Saturday, 31 October 2026

Share Market में Demand Zone और Supply Zone क्या होता है?

Supply Zone और Demand Zone दोनों ही शब्द Share Market से संबंधित technical term हैं. ये दोनों शब्द किसी भी trader को यह समझने में मदद करते हैं कि किसी स्टॉक की कीमत किस स्तर से गिर सकती है या बढ़ सकती है। इसे उदाहरण के साथ क्रम से समझने का प्रयास करते हैं। लेकिन उससे पहले दो और term buyers और sellers को समझना आवश्यक है। Share Market में Buyers (खरीदार) और Sellers (विक्रेता) वे दो पक्ष हैं जिनके बीच शेयरों की खरीद-बिक्री होती है। Buyers share को खरीदने वाला पक्ष है। वे इस उम्मीद में share खरीदते हैं कि भविष्य में उसकी कीमत और बढ़ेगी। इस अपेक्षा के साथ वे कम कीमत में खरीदते हैं और लाभ लेकर अधिक कीमत में बेच देते हैं। इसके विपरीत Sellers share को बेचने वाला पक्ष है। Share holders को जब ऐसा लगता है कि उसके पास जो stock है उसकी कीमत गिर सकती है, या उससे जितना लाभ लेने की अपेक्षा थी उतना मिल गया तो वह share को बेच देते हैं। शेयर की कीमत मुख्य रूप से इन दोनों पक्षों की गतिविधि के आधार पर बदलती रहती है। किसी भी share के अलग-अलग price range पर ये एक दुसरे पर हावी होते रहते हैं जिससे share market गतिशील बना रहता है। इनकी ही गतिविधि से stock चार्ट पर दो zone demand zone और Supply Zone बनते हैं।

Demand Zone 

Demand Zone वह price range होती है जहाँ किसी स्टॉक में खरीदारों (Buyers) की मांग (demand) इतनी मजबूत हो जाती है कि इस स्टॉक की कीमत गिरना बंद होकर ऊपर की ओर बढ़ने लगती है। उदाहरण के लिए – किसी कंपनी के 1 शेयर की कीमत 100 रूपये है। इसी दौरान उस stock को 100 -105 के बीच बहुत सारे खरीदार (buyers) मिल जाते हैं जिससे और शेयर की कीमत 100 रूपये से अचानक (5 मिनट या पूरे दिन भर में) उछलकर 120 रूपये तक पहुँच जाता है। ऐसी स्थिति में 100-105 रूपये का क्षेत्र Demand Zone कहलाता है। इस उछाल का मतलब यह है कि इस range में Buyers को खरीदारी के संकेत मिलते हैं और वे खरीदना शुरू कर देते हैं। भविष्य में यदि इस स्टॉक की कीमत यदि down होते हुए दोबारा उस क्षेत्र में आता है तो ऐसा माना जाता है कि वहाँ से खरीदारी बढ़ सकती है।

Supply Zone

Supply Zone Demand Zone का विपरीत होता है। अर्थात यह Sellers का मजबूत क्षेत्र होता है। किसी Price Range में आकर यदि उस share में selling शुरू हो जाता है तो share की कीमत नीचे आने लगता है। उदाहरण के लिए किसी कंपनी का शेयर यदि 200 रूपये तक पहुँच जाता है। और 200-210 रूपये के बीच बहुत सारे निवेशक अपने शेयर बेचने लगते हैं तो शेयर की कीमत 200 से गिरकर 170 रूपये या उससे भी निचे तक आ जाता है। इस स्थिति में 200-210 रूपये का क्षेत्र Supply Zone कहलाएगा। भविष्य में यदि कीमत दोबारा उस क्षेत्र में आता है तो sellers हावी हो जाते हैं और कीमत फिर से नीचे गिरने लगती है।

कई बार उस कंपनी से संबंधित कोई अच्छी खबर हो तो ये trend टूट भी जाता है और share की कीमत नए price range तक चला जाता है।



Monday, 26 October 2026

अमेरिका में मध्यावधि चुनाव : ट्रंप के लिए रिपोर्ट कार्ड का दिन

दिनांक 3 नवंबर 2026 अगले माह की इस अति महत्वपूर्ण तिथि की ओर पूरी दुनिया की नज़र है क्योंकि इस तिथि को संयुक्त राज्य अमेरिका में मध्यावधि चुनाव (Midterm Election) होना है. यह अमेरिकी राष्ट्रपति के 4 साल के कार्यकाल के मध्य अर्थात 2 साल पर होने वाला चुनाव है. इस कारण इन्हें मध्यावधि चुनाव कहा जाता है. इस चुनाव का मुख्य उद्देश्य है – अमेरिकी जनता द्वारा सरकार के प्रमुख (राष्ट्रपति) के कामकाज पर अपनी राय व्यक्त करना.

मध्यावधि चुनाव (Midterm Election) को समझने के लिए अमेरिकी संसद को समझना आवश्यक है. जैसे हमारे देश की संसद में दो सदन होते हैं, वैसे ही अमेरिका की संसद में भी दो सदन – प्रतिनिधि सभा और सीनेट होते हैं. प्रतिनिधि सभा (House of Representative) में अमेरिका के 50 राज्यों से 435 प्रतिनिधि, और सीनेट में 50 अमेरिकी राज्यों के 100 प्रतिनिधि (प्रत्येक राज्य से 2 प्रतिनिधि) चुनकर आते हैं. प्रतिनिधि सभा (House of Representative) के सदस्यों का कार्यकाल 2 वर्षों का जबकि सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है. ऐसे में प्रत्येक दो-दो वर्षों पर प्रतिनिधि सभा के सभी सदस्य एवं एक तिहाई सीनेट के सदस्य निर्वाचित होते रहते हैं.

3 नवंबर 2026 को होने वाला यह चुनाव एक तरफ जहां अमेरिकी जनता के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लोकप्रियता की परीक्षा है. तो वहीं दूसरी ओर इसके परिणाम युद्ध और टैरिफ की चिंता से घिरे देशों के लिए मरहम या जख्म देने का काम करेंगे. इस तारीख को अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदन के सदस्यों का चुनाव होना है {प्रतिनिधि सभा (House of Representative) के सभी 435 एवं सीनेट के 35 सीट पर}.

चुनाव के माध्यम से सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदन {प्रतिनिधि सभा (House of Representative) एवं सीनेट} में बहुमत में बने रहने के लिए प्रयास करेगी, वहीं विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी जनता को अपने पक्ष में लाते हुए किसी एक या दोनों सदन में बहुमत में आने का प्रयास करेगी. वर्तमान में प्रतिनिधि सभा के कुल 435 में से 218 सीट के साथ ट्रंप की रिपब्लिक पार्टी बहुमत में है जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 214 सीट है. इसी तरह वर्तमान स्थिति में सीनेट में यह आंकडा 53 बनाम 47 (दो निर्दलीय को मिलाकर) है. अर्थात प्रतिनिधि सभा में 4 सीट का और सीनेट में मात्र 6 सीट का अंतर है. ऐसी स्थिति में यदि डेमोक्रेटिक पार्टी को ट्रंप की नीतियों के कारण महंगाई से त्रस्त व असंतुष्ट अमेरिकी जनता का समर्थन मिल जाता है तो एक बड़ा उलटफेर हो सकता है. सीटों के बीच अत्यधिक अंतर होने पर डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक शक्ति और नीतियों को प्रभावित कर सकती है.[i] हालाँकि राष्ट्रपति पद पर वे बने रहेंगे लेकिन नागरिकों की नाराजगी को देखते हुए विपक्ष राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग भी ला सकता है.  

विपक्षी पार्टी (डेमोक्रेटिक पार्टी) यदि किसी सदन में बहुमत हासिल करती है तो डोनाल्ड ट्रंप के अलग-अलग देशों पर टैरिफ लगाने, ईरान के साथ युद्ध आदि मुद्दों पर निर्णायक फैसला लेना कठिन हो सकता है.

अमेरिका के अतिरिक्त विश्व के तीन अन्य देश मेक्सिको, अर्जेंटीना, फिलीपिंस में मध्यावधि चुनाव (Midterm Election) की व्यवस्था है.


Friday, 23 October 2026

औपनिवेशिक शिक्षा नीति और आधुनिक भारत का बौद्धिक निर्माण : मैकाले की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन

वर्ष 1757 ई. में बंगाल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी (ब्रिटिश व्यापारिक कंपनी) का हमारे देश में प्रशासनिक हस्तक्षेप शुरू हुआ. धीरे-धीरे कूटनीतिक प्रयासों से ईस्ट इंडिया कंपनी ने कुछ देसी रियासतों को सहायक संधि तो कुछ को हड़प नीति के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाते हुए अपने राजनैतिक वर्चस्व का विस्तार करती रही. शुरूआती वर्षों में (वर्ष 1757 से 73 ई. तक) ईस्ट इंडिया कंपनी अपने अधिकारियों के माध्यम से व्यापार के साथ-साथ इतने बड़े साम्राज्य को संचालित करती रही. लेकिन कंपनी के अधिकारियों के भ्रष्टाचार में संलिप्तता, कमजोर प्रशासन, खराब वित्तीय प्रबंधन, 1769-70 के भीषण बंगाल अकाल के कारण राजस्व वसूली पर पड़े दुष्प्रभाव, व्यापार के बदले ब्रिटिश सरकार को दिए जाने वाले राजस्व में अनियमितता आदि कारणों से ईस्ट इंडिया कंपनी भयानक आर्थिक संकट में फंस गई. कंपनी ने खुद को इस आर्थिक संकट से निकालने के लिए ब्रिटिश संसद की मदद मांगी[i]. फलस्वरूप वर्ष 1773 ई. में ‘रेग्युलेटिंग एक्ट’ के माध्यम से ब्रिटिश संसद ने कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करना पड़ा. इसके पश्चात साम्राज्य विस्तार/सुरक्षा हेतु युद्ध करने से लेकर गवर्नर जनरल की नियुक्ति करने जैसे कार्यों में ब्रिटिश संसद (क्राउन) सहयोग देने लगी. जबकि आन्तरिक प्रशासन की जिम्मेदारी कंपनी की होती थी. समय के साथ कंपनी पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ता गया और 1857 ई. की क्रांति के बाद वर्ष 1858 में ब्रिटिश संसद (क्राउन) ने ‘भारत सरकार अधिनियम’ के द्वारा शासन की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले लिया.[ii] वर्ष 1773 से 1858 की अवधि के बीच ब्रिटिश संसद ने पिट्स इंडिया एक्ट 1784, चार्टर एक्ट 1793, 1813, 1833, 1853 जैसे कई कानून के माध्यम से कंपनी सरकार को नियंत्रित करती रही.

ब्रिटिश संसद के ‘चार्टर एक्ट 1813’ के माध्यम से कंपनी के शासन को ब्रिटिश क्राउन के अधीन 20 साल के लिए बढ़ाया गया. इसके साथ ही कंपनी को शिक्षा (पाश्चात्य शिक्षा) के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी भी दी गई. भारत में शिक्षा के विकास के लिए प्रति वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। इस कार्य में इसाई मिशनरियों से सहयोग लेने का भी प्रावधान इस एक्ट में था. फलस्वरूप मिशनरियों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा, यूरोपी (पश्चिमी) साहित्य, विज्ञान संबंधी ज्ञान के प्रसार की प्रक्रिया शुरू हुई. उन्होंने कंपनी शासित क्षेत्रों में कई स्कूल स्थापित किये.

हालाँकि इसके पूर्व से ही कंपनी सरकार ने वर्ष 1781 में फ़ारसी व अरबी भाषा के अध्ययन के लिए कलकत्ता मदरसा, हिंदू धर्म व साहित्य के अध्ययन के लिए 1791 ई. में बनारस में एक संस्कृत कॉलेज, 1800 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई. अर्थात प्राच्यवादी (Orientalism) अध्ययन की शुरुआत हुई लेकिन इसका उद्देश्य वर्ष 1774 में कलकत्ता में स्थापित सुप्रीम कोर्ट में हिंदू, मुस्लिम कानून के जानकार के आवश्यकता की पूर्ती से संबंधित था. कंपनी सरकार को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता थी जो न्याय विभाग में अंग्रेज न्यायाधीशों के साथ संस्कृत, अरबी, फारसी भाषा में लिखित हिंदू व मुस्लिम कानून की व्याख्या कर सके, प्रशासनिक जगत में उस भाषा में पत्र-व्यवहार कर सके. कंपनी सरकार का यह प्रयास सफल नहीं हुआ. बी एल ग्रोवर इसके पीछे निहित कारण बताते हैं कि ‘प्रायः शिक्षक अधिक और विद्यार्थी कम होते थे’[iii]  

1813-33 के बीच कंपनी सरकार ने अंग्रेजी और प्राच्य भाषा (संस्कृत, फारसी, अरबी) दोनों से संबंधित साहित्यों, ज्ञान के प्रसार को बढ़ावा दिया. इसाई मिशनरी, कई आंग्लवादी विद्वान से लेकर राजा राममोहन राय जैसे भारतीय विद्वान ने कंपनी सरकार के प्राच्यवादी साहित्यों के अध्ययन को बढ़ावा देने की आलोचना की. भारतीय पुनर्जागरण के जनक कहे जाने वाले राजा राममोहन राय जैसे भारतीय विद्वान लोगों को समाज के लिए उपयोगी सदस्य बनाने के लिए गणित, विज्ञान जैसे विषयों के अध्ययन अध्यापन कराने के पक्षधर थे[iv]. वे अंग्रेजी व पाश्चात्य शिक्षा प्रसार पर जोर देने की बात करते थे. इसके विपरीत एच. टी. प्रिंसेप जैसे कुछ ऐसे भी अंग्रेज अधिकारी थे जो प्राच्य विद्या को प्रोत्साहन देने की नीति के समर्थक थे.

1833 के चार्टर एक्ट में ब्रिटिश संसद ने शिक्षा प्रसार के लिए स्वीकृत 1 लाख रूपये की राशि बढ़ाकर 10 लाख रूपये वार्षिक कर दिया गया. ऐसे में अब इस बात पर कठोर निर्णय लेना आवश्यक हो गया था कि ‘भारत में दी जाने वाली शिक्षा को स्वरुप कैसा हो?’ अर्थात प्राच्य शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए या पश्चिमी शिक्षा को? शिक्षा के क्षेत्र में यह 1830 के दसक का सबसे बड़ा विमर्श व विवाद था. 15 वर्षों तक यह विमर्श/विवाद चला.[v] तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने इस विवाद को सुलझाने का जिम्मा थॉमस बैबिंगटन मैकाले को दिया. मैकाले ने अपने विचार 'मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन' दस्तावेज के माध्यम से अभिव्यक्त किये. इस दस्तावेज में मैकाले ने शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी माध्यम से यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रचार निर्धारित किया.[vi]. मैकाले ने एक तरह से शिक्षा को ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया.

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था को समझने के बाद मैकाले इस राय पर पहुंचे कि प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था अविकसित होने के साथ-साथ अवैज्ञानिक थी. यही कारण था कि उन्होंने कंपनी द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थाओं में विज्ञान विषय का अध्ययन-अध्यापन शुरू किया. ताकि भारतीयों का बौद्धिक विकास सुनिश्चित किया जा सके जो भारत में ब्रिटिश प्रशासन को सहयोग प्रदान करने के साथ औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड के साथ-साथ भारत में भी स्थापित हुए/होने वाले उद्योग-धंधों के संचालन में सहयोग दे सके. विज्ञान के साथ-साथ इतिहास, भूगोल, गणित, कृषि आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी. छोटी कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होता था (1854 के वुड्स घोषणापत्र के बाद). माध्यमिक व उच्च कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी था. इस प्रकार वर्ष 1813-53 ई. के बीच ब्रिटिश संसद द्वारा जारी किये गए (तीन) चार्टर एक्ट के माध्यम से कई शैक्षिक प्रावधान किये गए जिससे भारत में गुरुकुल, मदरसे द्वारा शिक्षा देने के स्थान पर सरकार समर्थित आधुनिक शिक्षा (गणित, रसायन, पाश्चात्य साहित्य) व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हुआ.

क्यों खटकते हैं भारतीयों को मैकाले?

मैकाले की शिक्षा व्यवस्था की आलोचना की जाती रही है. इनमें उस समय के प्रबल प्रतिद्वंदी प्राच्यवादी (एच.एच विल्सन, फ्रेडरिक शोर, विलियम एडम आदि)[vii] से लेकर कालांतर के वर्तमान समय के इतिहासकार, शिक्षा विज्ञानी (रविन्द्र नाथ टैगोर), राजनीतिज्ञ (महात्मा गाँधी) सामाजिक कार्यकर्ता से लेकर बड़े-बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारी भी शामिल हैं. पारंपरिक हिंदू शिक्षा पद्धति, संस्कृत शिक्षा को महत्व देने वाले लोगों की नज़रों में ये आज भी खटकते हैं. उनके मुंह से अक्सर इस प्रकार की बातें सुनने को मिलती है कि मैकाले ने ये शिक्षा नीति नहीं लाया होता तो आज संस्कृत जैसे भाषा वैश्विक स्तर की भाषा होती. ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर मैकाले द्वारा प्रस्तावित शिक्षा पद्धति में दोष क्या थे?

आलोचना के आधार

·       भारतीय भाषाओं (संस्कृत, अरबी, फ़ारसी) के स्थान पर अंग्रेजी को प्राथमिकता –

आलोचक मैकाले की अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिए जाने की नीति का विरोध करते हैं, इनका विचार है कि शिक्षा देने की भाषा का माध्यम अंग्रेजी की जगह संस्कृत, फ़ारसी होना चाहिए था. प्राच्य साहित्यों का अवलोकन करने के पश्चात मैकाले इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन साहित्यों में आधुनिक विज्ञान और ज्ञान की सामग्री नहीं है. चूँकि आधुनिक विज्ञान और ज्ञान का केंद्र उस समय यूरोप में था, एवं इससे संबंधित अधिकांश पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में थी, इसलिए उनका तर्क था कि अंग्रेजी भाषा सीखकर लोग पश्चिमी विज्ञान और साहित्य तक अपनी पहुँच बनायेंगे जिससे उनकी बौद्धिक समृद्धि होगी. इसलिए शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा रखा गया. अन्य भाषा रखने का मतलब होता आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से संबंधित पुस्तकों का संस्कृत, फारसी भाषाओँ में अनुवाद करवाना जिसपर अनावश्यक धन व्यय होता. और ऐसा भी नहीं था कि पूरे देश के लोगों भी आम भाषा संस्कृत और फ़ारसी ही है. 

·       औपनिवेशिक हित –

ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने खर्च पर शिक्षा देना कोई लोक कल्याणकारी कदम नहीं था, बल्कि उसके खुद के प्रशासनिक आवश्यकता की पूर्ती थी. दरअसल, अपने प्रशासनिक जरुरत के हिसाब से कंपनी को बहुत सारे माध्यम व निम्न स्तर के अधिकारी चाहिए थे। यह कम खर्च में हो जाए, हर कोई यही चाहता है. इंग्लैंड से अंग्रेज लोगों को बुलाकर नौकरी पर रखने से कहीं ज्यादा सस्ता था भारतीय लोगों को रखना.

·       पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा -

उपरोक्त बिंदु से जैसा कि स्पष्ट है कि कंपनी सरकार द्वारा शिक्षा पर खर्च करना कोई लोक कल्याणकारी कदम नहीं था, बल्कि खुद के प्रशासनिक आवश्यकता की पूर्ती थी. ऐसे में पारंपरिक ज्ञान (संस्कृत, अरबी, फ़ारसी भाषा में लिखित साहित्य, दर्शन, योग, वैदिक मंत्र, ब्रह्मविद्या, क्षत्रविद्या, सर्पविद्या, वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद आदि) पर धन खर्च करने का कोई अर्थ नहीं था. ये सभी पारंपरिक ज्ञान/विद्या उनके लिए प्रासंगिक थी ही नहीं. ऐसे में स्वाभाविक है कि वे उन्हें वही ज्ञान देंगे जिससे कंपनी के हित/उद्देश्य की पूर्ती हो. उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता थी प्रशासन व्यवस्था में सहयोग देने वाले लोगों की. इस जरुरत को पूरा करने के लिए भारतीयों को तार्किक, बनाना आवश्यक था इस दक्षता की पूर्ती विज्ञान, गणित आदि विषय संबंधी ज्ञान अर्जित कर किया जा सकता था. चूँकि इस प्रकार के ज्ञान की पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध थी ऐसे में अंग्रेज़ी भाषा में ही इसे देना आवश्यक समझा गया। इसी दौरान वर्ष 1837 में फ़ारसी की जगह अंग्रेज़ी सरकारी कामकाज की भाषा बन गई, ऐसे में अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक हो गया.

·       सीमित लोगों तक शिक्षा –

ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी को वर्ष 1813 ई. के चार्टर एक्ट के तहत एक करोड रुपए शिक्षा व्यवस्था पर खर्च करने के लिए दिए थे. 1933 के चार्टर एक्ट में इस धन को एक करोड़ से बढ़कर 10 करोड़ कर दिया गया. ब्रिटिश संसद के द्वारा ऐसा करने के पीछे उद्देश्य जनहित नहीं था बल्कि कंपनी का हित था. इस धन का उपयोग ऐसे शिक्षा व्यवस्था में करना था, जिससे कि कंपनी को ऐसे मानव संसाधन उपलब्ध कराया जा सके, जो उसे प्रशासनिक सहयोग दे पाए. इस 10 करोड़ की राशि से तत्कालीन हिंदुस्तान की बहुसंख्या जनसंख्या को को शिक्षित नहीं किया जा सकता था, फिर भी अधिक से अधिक लोगों तक शिक्षा का प्रसार हो, इसका ध्यान रखा गया. यही कारण था कि मैकाले ने ऐसी व्यवस्था (Downward Filtration Theory) बनाई जिससे कि कुछ ऊँचे वर्ग के लोगों को अंग्रेज़ी में पढ़ाया जाए। ये लोग बाकी जनता के बीच उनकी भाषा का उपयोग करते हुए ज्ञान का प्रसार करेंगे. इस कारण से महान समाजसुधारक ज्योतिबा फुले ने इसकी आलोचना भी की थी. हालाँकि ऐसी व्यवस्था कर राजा राममोहन राय जैसे बौद्धिक व दार्शनिक व्यक्तित्व निर्मित करने का उद्देश्य रहा होगा. राजा राममोहन राय भी रंग-रक्त से भारतीय थे, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ के सामान ही थे.   

मैकाले के शिक्षा नीति की समीक्षा

मैकाले के शिक्षा नीति की निष्पक्ष समीक्षा की जाए तो उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उनकी आलोचना की जाए. बल्कि जिस उद्देश्य से ब्रिटिश संसद से कंपनी सरकार को शिक्षा पर खर्च करने के लिए फंड मिला था, मैकाले ने उसी उद्देश्य की पूर्ती की दिशा में कार्य किये. कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था के कारण कंपनी सरकार की जो स्थिति वर्ष 1772 ई. हुई थी वह स्थिति दुबारा न आ जाए, इसलिए मैकाले ने आधुनिक व तार्किक ज्ञान से युक्त बौद्धिक लोगों को तैयार करने वाली शिक्षा का पक्ष लिया. अधिकांश पश्चिमी शिक्षा प्राप्त कर देश समाज की समस्याओं को समझने वाले, उसके उन्मूलन के लिए आवाज़ उठाने वाले बौद्धिक लोग (ज्योतिबा फुले, महादेव गोविंद रानाडे, पंडिता रमाबाई, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, दादा भाई नैरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, आदि) मैकाले की इस बात पर मुहर लगाते हैं. ये सभी लोग पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से उपजी भारतीय बौद्धिक संपदा हैं.   

वर्ष 1813 या 1833 के चार्टर एक्ट से कंपनी सरकार को जो फंड (क्रमशः 1 लाख व 10 लाख) मिला था उसमें इसका उल्लेख नहीं था कि इस पैसे का उपयोग भारतीय शिक्षा व्यवस्था के उत्थान में खर्च किया जाए. ऐसे में यह अपेक्षा करना उचित नहीं है कि कंपनी सरकार उस राशि को संस्कृत या फारसी माध्यम से इन भाषाओँ में लिखित साहित्यों के अध्ययन के लिए किया जाए, जैसा आज के लोग सोचते हैं. आज हम अपने ही देश के तीन शिक्षा नीति का अवलोकन करें तो पाते हैं कि हमारी सरकार खुद इस उद्देश्य के साथ शिक्षा पर व्यय करती है कि उसे योग्य नागरिक (मानव संसाधन) मिल सके जो देश को विकसित बनाने में योगदान दे सकें. 2020 की शिक्षा नीति ऐसे नागरिक निर्माण की बात करती है जो 21वीं सदी के कौशल से युक्त हों.



[iii] ग्रोवर, बी एल, ‘आधुनिक भारत का इतिहास : एक नविन मूल्यांकन’ एस चंद पब्लिकेशन, नई दिल्ली, 2006, पृष्ठ 254

[iv] वही, पृष्ठ संख्या 255

[v] Singh Sahana, ‘Revisiting The Educational Heritage Of India’ Vitasta Publication, N. Delhi, Page No. 214

Sunday, 18 October 2026

जीवन का सफ़र और शिक्षा का पड़ाव : अनौपचारिक शिक्षा, औपचारिक शिक्षा और उसके विभिन्न स्तर

मानव जीवन के सफर में नामक अलग-अलग पड़ाव या अवस्था आते हैं. मानव विज्ञानी इन अवस्थाओं को अलग-अलग नाम से संबोधित करते हैं. जैसे - शैशवावस्था (जन्म से 2 वर्ष तक) आरंभिक बाल्यावस्था (2 से 6 वर्ष), उत्तर बाल्यावस्था (6 से 12 वर्ष) किशोरावस्था (12 से 18 वर्ष) युवावस्था (18 से 40 वर्ष), प्रौढ़ावस्था (40-60 वर्ष), और वृद्धावस्था (60 वर्ष के बाद). जीवन की इन अवस्थाओं का आधार हमारे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक विकास में आए बदलाव होते हैं. इस अवस्था विकास के क्रम में हमारी जिम्मेदारियां बदलती रहती है.

जीवन के सफ़र के साथ-साथ एक और सफ़र हमारे जीवन से जुड़ी होती है. यह है - शैक्षिक सफर. शिक्षा विज्ञानी इस सफ़र को भी अलग-अलग उद्देश्य और जिम्मेदारियों में विभाजित करते हुए अलग-अलग नाम से संबोधित करते हैं. जैसे – अनौपचारिक शिक्षा (वास्तविक जीवन अनुभव से परिवार, समाज में रहते हुए सीखना), औपचारिक शिक्षा (व्यवस्थित पाठ्यक्रम के माध्यम से शैक्षिक संस्थान में रहते हुए सीखना). औपचारिक शिक्षा को भी अलग-अलग स्तर में विभाजित किया गया है. जैसे – प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 5) उच्च प्राथमिक या पूर्व माध्यमिक (कक्षा 6 से 8) माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9 एवं 10) उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 11 एवं 12) उच्च शिक्षा (स्नातक, परास्नातक, शोध) आदि.

अपनी क्षमता, आवश्यकता और परिस्थिति के अनुरूप हम सभी अलग-अलग स्तर तक सफ़र कर पाते हैं. ये अलग बात है कि जागरूकता नहीं होने के कारण शैक्षिक जीवन में आगे बढ़ते हुए हम इस बात पर ध्यान नहीं दे पाते हैं कि हम शिक्षा के सफ़र के किस पड़ाव में हैं. सामान्यतः कोई बताने वाला भी नहीं होता है. ऐसे में एक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति के लिए या एक जिज्ञासु विद्यार्थी को शैक्षिक सफ़र के इन अवस्थाओं का ज्ञान अवश्य ही होना चाहिए. शिक्षा के अवस्थाओं पर पहुँचने से पूर्व यहाँ प्रयुक्त दो प्रमुख शब्दावली अनौपचारिक शिक्षा और औपचारिक शिक्षा को भी समझते हुए चलते हैं.

अनौपचारिक शिक्षा

अनौपचारिक शिक्षा से तात्पर्य एक ऐसी शिक्षा से है जिसे जीवन के अनुभवों से स्वाभाविक रूप से सीखा जाता है. जैसे अपने परिवार, समाज, दोस्तों के साथ रहते हुए, दूसरों को देखकर, सुनकर, अपने अनुभव, अपने गलतियों से सीखते हुए हम भाषा (व्याकरण हिस्से को छोड़कर), व्यवहार, जीवन जीने के तौर-तरीके, खेती करने से लेकर अलग-अलग प्रकार के काम सीखते हैं. इसे सीखने के लिए हमारे पास न तो कोई निर्धारित पाठ्यक्रम होता है, न ही परिवार, समाज के लोग व्यवस्थित रूप से कहीं कक्षा में बैठाकर सिखाते हैं, न ही उनके द्वारा हमारे सीखने के स्तर का आकलन या मूल्यांकन किया जाता है, और न ही इसके लिए परिवार या समाज की ओर से किसी प्रकार का प्रमाण पत्र दिया जाता है. बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक यह चलती रहती है.

औपचारिक शिक्षा

अनौपचारिक शिक्षा के विपरीत औपचारिक शिक्षा एक व्यवस्थित शिक्षा व्यवस्था होती है जिसका एक निर्धारित पाठ्यक्रम (क्या पढ़ाया जाएगा), निर्धारित शैक्षिक सत्र (एक/दो/तीन वर्ष) होता है. साथ ही सिखाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक द्वारा (प्रयोग, गतिविधि व शिक्षण अधिगम सामग्री का उपयोग करते हुए) व्यवस्थित तरीके से कक्षा में अध्यापन कराया जाता है, तत्पश्चात बच्चों के सीखने का आकलन किया जाता है, अंत में पाठ्यक्रम पूरा होने पर संबंधित संस्थान द्वारा प्रमाण पत्र दिया जाता है. क्रमबद्ध तरीके से यह स्तर बढ़ता जाता है. स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई इस औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत आती है. बच्चों में अपेक्षित कौशल का विकास जो बच्चे के साथ-साथ देश के विकास में भी योगदान दे, इसका मुख्य उद्देश्य है.

कौन बेहतर? अनौपचारिक या औपचारिक

हमारा सीखना जीवन पर्यंत चलता रहता है. शैक्षिक संस्थाओं में हम 3 से 35 वर्ष (आंगनबाड़ी से लेकर शोध करने तक) औपचारिक रूप से सीख रहे होते हैं जबकि इसके पूर्व और बाद का सीखना अनौपचारिक रूप से चलता रहता है. आवश्यक कौशल विकसित करने में दोनों का एक सामान महत्व है. 

औपचारिक शिक्षा के विभिन्न स्तर

उपरोक्त बातों से स्पष्ट है कि पहली कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत आते हैं. इस निर्धारित स्वरुप वाले पाठ्यक्रम को भी अलग-अलग स्तरों में विभाजित किया गया है –

प्राथमिक स्तर – औपचारिक शिक्षा का यह पहला स्तर है. ‘प्राथमिक’ शब्द का प्रयोग बुनियाद (नींव) के अर्थ में किया जाता है. इस स्तर में बच्चों में शिक्षा की बुनियाद रखने का कार्य किया जाता है. कक्षा 1 से 5 तक की शिक्षा इसके अंतर्गत आते हैं. इस स्तर की शिक्षा देने वाले विद्यालयों को प्राथमिक स्कूल के नाम से जाना जाता है. उदाहरण के लिए – शासकीय प्राथमिक शाला, बेमेतरा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्राथमिक स्तर को foundational (आंगनवाड़ी के 3 वर्ष एवं कक्षा 1, 2) और preparatory (कक्षा 3, 4, 5) स्टेज के अंतर्गत रखा गया है. इस स्तर पर बच्चों में भाषाई एवं गणितीय दक्षता, समाज एवं पर्यावरण से संबंधित अवधारणा विकसित करने के उद्देश्य से हिंदी, अंग्रेजी, गणित एवं पर्यावरण अध्ययन (छत्तीसगढ़ के संदर्भ में) से संबंधित न्यूनतम सीखने के प्रतिफल (Learning Outcomes) प्राप्त कर लेने की अपेक्षा होती है. अर्थात हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा में समझ के साथ पढ़ना-लिखना, दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले बुनियादी गणित (संख्या समझ, चार संक्रिया, ज्यामितीय आकृतियाँ, मापन आदि) से संबंधित समझ बनाने की नींव (बुनियाद) इस स्तर रखी जाती है ताकि अगले स्तर (उच्च प्राथमिक या पूर्व माध्यमिक) पर इन विषयों से संबंधित अमूर्त अवधारणाओं को बच्चे अच्छी तरह समझ पाएं. कक्षा 1 एवं 2 में बच्चों से जहाँ 2 भाषाओँ में पढ़-लिख पाने (डिकोडिंग), गणितीय अवधारणाओं, संक्रिया को समझ पाने की अपेक्षा होती है, वहीँ कक्षा 3,4,5 में किसी भाषा के प्रसंग को समझ के साथ पढ़ पाने, उस भाषा में अपने विचारों को मौखिक व लिखित रूप से अभिव्यक्त कर पाने की, 3, 4 या 5 अंकों से संबंधित संक्रिया को हल कर पाने की दक्षता प्राप्त करने की अपेक्षा होती है.   

उच्च प्राथमिक या पूर्व माध्यमिक स्तर -  यह प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर के बीच के कड़ी के रूप में काम करता है. कक्षा 6, 7 एवं 8 इसके अंतर्गत आते हैं. इस स्तर की शिक्षा देने वाले विद्यालयों को उच्च प्राथमिक/पूर्व माध्यमिक स्कूल के नाम से जाना जाता है. उदाहरण के लिए – शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला, बेमेतरा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इस स्तर को ‘मिडिल स्टेज’ नाम से संबोधित किया गया है. इस स्टेज में तीन भाषा विषय (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत), गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान विषय का व्यवस्थित अध्यापन कराया जाता है. वर्तमान में खेल, योग एवं कला शिक्षण जैसे विषयों को भी शामिल किया गया है. इस स्तर पर न केवल अलग-अलग विषयों के अलग-अलग शिक्षक की व्यवस्था शुरू होती है बल्कि शिक्षकों के शिक्षण का तरीका भी बदल जाता है. अलग-अलग विषयों से संबंधित अवधारणा को रटने की जगह उसके 'क्यों' और 'कैसे' समझने/समझाने पर जोर दिया जाता है. इस स्टेज में अपेक्षा यह रहती है कि बच्चा सिर्फ यह नहीं रटकर याद कर ले कि ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी’. बल्कि इस दिशा में सोचना शुरू करे कि ‘सिंधु घाटी सभ्यता से ऐसे क्या-क्या साक्ष्य, अवशेष मिले हैं जो इस बात को स्थापित करते हैं कि यह नगरीय सभ्यता थी’. अर्थात बच्चों को आलोचनात्मक चिंतन, तर्क करने पर जोर दिया जाता है. NCF – SE दस्तावेज में इस स्टेज में सभी विषयों के शिक्षण को रुचिकर बनाने के लिए कई उपाय बताए गए हैं.  

माध्यमिक स्तर – पूर्व माध्यमिक स्तर पार करने के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इस स्तर को secondary stage नाम से संबोधित किया गया है. कक्षा 9 एव 10 इसके अंतर्गत आते हैं. स्कूल के नाम कुछ इस तरह होते हैं – शासकीय माध्यमिक शाला/उच्च विद्यालय, बेमेतरा. पूर्व माध्यमिक कक्षा के विषयों को ही थोड़ी अधिक गहराई से पढ़ाया जाने लगता है. शिक्षा का यह स्तर उनके जीवन की दिशा तय करता है. पूर्व माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का उद्देश्य जहां जिज्ञासा जगाना होता है, वहीँ माध्यमिक स्तर पर इसका उद्देश्य थोडा व्यापक हो जाता है. किसी घटना को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जीवन से जोड़ते हुए विश्लेषित कर अपनी राय बनाने का कौशल विकास इस स्तर पर प्रमुख उद्देश्य हो जाता है.

उच्चतर माध्यमिक स्तर – उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने के पूर्व का स्तर है यह. इसके अंतर्गत कक्षा 11 एवं 12 आते हैं. अलग-अलग राज्यों में इसे इंटरमीडिएट भी कहा जाता है. इस स्तर पर बच्चा यह तय करता है कि उसे किस विषय को लेते हुए आगे बढ़ना है? इस स्तर पर उनके लिए तीन दरवाजे होते हैं – कला, विज्ञान और वाणिज्य. अपनी रूचि के विषय में वह गहराई में उतरने की शुरुआत करता है. इस स्तर पर बच्चे को स्वतंत्र चिंतन की ओर ले जाया जाता है. वह किसी घटना के कारण जानने के साथ-साथ समाज पर उसके दीर्घकालीन प्रभाव, उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए सरकार की नीति का मूल्यांकन करता है.   

उच्च शिक्षा – इस स्तर पर कोई बच्चा छात्र/छात्रा से आगे बढ़ते हुए विषय विशेषज्ञ बनने की शुरुआत करने के साथ-साथ अंजाम भी देता है. इसके अंतर्गत 3-4 वर्षीय स्नातक, 2 वर्षीय स्नातकोत्तर और नवीन ज्ञान का सृजन करने वाली शोध की डिग्री आती है. विद्यालय से हटकर इनकी पढ़ाई कॉलेज व विश्वविद्यालयों में होती है. यहाँ विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से सीखते हैं, शिक्षक/प्रोफ़ेसर केवल मार्गदर्शक की भूमिका में होते हैं.

इस तरह हमारे देश में शिक्षा का स्तरीकरण किया गया है.



Sunday, 27 September 2026

गुरुकुल से NEP 2020 तक: कैसे बदला भारत में शिक्षा का प्रबंधन?

वर्तमान में हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था को प्रबंधित करने के लिए अलग-अलग स्तर पर अधिकारी नियुक्त हैं. शिक्षा विभाग, राज्य, जिला, ब्लाक स्तर के शिक्षा अधिकारी के माध्यम से प्रबंधित हो रहा है. यहाँ एक सवाल उठता है कि क्या ये प्रबंधन व्यवस्था हमारे देश में प्राचीन काल से विद्यमान थी? क्या प्राचीन काल में भी ऐसे ऐसे अलग-अलग स्तर पर प्रबंधित करने वाले अधिकारी होते थे? जवाब है नहीं. प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षण संस्थाओं को प्रबंधित करने की कोई विशेष संगठन उपलब्ध होने के साक्ष्य नहीं मिलते हैं. शिक्षक सामान्यतः किसी मंदिर, मस्जिद या सार्वजनिक स्थान पर बच्चों को एकत्र कर पढ़ाते थे. राजा या सरकार की ओर से इस कार्य के लिए किसी भी प्रकार का मानदेय/वेतन उन्हें नहीं मिलता था. बल्कि बच्चों के अभिभावक की ओर से इसके बदले में उस शिक्षक को धन या अनाज प्राप्त होता था, विद्यार्थियों के भिक्षाटन कर राजस्व प्रबंध करने के उल्लेख भी मिलते हैं. इसके बरक्श वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो आज शिक्षकों को सरकार (केंद्र व राज्य) की तरफ से वेतन से लेकर अनेक प्रकार के भत्ते मिलते हैं, इनकी निगरानी के लिए संकुल, ब्लॉक, जिला स्तर पर अधिकारी नियुक्त किये गए हैं. ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर इस व्यवस्था की शुरुआत कब हुई? स्वतंत्रता के बाद या इसके पूर्व? जवाब है ब्रिटिश शासनकाल.

हमारे देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल से शुरू होती है. 1757 ई. में बंगाल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हो गया था. इसी क्रम में ब्रिटिश क्राउन का चार्टर एक्ट 1813 आया जिसके माध्यम से व्यापार और धन अर्जित कर ब्रिटिश क्राउन को भेजने के काम में लगे ईस्ट इंडिया कंपनी को शिक्षा (पाश्चात्य शिक्षा) के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी भी दी गई. इस अधिनियम के अनुसार भारत में शिक्षा के विकास के लिए प्रति वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी को इस कार्य में इसाई मिशनरियों से सहयोग लेने का भी प्रावधान इस एक्ट में था. फलस्वरूप मिशनरियों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा, यूरोपी (पश्चिमी) साहित्य, विज्ञान संबंधी ज्ञान के प्रसार की प्रक्रिया शुरू हुई. अपने प्रभावक्षेत्रों {बंगाल, मद्रास (वर्तमान चेन्नई) और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) प्रेसीडेंसी} में अपने देश (इंग्लैंड) जैसे विद्यालय स्थापित करने में रूचि ली. इसी क्रम में 1854 का wood’s Despatch से इन शालाओं के प्रबंधन की शुरुआत होती है. इस दस्तावेज में पहली बार शिक्षा के प्रशासन के लिए एक व्यवस्थित सरकारी ढांचा बनाने की स्पष्ट रूपरेखा दी गई. चूँकि उनके द्वारा स्थापित विद्यालयों में कई कक्षाएं होते थे, अलग-अलग कक्षाओं और विषयों को पढ़ाने के लिए अनेक अध्यापक होते थे. इसलिए इनके व्यवस्थित प्रबंध की आवश्यकता होती थी, इस आवश्यकता के फलस्वरुप ही उन्होंने हमारे देश में शैक्षिक प्रबंधन का क्रमबद्ध रूप से विकास किया. यहां प्रबंधन से तात्पर्य है किसी संगठन को संचालित व नियंत्रित करने वाले क्रियाकलाप.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 1948-49 के राधाकृष्णन आयोग, 1964-66 के कोठारी आयोग से लेकर भारत की तीसरी शिक्षा नीति (2020) के बीच जिला व स्थानीय स्तर पर शिक्षा प्रबंधन की व्यवस्था सुदृढ़ की गई. शुरुआत में में इन शिक्षा अधिकारियों की भूमिका विद्यालयों के निरीक्षण और प्रशासन तक सीमित थी, उनका ध्यान इस और ज्यादा रहता था कि ' स्कूल चल रहे हैं या नहीं? शिक्षक पढ़ा रहे हैं या नहीं? स्कूल की व्यवस्था प्रस्तावित नियमों के अनुसार चल रही है या नहीं? लेकिन 2020 शिक्षा नीति में शैक्षिक सहयोग (supportive supervision) और मॉनिटरिंग को अधिक महत्व दिया जाने लगा. अर्थात स्कूल या शिक्षक को अकादमिक सहयोग की जरूरत है तो अधिकारी न केवल उस स्कूल/शिक्षक के लिए ट्रेनिंग आयोजित करें बल्कि कक्षा में डेमो टीचिंग के माध्यम से अपेक्षित सहयोग करें.

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त पुस्तक/सामग्री

·       Charles Wood, ‘The Dispatch of 1854, on General Education in India’, London, Paragraph 15 – 21.

·       गुप्ता, डॉ. अलका, एस पी, ‘आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएं’ शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद, 2016




Wednesday, 19 August 2026

प्राचीन भारतीय शिक्षा की वैदिक पृष्ठभूमि एवं वेदों का स्वरूप

यह सर्वमान्य है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा की शुरुआत वेदों के अध्ययन से शुरू होती है. शुरुआत में यह श्रुति के रूप में थी बाद में इसे लेखबद्ध किया गया. अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएं’ शारदा प्रकाशन, इलाहाबाद (2016) में लेखक डॉक्टर एस.पी गुप्ता, डॉक्टर अलका गुप्ता अपना मत अभिव्यक्त करते हैं कि ‘प्रारंभ में वेद केवल एक ही था. भिन्न-भिन्न ऋषियों के द्वारा रचित मंत्रों और यज्ञ की विधि बताने वाले ब्राह्मणों का यह एक संग्रह था. उसी में जो मंत्र पद्य के रूप में आते उन्हें 'ऋक' कहते थे. गान रूप में गाए जाने वाले मंत्रों को 'साम' और गद्य रूप में पढ़े जाने वाले मंत्रों को 'यजु' कहा जाता था. प्रारंभ में सभी द्विज उनका अध्ययन करते थे. किंतु जब विद्वानों ने देखा कि संपूर्ण वेद का ग्रहण और धारण मनुष्य की शक्ति से बाहर होता जा रहा है. तब उन्होंने उस वेद को चार भाग में विभक्त कर दिया जिसे चार संहिताओं के रूप में आज हम देखते हैं’.

वेद का मुख्य विषय यज्ञ है. यज्ञ में यजमान और उसकी पत्नी के अतिरिक्त चार ब्राह्मण कार्यकर्ता आवश्यक होते हैं, जिन्हें 'ऋत्विक' कहा जाता है. उनके नाम होतृ, उदगातृ, अध्वर्यु, और ब्रह्मा हैं. जो देवताओं की स्तुति पढ़ता है, उसे होतृ कहा जाता है. गान के रूप में स्तुति करने वाला उदगातृ कहलाता है. अग्नि में आहुति देने वाला अध्वर्यु है, जो यज्ञ का प्रधान कार्यकर्ता होता है. इन तीनों के कार्यों का निरीक्षण करने वाले को 'ब्रह्मा' कहा जाता था. इन चारों के कार्यों को अलग-अलग बांट देने के लिए वेद को चार भागों में विभक्त किया गया, जिससे कि एक-एक भाग या संहिता पढ़ लेने से उससे संबंधित एक कार्य करने की योग्यता पूर्ण हो जाए. यह चार भाग हैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद.

केवल ऋग्वेद का अध्ययन कर लेने वाला होतृ बन सकता है, इसी प्रकार उदगातृ बनने के लिए केवल सामवेद पढ़ लेने की आवश्यकता है. यजुर्वेद संहिता का अध्ययन कर लेने से अध्वर्यु का कार्य चल जाता है. केवल ब्रह्मा के लिए चारों वेदों को पढ़ने की आवश्यकता होती है क्योंकि वह तीनों ‘ऋत्विक’ का निरीक्षक होता था. यदि उनके कार्यों को वह स्वयं न जानता हो तो निरीक्षण कैसे करेगा? इसके अतिरिक्त शांति, पुष्टि, काम करने के लिए उन्हें अथर्ववेद पढ़ने की भी आवश्यकता होती थी, यज्ञ में ब्रह्मा वही हो सकता है जो चतुर्वेदी हो. स्पष्ट है इन्हीं कारणों से हमें कहीं तीन तो कहीं चार वेद बताए जाते हैं.


Tuesday, 18 August 2026

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड(Operation Blackboard) : प्राथमिक शिक्षा में बदलाव की नींव

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नवनिर्मित भारतीय संविधान द्वारा 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने का दायित्व राज्यों को सौंपा गया था. लेकिन संविधान लागू होने के 3 दसक बीत जाने तक भी देशभर के राज्य सरकार इस व्यवस्था को अपनाने में असमर्थ रहा. हालाँकि इन तीन दसकों के दौरान हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा का प्रसार काफी योजनाबद्ध तरीके से हुआ. फलस्वरुप बड़ी संख्या में प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना हुई. विद्यालयों की स्थापना के दौरान वहां आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया. विद्यालयों की संख्या में इस वृद्धि का शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. कहीं विद्यालयों के अपने भवन नहीं थे, तो कहीं विद्यालयों में श्यामपट्ट नहीं थे, कहीं पुस्तकालय की सुविधा नहीं थी तो कहीं खेल के मैदान नहीं थे. पेय जल, शौचालय मात्र 11 % विद्यालयों में ही उपलब्ध थी. भारत सरकार द्वारा 1985 में जारी दस्तावेज 'शिक्षा की चुनौती : नीति संबंधी परिप्रेक्ष्य' में प्राथमिक शिक्षा की इन कमियों को चिन्हित करते हुए इसमें सुधार करने की आवश्यकता पर बल दिया गया.

यही कारण है कि वर्ष 1986 ईस्वी में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जब दूसरी शिक्षा नीति (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986) आई, तो इस दस्तावेज में सभी वर्गों के लिए शिक्षा के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया गया. इस दस्तावेज में प्रत्येक स्कूल में आवश्यक सुविधाएं व शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने की बात थी. शिक्षा नीति की बातों (प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक सुविधा की व्यवस्था) को ध्यान में रखते हुए 1987 ई. में Operation Blackboard कार्यक्रम की शुरुआत की गई. स्कूल में सीखने का उचित वातावरण मिले इसके लिए प्रत्येक स्कूल में निम्न सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया -

·       प्रत्येक स्कूल में कम-से-कम दो उपयोगी कक्षाएं या कमरे.

·       कम से कम दो शिक्षक, ताकि विद्यालय केवल एक शिक्षक पर निर्भर ना रहे.

·       आवश्यक शिक्षण सामग्री (TLMs)

·       बच्चों के सीखने के लिए शैक्षिक उपकरण और सामग्री.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में वर्ष 1992 में किए गए संशोधन में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के क्षेत्र को उच्च प्राथमिक शालाओं तक विस्तृत कर दिया गया.


अध्ययन हेतु प्रयुक्त पुस्तक/सामग्री

·       गुप्ता, डॉ. अलका, एस पी, ‘आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएं’ शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद, 2016