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Tuesday, 7 August 2018

घर की इज्जत


 किसी के घर की इज्जतबताकर हम बेटियों को
हमारी इज्जतखुद ही लूटते आए
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
रिश्तों का मर्मसमझाकर हमें
खुद ही रिश्तों को शर्मसार करते आए
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
चाल-चलन-सोच तुम्हारे गंदे रहे
फिर भी कुल्टा, बदचलन के आरोप
हमपर लगाते रहे
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
हमारी यौनिकता पर पहरे लगाकर भी
वेश्याओं के पास भटकते रहे
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
तुम्हारे हर जुल्म, अन्याय बर्दास्त किए हमने
खुद को घर की इज्जतजानकर ।
बस
बहुत कष्ट दिये हमें
इस घर की इज्जतके मिथक ने
अब हमें इस मिथक को तोड़ना है,
और
जिस दिन हम इसे तोड़ने में सफल हो गए
तुम, तुम्हारे समाज के
मंत्री, संतरी, मठाधीश, धर्मरक्षक
कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे ।


 (मूलतः पाक्षिक समाचार पत्र 'वीक ब्लास्ट' 1-15 अगस्त 2018 में प्रकाशित)  



Tuesday, 19 June 2018

किन्नर की आरज़ू




स्त्री शरीर में कैद पुरुष या पुरुष शरीर में कैद स्त्री गुण
वैश्विक समाज में बस यही मेरी पहचान है ।
कहने को तो, औरों की तरह इस धरती की ही संतान हैं हम
लेकिन धरावासियों के लिए तो जैसे बिन बुलाए मेहमान हैं हम ।
कैसे बयां करें अपनी बदकिस्मती, अपनी पीड़ा को,
आशीर्वचनों से हम जिस समाज को
लंबी उम्र, खूब तरक्की करने की दुवाएँ देते हैं ।
वही समाज हमें ...
जनाने-मर्दाने से इतर
किन्नर, छक्का, हिजड़ा कहकर हमारा उपहास उड़ाते हैं ।
कैसे बताएं कि प्रकृति प्रदत्त इस नासूर को हम
नियति मान कैसे जीवन भर ढोते हैं ?
नाच-गान से समाज को गुदगुदा कर
भिक्षाटन कर चंद सिक्के कमाते हैं ।
जीते जी नौकरी-रोजगार की जगह
लैंगिक गालियां-झिड़कियाँ ही पाते हैं
इस नरक से छुटकारा मिलने के बाद भी  
ढाई गज जमीन भी नसीब नहीं होती ।
क्यों ?
समाज निर्मित सौन्दर्य के पैमाने में
हम थोड़े अलग-थलग हैं तो क्या हुआ ?
24 कैरेट मर्दानगी नहीं, माँ बनने की क्षमता नहीं,
तो क्या हम इंसान नहीं ?
बहुत जी लिए इस नाच-गान, दुवाएँ देने, तालियाँ पीट-पीट,
भिक्षाटन कर जीवन जीने की परंपरा को,
अब इज्जत-सम्मान भरी ज़िंदगी जीना चाहते हैं हम ।
चाँद-मंगल-दूसरी दुनिया तक जाने की हमारी भी है आरज़ू
अपने अनगिनत सपने को हकीकत में बदलना चाहते हैं हम ।
अपनी इस अभिशप्त ज़िंदगी से मुक्ति चाहते हैं हम ।
अब इज्जत-सम्मान भरी ज़िंदगी चाहते हैं हम । 

{मूल रूप से अलवर (राजस्थान) से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका भर्तृहरि टाइम्स (13 मई - 18 जून 2018) संयुक्तांक में प्रकाशित} 




Tuesday, 24 April 2018

दलित (Dalit)

जब जब भी उनको लगेगा कि
दलित हमसे दूर हो रहे हैं
मंदिर का चढ़ावा कम हो रहा है ।
तब दान पाने के लिए, उन्हें लुभाने के लिए
कुछ न कुछ ऐसा करेंगे
कि आप दलित ही रह जाएं
और उनकी खोखली वर्ण व्यवस्था भी
बनी रह जाय ।
आपको कंधे पर बिठाकर मंदिर प्रवेश कराकर
2000
वर्ष पुरानी प्रथा
ध्वस्त करने का नाटक करेंगे ।
आपके समुदाय से एकाध
मंदिर के पुजारी या महामंडलेश्वर बनाएंगे ।
लेकिन मौका मिलने पर
एहसास दिलाने का मौका कभी नहीं चूकेंगे
कि आप "दलित" हैं ।
आपके वोटों के लिए
आपके ही घर बैठकर
चमचमाते नए थाली में खाकर
आपके हितैषी होने का दिखावा करेंगे ।
मतलब सध जाते ही
फिर से वही जाति सूचक गालियां ।
अपनी स्थिति से असंतुष्ट होकर
आप धर्मांतरण भी कर के देख लीजिये 
मुसलमान या ईसाई बन गए
तो अपने तंत्र मंत्र से आपको
पुनः हिन्दू व दलित बनाने के लिए उसी दलदल में लाने के लिए 
तरह-तरह के कर्मकांड करेंगे ।
'
हिंदुत्व खतरे में है' का आलाप कर
धर्मांतरण करने वाले का मर्दन करेंगे ।
सिवाय एक चीज के
दलितों का उपनयन संस्कार कर
तथाकथित अस्पृश्य से तथाकथित द्विज
बना सकने के ।
क्योंकि इससे उनकी वर्णव्यवस्था, उनका हिन्दुत्व 
खतरे में पड़ जाएगा ।

(मूल रूप से दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र "वीक ब्लास्ट" के 01-15 मई 2018 के अंक में प्रकाशित)


Wednesday, 8 June 2016

कहानी भारत के एक लाल महान की

आओ सुनाएँ हम एक कहानी
भारत के उस लाल महान की
जिसने हमको पाठ पढ़ाया
समता और आत्मसम्मान की
अस्पृश्यता का दंश झेलकर भी
अस्पृश्य समाज का जिसने किया कल्याण  
गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को जिसने
नवयान द्वारा दिया एक नया आयाम  
हजारों वर्षों से शोषित जनसमूह को जिसने
संविधान द्वारा निःशस्त्र न्याय दिलवाया था  
स्त्रियों के हितों के लिए जिसने
निःस्वार्थ हिंदू कोड बिल बनाया था
यूँ तो साहित्य में वे भारतीय संविधान के जनक कहलाते हैं  
पर जनमानस में तो वे
बाबासाहब भीम राव अम्बेडकर के नाम से जाने जाते हैं
महाद टैंक सत्याग्रह से जिसने
ब्राह्मणवादी मानसिकता को ललकारा था
दलितों को सम्मान दिलाने के लिए जिसने
फुले के मशाल को आगे बढ़ाया था
अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश भी जिनकी विद्वता का करते थे सम्मान  
उस महान विभूति को अपने ही देश में
समय-समय पर सहना पड़ा अपमान
फिर भी इस लाल ने हिम्मत कभी न हारी   
जाति व्यवस्था को खुलकर ललकारी
लाख कष्ट सहते हुए भी, अस्पृश्यता पर करके प्रहार
आखिर हमें दिया एक दिन समानता का उपहार  
यही है कहानी भारत के उस लाल महान की
जिसने हमको पाठ पढ़ाया, समता और आत्मसम्मान की ।

                                                                            
(भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका "द बुद्धिस्ट टाइम्स" के अप्रैल 2016 विशेषांक में प्रकाशित)