Tuesday, 18 August 2026

Operation Blackboard : स्कूल में न्यूनतम आधारभूत सुविधाएं सुनिश्चित करने का शुरूआती प्रयास

सन 1986 ईस्वी में राजीव गांधी के नेतृत्वा वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में देश को आगे ले जाने के उद्देश्य से दूसरी शिक्षा नीति (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986) लाई गई. इस दस्तावेज में सभी वर्गों के लिए शिक्षा के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया गया. इस दस्तावेज में प्रत्येक स्कूल में आवश्यक शैक्षिक सुविधाएं व शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने की बात थी. इस दौर में बहुत से प्राथमिक शालाओं में आवश्यक संसाधनों (पर्याप्त कक्षाकक्ष, शिक्षक, TLM  की कमी थी. इन बातों को ध्यान में रखते हुए 1987 ई. में Operation Blackboard योजना की शुरुआत की गई. स्कूल में सीखने का उचित वातावरण मिले इसके लिए प्रत्येक स्कूल में निम्न सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया था -

·       प्रत्येक स्कूल में कम-से-कम दो उपयोगी कक्षाएं या कमरे.

·       कम से कम दो शिक्षक, ताकि विद्यालय केवल एक शिक्षक पर निर्भर ना रहे.

·       आवश्यक शिक्षण सामग्री (TLMs)

·       बच्चों के सीखने के लिए शैक्षिक उपकरण और सामग्री.


Monday, 17 August 2026

NIPUN Bharat Mission: 21वीं सदी के नागरिक निर्माण की ओर एक कदम

NIPUN (National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy) Bharat Mission भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण शिक्षा पहल है, जिसकी शुरुआत, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जुलाई 2021 में हुई. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रावधानों को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई जिसका मुख्य उद्देश्य है कक्षा 3 तक प्रत्येक बच्चों में Foundational Literacy and Numeracy (FLN) अर्थात बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान सुनिश्चित करना। वर्ष 2026-27 तक इस लक्ष्य प्राप्ति का समय निर्धारित किया गया है. यह कक्षा 3 तक प्रत्येक बच्चे (सरकारी या निजी स्कूल का) में दो प्रकार की दक्षताएं सुनिश्चित करने की बात करता है –

(1)    FL (Foundational Literacy) अर्थात बुनियादी साक्षरता –

प्रत्येक बच्चे में बुनियादी साक्षरता की दक्षता भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, या अन्य स्थानीय भाषा) विषय के प्रभावी अध्ययन से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. इसके अंतर्गत कक्षा 3 तक प्रत्येक बच्चे से अपेक्षित है कि वह किसी चित्र को देखकर, उसका अवलोकन कर मौखिक एवं लिखित रूप से वह बता पाए कि चित्र में क्या-क्या (वस्तुओं के नाम) है? चित्र में छिपे संदेश को मौखिक या लिखित रूप से बता पाए. किसी पाठ/कविता/कहानी या छोटे प्रसंग को पढ़ने के बाद वह बता पाए कि यह कविता/कहानी/प्रसंग किससे संबंधित है, इसमें कौन-कौन से पात्र हैं? उनके बीच क्या संवाद हो रहा है? कविता/कहानी/प्रसंग में प्रयुक्त वाक्यों की क्रमबद्धता बता पाए. कविता/कहानी/प्रसंग में प्रयुक्त परिचित शब्दों का अपने संदर्भ (दैनिक जीवन) में उपयोग कर पाए, अपरिचित शब्दों के अर्थ बता पाए. उस कविता/कहानी/प्रसंग को अपनी कल्पना से आगे बढ़ा पाए, उसके अंत को एक अलग मोड़ दे पाए. अपने दिमाग में चल रही बातों (विचारों) को लेखबद्ध कर पाए. सोचकर लिख पाने के कौशल का उपयोग करते हुए कुछ नए कविता-कहानी का सृजन कर पाए.

(2)    FN (Foundational Numeracy) अर्थात बुनियादी संख्याज्ञान –

प्रत्येक बच्चे में बुनियादी संख्याज्ञान की दक्षता गणित विषय के प्रभावी अध्ययन से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. इसके अंतर्गत तीसरी कक्षा के बच्चों से अपेक्षित है कि कक्षा के अंत तक बुनियादी गणित के कौशल से युक्त हों. अर्थात गणितीय अवधारणाओं जैसे संख्या पूर्व अवधारणा (रंग, आकार, माप, स्थिति, वर्गीकरण, एक-एक की संगति, तुलना करना आदि), संख्या समझ (संख्या नाम एवं उसके लिए निर्धारित संकेत, गिनती) संक्रिया (जोड़ना, घटाना, गुणा, भाग) आकृति एवं स्थानिक समझ, मापन (लम्बाई, मानक व अमानक इकाइयों की समझ), पैटर्न, डाटा प्रबंधन, गणितीय सोच का मौखिक या लिखित प्रस्तुतीकरण, गणित का दैनिक जीवन में उपयोग. इसे एक उदाहरण से हम बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. किसी पहली कक्षा के बच्चे को हमने 10 आम दिए और उनसे हम निम्न सवाल पूछे –

·       आम का आकार कैसा है? गोल है, त्रिकोण है या चौकोर?

·       आम को गिन कर और लिखकर बताओ कि आपके पास कितने आम हैं?

·       आपके पास 10 आम हैं 2 और आम मैंने आपको दे दिए अब आपके पास कितने आम हैं?

·       10 आम में से 5 आम अपने दोस्त को दे दो. अब कितने आम आपके पास बचे?

·       10 आम को अपने 1 दोस्त से बांटो. दोनों को कितने-कितने आम मिलेंगे?

·       एक हाथ में 2 आम दुसरे हाथ में 3 आम रखो अब तुलना कर बताओ कौन हल्का है कौन भारी?

दूसरी व तीसरी कक्षा के बच्चों से उनके कक्षा अनुरूप निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप सवाल को modify कर पूछ सकते हैं – जैसे – कक्षा 3 के बच्चों से अपेक्षा है कि 1 से 9999 तक की संख्या से संबंधित संक्रिया हल करना). इस तरह तीसरी कक्षा का कोई बच्चा यदि 1 से 4 अंकों से संबंधित सवालों के सही जवाब दे देते हैं तो हम कह पाएँगे कि उस बच्चे ने FN (Foundational Numeracy) skill हासिल कर लिया है.  

NIPUN Bharat Mission के अंतर्गत उपरोक्त दोनों विषयों से संबंधित दक्षताओं की प्राप्ति पर इसलिए भी जोर दिया गया कि ये दक्षताएं ही आगे की कक्षा के अलग-अलग अवधारणाओं पर समुचित समझ बनाने का काम करते हैं. बिना इसके पर्यावरण अध्ययन, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं को समझ पाना बच्चों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों का क्षमतावर्द्धन भी इसका एक प्रमुख उद्देश्य है. शिक्षकों से अपेक्षा है कि बच्चों में उपरोक्त दोनों विषयों से संबंधित दक्षता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे शैक्षिक विधियों (pedagogy), प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करें जिससे बच्चे खेल-खेल में भरपूर आनंद लेते हुए सीख पाएं. जैसे – खेल आधारित शिक्षण, गतिविधि आधारित शिक्षण, कहानी एवं कविता के माध्यम से शिक्षण, अनुभवात्मक शिक्षण, बाल केंद्रित शिक्षण, TLM का प्रयोग आदि.

एक उदाहरण के माध्यम से इसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है - भाषाई दक्षता लाने के लिए कविता/कहानी को रुचिपूर्ण तरीके से हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव, के साथ सुनाएं (खेल एवं गतिविधि आधारित शिक्षण), कविता/कहानी के पात्रों, प्रमुख घटनाओं पर बच्चों को अपने विचार अभिव्यक्त करने के अवसर दें (बाल केंद्रित शिक्षण). उस कविता/कहानी को Stick Puppet या Hand Puppet के माध्यम से सुनाएं (TLM का प्रयोग). बच्चों से उस कविता/कहानी का नाट्य रूपांतरण करवाएं ((खेल एवं गतिविधि आधारित शिक्षण).

इसी तरह गणितीय दक्षता विकसित करने के लिए किसी भी अवधारणा पर काम करने से पूर्व उससे संबंधित कोई कविता कहानी सुनाएं, या बातचीत करें (कहानी एवं कविता के माध्यम से शिक्षण), बातचीत करते हुए बच्चों को ठोस वस्तुओं की सहायता से उसे अवधारणा तक ले जाएं उदाहरण के लिए अलग-अलग आकर से संबंधित ठोस वस्तु जैसे गोला, बेलन, घन, घनाभ आदि मॉडल पर टॉर्च जलाकर उसकी परछाई का अवलोकन करवाना (TLM का प्रयोग, अनुभवात्मक शिक्षण). धारिता पर काम करते हुए पहले अमानत इकाइयों से पानी को मापना, फिर मानक इकाई से पानी को मापते हुए दोनों के बीच के अंतर समझते हुए धारिता से संबंधित मानक इकाइयों की आवश्यकता को समझना (TLM का प्रयोग, अनुभवात्मक शिक्षण).

उपरोक्त बातों से यह स्पष्ट है कि NIPUN Bharat Mission भाषाई एवं गणितीय अवधारणाओं को rote learning की जगह समझ के साथ सीखने पर बल देता है. इस तकनीक से यदि बच्चों के साथ काम किया जाए तो वे भाषा शिक्षण के उद्देश्यों को समझ पाएँगे, भाषा एवं गणित विषय के अमूर्त अवधारणाओं को मूर्त वस्तुओं के माध्यम से समझ पाएँगे, किसी भी घटना के पीछे निहित कार्य-कारण संबंध को जान पाएँगे जिससे वे logical thinking की ओर अग्रसर हो रहे होंगे, गणित के सवालों को हल करते हुए मानक कलन विधि (standard algorithm) के पीछे निहित तर्क को समझ सकेंगे, अपनी बातों के समर्थन में तर्क देना सीख पाएंगे. इस तरह यह बच्चों में उन भाषाई एवं गणितीय कौशल विकसित करने की बात करता है, जो हमारे बच्चों को 21वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.    


Sunday, 16 August 2026

कब कहेंगे कि बच्चे ने Foundational Literacy दक्षता प्राप्त कर लिया है?

2020 शिक्षा नीति में उल्लेखित बातों/निर्देशों को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से जुलाई 2021 में भारत सरकार द्वारा NIPUN (National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy) Bharat Mission की शुरुआत की गई. तब से FLN शब्द का व्यापक प्रयोग किया जाने लगा. NIPUN Bharat Mission का यह लक्ष्य निर्धारित किया गया कि प्रत्येक बच्चा कक्षा 3 के अंत तक Foundational Literacy and Numeracy (FLN) की दक्षता हासिल कर लें. ऐसा इसलिए कि FLN skill किसी भी बच्चे की आगे की शिक्षा के लिए मजबूत नींव तैयार करने का काम करता है. यहाँ FLN में दो शब्द शामिल है literacy (साक्षरता) और numeracy (संख्या ज्ञान). इस आलेख में हम foundational literacy (बुनियादी साक्षरता) को लेकर अपनी समझ विकसित कर रहे होंगे.  

किसी भाषा में foundational literacy (बुनियादी साक्षरता) skill प्राप्त करने से तात्पर्य है बच्चों में उस targeted भाषा संबंधी ऐसी दक्षता विकसित करना, जिससे कि वह उस भाषा से संबंधित किसी भी वाक्य या प्रसंग को पढ़कर उसका अर्थ ग्रहण करते हुए यह समझ बना सके कि कि उसे वाक्य या प्रसंग में क्या कहा/निर्देशित किया जा रहा है? इस वाक्य या प्रसंग में निहित बात को वह उसी भाषा में या अपनी भाषा में बोलकर या लिखकर अभिव्यक्त कर सके. इसके अतिरिक्त और भी अपेक्षाएं हैं कि उस भाषा के शब्दों में निहित ध्वनियों, वर्णों, मात्राओं की पहचान कर सके. साथ ही इस कौशल का उपयोग वह दैनिक जीवन में कर सके.

इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं. तीसरी कक्षा के किसी एक बच्चे को हमने एक छोटा सा प्रसंग पढ़ने को दिया –

‘एक चिड़िया थी. उसे कहीं से एक मोती मिल गया. उसने उस मोती को अपने नाक में पहन लिया. और एक राजा के महल पर जा बैठी. राजा को देखकर एक गाना गाना शुरू कर दी ‘मैं राजा से बड़ी, मेरी नाक में मोती’ ...

इस 5-6 वाक्यों वाले प्रसंग को हम एक बार और पढ़ने के लिए कहेंगे. प्रसंग को 2 बार पढ़ने के बाद हम उस बच्चे से कुछ सवाल करेंगे. जैसे –

·       चिड़िया को क्या मिला?

·       मोती को नाक में पहनने के बाद चिड़िया कहाँ चली गई?

·       आप राजा की जगह होते तो चिड़िया का गाना सुनकर आपको कैसा लगता? आप क्या करते?

·       आपको मोती मिल जाए तो आप क्या करेंगे?

यदि बच्चा लोग सवालों के जवाब मौखिक रूप से तुरंत दे देता है, साथ ही इन सवालों के उत्तर यदि वह लिखित रूप में भी अभिव्यक्त कर पा रहा है (विशेष रूप से कल्पना आधारित सवाल) तो हम कह पाएंगे कि यह बच्चा किसी प्रसंग को समझ के साथ पढ़ पा रहा है. उसने बुनियादी साक्षरता का कौशल प्राप्त कर लिया है.

2020 शिक्षा नीति से पूर्व ‘literacy’ शब्द को केवल पढ़ने और लिखने की क्षमता के लिए use किया जाता था. लेकिन आरंभिक शिक्षा पर लगातार शोध से एक समझ बनी कि किसी भाषा में शब्द-वाक्य केवल पढ़-लिख पाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे समझना भी उतना ही आवश्यक है. तब से foundational literacy से मतलब समझ के साथ पढ़ना-लिखना समझा जाने लगा है.

Monday, 10 August 2026

नीरस कविता शिक्षण को आकर्षक कैसे बनाएं?

आंगनबाड़ी से लेकर 10वीं बोर्ड परीक्षा तक के सफ़र में हम कई भाषाएं सीखते हैं. जैसे – हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत आदि. शालाओं में भाषा शिक्षक द्वारा साहित्य के कई विधाओं जैसे कहानी, कविता, निबंध, जीवनी, नाटक, यात्रावृत्तांत, व्यंग्य आदि के माध्यम से लक्षित भाषा में सुनने, बोलने, पढ़ने, लिखने के साथ-साथ उस भाषा में कल्पना कर विचार अभिव्यक्त करने का कौशल सिखाया जाता है. इस प्रक्रिया में कहानी के बाद बच्चों के बीच यदि कोई अन्य लोकप्रिय विधा है, तो वह है कविता. आंगनबाड़ी से कविता को हाव-भाव के साथ गाने का जो अनुभव बच्चों को मिलता है उसका सकरात्मक प्रभाव कक्षा 1 में सामान्यतः देखने को मिलता है. लेकिन यह बहुत दिनों तक रह नहीं पाता है. कुछ गिनती के शिक्षकों को छोड़ दें तो अधिकाँश भाषा शिक्षक ऐसे देखने को मिलते हैं जो पाठ्यपुस्तक में दी गई कविता को भी लयबद्ध, हाव-भाव व आवाज़ के उतार चढ़ाव के साथ गाने में झिझक महसूस करते हैं.

शुरुआती कक्षा की कविताओं का यदि हम अवलोकन करें तो बच्चों को आनंद के साथ भाषाई कौशल विकसित करने के बहुत से तत्व मौजूद मिलेंगे जैसे - कविताएं तुकबंदी युक्त मिलेंगे, जिन्हें लयबद्ध गाने  में बच्चों को आनंद आता है. यहाँ तुकबंदी से तात्पर्य है किसी कविता की दो क्रमबद्ध पंक्तियों के अंत में ऐसे शब्दों का प्रयोग जिनका अंतिम शब्द समान ध्वनि वाले हों. उदाहरण के लिए कक्षा 1 की एक कविता को देख सकते हैं -

छह साल की छोकरी,

भरकर लाई टोकरी.

टोकरी में आम है,

नहीं बताती दाम है.

उपरोक्त कविता को यदि हम देखें तो इसकी वाक्य संरचना लेखक द्वारा इस प्रकार बनाया गया है कि पंक्तियों के अंत में ‘छोकरी, टोकरी’ एवं ‘आम है, दाम है’ जैसे समान तुकबंदी वाले शब्द आ रहे हैं. इन दोनों वाक्यों की अंतिम ध्वनि मिलती जुलती है. बच्चों को इन्हें गाने में बहुत आनंद आता है.

क्यों जरूरी है लयबद्ध होकर गाना?

किसी कविता पर काम कर रहे शिक्षक से यह अपेक्षा होती है कि बच्चों को यह मॉडलिंग कर बताएं कि किसी कविता को गाते कैसे हैं? अर्थात किसी कविता को केवल जैसे तैसे पढ़कर वह पाठ पूरा करने की जगह उस कविता को पहले खुद बेहतर तरीके से समझते हुए उसे बच्चों के साथ, पूरी रूचि के साथ, हाव – भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ गाएं. प्रत्येक बच्चे को इस प्रक्रिया में शामिल करें. हाव-भाव और आवाज़ के उतार चढ़ाव के साथ गाने का यह लाभ है कि बच्चे प्रत्येक पंक्तियों से निकलने वाले अर्थ तक आसानी से पहुँच पाते हैं. छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों में ‘शिक्षकों से कुछ बातें’ खंड में इस बिंदु पर जोर देते हुए अपेक्षा की गई है कि शिक्षक कविता व कहानी को हाव-भाव अथवा उतार-चढ़ाव के साथ सुनाने का अभ्यास करें. 

इसके साथ ही कविता में प्रयुक्त सामान तुक वाले शब्दों की ओर अवश्य ही ध्यान दिलाया जाना चाहिए क्योंकि एक तो समान तुक वाले शब्दों को बोलने व गाने में बच्चों को आनंद आता है, जिसके फलस्वरूप बोल रहे शब्दों को, दैनिक दीवान में उनकी उपयोगिता को आत्मसात कर रहे होते हैं, उन शब्दों के उच्चारण को भी बेहतर तरीके से समझ रहे होते हैं. 


Friday, 7 August 2026

भाषा शिक्षण की पद्धतियाँ

प्राथमिक शालाओं में कक्षा पहली से पांचवीं तक हिंदी भाषा शिक्षण कविता, कहानी जैसे अनेक विधाओं के माध्यम से कराई जाती है. यह शिक्षण मुख्यतः पाठ्यपुस्तक पर केंद्रित होता है. दो अलग अलग दौर (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एवं 2020) के पाठ्यपुस्तकों को यदि विश्लेषित किया जाए तो तो इनमें भाषा शिक्षण की दो पद्धतियाँ दृष्टिगत होती हैं - (1) वर्णमाला पद्धति – जिस पद्धति से हम सभी अर्थात 2018 से पूर्व के बच्चों ने हिंदी भाषा पढ़ना-लिखना सीखा. इस पद्धति में पढ़ने की शुरुआत हिंदी वर्णमाला (स्वर एवं व्यंजन) से करते हुए बिना मात्रा वाले शब्द, अलग-अलग मात्राओं/ध्वनियों वाले शब्द पर समझ बनाते हुए शिक्षक कुछ परिचित शब्द, तत्पश्चात अपरिचित शब्दों की समझ के साथ पठन कराते हुए अंत में वाक्य पठन की ओर बढ़ते थे.

दूसरी पद्धति है (2) संदर्भ पद्धति – जिस पद्धति से पढ़ाने के लिए 2018 के बाद छत्तीसगढ़ के कक्षा 1 का पाठ्यपुस्तक निर्मित किया गया था. इस पाठ्यपुस्तक में शुरुआत एक मजेदार बालगीत ‘छह साल की छोकरी’ (शीर्षक - आम की टोकरी) से की गई है. पूर्व की तरह ही अपेक्षा यह थी कि शिक्षक इस मजेदार बालगीत को हाव-भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ सुनाते/वाचन करते हुए, बच्चों को आनंद लेने की प्रक्रिया में शामिल करें, तत्पश्चात बालगीत में प्रयुक्त किसी परिचित शब्द के माध्यम से उस शब्द की बनावट (शब्द को बोर्ड पर लिखते हुए) उसमें प्रयुक्त हुई ध्वनियों पर बात करते हुए किसी वर्ण तक पहुंचा जाए. इससे पूर्व पाठ में दिए गए चित्रों को देखकर समझने (लोगोग्राफिक पठन) और मौखिक रूप से अभिव्यक्त करने संबंधी भी अपेक्षा थी.

पाठ्यपुस्तक के अवलोकन से इतना तो पता चला कि यह तकनीक भाषा सिखाने की पारंपरिक तकनीक से अलग एक प्रयोग था. लेकिन वर्णमाला पद्धति की जगह इस सन्दर्भ पद्धति को लागू करने के पीछे निहित तर्क आज तक समझ नहीं आया. आज अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘पाठशाला : भीतर और बाहर’ के एक आलेख (संवाद) ‘क्या सभी बच्चों को स्कूल में गणित सिखाना चाहिए?’ को पढ़ते हुए इसके पीछे निहित तर्क समझ आया.

संवाद करते हुए भाषाविद आलोक तिवारी कहते हैं, ‘बच्चों को सबसे पहले भाषा सिखाने की जरूरत है. उस भाषा का व्याकरण बाद में. अर्थात कबूतर पहले बताने की जरुरत है, ‘क’ बाद में’. भाषा सिखाने की शुरुआत भी मूर्त रूप में होना चाहिए. यही कारण है कि तब से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यपुस्तक के डिजाईन होने के बीच के समय में प्रशिक्षणों में वर्णमाला पद्धति की जगह सन्दर्भ पद्धति के साथ काम करने को जोर दिया गया.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बच्चों को भाषा सिखाने के लिए पारंपरिक तकनीक की जगह यह पद्धति कहीं ज्यादा असरदार है जो बच्चों को सोचने के साथ साथ अपने पूर्व अनुभव का उपयोग करते हुए अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के मौके देता है. साथ ही यह पद्धति शिक्षकों को मोडलिंग कर बच्चों को जल्दी सीखने के मौके देती है.

Saturday, 16 May 2026

30 की उम्र के बाद आहार नियंत्रण: Diabetes से बचाव का सबसे जरूरी कदम

वर्ष 2026 की शुरुआत एक ऐसे न्यूज़ के साथ हुई जिसने मेरे जीवन जीने के तरीके को बदल दिया। अनियमित खान पान को नियमित कर दिया। समोसा, कचौरी, जलेबी, केला व अन्य मिठाई, जो मेरा प्रिय हुआ करता था, को हमेशा के लिए मुझे दूर कर दिया। स्कूल विजिट के दौरान अचानक से मुझे घबराहट का एहसास हुआ। किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए बिना देर किये पास स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दाढ़ी (बेमेतरा, छत्तीसगढ़) में चिकित्सकीय परामर्श लिया। जांच में डॉक्टर ने हाई ब्लड प्रैशर (High Blood Pressure) एवं डायबिटीस (Diabetes) की पुष्टि किया। जांच से आधे घंटे पहले एक समोसा खाया था यह मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं था। 40 वर्ष की उम्र, दो छोटे-छोटे बच्चे (एक की उम्र 5 वर्ष, दूसरे की 3 माह), नाममात्र बैंक बैलेंस से लेकर और भी बहुत कुछ मेरी दिमाग में अगले एक माह तक घूमते रहे। अच्छी बात ये थी कि इन चिंताओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इन्हें दूर करने का हर संभव उपाय किया। कभी-कभी के धूम्रपान छोड़ने से लेकर प्रतिदिन के Brisk Walk को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाया।

            एक बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है – आवश्यकता आविष्कार की जननी है। इस रोग से पीछा छुड़ाने की इच्छा/जिद ने मुझे diabetes एवं blood pressure के बारे में अधिक से अधिक जानने की आवश्यकता जागृत किया। फलस्वरूप डॉक्टर से लेकर chat GPT जैसे AI प्लैटफ़ार्म का भरपूर उपयोग किया इस बीमारी को गहराई से जानने-समझने के लिए। चिकित्सक से ज्यादा सहयोग तो नहीं मिला लेकिन AI ने जरूर थोड़ी बहुत जिज्ञासा शांत की। जिज्ञासा इसलिए भी थी कि इस रोग से लड़ने के लिए इसके प्रत्येक पहलू की जानकारी प्राप्त करने को आवश्यक कदम मानता था। इससे संबंधित असीमित जिज्ञासा ने मुझे इस पुस्तक (डायबिटीस, हाई ब्लड प्रेसर दूर रखिए जीवन भर) तक पहुंचाया। जहां तक मुझे याद है इस पुस्तक को मैंने student life (Ph.D.) के दौरान 2018 के आसपास वर्धा (महाराष्ट्र) खरीदा था अपने पिताजी को गिफ्ट करने के लिए (क्योंकि वह भी diabetes patient थे, और मेरी दिली इच्छा थी उनको यह पुस्तक भेंट करूँ ताकि वे इसे पढ़कर diabetes के एक-एक पहलू को समझते हुए उसके नियंत्रण के हरसंभव प्रयास कर सकें)। हालांकि यह हो नहीं सका अलग-अलग कारणों से। Diabetes को समझने के लिए इससे संबंधित एक पुस्तक मैंने ऑनलाइन ऑर्डर भी किया। उसके आने के पूर्व ही एक दिन अचानक से यह पुस्तक मुझे मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में दिख गया। बस फिर क्या था – व्यस्त दिनचर्या में थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर अपनी जिज्ञासा शांत किया। डॉ. धीरेन गाला, डॉ. संजय गाला लिखित नवनीत पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 184 पृष्ठों की यह पूरी पुस्तक दो भागों में बंटी है। दोनों ही भाग बहुत ही उपयोगी है। पहला भाग जहां diabetes से संबंधित है, दूसरा भाग हाई ब्लड प्रेसर (High Blood Pressure) से। दूसरे भाग की बात फिर कभी कर रहे होंगे। पहले भाग को पढ़ने के बाद बहुत हद तक मेरी असीमित जिज्ञासा शांत हुई। जैसे -

1.      डायबिटिस (मधुमेह) से तात्पर्य क्या है?

जीवाणुजन्य रोग के विपरीत डायबिटिस (मधुमेह/मधुप्रमेह) एक संस्कृतिजन्य (disease of civilization) रोग है जो इन्स्युलिन (insulin) नामक एक हॉरमोन (Harmon) की कमी से होता है। इस रोग का सीधा संबंध हमारे शरीर के पैनक्रियाज नामक ग्रंथि से है। इस ग्रंथि में दो कोष – अल्फा कोष एवं बीटा कोष होते हैं। बीटा कोष इंसुलिन बनाते हैं। श्रमरहित जीवन, अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट व शर्करायुक्त खाद्य पदार्थों के सेवन अर्थात अयोग्य रहन-सहन का परिणाम है यह रोग। यह संक्रमण से फैलने वाला रोग तो नहीं है लेकिन किसी को यदि यह रोग हो जाता है तो आनुवांशिक/वंशपरंपरागत बढ़ता जाता है।

            मधुमेह दो प्रकार के होते हैं, जिसे type 1 और type 2 मधुमेह कहा जाता है। कम उम्र में ही इंसुलिन की कमी के कारण उत्पन्न होने वाला मधुमेह Type 1 एवं (2) शरीर में इंसुलिन के विरुद्ध प्रतिकार (insulin resistance) के परिणामस्वरूप होने वाला मधुमेह Type 2 कहलाता है। प्रथम प्रकार के मधुमेह को बाल्यावस्था का मधुमेह कहा जाता है। जबकि दूसरे प्रकार के मधुमेह को प्रौढ़ावस्था का मधुमेह कहा जाता है। इंसुलिन की कमी के कारण या जब शरीर तैयार इंसुलिन का उपयोग नहीं कर पाता है तो खून में शर्करा की मात्रा असामान्य ढंग से बढ़ जाती है। ऐसे में हमारा शरीर खून में संचित शर्करा को अंततः पेशाब के माध्यम से निकालने लगती है। इस व्याधि/रोग को ही मधुमेह कहा जाता है। यह एक जीवन भर का रोग है। जिसे ठीक नहीं किया जा सकता। लेकिन उचित उपायों से उसे नियंत्रण में रखा जा सकता है। उसके दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है।

2.      इंसुलिन क्या है?

इंसुलिन हमारे शरीर के पैनक्रियाज ग्रंथि से निकलने वाला एक अंतःस्त्राव या हार्मोन है जो रक्त (खून) में स्थित शर्करा/ग्लूकोज की मात्रा को शरीर के एक-एक कोशिका में पहुंचा कर कम/नियंत्रित करता है। पेंक्रियाज़ में दो कोष क्रमशः अल्फा एवं बीटा कोष होता है। बीटा कोष से इंसुलिन का स्त्राव होता है। हमारे शरीर में मौजूद करोड़ों कोशिका उस ग्लूकोज से शरीर के लिए ऊर्जा बनाती है। यदि खून में ग्लूकोज की मात्रा कोषों की आवश्यकताओं की अपेक्षा अधिक हो जाता है तो इंसुलिन उसका रूपान्तरण ग्लायकोजेन या चर्बी में करके उसका संग्रह यकृत या चर्बी के कोषों में करता है। यह शरीर में प्रोटीन के निर्माण के लिए भी सहायक होता है। शरीर में यदि इसकी कमी हो जाए या शरीर की कोशिका इसका प्रतिरोध करने लगे तो रक्त में शर्करा की मात्रा अत्यधिक हो जाती है। जिससे मधुमेह नामक रोग की चपेट में आ जाता है।    

3.      मधुमेह रोगियों का वजन कम क्यों होता जाता है?

इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध के कारण रक्त में स्थित ग्लूकोज शरीर के अलग-अलग भागों में नहीं जा पाता है। न ही ग्लायकोजेन (चर्बी) में उसका रूपान्तरण हो पाता है। ऐसे समय में शरीर अपने भीतर संग्रहित चर्बी और प्रोटीन का विघटन कर उन्हें निश्चित कोषों तक पहुंचाने का प्रयत्न करता है। इस जमा चर्बी के नष्ट होने से मधुमेह के रोगी का वजन घटने लगता है।

4.      मधुमेह रोगियों को बार-बार पेशाब क्यों लगता है?

खून में जब ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है और इंसुलिन प्रतिरोध के कारण कोशिका तक वह पहुँच नहीं पाता है तो शरीर यकृत या चर्बी कोषों में मौजूद चर्बी का बहुत तेजी से विघटन कर कोशिका तक पहुंचाने का प्रयास करता है। इस विघटन से शरीर में कीटोन द्रव्य उत्पन्न होता है। अम्लीय होने के कारण ये कीटोन रक्त को विषाक्त बनाते हैं। इन बड़े मात्रा में मौजूद विषैले किटोन द्रव्यों को शरीर पेशाब के माध्यम से शरीर के बाहर निकालने का प्रयत्न करता है। इस कारण रोगी को बार-बार पेशाब लगती है।

5.      किसी व्यक्ति को मधुमेह होने के क्या कारण हैं?

किसी व्यक्ति के मधुमेह से ग्रसित होने के पीछे कोई एक कारण नहीं होता है। बल्कि मधुमेह होना कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे –

·       आनुवांशिक कारण – माता पिता को यदि मधुमेह है तो बच्चे को भी होने की अधिक संभावना रहती है। हालांकि वास्तविकता यह भी है कि किसी व्यक्ति का वजन यदि आदर्श वजन से 30 प्रतिशत कम हो तो वह मधुमेह से बच जाता है।  

·       शारीरिक स्थूलता (शरीर का अधिक वजनी होना) – किसी परिवार में यदि मधुमेह रोगी न भी हों तो भी कोई व्यक्ति मधुमेह की चपेट में आ सकता है, यदि वह अधिक वजन वाला स्त्री या पुरुष हो। ऐसा माना जाता है कि मधुमेह स्थूलता का कानूनन पति है। अधिक वजन वाले लोग आसानी से मधुमेह का शिकार बनते हैं।

·       अयोग्य व अत्यधिक आहार – संशोधित (refined) एवं प्रक्रियायुक्त (processed) खाद्य पदार्थ मधुमेह को accelerate करते हैं। अत्यधिक आहार को पचाने के लिए शरीर को अधिक पाचक रसों और इंसुलिन का उत्पादन करना पड़ता है। अधिक काम करने के कारण अंत में पैंक्रियास थक जाता है। परिणामस्वरूप इंसुलिन का उत्पादन प्रभावित होता है।

·       अपर्याप्त शारीरिक श्रम - शारीरिक परिश्रम के दौरान स्नायु रक्त में स्थित अधिकांश शर्करा का उपयोग कर डालते हैं, परिणामस्वरूप पेनक्रियास ग्रंथि का बोझ काफी कम हो जाता है। लेकिन शारीरिक श्रम यदि समुचित मात्रा में न हो तो इसका दुष्प्रभाव पैनक्रियाज पर पड़ता है।

इसके अतिरिक्त वाइरस का संक्रमण, मानसिक तनाव, कुछ होर्मोंस का प्रतिकूल प्रभाव आदि भी अन्य कारण हैं।

6.      मधुमेह के लक्षण क्या-क्या हैं?

Type 1 Diabetes के लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगत होता है, लेकिन प्रौढावस्था का डायबीटीज (Type 2 Diabetes) इस तरह दबे पांव आता है कि रोगी को उसके आने की भनक तक नहीं लग पाता। मधुमेह रोगियों में निम्न प्रकार के लक्षण देखने को मिलते हैं –

·       अत्यधिक और बार-बार पेशाब आना।

·       मुँह सूखना और बहुत प्यास लगना।

·       बहुत भूख लगना।

·       शरीर का वजन धीरे धीरे कम होना।

·       थकावट और कमजोरी होना तथा शरीर में दर्द होना।

·       मानसिक थकावट एकाग्रता का अभाव।

इसके अतिरिक्त घाव भरने में विलंब होना, चश्मे के नंबर में बार-बार परिवर्तन होना, हाथ-पैर का दुखना या सुन्न पड़ जाना, आदि मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं।

7.      मधुमेह से होने वाली समस्याएँ क्या-क्या हैं?

·       डायबीटिक कोमा - यह समस्या मुख्यतः टाइप वन डायबिटीज़ के रोगियों में देखने को मिलते हैं। चर्बी के विघटन के कारण बनने वाले कीटोन द्रव्य को शरीर पेशाब के माध्यम से बाहर निकालने का प्रयास करता है। इससे रोगी को बार-बार पेशाब होती है। अत्यधिक मात्रा में पेशाब होने के कारण शरीर में पानी कम हो जाता है। जिससे रक्त से कीटोन द्रव्यों की सांद्रता बढ़ जाती है। इन अम्लीय कीटोन द्रव्यों का मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे वह धीरे-धीरे बेहोश हो जाता है।

·       हाइपोग्लिसेमिक कोमा –रक्त में शर्करा कम करने के लिए कुछ लोग अलग-अलग प्रकार के तरीके अपनाने लगते हैं, जैसे - अत्यधिक दवा का सेवन करना, खाना कम कर देना, अधिक शारीरिक श्रम करना। इन कारणों से कभी-कभी रक्त में शर्करा या ग्लूकोज की मात्रा अत्यधिक कम हो जाती है जिससे बेहोसी आ जाती है। इसे हाइपोग्लिसेमिक कोमा कहा जाता है।  

·       शरीर में छोटे-बड़े फोड़े होना और देर से भरना।   

·       तीव्र गैंग्रीन – हाथ पैर की उँगलियों में झुंझुनाहट होना।  

·       स्पर्श संवेदना बढ़ने से हाथ-पैर में जलन होना (विशेष रूप से रात के समय)

इसके अतिरिक्त स्पर्श संवेदना कम होने से पैर में झुनझुनी, मूत्राशय की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव (Urine Infection), आँख तथा नेत्रपटल पर प्रतिकूल प्रभाव, दृष्टि का ह्रास (मोतियाबिंद), प्रजननतंत्र पर दुष्प्रभाव, पैर पर दुष्प्रभाव आदि समस्याएँ समान्यतः देखने को मिलती है।   

8.      मधुमेह के उपचार में हमारा आहार कैसा होना चाहिए?

मधुमेह में चिकित्सा की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से रोगियों की होती है। आहार के साथ-साथ, कसरतें, योगासन, दवाएं, एक्यूप्रेसर, लोहचुंबक चिकित्सा से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अधिक वजन वाले मधुमेह रोगियों के लिए आहार प्रबंधन ही श्रेष्ठ उपाय है। लेखक बताते हैं कि मधुमेह रोगियों का आहार ऐसा होना चाहिए कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चर्बी आदि ताकत प्रदान करने वाले घटक शरीर को पर्याप्त मात्रा में मिले। आहार में ऐसे भोजन शामिल करें जिससे विटामिन, क्षार और फाइवर शरीर को मिले। आदर्श वजन बनाए रखने के लिए आवश्यक कैलोरी शरीर को उपलब्ध हो। भोजन की गुणवत्ता मधुमेह रोगी के शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई सामान्य से भी कम श्रम करने वाला अधिक वजन वाला रोगियों तो उसे उसके वजन के अनुसार 20 से 25 कैलोरी प्रति किलो, जबकि कम वजन वाले रोगी को 35 कैलोरी प्रति किलो के हिसाब से आहार लेना चाहिए। यह आहार दिन भर में समान रूप से बंटा होना चाहिए अर्थात् थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करना चाहिए। मधुमेह रोगियों को क्या न खाएं? इसके साथ-साथ क्या खाएं? कब और कितना खाएं? इस संबंध में भी विस्तृत जानकारी होना आवश्यक है। पर्याप्त जानकारी न होने के कारण सामान्यतः लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होती है। मधुमेह रोगियों को संतृप्त चर्बी (वसा) जो घी, मक्खन, नारियल तेल और पाम तेल में होती है, से दूरी बनाकर रखना चाहिए। मूँगफली, तिल, मकई, सोयाबीन के तेल में असंतृप्त चर्बी पाई जाती है। ऐसे असंतृप्त चर्बी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना लाभदायक होता है। दैनिक आहार में रेशा युक्त खाद्य पदार्थ, शाक-भाजी शामिल करना चाहिए।

9.      क्या कसरत या योगासन से मधुमेह को नियंत्रित किया जा सकता है?

मधुमेह को नियंत्रित करने में आहार के बाद दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है कसरत एवं योगासन (आसन, प्राणायाम)। कसरत के दौरान नसों के फैलने-सिकुड़ने की प्रक्रिया से खून में मौजूद अधिकांश ग्लूकोज खर्च हो जाती है, शरीर में संचित चर्बी खर्च होती है। इन सभी क्रियाओं से पेंक्रियाज़ ग्रंथि का काम कम हो जाता है। मधुमेह रोगियों को ऐसे कसरत करना चाहिए जिसमें ज्यादा ज़ोर नहीं लगाना पड़ता है। जैसे चलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, बागवानी करना आदि। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कसरत में नियमितता हो। मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी आसन हैं – उड्डीयानबंध, त्रिकोणासन, योगमुद्रा, धनुरासन, पश्चिमोत्तानासन, कोणासन, सर्वांगासन, मत्स्यासन, शवासन। आसन के अतिरिक्त दो प्राणायाम उपयोगी हैं – उज्जाई एवं भस्त्रिका प्राणायाम।

10.  क्या मधुमेह रोगियों के लिए डायलिसिस मशीन जैसा कोई यंत्र है जो रक्त में से ग्लूकोज की मात्रा को फिल्टर कर बाहर निकाल सके?

मधुमेह रोगियों को डायबिटिक कोमा (बेहोसी) जैसी समस्या से बचाने के लिए इंसुलिन की सुई दी जाती है, जिसे काफी सावधानी से रोगी को दी जाती है। इस दौरान इंसुलिन की मात्रा को लेकर बहुत माथापच्ची की स्थिति रहती है। ऐसे आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए एक ऐसा यंत्र आविष्कृत किया गया है जो शरीर के पेंकियाज़ ग्रंथि जैसा ही काम करते हैं। एक ट्यूब की सहायता से रोगी के रक्त को यंत्र में लगातार भेजा जाता है जहाँ ग्लूकोज की मात्रा का पृथक्करण रहता है। आवश्यक मात्रा में रोगी के शरीर में इंसुलिन को प्रविष्ट किया जाता रहता है। यह यंत्र काफी विशाल होता है। आपातकालीन परिस्थिति से निपटने के लिए ही इसका प्रयोग किया जाता है।

            ऐसे छोटे यंत्र आविष्कृत करने के भी प्रयास हुए जिन्हें रोगी अपने शरीर पर धारण कर सके और अपना दैनिक कामकाज भी जारी रख सकें। विदेश में उपलब्ध ऐसा ही एक यंत्र कमर के पट्टे पर धारण किया जाता है। उस में स्थित सुई को पेड़ू में लगाए रखना पड़ता है। इस यंत्र में खून में स्थित ग्लूकोज की मात्रा मालूम करने की व्यवस्था नहीं होती। उसमें से थोड़ा थोड़ा इनसुलिन रोगी के शरीर में लगातार प्रविष्टि होता रहता है, नाश्ते या भोजन के बाद यन्त्र स्थित एक पंप को दबाकर रोगी को कुछ अधिक इंसुलिन शरीर में प्रविष्ट कराना होता है। हमारे देश में फिलहाल ऐसे यंत्र नहीं के बराबर उपलब्ध हैं।

उपरोक्त जिज्ञासा शांत करने के अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण जानकारी भी पुस्तक से प्राप्त होती है। जैसे -

v इंसुलिन की खोज के लिए नोबल पुरस्कार - सन् 1920 में फ्रेड्रिक बैंटिंग और चार्ल्स बस्ट नाम के वैज्ञानिक ने पैनक्रियाज नामक पाचन ग्रन्थि के स्राव से विशुद्ध इंसुलिन को अलग करने में सफल हुए। उन्होंने बताया कि मधुमेह से पीड़ित प्राणियों को इंसुलिन दिया जाए तो उनके रक्त में अवस्थित शर्करा की मात्रा कम हो जाती है। इस खोज के लिए इन दो वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

v जामुन के बीज का चूर्ण का सेवन करने की सलाह आयुर्वेद के चिकित्सक देते हैं जो कि प्रभावी है। लेकिन मधुमेह रोगियों को जामुन का सेवन करने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि इसमें 15% शर्करा होती है। सेवन से मधुमेह बढ़ सकता है।

अन्य प्रभावी चीजें -

·       प्रत्येक खंड में कही जा रही बात को बेहतर तरीके से समझाने के लिए समुचित रंगीन चित्रों का प्रयोग किया गया है जो पढ़ने की रोचकता को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए चित्र 2.5 देखकर कोई भी बेहतर तरीके से समझ बना सकता है कि मधुमेह के रोगियों का पेशाब मीठा क्यों होता है?

·       Type 1 एवं Type 2 के मधुमेह को बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है।

·       पहली बार पता चला कि मधुमेह के होने के जीवाणु थ्योरी भी अस्तित्व में हैं। लेखक बताते हैं कि पेंक्रियाज ग्रंथि (एक प्रकार का पाचक ग्रंथि) लोब्यूल्स नामक इकाइयों से निर्मित होती है। प्रत्येक लोब्यूल्स में दो प्रकार के कोष होते हैं : अन्तःस्त्रावी (endocrine) एवं बाह्यस्त्रावी (exocrine)। अंतःस्त्रवि कोष के दो कोष होते हैं- बीटा कोष एवं अल्फा कोष। बीटा कोष इंसुलिन बनाते हैं, जबकि अल्फा कोष ग्लूकागोन नामक हारमोन का स्त्राव करते हैं। विषाणु पेनक्रियास ग्रंथि में अवस्थित बीटा कोषों को नष्ट कर देते हैं जिससे मधुमेह होता है।

·       पेशाब, रक्त के माध्यम से मधुमेह के परीक्षण के अलग-अलग जांच विधियों, परीक्षण विधि, जैसे बेनेडिक्ट टेस्ट, ग्लूकोज ऑक्सीडेज टेस्ट, ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट, के बारे में विस्तार से बताया गया है।

·       मधुमेह जिन लोगों का खानदानी इतिहास रहा है उन्हें 30 वर्ष की आयु के बाद स्वेच्छा से आहार नियंत्रण स्वीकार कर लेना चाहिए। आहार नियंत्रण से तात्पर्य है – मीठा खाने व अत्यधिक खाने से तौबा कर लेना। यदि वजन समान्य से ज्यादा है तो अपना वजन नियंत्रण करना शुरू कर देना चाहिए।



Monday, 26 January 2026

उच्च शिक्षा में समानता की लड़ाई: क्यों खटक रहे हैं UGC Equity Regulations 2026?

जाति, धर्म, वर्ग, जेंडर, रंग, भाषा, संस्कृति आदि के नाम पर भेदभाव हमारे वैश्विक समाज की एक कड़वी सच्चाई है। ईश्वर/अल्लाह/भगवान की नज़र में सभी मनुष्यों को सामान मानने वाले लोग/समाज सैद्धांतिक रूप से भले ही कितना भी बड़े-बड़े दावे करे कि हमारा समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त है लेकिन निष्पक्ष रूप से उस समाज का अवलोकन करने पर यह बात हवा-हवाई लगेगी। यह भेदभाव तब और बढ़ जाता है जब उस क्षेत्र में दो अलग-अलग प्रकार के मानव समूह की मौजूदगी हो, दोनों के रंग रूप अलग-अलग हो। दोनों में सांस्कृतिक विविधताएँ हों। वहाँ आपको रंग/वर्ग (अमीर/गरीब) मूल निवासी/विदेशी, संस्कृति आदि के आधार पर भेदभाव देखने को मिलेगा। उदाहरण के रूप में अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका में श्वेत एवं अश्वेत नागरिकों के बीच भेदभाव देखा जा सकता है।  

हमारा देश भारत भी इस भेदभाव/छुआछूत की बिमारी से अछूता नहीं है। सैद्धांतिक रूप से भले ही हमारा देश हर एक नागरिक को समानता का अधिकार (सभी नागरिक एक समान है) देता है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। विवाह में घोड़ी चढ़ने, मूंछ रखने, जनेऊ पहनने आदि से संबंधित समाचार पत्रों में छपने वाले न्यूज इस बात की पोल खोलते नजर आएँगे कि हमारे देश में सभी नागरिक एक समान है। इस वास्तविकता के पीछे आखिर कौन जिम्मेदार है? सरकार या समाज के लोग? सरकार की यदि हम बात करें तो हमारी सरकार के सभी अंग जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि भलिभांति अवगत है कि सभी नागरिक शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से अभी एक समान नहीं है, सभी को समानता की एक पंक्ति में लाने के लिए उन समाज के लोगों को अनेक प्रकार के लोककल्याणकारी योजनाएं, सेवा क्षेत्र की नौकरियों में ला रही है। संवैधानिक संस्थाओं को समावेशी बनाने की हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में पंचायत व्यवस्था में आरक्षण द्वारा राजनीति में समावेशन, शिक्षा एवं सेवा के क्षेत्र में आरक्षण के प्रावधान से समाज में समावेशन के सफल प्रयास को समझा जा सकता है।

समानता का अधिकार मिले 7 दशक (77 वर्ष) हो जाने के बाद भी हमारे देश के नागरिक कितना एक दूसरे की नज़र में समान हैं, इस बात की झलक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की एक विनियम ‘UGC Equity Regulations 2026’ में देखने को मिला। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी 2026 से भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए नियम लागू किये हैं जिसका उद्देश्य है - उच्च शिक्षा में जाति, धर्म, दिव्यंगता आदि के आधार पर हो रहे भेदभाव को रोकना/खत्म करना (समता का संवर्द्धन)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित समता एवं समावेशन को ध्यान में रखते हुए सभी जाति, धर्म, वर्ग, के छात्र-छात्राओं/संकाय सदस्य के हित को ध्यान में रखते हुए इस नियम को लाया गया।

इन नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान (कॉलेज/यूनिवर्सिटी) को एक Equal Opportunity Centre (EOC)/समान अवसर केंद्र बनाना अनिवार्य होगा। यह सेंटर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, दिव्यांग वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को दर्ज करेगा, काउंसलिंग करेगा, जागरूकता फैलाएगा, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की सिफारिश भी करेगा। अपने कैंपस में सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित भी करेगा। 2012 से ही उच्च शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार के सेंटर स्थापित हैं। उन्हें ही संसोधित कर सक्रिय किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त हर संस्थान में समान अवसर केंद्र के अंतर्गत ही एक Equity Committee/समता समिति बनाई जाएगी, जिसमें संस्था प्रमुख, शिक्षक, संस्थान का ही एक गैर शिक्षकीय कर्मचारी, दो छात्र प्रतिनिधि, व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक समाज के दो प्रतिनिधि आदि शामिल होंगे। इस समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा। सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा। यह कमेटी भेदभाव के शिकायत की जांच करेगा, 30 से 60 दिनों में फैसला देगा तत्पश्चात इसकी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगा। संस्था यदि इस संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही करती है या मामले को नजरंदाज करती है तो यूजीसी उस पर कार्रवाई कर सकती है, पाबंदियाँ लगा सकती है। समता समिति उन कार्यों की एक सूची भी तैयार और प्रसारित करेगी जो भेदभाव की श्रेणी में आते हैं। इसके लिए भेदभाव को व्यापक तरीके से परिभाषित किया गया है। इन बिंदुओं को ‘भेदभाव’ के दायरे में रखा गया है –

·       जाति/धर्म/लिंग के आधार पर अपमान या अनुचित व्यवहार

·       मौखिक या मानसिक उत्पीड़न

समता समिति शिकायतकर्ता की सुरक्षा का भी ध्यान रखेगी। इसके लिए वह भेदभाव की सूचना देने वाले हितधारक की पहचान उसके अनुरोध पर गोपनीय रखेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगी कि उसे किसी भी प्रकार से डराया धमकाया नहीं जाए। यदि ऐसा होता है तो यूजीसी उस संबंधित संस्थान पर कार्रवाई कर सकता है। जैसे - यूजीसी संचालित योजनाओं में संस्था के भाग लेने से वंचित करना, कोर्स की मान्यता रद्द करना, उच्च शिक्षा संस्थान के लिस्ट से संस्था को हटाना, आदि।

यूजीसी द्वारा लाए गए इन 8 पृष्ठों वाले नियमों से सवर्ण जाति के लोग/छात्र/छात्राएं/शिक्षक जहाँ चिंतित हैं वहीं आरक्षित वर्ग के लोग हर्षित हैं। आरक्षित वर्ग के लोग इस कदम को सामाजिक भेदभाव खत्म करने/रोकने की दिशा में एक बढ़िया कदम मान रहे हैं। आरक्षित वर्गों के कॉलेज एवं विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राएँ विशेष रूप से हर्षित हैं क्योंकि वे कॉलेज, विश्वविद्यालय में जाति, धर्म, जेन्डर के नाम पर होने वाले भेदभाव की वास्तविकता से भली भाँति परिचित हैं। इस तरह के भेदभाव में सहपाठियों के साथ-साथ शिक्षक, गैर शिक्षकीय कर्मचारी से भी प्रताड़ित हो रहे होते हैं जो उनके उपनाम देख कर उनके साथ व्यवहार में परिवर्तन लाते हैं। सोशल मीडिया से यह समझ आया कि बहुत से सवर्ण बुद्धिजीवी यूजीसी के इस स्टेप की सराहना कर रहे हैं क्योंकि वे समाज में जाति आधारित भेदभाव की वास्तविकता को जानते समझते हैं।

सवर्ण जाति के लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि

·       आरक्षित वर्ग के छात्र/छात्रा इस नियम का गलत उपयोग कर उनकी/उनके बच्चों की छवि, मानसिक स्वास्थ्य और कैरियर का नुकसान कर सकते हैं।

·       उनके बीच हमेशा एक डर का माहौल रहेगा।

·       एक दूसरे के बीच स्वस्थ संवाद की चुनौती रहेगी।

इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस नियम व्यवस्था से दोनों वर्गो के बीच स्वस्थ संवाद की प्रक्रिया बाधित होगी, थोड़ी कमी आएगी। लेकिन इस दौरान सबसे अच्छी बात यह रहेगी कि  उनके आपसी बातचीत में सामन्ती मानसिकता/जातीय दंभ वाले व्यवहार में कमी आएगी। आरक्षित वर्गों के युवाओं को नौकरियों के साक्षात्कार में जिस तरह से Not found suitable (NFS) बता कर आगे बढ़ने की दौड़ से किनारा कर दिया जाता था, उस पर विराम लगाया जा सकेगा। ऐसे भ्रष्ट आचरण करने वाले समता समिति से डरेंगे और भ्रष्टाचार करने से पहले 10 बार सोचेंगे। जाति देखकर Not found suitable (NFS) करने वाले बेनकाब हो रहे होंगे।

इस आठ पृष्ठों वाले नियमों को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि सवर्णों का इससे डरना बेवजह है। यूजीसी के इस कदम का उद्देश्य देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक बहिष्करण को खत्म कर सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है, ताकि सभी नागरिको में एक समतामूलक समाज निर्माण की भावना विकसित हो और 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में हम खुद को और आने वाली पीढ़ी को विकसित करने की दिशा में अग्रसर हो। किसी पर बेवजह भेदभाव के आरोप लगाकर उसका नुकसान करना इस नियम का बिलकुल भी उद्देश्य नहीं है।

यूजीसी के इस प्रावधान की सार्थकता को POSH (Prevention of Sexual Harassment) के नियमों से समझा जा सकता है। 2013 में लाए गए इस कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि ‘कार्यस्थल (स्कूल, कार्यालय, कॉलेज, अस्पताल आदि) पर महिलाएं सुरक्षित महसूस कर बेफिक्र होकर कार्य कर सकें’। इस नियम में ‘सेक्शुअल हैरेसमेंट’ को इतनी गहराई से परिभाषित किया गया है कि इसके समक्ष ‘भेदभाव’ की परिभाषा सतही लगेगी। इस कानून के अनुसार निम्न व्यवहार को ‘Sexual Harassment’ के दायरे में रखा गया –

·       अनचाहा शारीरिक संपर्क या निजी दायरे का उल्लंघन,

·       यौन संबंधों या यौन सेवाओं की मांग करना,

·       बुरी नजर या अनुचित ढंग से देखना,

·       जबरन किए गए सेक्शुअल आचरण, यौन संबंध या हमले,

·       अभद्र प्रदर्शन या यौनिक तौर पर प्रकट हाव-भाव,

·       अनुचित, अंतरंग, सेक्सुल या सेक्सिस्ट बातचीत: ऑनलाइन या ऑफलाइन,

·       अनचाही फ्लर्टिंग, रोमैन्टिक या यौनिक पेशकश या गिफ्ट, आमंत्रण जैसे हाव-भाव,

·       स्त्री के शरीर, कपड़ों, या सेक्शुअल रुझान पर टिप्पणी या सलाह,

जिन कार्यस्थलों/कार्यालयों में इन नियमों के पालन कड़ाई से कराए जाते हैं वहाँ सभी जेंडर (स्त्री, पुरुष, थर्ड जेंडर) के बीच स्वस्थ संवाद की कोई चुनौती ही नहीं होती, बल्कि यथा संभव स्वस्थ संवाद ही होता है। स्वस्थ संवाद के कारण दोनों पक्षों के बीच किसी भी प्रकार के अवांछित/अनुचित व्यवहार भी नहीं होता है। सभी अपने कार्य में लगे रहते हैं। हाँ ! थोड़ा डर का माहौल भी जरूर होता है लेकिन यह डर सहकर्मी स्त्रियों के साथ अनुचित व्यवहार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा होता है। धीरे-धीरे सभी इस माहौल में रहने के आदि हो जाते हैं और इस बात को भी बेहतर तरीके से समझने लगते हैं कि इस प्रकार के तथाकथित कड़े नियम-कानून की हमारे समाज में आवश्यकता क्यों है?  

UGC Equity Regulations 2026’ Prevention of Sexual Harassment act 2013 जैसे नियम कानून हमारे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को और बेहतर करने के लिए ही बनाए जाते हैं। ऐसे में अच्छे नियम-कानून का विरोध करने, इसे वापस लेने की मांग, को किसी भी तरीके से उचित नहीं ठहराया जा सकता। ये सभी प्रावधान हमारे देश के नागरिकों को ही संवैधानिक मूल्यों को समझने, इस अनुसार आचरण करने का समय विकसित कर रहा होगा। फिर भी किसी वर्ग विशेष को यदि इसके अत्यधिक दुरुपयोग होने की संभावना लगती है तो यूजीसी को इसके नियमों को थोड़ा और व्यवस्थित करना चाहिए। हालांकि समता समिति में शामिल सदस्यों को इतना भी कमतर आंकना उपयुक्त नहीं माना जाना चाहिए।