाता है। सामाजिक अध्ययन (8 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश) व सामाजिक विज्ञान (22 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश) के अतिरिक्त त्रिपुरा तथा हरियाणा राज्य में इसे 'इतिहास भूगोल और नागरिक शास्त्र' विषय के नाम से संबोधित किया जाता है।[i]

क्रम

नामकरण

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश

राज्य की संख्या

1

सामाजिक अध्ययन

आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, सिक्किम, असम, मेघालय, छत्तीसगढ़

6

2

सामाजिक विज्ञान

अंडमान एवं निकोबार दीप समूह, दिल्ली, जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, केरल, झारखंड, लक्ष्यदीप, नागालैंड, मणिपुर, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मिजोरम, गुजरात, दादर-नगर हवेली, पंजाब, उत्तराखंड, दमन एवं दीव, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश

23

3

इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र

त्रिपुरा, हरियाणा

2

4

इतिहास एवं भूगोल

पश्चिम बंगाल, गोवा

2

5

इतिहास, राजनीति शास्त्र एवं भूगोल

उड़ीसा

1



[i] Yadav S K (2014) School Curriculum, NCERT, New Delhi Page No. 14

Saturday, 15 April 2023

अंधविश्वास के मकड़जाल से मुक्त होने का समय

 ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।

          इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी।  

          सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है। 

Sunday, 19 December 2021

सहिष्णु या असहिष्णु धर्म नहीं व्यक्ति होता है।

वर्तमान में हमारे देश में एक तरफ बड़ी संख्या में हिंदू धर्मावलंबी खुद को शान से हिंदू कहते हुए अपने ही देश के अन्य नागरिक विशेष रुप से मुसलमान, इसाई धर्मावलंबियों को अपने देश/धर्म के लिए खतरा मानते हैं, और इनके खिलाफ दिन रात आग उगलते रहते हैं। दूसरी तरफ कुछ मुसलमान भी पूरे जोश में हिंदुओं के खिलाफ इतिहास पलट कर देख लेने जैसे अनाप-शनाप बातें उगलते रहते हैं। इस कड़ी में आप उन धर्म या जाति के लोगों को भी शामिल कर सकते हैं जो बिल्कुल इन दोनों के नक्शे कदम पर चलते हैं।

          कोई शक नहीं कि दोनों ही समूह अपने-अपने धार्मिक समूह के नफरत के सौदागर हैं। इनसे यदि इनके अपने धर्म संबंधी विचार पूछा जाए तो दोनों के जवाब बिल्कुल एक जैसे होंगे। एक कहेगा कि हिंदू जैसा सहिष्णु धर्म दुनिया में और कोई नहीं है। तो दूसरा समूह अपने धर्म को दुनिया का सबसे अधिक अमन, चैन, शांति चाहने वाला धर्म बता देंगे। तीसरा समूह जिसे आप शामिल कर रहे हैं उनका भी जवाब ऐसे ही होने की पूरी गारंटी है। ऐसे लोगों को ही उस धर्म का कट्टरपंथी समूह कहा जाता है। इन्हें सिर्फ अपना ही दही मीठा लगता है। और सामने वाले का खट्टा। यहां दही शब्द से तात्पर्य धर्म से और मीठे का सहिष्णु या अमन चैन पसंद से है। इनको यह नहीं पता होता कि दही किसी की भी हो उसके स्वाद की प्रकृति एक जैसी ही खट्टी होती है। ऐसे में उसे मीठा बतलाना सत्य से मुंह मोड़ना है। इन दोनों समूहों के दही को कोई खट्टा कहे यह उन्हें बर्दाश्त नहीं है। वह मरने और मारने पर उतारू हो जाते हैं। उनका सहिष्णु धर्म तुरंत असहिष्णु हो जाएगा।

          दरअसल उन्हें यह नहीं पता होता कि किसी के प्रति सहिष्णु या असहिष्णु होने का संबंध धर्म से नहीं बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व से होता है। पूरी दुनिया को यदि वह जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग के आधार पर भेद करने के परीक्षा प्रेम भरी नजर से देखता है तो वह सहिष्णु है। अन्यथा ...

Saturday, 18 December 2021

प्राचीन रीति रिवाजों में संसोधन या त्याग करने का समय

किसी भी धर्म चाहे वह हिन्दू हो या इस्लाम, के हजारों वर्ष पूर्व बनाई धार्मिक व्यवस्था को आंख मूंदकर follow करना कोई बुद्धिमानी नहीं है। परिस्थितियां हमेशा एक सी नहीं होती। उस समय कुछ थी आज कुछ और है। तब प्राचीन काल या आरंभिक मध्यकाल का दौर था। उस दौर में हम उतने तार्किक नहीं थे जो इन रीति रिवाजों की प्रासंगिकता को आलोचनात्मक नज़रिये से देख सकें। आज हम आधुनिक काल में जी रहे हैं। हमारे देश में इसकी शुरुआत हुए 200 वर्ष हो चुके हैं। इन दो सौ वर्षों में अनेक धर्म/समाज सुधारकों ने कुछ अनर्गल प्रथाओं के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए उसे कानूनन बंद करवाया। आज भी ऐसे कई कुप्रथाओं (व्रत, त्योहार) को हम जरूरी रीति रिवाज या नियम कानून मानकर उसे ढोए जा रहे हैं। जिसकी कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

          ऐसे रीति-रिवाजों, मान्यताओं को या तो खत्म कर देना चाहिए या समय की प्रासंगिकता के अनुसार इनमें संसोधन होते रहना चाहिए, जैसा संविधान का होता है।

 

 

Tuesday, 14 December 2021

उफ़्फ़ ये धर्म के ठेकेदार

 धर्म के ठेकेदारों की मानें तो प्रत्येक घटना के पीछे भगवान, ईश्वर, अल्लाह, खुदा का हाथ होता है। यानी अच्छे काम से लेकर बुरे काम तक सब भगवान, ईश्वर, अल्लाह की मर्जी से होता है। बिना उसकी मर्जी के कोई पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसा कह कर वह धर्म का ठेकेदार सामने वाले के दिमाग में अपने ईश्वर की सर्वोच्चता को स्थापित कर रहा होता है। अप्रत्यक्ष रूप से उस अदृश्य शक्ति से सामने वाले व्यक्ति को इतना डरा दिया जाता है कि इस पर कोई भी सवाल उठाने की हिम्मत नहीं करता। बस सभी लोग गुणगान करने में जुट जाते हैं। हास्यास्पद बात यह है कि सारे काम जब उनकी मर्जी से हो रहे हैं तो फिर स्वर्ग, नरक, जन्नत, जहन्नुम का लालच या डर दिखाने का क्या मतलब? कोई आदमी यदि किसी की हत्या कर रहा है तो वह अपराध कैसे हुआ? वह तो भगवान, ईश्वर, अल्लाह की मर्जी का पालन कर रहा है। ऐसे में गंगा, जमजम स्नान करने, तीर्थ यात्रा या हज करने जैसे फर्जी कर्मकांड करा कर केवल इंसानों के खून पसीने की कमाई लूटने का क्या मतलब?  

            क्या झूठ के नाम पर यह लूटपाट, कमाई उन धर्म के ठेकेदारों के लिए पाप नहीं है? इन पाखंडीयों को खुद के पाप दिखते नहीं, चले हैं दूसरे का पाप देखने और समाधान करने।

प्राचीन काल को त्याग आधुनिक काल में जीने की जरूरत

ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।

          इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी।  

          सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है।   


Sunday, 9 August 2020

कोरोना महामारी के दौर में मंदिर-मूर्ति पर विमर्श क्यों?

 

पिछले 8 माह के दौरान कोरोना वायरस ने सभी धर्मों के देवी-देवताओं के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। त्रस्त जनता को देखकर कष्ट से उबारने या किसी न किसी रूप में आकर लोगों की जान बचाने के लिए जाने जाने वाले देवी-देवताओं को भी अपने भक्तों की चिंता नहीं है। ऐसा इन देवी-देवताओं के सबसे बड़े पुजारी या भगवान, ईश्वर, अल्लाह के सबसे करीब होने का दावा करने वाले लोगों के संक्रमित होने के आधार पर कहा जा सकता है। उन्हें अपने ही आराध्य की अलौकिक शक्ति पर विश्वास नहीं है। इसीलिए अपनी रक्षा के लिए ये लोग खुद तो मास्क पहन रहे हैं, मंदिर-मस्जिद में सैनीटाइजर का प्रयोग कर रहे हैं ही, साथ ही अपने आराध्य को भी मास्क पहना रहे हैं। कई मंदिरों में तो मंदिर प्रबंधन समिति को यहाँ तक डर है कि श्रद्धालुओं द्वारा मूर्ति को हाथ लगाने से उनके आराध्य न संक्रमित हो जाएँ व अन्य को संक्रमित कर दें। इसलिए श्रद्धालुओं को मूर्तियों को हाथ तक नहीं लगाने दे रहे हैं। दूर से प्रणाम कर यथाशीघ्र दर्शन कर गर्भगृह से निकलने का निर्देश दे रहे हैं। अधिकांश मंदिरों के कपाट इस महामारी ने बंद करवा दिये हैं। यदि खुले भी हैं तो गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है। पूरे विश्व के कट्टर धार्मिक समुदायों में हाहाकार मचा हुआ है, क्योंकि कर्मकांड करने/कराने के एवज में मिलने वाले परिश्रमिक/दान से होने वाली आय से महरूम हो गया है। विज्ञान की आलोचना करने वाले ये कट्टर धार्मिक वर्ग आज वैज्ञानिकों की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं कि कब इसका टीका मिले और हालात सामान्य हो। नास्तिक (भगवान, ईश्वर, अल्लाह के अस्तित्व को नहीं मानने/चुनौती देने वाले) लोग मौके का फायदा उठाते हुए इन धार्मिक कट्टरपंथियों को छेड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। इससे पूर्व से ही वे इस तथ्य के आधार पर भगवान, अल्लाह के अस्तित्व को नकार रहे हैं कि 500 वर्ष पूर्व जब मंदिर टूटा तो खुद राम भी अपने जन्मस्थान स्थित मंदिर को टूटने से बचा नहीं पाए। एकमात्र अमर देवता राम के परम भक्त हनुमान भी मंदिर को टूटने से बचा नहीं सके। इसी तरह 1992 में मस्जिद को टूटने से अल्लाह भी नहीं बचा सके। नहीं बचा सके तो भी कोई बात नहीं। अगले दिन खुद की अलौकिक शक्ति से ही बनवा कर अपने अस्तित्व का प्रमाण देते। लेकिन वह भी नहीं हुआ। यह हाल है पूरे दिन भर देवी-देवताओं, अल्लाह, ईश्वर, वाहेगुरु की उपासना करने वाले पुरोहित वर्ग का।

          दूसरी तरफ हैं हमारे देश के शासक वर्ग अर्थात सत्तानसीं संवैधानिक पदों पर बैठे अलग-अलग पार्टियों, विचारधारा के जनप्रतिनिधि। ऐसा नहीं है कि उपरोक्त परिस्थितियों से वे परिचित नहीं हैं। बावजूद इसके वे स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी जैसे जन-समस्याओं को दरकिनार कर मीडिया चैनलों, समाचारपत्रों के माध्यम से धार्मिक मुद्दों को उछालने और इसपर विमर्श करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ताकि खुद को संबंधित धर्म के लोगों का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर सकें। इनके इस रवैये के कारण अन्य पार्टियों को भी चाहे-अनचाहे इस तरह के विमर्श में कूदना ही पड़ता है खुद को उस धर्म विशेष का हितैषी बताने के लिए। पार्टी विशेष द्वारा समर्थित मीडिया विपक्षी पार्टियों को इस विमर्श में भाग लेने को मजबूर कर देता है। क्योंकि कोई भी पार्टी बहुसंख्यक वोट बैंक को चाहे-अनचाहे खोना नहीं चाहती। परिणामस्वरूप मीडिया के साथ-साथ आम जनता में विमर्श की धारा ही बदल जाती है। और वे समस्याएँ दब जाती है जिनपर बात किया जाना चाहिए और सत्तारूढ़ सरकार को उस समस्या के समाधान की बात पहुंचानी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हाल ही की घटना 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु भूमि पूजन समारोह को लें तो पूरे देश में हिंदू लोग इस दिन को जश्न के रूप में मनाए जो स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जैसे ही घोषणा की कि अयोध्या से 3 किलोमीटर दूर सरयू नदी के तट पर स्थित एक गाँव में भगवान श्री राम की 251 मीटर ऊंची मूर्ति बनाई जाएगी, इसी राज्य के दो प्रमुख विपक्षी पार्टियां समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी विकास दुबे एनकाउंटर के बाद भाजपा से नाराज ब्राह्मण वोटरों को खुश करने के लिए क्रमशः परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित करने, परशुराम के नामपर अस्पताल बनवाने की घोषणा कर दी। रोचक बात यह है कि कभी मायावती ने ही दलितों व पिछड़ों का वोट पाने के लिए तिलक, तराजू का नारा दिया था। और अब ...। 2022 में कौन सी पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाती है कौन नहीं? इसका फैसला तो जनता करेगी। लेकिन यह उपयुक्त समय नहीं है मूर्ति निर्माण पर बात करने का। क्योंकि इस अनावश्यक विमर्श से देश में विमर्श का मुद्दा परिवर्तित हो जा रहा है। जिसे देखो राम मंदिर, मस्जिद, मूर्ति पर बहस कर रहा है। कोरोना महामारी कितनी तेजी से अपने पैर फैला रहा है, इससे मजदूर वर्ग, निर्धन किसान, डॉक्टर, छोटे-छोटे व्यवसायी किस तरह परेशान हो रहे हैं जैसे मुद्दे चर्चा से गायब हो गए।

          मीडिया चैनलों में जहां विमर्श अस्पताल, स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने, बेरोजगारी की मार झेल रही जनता को रोजगार या नौकरी देने, शिक्षा से दूर होते देश के भावी भविष्य के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने पर होनी चाहिए, उसका स्थान मंदिर-मूर्ति निर्माण ले लेता है। आनेवाले समय में कोरोना महामारी से उपजे हालात के कारण जहां देश की जीडीपी में जबरदस्त गिरावट आने की भविष्यवाणी अर्थशास्त्री कर रहे हैं, ऐसे में हमारे प्रतिनिधियों द्वारा 2 वर्ष बाद रोजगार सृजन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की बात न कर बड़े-बड़े मूर्तियों को बनाकर देश की अर्थव्यवस्था डुबाने की बात करना कोई बुद्धिमानी वाली बात नहीं है। वह भी तब जब जनता यह जान चुकी है कि कोरोना से लड़ने के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं युक्त अस्पताल की आवश्यकता है मंदिर, मस्जिद या मूर्तियाँ बनाने से हमें कोई लाभ होने वाला नहीं है।  अतः जनता भी यह मांग करे कि सरकार, जनप्रतिनिधि सैकड़ों एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर इतने ऊंचे मूर्ति निर्माण पर व्यय होने वाली कम से कम हजारों करोड़ रुपए जैसी बड़ी धनराशि स्वास्थ्य सुविधा सुधार हेतु करे। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो आने वाले चुनाव में देश की जनता को आने वाले विषम हालात को ध्यान में रखते हुए ऐसे मानसिक दिवालिये जनप्रतिनिधियों को आने वाले चुनाव में सबक सिखाने की जरूरत है। उनको चुनने की जरूरत है जो जनता के इन बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज़ उठाए।    

Wednesday, 29 July 2020

स्त्रियों के प्रति हमारे समाज की संकीर्ण सोच


प्राचीन, मध्य होते हुए हम आधुनिक काल में प्रवेश कर गए हैं जहां हम खुद को अपने पूर्वजों से सभ्य व बुद्धिमान होने का दावा करते हैं लेकिन स्त्रियों के प्रति हमारी सोच वही प्राचीनकाल वाली ही है, आधुनिक नहीं हो पाई है। इस संकीर्ण सोच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हम इनको नीचा दिखाने के लिए सैकड़ों निम्न दर्जे के लोकोक्तियाँ, मुहावरे प्रयुक्त करने से नहीं चूकते। इनमें से एक है – “दो स्त्रियां कभी आपस में चुप नहीं बैठ सकती”। अर्थात किसी भी स्थान पर यदि दो स्त्रियां मिल जाएं तो वे कुछ न कुछ बात निकाल ही लेती हैं अपना टाइम पास करने के लिए। हद तो इस बात की है कि उनकी बातचीत को बातचीत नहीं, बल्कि चुगली करने के रूप में देखा जाता है। इस बातचीत को समाज की तरह यदि आप भी स्वस्थ संवाद न मानकर चुगली मानते हैं तो आप भी समाज की तरह मानसिक रूप से विकृत हैं। क्योंकि चुगली करने पर किसी खास जेंडर का एकाधिकार नहीं होता है। दो बातचीत पसंद पुरुष यदि एक जगह मिल जाएँ और राजनैतिक या सामाजिक मुद्दों पर बातचीत करते हुए किसी पार्टी, विचारधारा की आलोचना करें तो उसे चुगली नहीं माना जाता। यदि इसे चुगली ही माना जाए तो स्त्रियाँ इस मामले में भी दूसरे नंबर पर होगी। अव्वल स्थान पर वे पुरुष वर्ग होंगे जो चौक-चौराहों पर कैमरे की तरह हमेशा यह ताकते रहते हैं कि किसकी बहू-बेटी कहां आ-जा रही है? क्या पहन रही है? कोई दिखी नहीं कि अपने साथियों से कानाफूसी शुरू।  
          यदि दो स्त्रियाँ लंबे समय तक बात भी करती है तो इसमें गलत क्या है? पितृसत्तात्मक समाज ने जब निजी क्षेत्र या गृह कार्य स्त्रियों के, और पुरुषों को बाहरी दुनिया का ठेका दे दिया। ऐसे में लगातार झाड़ू-पोछा, बर्तन, दो से तीन टाइम खाना बनाने, बच्चों की देखभाल करने आदि कार्य से निवृत्त होकर दो स्त्रियाँ यदि आपस में मिलकर अपने निजी क्षेत्र संबंधी कुछ बात कर ही लेती हैं तो इसमें गलत क्या है? कोई दावा के साथ कह भी नहीं कर सकता कि दोनों मिलकर किसी की बुराई ही करती हैं। एक समय था, जब आप उसे पढ़ाई-लिखाई, सामाजिक कार्य, राजनीति से दूर रखते थे, उस दौरान इस बात की थोड़ी-बहुत संभावना रहती होगी। लेकिन आज वह समय नहीं बल्कि कुछ और है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार से लेकर अनेक प्रकार के अधिकार का उपयोग कर आज वे सार्वजनिक क्षेत्रों में भी पुरुषों को टक्कर दे रही हैं। इस स्तर की यदि दो स्त्रियां आपस में मिलती हैं तो आप की तरह ही वह भी सामाजिक बदलाव, राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर अन्य कई प्रकार के सार्थक बातचीत करती हैं। अतः जरूरत है हम आप को स्त्रियों को देखने के अपने नजरिए में परिवर्तन लाने की। इस संकीर्ण सोच से खुद को उबारने की।
(मूलतः पटना से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'एजुकेशनल न्यूज़' के 4 अगस्त 2020 के अंक में प्रकाशित)  

Sunday, 7 June 2020

कोरोना के दौर में आरंभिक भाषा शिक्षण एवं अभिभावक


कोरोना दौर जारी है, बाज़ार, फैक्ट्री से लेकर शिक्षण संस्थाएं सभी बंद पड़ने के बाद धीरे-धीरे खुलने शुरू हो गए हैं। निजी व शासकीय प्राथमिक शालाओं के फिलहाल खुलने पर थोड़ा संशय बना हुआ है क्योंकि बात बच्चों की है। वैसे हम सभी इजरायल, फ्रांस आदि देशों में इस दौरान स्कूल खुलने से बच्चों के कोरोना संक्रमित होने की घटना से हम सभी वाकिफ हैं। यदि हमारे देश में भी ऐसी परिस्थितियाँ बनती है तो अन्य देशों की तरह हमारे देश के स्कूल भी अनिश्चित काल के लिए बंद हो जाने की संभावना बनती है। यदि पूरी सावधानी रखते हुए विद्यालय खुल भी जाएँ तो इस बात की भी पूरी संभावना हो सकती है कि शिक्षक या स्कूल से पर्याप्त सहयोग न मिल पाए जैसा इससे पूर्व मिलता आया है जिससे आपके बच्चे का भाषाई कौशल विकास अवरुद्ध हो सकता है। परिणामस्वरूप आत्मविश्वासी, तेज़ तर्राक, चालाक की जगह आपका बच्चा दब्बू, बुद्धिहीन भी हो सकता है। ऐसा कहने का आधार प्रसिद्ध भाषाविद, दार्शनिक नॉम चोम्सकी का भाषा विकास के सिद्धान्त है, जिसके अनुसार भाषा का विकास मनुष्य की एक संपत्ति है जो स्वतंत्र रूप से बुद्धि का कार्य करता है। इसलिए जैसे हमारी ताकत का आधार इस बात पर सर्वाधिक निर्भर करता है कि हमारा सुबह का नाश्ता पौष्टिक तत्वों से कितना समृद्ध है। वैसे ही अपने बच्चे इस दृष्टिकोण से बच्चे के भाषाई विकास में जरा सा भी लापरवाही करना आपको महंगा पड़ सकता है। यहाँ सवाल उठता है कि आखिर आरंभिक भाषा शिक्षण है क्या? तो आरंभिक भाषा शिक्षण से तात्पर्य है कि कक्षा पहली से पाँचवीं तक बच्चों को भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू आदि सहित अन्य भाषा) विषय के माध्यम से वांछित कौशल का विकास कराया जाना। इन कौशल विकास का अधिकांश दायित्व भाषा विषय तथा भाषा शिक्षक के कंधे पर होता है। इन कौशलों का सही तरीके से विकास होगा तभी अन्य विषयों के अध्ययन से खुद को ये पूरी रुचि के साथ जोड़ पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि तर्क लगाने के कौशल का विकास नहीं हो पाता है तो उसे गणित, विज्ञान विषय रुचिकर नहीं लगेगा। यदि सुनने, समझने का कौशल विकसित नहीं होता है तो कोई विषय रुचिकर नहीं लगेगा आपके बच्चे को।       
          जिन कौशलों के विकास की बात उपरोक्त पंक्तियों में की गई है, वह हैं – किसी भी कविता, कहानी को सुनकर उसके अर्थ को आत्मसाथ कर पाने का कौशल, उन कविता-कहानियों को हाव भाव के साथ कहने का कौशल, उस कविता को पढ़ने का कौशल, कविता-कहानी में आए पात्रों से परिचित होने के साथ-साथ उनसे संबंधित सवाल पूछने एवं उससे संबंधित सवालों के उत्तर देने का कौशल, संबंधित भाषा विषय के ध्वनि, अक्षर, मात्राओं को समझने का कौशल, इन अक्षर व मात्राओं के संयोग से निर्मित शब्द बनाने व समझने का कौशल, शब्द भंडार बढ़ाने का कौशल,  मौलिक चिंतन-लेखन करने, तर्क करने, कल्पना करने, विश्लेषण करने का कौशल, पूछे गए प्रश्न के जवाब देते हुए नए-नए शब्दों का चयन करने का कौशल, संक्षेप या विस्तार में कहने-लिखने का कौशल, लिंग, वचन के भेद को समझने का कौशल, कविता-कहानी को संवाद के उतार-चढ़ाव के साथ पढ़ने व सुनाने का कौशल, शब्द, वाक्य व अनुच्छेद के बीच के अंतर समझ पाने का कौशल, चित्र या अभिनय के माध्यम से कविता या कहानी को समझाने का कौशल, स्वतंत्र रूप से कविता या कहानी बुनने का कौशल आदि। ताकि बच्चा रट्टा मार कर नहीं बल्कि स्वयं से कुछ कर उस अवधारणा के संबंध में अपनी समझ बना सके।
          जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि बच्चों में इन कौशलों को विकसित करने की ज़िम्मेदारी मुख्यतः स्कूल शिक्षक पर होती थी। लेकिन कोरोना महामारी के इस दौर में जिस तरह बच्चे का शिक्षक और स्कूल से दूरी सी बनती जा रही है, ऐसे में बेहतर होगा कि अपने बच्चों के बेहतर विकास के लिए अभिभावक खुद ही भाषा शिक्षक की भूमिका का निर्वाह करें। सीखने हेतु भय-मुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से यह एक अच्छा कदम होगा क्योंकि घरेलू परिवेश में बच्चा भयमुक्त होकर सीखता है। घरेलू परिवेश में ही कक्षा जैसा अनुभव देकर आप अपने बच्चे को मौखिक रूप से मुखर बना सकते हैं। हालांकि यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठता है कि बिना शिक्षकीय प्रशिक्षण के अभिभावक घर पर कैसे शिक्षक की भूमिका निभाएँ? आप यह काम अच्छे से कर सकते हैं इसमें कोई दो राय नहीं। क्योंकि यदि आप अपने बच्चे को स्कूल भेजने से पूर्व भाषाई रूप से वयस्क (नोम चोम्सकी के भाषा विकास सिद्धांत के अनुसार) कर सकते हैं तो अपनी क्षत्र-छाया में रखकर उनमें उपरोक्त कौशलों को विकसित भी कर सकते हैं। स्कूल जाने से पूर्व ही बच्चों के भाषाई रूप से वयस्क हो जाने की बात आपको आश्चर्यचकित कर सकता है लेकिन यह सत्य है। विडम्बना यह है कि इस बात की जानकारी अभिभावक को भी नहीं होती, वे इस तथ्य से अनजान होते हैं। अपने बच्चे के भाषाई कौशल के विकास में आप निम्न रूप से योगदान दे सकते हैं -
·       सीखने के प्रतिफल जानने-समझने का प्रयास करें –
राष्ट्रीय शिक्षा एवं अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा 2016-17 से प्राथमिक से लेकर माध्यमिक कक्षा स्तर पर पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों जैसे भाषा, गणित, सामाजिक अध्ययन, विज्ञान के पाठ्यपुस्तकों के शुरुआत में सीखने के प्रतिफल खंड शामिल किया गया है, जिसका उद्देश्य है शिक्षकों, अभिभावकों को इस बात से अवगत कराना कि अलग-अलग दर्जे में बच्चों में कौन-कौन से कौशल विकसित किया जाना चाहिए। यह सीखने का एक मापदंड है जिसके आधार पर बच्चे का आकलन किया जाता है। एनसीईआरटी के अतिरिक्त एससीईआरटी ने अपने-अपने राज्यों के शासकीय शालाओं के पाठ्यपुस्तकों में इसे शामिल किया है। आपके बच्चे का नामांकन यदि किसी निजी विद्यालय में है तो उनके पाठ्यपुस्तक में यह संभवतः नहीं भी हो सकता है। ऐसे में आप इसे एनसीईआरटी या एससीईआरटी के वैबसाइट से डाउनलोड कर सकते हैं। अभिभावक को भी यदि यह पता हो कि उनका बच्चा यदि पहली कक्षा में है और इस दौरान उनमें कौन-कौन से कौशल विकसित होना चाहिए तो वह भी वैसे ही योगदान दे सकते हैं जैसे अपने बच्चे को पूर्व में शिक्षक के लिए निर्धारित कार्य गिनती, अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू या अन्य भाषाओं के ध्वनि, वर्णमाला का ज्ञान करा देते हैं।
·       कविता-कहानी में आए संदर्भों पर बात करें –
प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के भाषाई कौशल के विकास हेतु साहित्य की दो विधाएँ - कविता एवं कहानी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कोई दो राय नहीं कि स्कूल भेजने से पूर्व अभिभावक अपने बच्चे को 4 से 8 लाइन की कम-से-कम दर्जनों कविता-कहानियाँ याद करा ही देते हैं। आरंभिक कक्षा की कविता कहानियाँ चाहे वह किसी भी भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, या अन्य क्षेत्रीय भाषा) की हो, काफी मनोरंजक या गुदगुदाने वाली होती है। जिसे बच्चे पूरे आनंद लेते हुए सुनते, बोलते, पढ़ते, लिखते हैं। इन कविता-कहानियों में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो सीधे उनके परिवेश से जुड़े होते हैं जैसे जानवर या पशु-पक्षियों में कबूतर, खरगोश, गाय, तोता, फल-सब्जियों में आलू, बैगन, टमाटर, गाजर, सेब, केला। इन परिचित वस्तुओं के साथ-साथ कई ऐसे शब्द या अवधारणा आते हैं जो उनके परिवेश से संबंधित नहीं होने के कारण उनके नाम वे पहली बार सुन रहे होते हैं जैसे – जेब्रा, दरियाई घोड़ा, गैंडा, डाइनाशोर आदि। एक भाषा शिक्षक का यह काम होता है कि उस कविता-कहानी में आए नए शब्द, अवधारणा को रोचक तरीके से बताना, ताकि उनके शब्दभंडार संदर्भ के साथ बढ़ाया जा सके। ऐसे में यह कदम अब अभिभावक स्वयं उठाते हुए उन कविता-कहानियों को न सिर्फ बच्चों को सुनाएँ, बल्कि उसमें आए अवधारणा पर खुलकर बात करें। कोशिश करें बच्चे से ही कल्पना करवाने, अनुमान लगवाने का कि कविता/कहानी में यदि ऐसा होता तो क्या होता?
·       घर को बनाएँ प्रिंट-रिच
बच्चे के भाषाई कौशल विकास के लिए प्रिंटरिच वातावरण एक महत्वपूर्ण उपकरण होता है। स्कूली कक्षा में बच्चों को यह वातावरण तो मिलता ही है, घर पर भी ऐसे माहौल विकसित किए जाने चाहिए। वर्तमान में बच्चे जब स्कूल से दूर होते जा रहे हैं, हमारा प्रयास हो घर के किसी कमरे या पूरे घर को ही प्रिंटरिच बनाने की। आपका बच्चा जिस कक्षा में है उस कक्षा के पाठ्यपुस्तक के प्रकृति अनुसार अनेक तरह की कविताएं, कहानियाँ एक रीडिंग कोर्नर में संकलित कर सकते/सकती हैं। यहाँ सवाल हो सकता है कि आखिर प्रिंटरिच वातावरण का निर्माण कैसे करें? जवाब है बिलकुल वैसे ही जैसे चिड़ियाँ अपना घोसला बुनती है। पहली व दूसरी कक्षा की बात करें तो उन्हें ध्वनि, वर्णमाला से परिचित करवाने के उद्देश्य से उनके परिवेश से जुडते विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन, जिनसे वे परिचित हों, जैसे जो भी टॉफी, बिस्कुट, चिप्स, आइसक्रीम आदि आपके बच्चे खाते हों उसके रैपर, विज्ञापन, प्रिंटरिच सामग्री हो सकती है। इनके साथ काम करते हुए उन्हें उस रैपर में छपे प्रिंट के अर्थ से अवगत कराएं। इस दौरान इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके बच्चे यदि इनसे परिचित हो गए हैं तो इसे बदलकर उन सामग्रियों को प्राथमिकता दें जो उनके पाठ्यपुस्तक से जुड़ते हों। बच्चे के कक्षानुसार पाठ्यपुस्तकों की मांग के आधार पर इन सभी प्रिंटरिच सामग्री को बदलते भी रहें। ये प्रिंटरिच सामग्री बच्चों को बाल साहित्य की तरफ ले जाने में सहायक होगा। इसके पश्चात उनके लिए एक छोटा सा पुस्तकालय स्थापित कर उन्हें पढ़ने-लिखने के मौके देकर उन्हें भाषाई रूप में समृद्ध कर सकते हैं।
·       अपने बच्चों को सवालीराम बनाएँ –
अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि बच्चे को स्कूल में सवाल पूछना सिखाया ही नहीं जाता, जिसका परिणाम यह होता है कि किसी शब्द या अवधारणा को समझने में यदि उसे समस्या आ रही है तो वह उसे पूछ नहीं पाता? यदि यह हमारे व्यक्तित्व में घर कर जाए तो पूरी ज़िंदगी वह इससे उबर नहीं पाता है। वह एक पढ़ा-लिखा नागरिक तो बन जाएगा लेकिन जागरूक नागरिक नहीं। इसलिए अपने बच्चे को प्रश्न पूछने के भरपूर मौके दें। अक्सर हम (शिक्षक/अभिभावक) बच्चों के किसी प्रकार के प्रश्न पूछने पर डांटकर उसे चुप करा देते हैं, ऐसा हम तब करते हैं जब हमारे पास उनके प्रश्न का जवाब नहीं होता। शर्मिंदा होने से बचने के लिए हम उनको ऐसा डरा देते हैं कि दुबारा वह प्रश्न पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता। मेरा मानना है कि हमें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं। हमें ये ज्ञान होना चाहिए कि हर कोई किसी विषय का विशेषज्ञ नहीं होता जो उसे सब कुछ आएगा ही। कोई मुझसे गणित में कुछ पूछ ले तो मैं खुद तारे गिनने लग सकता हूँ। ऐसा में होना ये चाहिए कि हम अलग-अलग स्त्रोत से जानकारी प्राप्त कर बच्चे की जिज्ञासा शांत करें दमन नहीं। क्योंकि बच्चे किसी भी चीज को तब तक गहराई से नहीं सीख पाएंगे जब तक कि उसके अनेक पहलुओं को सवालों के माध्यम से जानेंगे या समझेंगे नहीं। ऐसे में उन्हें सवालीराम बनने के मौके दें।
·       प्रतिदिन कौशल विकास का आकलन करें -
अभिभावक स्वयं से प्रतिदिन उनके कौशल विकास का आकलन करें। आकलन के दौरान यह समझने का प्रयास करें कि आपके बच्चे में कक्षानुसार सीखने के प्रतिफल के अनुरूप कौशल विकसित हो पा रहा है या नहीं। यदि कहीं कोई समस्या आ रही है तो पहले के तरीके की जगह आप अलग-अलग रोचक तरीके अपना सकते हैं। कोशिश यह रहना चाहिए कि बच्चे को पता न चल पाएँ कि उनका आकलन किया जा रहा है। अक्सर आकलन के संबंध में जानकारी मिलते ही बच्चे किसी अवधारणा को समझना छोड़कर उसके संबंध में रट्टा मारकर उसे आत्मसाथ कर लेते हैं जो दीर्घकालिक नहीं होते। कोशिश करें कि इसे खेल-खेल में करने की। बच्चे में यदि वह कौशल विकसित नहीं हो पा रहा है तो उस तरीके में बदलाव करते हुए अलग गतिविधि अपना सकते हैं।
          अब सवाल उठता है कि अभिभावक इसके लिए अपने व्यस्त दैनिक जीवन से समय कब और कैसे निकालें ? ये निकालना तो पड़ेगा ही अपने बच्चे के भविष्य को सँवारने हेतु। कभी माँ को तो कभी पिता को। कोई आवश्यकता नहीं है स्कूल के पाठ्यक्रम को पूरा कराने की। आप अपने स्तर से अलग-अलग गतिविधि कराकर अपने बच्चे में इन सीखने के प्रतिफलों को समाहित करवा सकते हैं। यदि ऐसा करवा पाए तो पाठ्यपुस्तक के सवालों को हल करना आपके बच्चे के लिए चुटकी का काम होगा। और यदि ऐसा संभव हो पाता है तो वह दिन दूर नहीं जब असर-2019 की रिपोर्ट कि ‘8वीं तक के बच्चे 2सरी कक्षा की पुस्तक पढ़ नहीं पाते हैं” झूठी साबित होगी।
                                                          साकेत बिहारी, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा (छ.ग.)


(मूलतः दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र women express के 8 जून 2020 अंक के संपादकीय में प्रकाशित)