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Sunday, 5 January 2025

चन्द्रमा (Moon) क्यों चमकता है?

रात के अंधेरे में अलग अलग नामों वाले आकाशीय पिंड जैसे ग्रह, उपग्रह, तारे आदि अक्सर चमकते नजर आते हैं। किसी अन्य ग्रह से यदि हमारी पृथ्वी को भी देखा जाए तो यह भी चमकती नज़र आएगी। आखिर इनके चमकने का कारण क्या है? उत्तर है ये सभी आकाशीय पिंड दो कारणों से चमकते हैं-

1.     उन आकाशीय पिंडों का हाइड्रोजन-हीलियम जैसे गैसों से निर्मित होना।

2.     किसी तारे से आ रही प्रकाश का परावर्तन।

    पहले कारण को हम सूर्य का उदाहरण लेते हुए समझ सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सूर्य 70% हाइड्रोजन 28% हीलियम और 2% अन्य गैसों से बना हुआ है। सूर्य की सतह पर मौजूद हाइड्रोजन गैस नाभिकीय संलयन (Nuclear fusion – किसी भी तत्व के दो ऐटम का आपस में जुड़ जाना) प्रक्रिया से हीलियम गैस बनाती है। इस अभिक्रिया के दौरान आउटकम के रूप में काफी विशाल मात्रा में उर्जा, प्रकाश निकलता है। इस कारण सूर्य चमकता है, और हम कह पाते हैं कि सूर्य का अपना प्रकाश स्रोत है।

    दूसरे कारण को हम चंद्रमा का ही उदाहरण लेते हुए समझते हैं। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। इसे उपग्रह के नाम से इसलिए संबोधित किया जाता है कि यह सूर्य की परिक्रमा न कर, पृथ्वी की परिक्रमा करती है। चन्द्रमा 4000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से 27.3 दिनों में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूर्ण करता है। पृथ्वी की तरह ही यह ठोस चट्टानों से निर्मित आकाशीय पिंड है। पृथ्वी की तरह ही यह हाइड्रोजन हिलियम आदि गैसों से निर्मित नहीं है। सूर्य से निकलने वाले प्रकाश इसकी सतह पर पड़कर पृथ्वी पर प्रतिबिंबित होते हैं, इस कारण यह हमें चमकता हुआ दिखाई पड़ता है। इसका आधा हिस्सा जब सूर्य के सामने रहता है, तो सूर्य का प्रकाश इस से परावर्तित होकर हमारे पृथ्वी पर पड़ता है, हमारे आँखों की रेटिना से टकराता है। इससे यह आकाशीय पिंड चमकता हुआ दिखाई पड़ता है।

अध्ययन हेतु प्रयुक्त सामग्री 

1.     https://www.youtube.com/watch?app=desktop&v=IP7ahJsKGA4&t=283s

2. https://navbharattimes.indiatimes.com/world/science-news/what-is-the-sun-made-of-elements-of-sun-how-sun-is-formed-and-produce-energy-hindi/articleshow/91830430.cms




Tuesday, 31 December 2024

सामाजिक अध्ययन की कक्षा और मानचित्र का उपयोग

मानचित्र सामाजिक अध्ययन शिक्षण में उपयोग किया जाने वाला सर्व प्रमुख शिक्षण सहायक सामग्री है। कक्षा छठवीं, सातवीं, आठवीं के सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक का शायद ही कोई ऐसा अध्याय हो, जिसका प्रत्यक्ष जुड़ाव मानचित्र से न हो। ऐसा इसलिए कि ये मानचित्र सामाजिक अध्ययन को न केवल रुचिकर बनाते हैं बल्कि तथ्यों को समझने में, उसे स्थायित्व प्रदान करने में हमारे मन मस्तिष्क की मदद भी करते हैं। उदाहरण के लिए यदि आप बच्चे को समझाएँ कि ‘पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा उत्तमाशा अंतरीप होते हुए 1498 ईस्वी में हिंदुस्तान के कालीकट बंदरगाह पर पहुंचा’। यह तथ्य आपके मन-मस्तिष्क में 5 से 10 साल रह सकता है। बाद में इसके धूमिल हो जाने की पूरी संभावना है। लेकिन इसी तथ्य को यदि मानचित्र की सहायता से बच्चों को बताया जाए तो इसके मन मस्तिष्क में दीर्घकाल तक बने रहने की पूरी संभावना होती है। क्योंकि इस तथ्य को बच्चे ने देखते हुए अर्जित किया।

मानचित्र पृथ्वी के किसी भूभाग की पैमाने से मापकर बनाई गई चित्र होती है। भूगोलविद उस भूभाग के मानचित्र को इस तरह से बनाते हैं जैसे उस भू-भाग को ऊपर आसमान से देखा जा रहा है। बच्चे सामान्यतः इस तथ्य से अवगत नहीं होते हैं। हममें से अधिकांश शिक्षकों की भी स्थिति ऐसी ही होती है। क्योंकि ऐसे तथ्यों से हम अपने विद्यार्थी जीवन में परिचित हो ही नहीं पाए, किसी प्रशिक्षण में भी शायद ही बताई जाती हो। ऐसे में हमारा दायित्व बनता है कि छात्र जीवन में हमें मानचित्र अध्ययन करने में जो चुनौतियां आईं, हमारे बच्चों को उन चुनौतियों का सामना न करना पड़े। मानचित्र अध्ययन के दौरान बच्चों को सबसे ज्यादा समस्या उस मानचित्र में उसके दिशा निर्धारण में होती है। अक्सर दिशाओं को समझने में वे भ्रमित हो जाते हैं। वे भ्रमित न हों इसके लिए हम कुछ बातों का ध्यान रख सकते हैं-  

·       उच्च-प्राथमिक शालाओं के प्रत्येक कक्षा (छठवीं, सातवीं, आठवीं) में पाठ्यपुस्तकों के विषयवस्तु अनूरूप भौतिक (Physical), राजनीतिक (Political) एवं कुछ थीमैटिक (Thematic) मानचित्र अनिवार्य रूप से होने ही चाहिए। ताकि सालों भर मानचित्र से बच्चों का सामना होता रहे। लगातार उन मानचित्रों को पढ़ने हेतु (शुरुआत में दिशा निर्धारण) मार्गदर्शित करते रहें।

·       कक्षा में जब मानचित्र पर कार्य करने की शुरुआत कर रहे हों तो बच्चों को मानचित्र दीवार पर कील के सहारे लटका कर नहीं, बल्कि कक्षा के फर्श पर फैला कर बताएं। कुछ दिन इस तरीके से काम करने के बाद बच्चे यह समझ बना पाएंगे कि दीवार पर टंगी मानचित्र की स्थिति ऐसी होती हैं जैसे उसे आसमान से देखा जा रहा हो।

·        यदि संभव हो तो थ्री आयामी मानचित्र का उपयोग करें। इससे बच्चो को पर्वत, पठार, मैदान, नदियों के बहाव की दिशा (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) आदि को समझने में बच्चों को सुविधा होगी।

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त ग्रंथ/पत्र/पत्रिकाएं

·       शैक्षणिक संदर्भ, वर्ष 17, अंक 98 (मूल क्रमांक 155) नवंबर-दिसंबर 2024  

Sunday, 30 May 2021

किसी भी क्षेत्र की ऊंचाई मापने के लिए मानक के रूप में समुद्र तल का उपयोग क्यों किया जाता है?

पृथ्वी पर कोई क्षेत्र कितनी ऊंचाई पर स्थित है इसे जानने के लिए समुद्र तल को मानक के रूप में प्रयोग किया जाता है। समुद्र तल को मानक माने जाने के पीछे प्रमुख कारण यह है कि समुद्र तल की ऊंचाई हमेशा एक समान रहती है। विपरीत परिस्थितियों में थोड़ा बहुत ही ऊपर नीचे हो सकता है, लेकिन धरती तल की ऊंचाई हर जगह एक समान नहीं है। कहीं पर्वत है, कहीं पठार है, तो कहीं मैदानी भाग है। अर्थात पृथ्वी तल कहीं ऊंचा है तो कहीं नीचे भी है। इसलिए किसी भी स्थान की ऊंचाई का पता लगाने के लिए समुद्र तल को ही मानक के रूप में भूगोलविदों द्वारा प्रयोग किया जाता है। विशेष रुप से रेल विभाग द्वारा। रेल विभाग द्वारा प्रत्येक स्टेशन पर इसे अंकित करवाया जाता है ताकि अगले स्टेशन के ऊंचाई का पता हो तो लोको पायलट उस अनुरूप ट्रेन के इंजन को खींचने के लिए पावर को मैनेज कर सकें।


Friday, 3 July 2020

भारत की ऋतुएँ


संस्कृत ग्रंथ ऋग्वेद तथा रामायण में भारत की ऋतुओं का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में 5 तथा रामायण में 6 ऋतुओं का उल्लेख मिलता है।
1.     वसंत (Spring)March-April
2.     ग्रीष्म (Summer) – May - June
3.     वर्षा (Rainy Season) – July - August
4.     शरद (Autumn) – September- October
5.     हेमंत (Winter) – November - December
6.     शिशिर (Severe Winter) – January - February

Saturday, 20 June 2020

संस्कृत ग्रंथों में वर्णित 10 दिशाएँ (Ten Directions) एवं उसके स्वामी


ऋग्वेद में 4 दिशाओं पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण का वर्णन मिलता है, जबकि इनके बाद रचित पौराणिक ग्रंथों में 10 दिशाओं तथा उनके स्वामी का उल्लेख मिलता है जो निम्न हैं -
पूरब – इंद्र
पश्चिम – वरुण (जल का स्वामी)
उत्तर – कुबेर (धन का स्वामी)
दक्षिण – यम
आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) – अग्नि
नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) – नीरित
वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) – मारुत (वायु/पवन देव)
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) – ईशा
आकाश – ब्रह्मा
पाताल – शेषनाग

Thursday, 11 June 2020

अलेक्ज़ेंडर महान ‘सिकंदर’ की विश्व की बाह्य सीमा निर्धारण नीति

इतिहास के छात्र से लेकर इतिहास को बोझिल मानने वाले सभी सिकंदर के नाम से विश्वप्रसिद्ध अलेक्ज़ेंडर महानसे परिचित होंगे ही। वही सिकंदर जिसपर इतिहास को बोझिल विषय मानने वाले छात्रों के लिए एक गाना बना था जो आपलोगों ने भी सुना ही होगा –

सिकंदर ने पोरस ...

से की थी लड़ाई...

जो की थी लड़ाई...

तो मैं क्या करूँ ?

जी हाँ, ये वही सिकंदर है जिसके बारे में हम बचपन में नादानी से कहा करते थे कि न ये सिकंदर हमारे देश आता न ये ई. सन रटने वाला बोझिल विषय हमें पढ़ना पड़ता। सिकंदर के संबंध में हमें बहुत ही सीमित जानकारी मिलती है कि विश्वविजय के क्रम में सिकंदर हिंदुस्तान (भारत) के पश्चिमी प्रांत पंजाब तक पहुँच गया था जहां के शासक पोरस से उसकी लड़ाई हुई। पोरस पराजित हुआ और सिकंदर ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। उसके प्रदेशों को वह वापस कर विश्वविजय के लिए आगे बढ़ गया। हालांकि वह रावी नदी से आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। एक सामाजिक विज्ञान शिक्षक/छात्र होने के नाते हमारा यह कार्य है कि सिकंदर के बारे में हम कुछ और भी जानें ताकि न सिर्फ बच्चों की जिज्ञासा को शांत कर सकें बल्कि उनके साथ-साथ खुद के ज्ञान को भी और समृद्ध कर सकें।

          शुरुआत करते हैं इस बात से कि प्राचीन दौर के एक महान व्यक्ति के रूप में याद किये जाने वाले सिकंदर के विश्वविजेता बनने के पीछे निहित उद्देश्य क्या थे? सिर्फ अपने साम्राज्य का विस्तार या कुछ और? उत्तर है कि सिकंदर के विश्वविजेता बनने के पीछे एक उद्देश्य तो अपने साम्राज्य का विस्तार करना तो था ही, एक दूसरा उद्देश्य भी था विश्व की बाहरी सीमा का पता लगाना।[1] क्योंकि एक शासक होने के साथ-साथ वह एक भूगोलविद भी था। वह यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू के अनेक शिष्यों में से एक था। उसके विश्वविजय अभियान के पीछे उसके गुरु अरस्तू की शिक्षा का भी पर्याप्त योगदान था, जो अपने अपने शिष्यों में किसी भी सिद्धान्त को प्रत्यक्ष अवलोकन करने की एक प्रबल इच्छा जागृत की। अरस्तू अपने शिष्यों को यह सिखाया करते थे कि जाओ और देखो और स्वतः निर्णय करो कि क्या कोई सिद्धांत स्वीकार योग्य है या अस्वीकार योग्य?[2] भूगोलविद माजिद हुसैन के अनुसार अरस्तू के इस शिक्षा का उनके सबसे उत्साही शिष्य एलेक्जेंडर (सिकंदर) पर गहरा प्रभाव हुआ जो तत्कालीन मकदूनिया के शासक फिलिप द्वितीय का पुत्र था। सिकंदर के पिता फिलिप द्वितीय ने अपने दम पर अपने राज्य मकदूनिया की सेना को एक ऐसे प्रभावशाली उच्च प्रशिक्षित सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया जिसने सिकंदर को तत्कालीन सर्वाधिक शक्तिशाली फारस साम्राज्य को पराजित करने में अद्भुत प्रतिभा दिखाई।

          सिकंदर की सौतेली बहन की शादी में उनके पिता फिलिप द्वितीय की हत्या उनके ही एक गार्ड द्वारा कर दिए जाने के पश्चात नए राजा बनने के लिए संघर्ष की शुरुआत हो गई थी। इस संघर्ष में सिकंदर ने अपने एक सौतेले भाई फिलिप एरिडाइस को छोड़कर सभी उत्तराधिकार पद के दावेदारों व अन्य विरोधियों का क्रूरता से सफाया कर 20 साल की उम्र में राजा बने। अपने 12 वर्ष के शासनकाल के दौरान अपने सैनिकों के साथ 12000 मील की विजय यात्रा (पश्चिम में यूनान से लेकर पूर्व में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, मिस्र तक) करते हुए खुद को एक प्रभावशाली सैनिक कमांडर के रूप में किया। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ विश्व की बाहरी सीमा निर्धारित करने के उद्देश्य से एक प्रशिक्षित सेना लेकर दक्षिण व पूर्व दिशा की ओर बढ़ा। वह जानना चाहता था कि फारस साम्राज्य के उस पार दूर के क्षेत्रों में वस्तुतः है क्या जहां के विषय में अनेक कहानियाँ तथा किंवदंतियाँ प्रचलित थी। 330 – 323 ई. की अवधि के दौरान वह देश विदेश की सूचनाओं को प्राप्त करने व उन्हें रिकॉर्ड करने विशेषज्ञों को लेकर फारस से भारत तक आया और एक सच्चे खोजी की तरह दूसरे रास्ते से लौटा।[3]

          अपने विद्यार्थी जीवन में तीन वर्षों तक सिकंदर (343-340 ई. पू.) अरस्तू के पास अध्ययन किए। मकदूनिया का शासक बनने के पश्चात सिकंदर ने यूनानी साम्राज्य का विस्तार पूरे विश्व में करने की योजना बनाई। इस क्रम में दक्षिणी क्षेत्र (मिश्र) को विजित करने के पश्चात वह पूर्व दिशा की ओर बढ़ा। 327 ई. पू. में हिंदुकुश पर्वत पार करते हुए खैबर दर्रे के रास्ते सिंधु नदी (पंजाब) क्षेत्र में प्रवेश किया। उसे यह विश्वास था कि अब वह पूर्व की ओर आवासित जगत की सीमा से कुछ ही दूर है। वह आगे बढ़ कर उस सीमा तक जाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्यवश उसके सैनिकों ने उसका साथ नहीं दिया। सिकंदर ने उनमें उत्साह जगाने की पूरी कोशिश की लेकिन बुरी तरह थक चुके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। कुछ ने तो विद्रोह तक कर दिया।

          वापसी के दौरान सिकंदर ने अपनी सेना को दो भागों में विभाजित किया। एक टुकड़ी को नियरकस के सेनापतित्व में सिंधु नदी, सिंधु नदी मुहाने, अरब सागर, फारस की खाड़ी होते हुए भेजा, दूसरी टुकड़ी को खुद थलमार्ग होते हुए मकरान, बलूचिस्तान, ईरान के रास्ते मेसोपोटामिया के लिए बढ़ी। थल मार्ग से बढ़ते हुए 323 ई. पू. रास्ते में बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु हो गई। इस तरह विश्व की बाहरी सीमा निर्धारण को निकले सिकंदर का कार्य पूर्ण तो नहीं हो पाया लेकिन अपने इस विश्वविजयी अभियान के माध्यम से उसने यूनानियों को उन प्रदेशों का ज्ञान कराया जो उनके ज्ञान के दायरे से बाहर के थे। यूनानियों को फारस, मध्य एशिया, अफगानिस्तान, हिंदुस्तान तथा ईरान के तटीय क्षेत्रों की भौतिक स्थिति, इन क्षेत्रों के जन-जातियों, पेड़ पौधों का ज्ञान हो पाया।



[1] हुसैन माजिद, भौगोलिक चिंतन का इतिहास पंचम संस्करण, रावत प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृष्ठ सं. 18 

[2] वही, पृष्ठ सं. 18 

[3] हुसैन माजिद, भौगोलिक चिंतन का इतिहास पंचम संस्करण, रावत प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृष्ठ सं. 102 

Monday, 11 May 2020

सामाजिक अध्ययन की आवश्यकता क्यों?


मनुष्य के सामाजिक क्रियाकलापों का अध्ययन ही सामाजिक अध्ययन है। एक अकादमिक विषय के रूप में समस्त विश्व सहित हमारे देश में भी प्राथमिक स्कूल से लेकर कॉलेज, विश्वविद्यालय स्तर तक इसका अध्ययन/अध्यापन कराए जाते हैं। इसके अध्ययन की शुरुआत तो हालांकि महान दार्शनिक प्लेटो के काल से ही शुरू हो गई थी लेकिन मध्यकाल में अल-बेरुनी, तत्पश्चात 18वीं सदी में यूरोपीय देशों में ज्ञानोदय काल में रूसो, दिदरो, इमाइल दुर्खीम, औगस्ट कामते, चार्ल्स डार्विन, कार्ल मार्क्स, मैक्स वेबर आदि दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों द्वारा इसके व्यवस्थित अध्ययन की शुरुआत हुई। उस समय इसे 'मोरल फिलॉस्फी' के नाम से जाना जाता था। बाद में इसे सामाजिक विज्ञान के नाम से संबोधित किया जाने लगा। औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक समस्याओं के अध्ययन ने इसे विज्ञान के समान ही लोकप्रिय बनाने का कार्य किया। जिसकी झलक हमें 1824 ई. में विलियम थोम्पसन की पुस्तक “An Inquiry into the principles of the distribution of the wealth” में देखने को मिलती है। इसी पुस्तक में सर्वप्रथम सामाजिक विज्ञान शब्द प्रयुक्त किया गया।[i] इसी क्रम में 1924 ई. में तत्कालीन समाजशास्त्रियों द्वारा इस विषय पर विस्तृत अध्ययन हेतु एक सोसल साइन्स सोसाइटी की स्थापना की गई। तब से ही समस्त वैश्विक जगत सहित हमारे देश में इसका अध्ययन अनवरत रूप से चलता रहा है।
          विज्ञान (भौतिकी, रसायनशास्त्र, वनस्पति विज्ञान, जन्तु विज्ञान) गणित जैसे अन्य विषयों की अपेक्षा सामाजिक अध्ययन छात्र/छात्राओं को कोई विशेष लाभ वाला रोजगार उपलब्ध नहीं कराता। जैसे विज्ञान के विभिन्न विषयों का अध्ययन कर कोई छात्र/छात्रा इंजीनियर, वैज्ञानिक, डॉक्टर बन रोजगार प्राप्त कर सकता है लेकिन सामाजिक अध्ययन के अंतर्गत के विषय जैसे इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र/राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान, मानवविज्ञान आदि अकादमिक व सेवा क्षेत्र को छोड़कर प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देने में असमर्थ है। इन विषयों का अध्ययन कर यदि कोई इतिहासकार, समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी, अर्थशास्त्री बन भी जाता है तो विज्ञान पृष्ठभूमि के लोगों से आजीविका कमाने की तुलना में कमतर ही होता है। वर्तमान में वैज्ञानिक युग में हमारी सरकार भी विज्ञान व प्रद्योगिकी ज्ञान से युक्त मानव संसाधन निर्माण पर ज्यादा ज़ोर दे रही है। आम भारतीय जनमानस भी सामाजिक अध्ययन को एक अनउपयोगी विषय मानता है। इस मुद्दे पर हुए अध्ययन भी साबित करते हैं कि शिक्षक भी इसे पढ़ाने में कोई विशेष रुचि नहीं लेते। केवल परीक्षा में पास कराने हेतु संबंधित पाठ बच्चों को पाठ पढ़ा देते हैं या कंठष्ट करा देते हैं। इस अरुचि का संज्ञान सरकार को भी है। बावजूद इसके प्रतिवर्ष विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक सामाजिक अध्ययन पर अरबों रुपए खर्च करती है। क्यों ? भारत सरकार के अलग-अलग समय पर निर्गत पाठ्यचर्या की रूपरेखा के माध्यम से इसे समझा जा सकता है -
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एनसीईआरटी (NCERT) ने भारत में सामाजिक अध्ययन की वास्तविक स्थिति पर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में उसे भारतीय समाज में प्रचलित स्कूलों की कई प्रकार की कमियाँ दिखी। फलतः 1963-64 ई. में 4 अखिल भारतीय कार्यशाला आयोजित किए गए जिसके पश्चात कक्षा 1 से 11 तक के लिए सामाजिक अध्ययन पाठ्यक्रम निर्धारित किए गए। कक्षा 3 से 5 तक के लिए राज्य, देश, तथा विश्व की जानकारी देनेवाले पाठ्यपुस्तकें तैयार की गई। कक्षा 6 से 8 तक के लिए इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र की अलग-अलग पाठ्यपुस्तक तैयार की गई। इसके 10 वर्ष पश्चात 1975 ई. में प्रथम बार पाठ्यचर्या की रूपरेखा बनाते हुए कक्षा 6 से 10 तक इतिहास, भूगोल तथा नागरिक शास्त्र की तीन अलग-अलग पाठ्यपुस्तकें तैयार की गई। इन तीनों को सम्मिलित रूप से सामाजिक विज्ञान कहा गया। सामाजिक विज्ञान का उद्देश्य निर्धारित किया गया –  बड़े हो रहे नागरिकों को समुदाय, राज्य तथा संसार की गतिविधियों में भाग लेने लायक बनाना। 1988 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में इसके अध्ययन के उद्देश्य को बढ़ाते हुए बच्चों को अपने अधिकार तथा कर्तव्यों के प्रति समर्पित नागरिक समुदाय का निर्माण करना रखा गया।
          इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु हमारे विद्यालयी पाठ्यचर्या में प्राथमिक स्तर पर कक्षा 3 से 5 तक पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस), कक्षा 6 से 8 तक इतिहास, भूगोल तथा नागरिकशास्त्र तथा मध्यमिक स्तर पर इन तीनों के अतिरिक्त अर्थशास्त्र का अध्ययन/अध्यापन किया/कराया जाता है। कक्षा 3 से 5 तक के बच्चों के लिए पर्यावरण अध्ययन को सामाजिक अध्ययन पाठ्यक्रम में इसलिए शामिल किया गया कि बच्चों में प्राकृतिक तथा सामाजिक पर्यावरण के संबंधों को समझने की योगिता विकसित हो सके।
          सामाजिक अध्ययन हमें यह सिखाता है कि भाषा, धर्म, संप्रदाय, जाति, जनजातीय व भौगोलिक विविधता वाले, जटिल समाज वाले हमारे देश में हमें किस प्रकार किसी वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बगैर एकता को बढ़ावा देते हुए मिल-जुल कर रहना है। यह हमें समाज, राजनीति, धर्म, संस्कृति से संबंधित क्षेत्र में घटित होने वाली घटनाओं, समस्याओं का विश्लेषण, आलोचना करना सिखाता है ताकि इनपर विचार विमर्श करते हुए हम एक बेहतर भविष्य के निर्माण में योगदान दे सकें।
          राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक शाला के बच्चों के लिए सामाजिक अध्ययन के निम्न उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं –
प्राथमिक स्तर पर
·       बच्चों में अपने घर समाज के आसपास की वस्तुओं को पहचानने तथा उसके वर्गीकरण करने की क्षमता विकसित करना।
·       बच्चों में प्राकृतिक तथा सामाजिक पर्यावरण के अंतरसंबंध संबंधित समझ विकसित करना।
उच्च प्राथमिक स्तर पर
·       समाज के सामाजिक आर्थिक समस्याओं जैसे गरीबी, निरक्षरता, जाति, वर्ग, जेंडर, पर्यावरण आदि से अवगत कराने के लिए।
·       विश्लेषणात्मक तथा रचनात्मक मस्तिष्क की नींव तैयार करना।
·       भारतीय संविधान के मूल्यों जैसे समानता, स्वतंत्रता, न्याय आदि को समझाना ताकि वे धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक समाज के निर्माण के महत्व को समझ सकें।
·       नागरिकों में स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता विकसित करने के साथ-साथ उन्हें उन सामाजिक बलों का सामना करने को तैयार करना जिनसे लोकतांत्रिक मूल्यों को खतरा है।
·       बच्चों को प्रकृति तथा समाज के बीच के अंतरसबंध बताते हुए उस परिवेश या समाज के संबंध में आलोचनात्मक समझ विकसित करना जिसमें वे रहते हैं।
·       संबंधित राज्य, देश के सामाजिक-राजनैतिक संस्थाओं से बच्चों को परिचित कराना।   
·       विविध भाषा-संस्कृतियों वाले देश-समाज में जीवन यापन हेतु एक सहिष्णु वातावरण का निर्माण करना।
·       स्वच्छ लोकतंत्र निर्माण हेतु एक ऐसे नागरिक समूह का निर्माण करना जिन्हें अपने अधिकारों तथा जिम्मेदारियों का ज्ञान हो।
·       सामाजिक संस्थाओं, परंपराओं तथा समाज में व्याप्त अनेक विचारों के संबंध में बताना। उन्हें इस लायक बनाना कि वे इन परंपराओं, विचारों के संदर्भ में प्रश्न कर सकें, उनकी जांच पड़ताल कर सकें।
सामाजिक अध्ययन व सामाजिक विज्ञान की पहेली
वर्तमान में विद्यालयी पाठ्यक्रम में पर्यावरण अध्ययन, इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र  आदि के अध्ययन को मिश्रित रूप से सामाजिक विज्ञान विषय के अंतर्गत पढ़ाया जाता है। इन विषयों के लिए कभी सामाजिक विज्ञान तो कभी सामाजिक अध्ययन शब्दावली भी प्रयुक्त की जाती है। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि इस अध्ययन क्षेत्र को सामाजिक अध्ययन या सामाजिक विज्ञान, क्या कहना उपयुक्त होगा? इस भ्रम की स्थिति को थोड़ा दूर करने का प्रयास किया है अमेरिकन काउंसिल ऑफ द सोसल स्टडीज़ ने, जिसके अनुसार, सामाजिक अध्ययन सामाजिक विज्ञान और ह्यूमनटीज़ (मानविकी) का मिश्रित अध्ययन है जिसका उद्देश्य है एक योग्य, समृद्ध नागरिक का निर्माण करना[ii] अब सवाल है कि किन-किन विषयों को हम सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत रखें और किन विषयों को मानविकी के अंतर्गत? सामाजिक विज्ञान अध्ययन का वह क्षेत्र है जिसके अंतर्गत समाज व सामाजिक संस्थाओं के साथ नागरिकों के संबंधों का वैज्ञानिक विधि द्वारा अध्ययन किया जाता है। इसके अंतर्गत भूगोल, मानव विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र जैसे विषय आते हैं। वहीं मानविकी के अंतर्गत मनुष्य के व्यक्तिगत विचारों, क्रियाकलापों संबंधी अध्ययन आते हैं। जैसे इतिहास, कला, दर्शन, साहित्य, धर्म, संस्कृति संबंधी अध्ययन आदि।
          इस आधार पर यदि हम विद्यालय स्तर के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम को देखें तो इसमें इतिहास विषय के अंतर्गत अतीत के लोगों के व्यक्तिगत विचारों (दर्शन), उनके लिखित दस्तावेज़ (साहित्य) उनके व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर बनाए गए रीति रिवाजों (धर्म, संस्कृति) का अध्ययन किया जाता है। वहीं नागरिक शास्त्र के अंतर्गत समाज की प्रशासनिक संस्थाओं, भूगोल के अंतर्गत समाज की विशेषताओं, स्थिति का अध्ययन किया जाता है। इस आधार पर विद्यालय स्तर के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम को सामाजिक अध्ययन कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। 
सामाजिक अध्ययन के विषय  
समाज संबंधी विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन के उद्देश्य से सामाजिक अध्ययन को कई शाखाओं में विभाजित किया गया है। समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानव विज्ञान, भाषा विज्ञान, जनसंचार, शिक्षा शास्त्र, विधि (कानून) राजनीति शास्त्र, समाज कार्य, इतिहास, भूगोल आदि इसकी शाखाएँ हैं। विभिन्न समय अंतराल में विविन मानव प्रजातियों, समुदायों की भौतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का अध्ययन मानव विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है। संसार, प्राचीन काल से आज तक मनुष्य द्वारा आपसी बातचीत या संचार के साधनों के विकास का अध्ययन है। समाजशास्त्र के अंतर्गत सामाज संबंधी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। औगस्ट कामते को समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है। अर्थशास्त्र का अध्ययन इसलिए आवश्यक है कि किशोर जिस देश या समाज में रहता है उसकी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में जान सके। इतिहास का अध्ययन इस दृष्टि से कराया जाता है कि हमें पता चल सके कि विभिन्न काल खंडों में हमारी सभ्यता संस्कृति कैसी थी? किस प्रकार इन में परिवर्तन आए। समाज के निवासियों के शासन व्यवस्था, उनके अधिकार व कर्तव्य का अध्ययन नागरिक शास्त्र/राजनीति विज्ञान के अंतर्गत करते हैं। एक विषय के रूप में नागरिक शास्त्र का अध्ययन औपनिवेशिक काल की देन है। हिंदुस्तान में अंग्रेजी राज के प्रति बढ़ती निष्ठाहीनता को देखते हुए इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। ताकि संवेदनशील तथा उत्तरदायी नागरिक का निर्माण किया जा सके। भूगोल के अंतर्गत वैश्विक संदर्भ में अपने क्षेत्र, प्रदेश तथा देश के पर्यावरण, संसाधन की स्थिति का अध्ययन किया जाता है।

Tuesday, 2 April 2019

शनि ग्रह : परिचय


सौर मंडल के ग्रह शनि को हमारे धर्मदेश में 'शनैश्चरकहा जाता है। दरअसल यह हमारी पृथ्वी से 750 गुना बड़ा है तथा हमारी पृथ्वी से 128 करोड़ किलोमीटर दूर है। यह 30 वर्ष में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। पृथ्वी से इतनी दूर होने के कारण यह ग्रह बहुत ही धीमी गति से चलता दिखाई देता है इसलिए प्राचीन काल में लोगों ने इसे 'शनैःचरनाम दिया था। जिसका अर्थ होता है - धीमी गति से चलने वाला। 
'शनिचर' या 'शनि' इसका अपभ्रंश रूप है। पौराणिक कथाओं में इसे सूर्य का पुत्र कहा गया है। यूनानी मान्यताओं के अनुसार यह (सैटर्न) बृहस्पति (जुपिटर) का पिता है। भारतीय ज्योतिष में इसे एक अशुभ ग्रह माना गया है जबकि वास्तविकता यह है कि यह सौर मंडल का सबसे खूबसूरत ग्रह है। चुकी यह अत्यंत मंद गति से 30 वर्षों में सूर्य का एक चक्कर लगाता है इसलिए पूरे वर्ष भर भी इसकी स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं देता। एक राशि में यह लगभग ढाई वर्ष रहता है।