वर्ष 1757 ई.
में बंगाल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी (ब्रिटिश व्यापारिक
कंपनी) का हमारे देश में प्रशासनिक हस्तक्षेप शुरू हुआ. धीरे-धीरे कूटनीतिक
प्रयासों से ईस्ट इंडिया कंपनी ने कुछ देसी रियासतों को सहायक संधि तो कुछ को हड़प
नीति के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाते हुए अपने राजनैतिक वर्चस्व का विस्तार
करती रही. शुरूआती वर्षों में (वर्ष 1757 से 73 ई. तक) ईस्ट इंडिया कंपनी अपने
अधिकारियों के माध्यम से व्यापार के साथ-साथ इतने बड़े साम्राज्य को संचालित करती
रही. लेकिन कंपनी के अधिकारियों के भ्रष्टाचार में संलिप्तता, कमजोर प्रशासन, खराब
वित्तीय प्रबंधन, 1769-70 के भीषण बंगाल अकाल के कारण राजस्व वसूली पर पड़े
दुष्प्रभाव, व्यापार के बदले ब्रिटिश सरकार को दिए जाने वाले राजस्व में अनियमितता
आदि कारणों से ईस्ट इंडिया कंपनी भयानक आर्थिक संकट में फंस गई. कंपनी ने खुद को
इस आर्थिक संकट से निकालने के लिए ब्रिटिश संसद की मदद मांगी[i].
फलस्वरूप वर्ष 1773 ई. में ‘रेग्युलेटिंग एक्ट’ के माध्यम से ब्रिटिश संसद ने
कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करना पड़ा. इसके पश्चात साम्राज्य विस्तार/सुरक्षा
हेतु युद्ध करने से लेकर गवर्नर जनरल की नियुक्ति करने जैसे कार्यों में ब्रिटिश
संसद (क्राउन) सहयोग देने लगी. जबकि आन्तरिक प्रशासन की जिम्मेदारी कंपनी की होती
थी. समय के साथ कंपनी पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ता गया और 1857 ई. की
क्रांति के बाद वर्ष 1858 में ब्रिटिश संसद (क्राउन) ने ‘भारत सरकार अधिनियम’ के
द्वारा शासन की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले लिया.[ii]
वर्ष 1773 से 1858 की अवधि के बीच ब्रिटिश संसद ने पिट्स इंडिया एक्ट 1784, चार्टर
एक्ट 1793, 1813, 1833, 1853 जैसे कई कानून के माध्यम से कंपनी सरकार को नियंत्रित
करती रही.
ब्रिटिश
संसद के ‘चार्टर एक्ट 1813’ के माध्यम से कंपनी के शासन को ब्रिटिश क्राउन के अधीन
20 साल के लिए बढ़ाया गया. इसके साथ ही कंपनी को शिक्षा (पाश्चात्य शिक्षा)
के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी भी दी गई. भारत में शिक्षा के विकास के लिए प्रति
वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। इस कार्य में इसाई मिशनरियों से
सहयोग लेने का भी प्रावधान इस एक्ट में था. फलस्वरूप मिशनरियों के माध्यम से अंग्रेजी
भाषा, यूरोपी (पश्चिमी) साहित्य, विज्ञान संबंधी ज्ञान के
प्रसार की प्रक्रिया शुरू हुई. उन्होंने कंपनी शासित क्षेत्रों में कई स्कूल
स्थापित किये.
हालाँकि
इसके पूर्व से ही कंपनी सरकार ने वर्ष 1781 में फ़ारसी व अरबी भाषा के अध्ययन के
लिए कलकत्ता मदरसा, हिंदू धर्म व साहित्य के अध्ययन के लिए 1791 ई. में बनारस में
एक संस्कृत कॉलेज, 1800 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई. अर्थात
प्राच्यवादी (Orientalism) अध्ययन की शुरुआत हुई लेकिन इसका उद्देश्य वर्ष 1774 में कलकत्ता में
स्थापित सुप्रीम कोर्ट में हिंदू, मुस्लिम कानून के जानकार के आवश्यकता की पूर्ती
से संबंधित था. कंपनी सरकार को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता थी जो न्याय विभाग में
अंग्रेज न्यायाधीशों के साथ संस्कृत, अरबी, फारसी भाषा में लिखित हिंदू व मुस्लिम
कानून की व्याख्या कर सके, प्रशासनिक जगत में उस भाषा में पत्र-व्यवहार कर सके. कंपनी
सरकार का यह प्रयास सफल नहीं हुआ. बी एल ग्रोवर इसके पीछे निहित कारण बताते हैं कि
‘प्रायः शिक्षक अधिक और विद्यार्थी कम होते थे’[iii]
1813-33 के बीच कंपनी सरकार ने अंग्रेजी और प्राच्य भाषा
(संस्कृत, फारसी, अरबी) दोनों से संबंधित साहित्यों, ज्ञान के प्रसार को बढ़ावा दिया.
इसाई मिशनरी, कई आंग्लवादी विद्वान से लेकर राजा राममोहन राय जैसे भारतीय विद्वान
ने कंपनी सरकार के प्राच्यवादी साहित्यों के अध्ययन को बढ़ावा देने की आलोचना की. भारतीय
पुनर्जागरण के जनक कहे जाने वाले राजा राममोहन राय जैसे भारतीय विद्वान लोगों को
समाज के लिए उपयोगी सदस्य बनाने के लिए गणित, विज्ञान जैसे विषयों के अध्ययन
अध्यापन कराने के पक्षधर थे[iv].
वे अंग्रेजी व पाश्चात्य शिक्षा प्रसार पर जोर देने की बात करते थे. इसके विपरीत
एच. टी. प्रिंसेप जैसे कुछ ऐसे भी अंग्रेज अधिकारी थे जो प्राच्य विद्या को
प्रोत्साहन देने की नीति के समर्थक थे.
1833 के चार्टर एक्ट में ब्रिटिश संसद ने शिक्षा प्रसार के लिए
स्वीकृत 1 लाख रूपये की राशि बढ़ाकर 10 लाख रूपये वार्षिक कर दिया गया. ऐसे में अब
इस बात पर कठोर निर्णय लेना आवश्यक हो गया था कि ‘भारत में दी जाने वाली शिक्षा को
स्वरुप कैसा हो?’ अर्थात प्राच्य शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए या पश्चिमी शिक्षा को? शिक्षा
के क्षेत्र में यह 1830 के दसक का सबसे बड़ा विमर्श व विवाद था. तत्कालीन गवर्नर
जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने इस विवाद को सुलझाने का जिम्मा थॉमस बैबिंगटन मैकाले
को दिया. मैकाले ने अपने विचार 'मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन' दस्तावेज के माध्यम से
अभिव्यक्त किये. इस दस्तावेज में मैकाले ने शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी माध्यम से
यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रचार निर्धारित किया.[v].
मैकाले ने एक तरह से शिक्षा को ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों के अनुरूप ढालने का प्रयास
किया.
प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था को समझने के बाद मैकाले इस राय
पर पहुंचे कि प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था अविकसित होने के साथ-साथ अवैज्ञानिक
थी. यही कारण था कि उन्होंने कंपनी द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थाओं में विज्ञान
विषय का अध्ययन-अध्यापन शुरू किया. ताकि भारतीयों का बौद्धिक विकास सुनिश्चित किया
जा सके जो भारत में ब्रिटिश प्रशासन को सहयोग प्रदान करने के साथ औद्योगिक क्रांति
के फलस्वरूप इंग्लैंड के साथ-साथ भारत में भी स्थापित हुए/होने वाले उद्योग-धंधों
के संचालन में सहयोग दे सके. विज्ञान के साथ-साथ इतिहास, भूगोल, गणित, कृषि आदि
विषयों की शिक्षा दी जाती थी. छोटी कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या
क्षेत्रीय भाषा होता था (1854 के वुड्स घोषणापत्र के बाद). माध्यमिक व उच्च
कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी था. इस प्रकार वर्ष 1813-53 ई. के बीच
ब्रिटिश संसद द्वारा जारी किये गए (तीन) चार्टर एक्ट के माध्यम से कई शैक्षिक
प्रावधान किये गए जिससे भारत में गुरुकुल, मदरसे द्वारा शिक्षा देने के स्थान पर
सरकार समर्थित आधुनिक शिक्षा (गणित, रसायन, पाश्चात्य साहित्य) व्यवस्था का मार्ग
प्रशस्त हुआ.
क्यों खटकते हैं भारतीयों को मैकाले?
मैकाले
की शिक्षा व्यवस्था की आलोचना की जाती रही है. इनमें उस समय के प्रबल प्रतिद्वंदी प्राच्यवादी
(एच.एच विल्सन, फ्रेडरिक शोर, विलियम एडम आदि)[vi]
से लेकर कालांतर के वर्तमान समय के इतिहासकार, शिक्षा विज्ञानी (रविन्द्र नाथ
टैगोर), राजनीतिज्ञ (महात्मा गाँधी) सामाजिक कार्यकर्ता से लेकर बड़े-बड़े संवैधानिक
पदों पर बैठे अधिकारी भी शामिल हैं. पारंपरिक हिंदू शिक्षा पद्धति, संस्कृत शिक्षा
को महत्व देने वाले लोगों की नज़रों में ये आज भी खटकते हैं. उनके मुंह से अक्सर इस
प्रकार की बातें सुनने को मिलती है कि मैकाले ने ये शिक्षा नीति नहीं लाया होता तो
आज संस्कृत जैसे भाषा वैश्विक स्तर की भाषा होती. ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर
मैकाले द्वारा प्रस्तावित शिक्षा पद्धति में दोष क्या थे?
आलोचना के आधार
·
भारतीय
भाषाओं (संस्कृत, अरबी, फ़ारसी) के स्थान पर अंग्रेजी को प्राथमिकता –
आलोचक
मैकाले की अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिए जाने की नीति का विरोध करते हैं, इनका
विचार है कि शिक्षा देने की भाषा का माध्यम अंग्रेजी की जगह संस्कृत, फ़ारसी होना
चाहिए था. प्राच्य साहित्यों का अवलोकन करने के पश्चात मैकाले इस निष्कर्ष पर
पहुंचे कि इन साहित्यों में आधुनिक विज्ञान और ज्ञान की सामग्री नहीं है. चूँकि
आधुनिक विज्ञान और ज्ञान का केंद्र उस समय यूरोप में था, एवं इससे संबंधित अधिकांश
पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में थी, इसलिए उनका तर्क था कि अंग्रेजी भाषा सीखकर लोग
पश्चिमी विज्ञान और साहित्य तक अपनी पहुँच बनायेंगे जिससे उनकी बौद्धिक समृद्धि
होगी. इसलिए शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा रखा गया. अन्य भाषा रखने का मतलब होता
आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से संबंधित पुस्तकों का संस्कृत, फारसी भाषाओँ में अनुवाद
करवाना जिसपर अनावश्यक धन व्यय होता. और ऐसा भी नहीं था कि पूरे देश के लोगों भी
आम भाषा संस्कृत और फ़ारसी ही है.
·
औपनिवेशिक
हित –
ईस्ट
इंडिया कंपनी को अपने खर्च पर शिक्षा देना कोई लोक कल्याणकारी कदम नहीं था, बल्कि
उसके खुद के प्रशासनिक आवश्यकता की पूर्ती थी. दरअसल, अपने प्रशासनिक जरुरत के
हिसाब से कंपनी को बहुत सारे माध्यम व निम्न स्तर के अधिकारी चाहिए थे। यह कम खर्च
में हो जाए, हर कोई यही चाहता है. इंग्लैंड से अंग्रेज लोगों को बुलाकर नौकरी पर
रखने से कहीं ज्यादा सस्ता था भारतीय लोगों को रखना.
·
पारंपरिक
ज्ञान की उपेक्षा -
उपरोक्त
बिंदु से जैसा कि स्पष्ट है कि कंपनी सरकार द्वारा शिक्षा पर खर्च करना कोई लोक
कल्याणकारी कदम नहीं था, बल्कि खुद के प्रशासनिक आवश्यकता की पूर्ती थी. ऐसे में
पारंपरिक ज्ञान दिया जाने उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखता. स्वाभाविक है कि वे
उन्हें वही ज्ञान देंगे जिससे उनके उद्देश्य की पूर्ती हो. ऐसे में प्रशासनिक
सहयोग की जरुरत को पूरा करने के लिए भारतीयों को अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान देना
आवश्यक था। ऐसी परिस्थिति में ही वर्ष 1837 में फ़ारसी की जगह अंग्रेज़ी सरकारी
कामकाज की भाषा बनी, ऐसे में अंग्रेज़ी
भाषा में शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक हो गया.
· सीमित लोगों तक शिक्षा –
ब्रिटिश
संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी को वर्ष 1813 ई. के चार्टर एक्ट के तहत एक करोड रुपए
शिक्षा व्यवस्था पर खर्च करने के लिए दिए थे. 1933 के चार्टर एक्ट में इस धन को एक
करोड़ से बढ़कर 10 करोड़ कर दिया गया. ब्रिटिश संसद के द्वारा ऐसा करने के पीछे
उद्देश्य जनहित नहीं था बल्कि कंपनी का हित था. इस धन का उपयोग ऐसे शिक्षा
व्यवस्था में करना था, जिससे कि कंपनी को
ऐसे मानव संसाधन उपलब्ध कराया जा सके, जो उसे प्रशासनिक
सहयोग दे पाए. इस 10 करोड़ की राशि से तत्कालीन हिंदुस्तान की बहुसंख्या जनसंख्या
को को शिक्षित नहीं किया जा सकता था, फिर भी अधिक से अधिक
लोगों तक शिक्षा का प्रसार हो, इसका ध्यान रखा गया. यही कारण
था कि मैकाले ने ऐसी व्यवस्था (Downward Filtration Theory) बनाई
जिससे कि कुछ ऊँचे वर्ग के लोगों को अंग्रेज़ी में पढ़ाया जाए। ये लोग बाकी जनता
के बीच उनकी भाषा का उपयोग करते हुए ज्ञान का प्रसार करेंगे. इस कारण से महान
समाजसुधारक ज्योतिबा फुले ने इसकी आलोचना भी की थी. हालाँकि ऐसी व्यवस्था कर राजा
राममोहन राय जैसे बौद्धिक व दार्शनिक व्यक्तित्व निर्मित करने का उद्देश्य रहा
होगा. राजा राममोहन राय भी रंग-रक्त से भारतीय थे, लेकिन
रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से
अंग्रेज़ के सामान ही थे.
मैकाले के शिक्षा नीति की समीक्षा
मैकाले
के शिक्षा नीति की निष्पक्ष समीक्षा की जाए तो उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो
उनकी आलोचना की जाए. बल्कि जिस उद्देश्य से ब्रिटिश संसद से कंपनी सरकार को शिक्षा
पर खर्च करने के लिए फंड मिला था, मैकाले ने उसी उद्देश्य की पूर्ती की दिशा में
कार्य किये. कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था के कारण कंपनी सरकार की जो स्थिति वर्ष 1772
ई. हुई थी वह स्थिति दुबारा न आ जाए, इसलिए मैकाले ने आधुनिक व तार्किक ज्ञान से
युक्त बौद्धिक लोगों को तैयार करने वाली शिक्षा का पक्ष लिया. अधिकांश पश्चिमी
शिक्षा प्राप्त कर देश समाज की समस्याओं को समझने वाले, उसके उन्मूलन के लिए आवाज़
उठाने वाले बौद्धिक लोग (ज्योतिबा फुले, महादेव गोविंद रानाडे, पंडिता रमाबाई, डॉ.
भीमराव अम्बेडकर, दादा भाई नैरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, राजा
राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, आदि) मैकाले की इस बात पर मुहर लगाते हैं. ये
सभी लोग पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से उपजी भारतीय बौद्धिक संपदा हैं.
[i] https://www.parliament.uk/about/living-heritage/evolutionofparliament/legislativescrutiny/parliament-and-empire/parliament-and-the-american-colonies-before-1765/parliament-and-the-east-india-company/?utm_source=chatgpt.com
[ii] https://www.parliament.uk/about/living-heritage/evolutionofparliament/legislativescrutiny/parliament-and-empire/parliament-and-the-american-colonies-before-1765/east-india-company-and-raj-1785-1858/?utm_source=chatgpt.com
[iii] ग्रोवर,
बी एल, ‘आधुनिक भारत का इतिहास : एक नविन मूल्यांकन’ एस चंद पब्लिकेशन, नई दिल्ली,
2006, पृष्ठ 254
[iv] वही,
पृष्ठ संख्या 255



