Saturday, 16 May 2026

30 की उम्र के बाद आहार नियंत्रण: Diabetes से बचाव का सबसे जरूरी कदम

वर्ष 2026 की शुरुआत एक ऐसे न्यूज़ के साथ हुई जिसने मेरे जीवन जीने के तरीके को बदल दिया। अनियमित खान पान को नियमित कर दिया। समोसा, कचौरी, जलेबी, केला व अन्य मिठाई, जो मेरा प्रिय हुआ करता था, को हमेशा के लिए मुझे दूर कर दिया। स्कूल विजिट के दौरान अचानक से मुझे घबराहट का एहसास हुआ। किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए बिना देर किये पास स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दाढ़ी (बेमेतरा, छत्तीसगढ़) में चिकित्सकीय परामर्श लिया। जांच में डॉक्टर ने हाई ब्लड प्रैशर (High Blood Pressure) एवं डायबिटीस (Diabetes) की पुष्टि किया। जांच से आधे घंटे पहले एक समोसा खाया था यह मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं था। 40 वर्ष की उम्र, दो छोटे-छोटे बच्चे (एक की उम्र 5 वर्ष, दूसरे की 3 माह), नाममात्र बैंक बैलेंस से लेकर और भी बहुत कुछ मेरी दिमाग में अगले एक माह तक घूमते रहे। अच्छी बात ये थी कि इन चिंताओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इन्हें दूर करने का हर संभव उपाय किया। कभी-कभी के धूम्रपान छोड़ने से लेकर प्रतिदिन के Brisk Walk को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाया।

            एक बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है – आवश्यकता आविष्कार की जननी है। इस रोग से पीछा छुड़ाने की इच्छा/जिद ने मुझे diabetes एवं blood pressure के बारे में अधिक से अधिक जानने की आवश्यकता जागृत किया। फलस्वरूप डॉक्टर से लेकर chat GPT जैसे AI प्लैटफ़ार्म का भरपूर उपयोग किया इस बीमारी को गहराई से जानने-समझने के लिए। चिकित्सक से ज्यादा सहयोग तो नहीं मिला लेकिन AI ने जरूर थोड़ी बहुत जिज्ञासा शांत की। जिज्ञासा इसलिए भी थी कि इस रोग से लड़ने के लिए इसके प्रत्येक पहलू की जानकारी प्राप्त करने को आवश्यक कदम मानता था। इससे संबंधित असीमित जिज्ञासा ने मुझे इस पुस्तक (डायबिटीस, हाई ब्लड प्रेसर दूर रखिए जीवन भर) तक पहुंचाया। जहां तक मुझे याद है इस पुस्तक को मैंने student life (Ph.D.) के दौरान 2018 के आसपास वर्धा (महाराष्ट्र) खरीदा था अपने पिताजी को गिफ्ट करने के लिए (क्योंकि वह भी diabetes patient थे, और मेरी दिली इच्छा थी उनको यह पुस्तक भेंट करूँ ताकि वे इसे पढ़कर diabetes के एक-एक पहलू को समझते हुए उसके नियंत्रण के हरसंभव प्रयास कर सकें)। हालांकि यह हो नहीं सका अलग-अलग कारणों से। Diabetes को समझने के लिए इससे संबंधित एक पुस्तक मैंने ऑनलाइन ऑर्डर भी किया। उसके आने के पूर्व ही एक दिन अचानक से यह पुस्तक मुझे मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में दिख गया। बस फिर क्या था – व्यस्त दिनचर्या में थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर अपनी जिज्ञासा शांत किया। डॉ. धीरेन गाला, डॉ. संजय गाला लिखित नवनीत पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 184 पृष्ठों की यह पूरी पुस्तक दो भागों में बंटी है। दोनों ही भाग बहुत ही उपयोगी है। पहला भाग जहां diabetes से संबंधित है, दूसरा भाग हाई ब्लड प्रेसर (High Blood Pressure) से। दूसरे भाग की बात फिर कभी कर रहे होंगे। पहले भाग को पढ़ने के बाद बहुत हद तक मेरी असीमित जिज्ञासा शांत हुई। जैसे -

1.      डायबिटिस (मधुमेह) से तात्पर्य क्या है?

जीवाणुजन्य रोग के विपरीत डायबिटिस (मधुमेह/मधुप्रमेह) एक संस्कृतिजन्य (disease of civilization) रोग है जो इन्स्युलिन (insulin) नामक एक हॉरमोन (Harmon) की कमी से होता है। इस रोग का सीधा संबंध हमारे शरीर के पैनक्रियाज नामक ग्रंथि से है। इस ग्रंथि में दो कोष – अल्फा कोष एवं बीटा कोष होते हैं। बीटा कोष इंसुलिन बनाते हैं। श्रमरहित जीवन, अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट व शर्करायुक्त खाद्य पदार्थों के सेवन अर्थात अयोग्य रहन-सहन का परिणाम है यह रोग। यह संक्रमण से फैलने वाला रोग तो नहीं है लेकिन किसी को यदि यह रोग हो जाता है तो आनुवांशिक/वंशपरंपरागत बढ़ता जाता है।

            मधुमेह दो प्रकार के होते हैं, जिसे type 1 और type 2 मधुमेह कहा जाता है। कम उम्र में ही इंसुलिन की कमी के कारण उत्पन्न होने वाला मधुमेह Type 1 एवं (2) शरीर में इंसुलिन के विरुद्ध प्रतिकार (insulin resistance) के परिणामस्वरूप होने वाला मधुमेह Type 2 कहलाता है। प्रथम प्रकार के मधुमेह को बाल्यावस्था का मधुमेह कहा जाता है। जबकि दूसरे प्रकार के मधुमेह को प्रौढ़ावस्था का मधुमेह कहा जाता है। इंसुलिन की कमी के कारण या जब शरीर तैयार इंसुलिन का उपयोग नहीं कर पाता है तो खून में शर्करा की मात्रा असामान्य ढंग से बढ़ जाती है। ऐसे में हमारा शरीर खून में संचित शर्करा को अंततः पेशाब के माध्यम से निकालने लगती है। इस व्याधि/रोग को ही मधुमेह कहा जाता है। यह एक जीवन भर का रोग है। जिसे ठीक नहीं किया जा सकता। लेकिन उचित उपायों से उसे नियंत्रण में रखा जा सकता है। उसके दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है।

2.      इंसुलिन क्या है?

इंसुलिन हमारे शरीर के पैनक्रियाज ग्रंथि से निकलने वाला एक अंतःस्त्राव या हार्मोन है जो रक्त (खून) में स्थित शर्करा/ग्लूकोज की मात्रा को शरीर के एक-एक कोशिका में पहुंचा कर कम/नियंत्रित करता है। पेंक्रियाज़ में दो कोष क्रमशः अल्फा एवं बीटा कोष होता है। बीटा कोष से इंसुलिन का स्त्राव होता है। हमारे शरीर में मौजूद करोड़ों कोशिका उस ग्लूकोज से शरीर के लिए ऊर्जा बनाती है। यदि खून में ग्लूकोज की मात्रा कोषों की आवश्यकताओं की अपेक्षा अधिक हो जाता है तो इंसुलिन उसका रूपान्तरण ग्लायकोजेन या चर्बी में करके उसका संग्रह यकृत या चर्बी के कोषों में करता है। यह शरीर में प्रोटीन के निर्माण के लिए भी सहायक होता है। शरीर में यदि इसकी कमी हो जाए या शरीर की कोशिका इसका प्रतिरोध करने लगे तो रक्त में शर्करा की मात्रा अत्यधिक हो जाती है। जिससे मधुमेह नामक रोग की चपेट में आ जाता है।    

3.      मधुमेह रोगियों का वजन कम क्यों होता जाता है?

इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध के कारण रक्त में स्थित ग्लूकोज शरीर के अलग-अलग भागों में नहीं जा पाता है। न ही ग्लायकोजेन (चर्बी) में उसका रूपान्तरण हो पाता है। ऐसे समय में शरीर अपने भीतर संग्रहित चर्बी और प्रोटीन का विघटन कर उन्हें निश्चित कोषों तक पहुंचाने का प्रयत्न करता है। इस जमा चर्बी के नष्ट होने से मधुमेह के रोगी का वजन घटने लगता है।

4.      मधुमेह रोगियों को बार-बार पेशाब क्यों लगता है?

खून में जब ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है और इंसुलिन प्रतिरोध के कारण कोशिका तक वह पहुँच नहीं पाता है तो शरीर यकृत या चर्बी कोषों में मौजूद चर्बी का बहुत तेजी से विघटन कर कोशिका तक पहुंचाने का प्रयास करता है। इस विघटन से शरीर में कीटोन द्रव्य उत्पन्न होता है। अम्लीय होने के कारण ये कीटोन रक्त को विषाक्त बनाते हैं। इन बड़े मात्रा में मौजूद विषैले किटोन द्रव्यों को शरीर पेशाब के माध्यम से शरीर के बाहर निकालने का प्रयत्न करता है। इस कारण रोगी को बार-बार पेशाब लगती है।

5.      किसी व्यक्ति को मधुमेह होने के क्या कारण हैं?

किसी व्यक्ति के मधुमेह से ग्रसित होने के पीछे कोई एक कारण नहीं होता है। बल्कि मधुमेह होना कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे –

·       आनुवांशिक कारण – माता पिता को यदि मधुमेह है तो बच्चे को भी होने की अधिक संभावना रहती है। हालांकि वास्तविकता यह भी है कि किसी व्यक्ति का वजन यदि आदर्श वजन से 30 प्रतिशत कम हो तो वह मधुमेह से बच जाता है।  

·       शारीरिक स्थूलता (शरीर का अधिक वजनी होना) – किसी परिवार में यदि मधुमेह रोगी न भी हों तो भी कोई व्यक्ति मधुमेह की चपेट में आ सकता है, यदि वह अधिक वजन वाला स्त्री या पुरुष हो। ऐसा माना जाता है कि मधुमेह स्थूलता का कानूनन पति है। अधिक वजन वाले लोग आसानी से मधुमेह का शिकार बनते हैं।

·       अयोग्य व अत्यधिक आहार – संशोधित (refined) एवं प्रक्रियायुक्त (processed) खाद्य पदार्थ मधुमेह को accelerate करते हैं। अत्यधिक आहार को पचाने के लिए शरीर को अधिक पाचक रसों और इंसुलिन का उत्पादन करना पड़ता है। अधिक काम करने के कारण अंत में पैंक्रियास थक जाता है। परिणामस्वरूप इंसुलिन का उत्पादन प्रभावित होता है।

·       अपर्याप्त शारीरिक श्रम - शारीरिक परिश्रम के दौरान स्नायु रक्त में स्थित अधिकांश शर्करा का उपयोग कर डालते हैं, परिणामस्वरूप पेनक्रियास ग्रंथि का बोझ काफी कम हो जाता है। लेकिन शारीरिक श्रम यदि समुचित मात्रा में न हो तो इसका दुष्प्रभाव पैनक्रियाज पर पड़ता है।

इसके अतिरिक्त वाइरस का संक्रमण, मानसिक तनाव, कुछ होर्मोंस का प्रतिकूल प्रभाव आदि भी अन्य कारण हैं।

6.      मधुमेह के लक्षण क्या-क्या हैं?

Type 1 Diabetes के लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगत होता है, लेकिन प्रौढावस्था का डायबीटीज (Type 2 Diabetes) इस तरह दबे पांव आता है कि रोगी को उसके आने की भनक तक नहीं लग पाता। मधुमेह रोगियों में निम्न प्रकार के लक्षण देखने को मिलते हैं –

·       अत्यधिक और बार-बार पेशाब आना।

·       मुँह सूखना और बहुत प्यास लगना।

·       बहुत भूख लगना।

·       शरीर का वजन धीरे धीरे कम होना।

·       थकावट और कमजोरी होना तथा शरीर में दर्द होना।

·       मानसिक थकावट एकाग्रता का अभाव।

इसके अतिरिक्त घाव भरने में विलंब होना, चश्मे के नंबर में बार-बार परिवर्तन होना, हाथ-पैर का दुखना या सुन्न पड़ जाना, आदि मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं।

7.      मधुमेह से होने वाली समस्याएँ क्या-क्या हैं?

·       डायबीटिक कोमा - यह समस्या मुख्यतः टाइप वन डायबिटीज़ के रोगियों में देखने को मिलते हैं। चर्बी के विघटन के कारण बनने वाले कीटोन द्रव्य को शरीर पेशाब के माध्यम से बाहर निकालने का प्रयास करता है। इससे रोगी को बार-बार पेशाब होती है। अत्यधिक मात्रा में पेशाब होने के कारण शरीर में पानी कम हो जाता है। जिससे रक्त से कीटोन द्रव्यों की सांद्रता बढ़ जाती है। इन अम्लीय कीटोन द्रव्यों का मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे वह धीरे-धीरे बेहोश हो जाता है।

·       हाइपोग्लिसेमिक कोमा –रक्त में शर्करा कम करने के लिए कुछ लोग अलग-अलग प्रकार के तरीके अपनाने लगते हैं, जैसे - अत्यधिक दवा का सेवन करना, खाना कम कर देना, अधिक शारीरिक श्रम करना। इन कारणों से कभी-कभी रक्त में शर्करा या ग्लूकोज की मात्रा अत्यधिक कम हो जाती है जिससे बेहोसी आ जाती है। इसे हाइपोग्लिसेमिक कोमा कहा जाता है।  

·       शरीर में छोटे-बड़े फोड़े होना और देर से भरना।   

·       तीव्र गैंग्रीन – हाथ पैर की उँगलियों में झुंझुनाहट होना।  

·       स्पर्श संवेदना बढ़ने से हाथ-पैर में जलन होना (विशेष रूप से रात के समय)

इसके अतिरिक्त स्पर्श संवेदना कम होने से पैर में झुनझुनी, मूत्राशय की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव (Urine Infection), आँख तथा नेत्रपटल पर प्रतिकूल प्रभाव, दृष्टि का ह्रास (मोतियाबिंद), प्रजननतंत्र पर दुष्प्रभाव, पैर पर दुष्प्रभाव आदि समस्याएँ समान्यतः देखने को मिलती है।   

8.      मधुमेह के उपचार में हमारा आहार कैसा होना चाहिए?

मधुमेह में चिकित्सा की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से रोगियों की होती है। आहार के साथ-साथ, कसरतें, योगासन, दवाएं, एक्यूप्रेसर, लोहचुंबक चिकित्सा से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अधिक वजन वाले मधुमेह रोगियों के लिए आहार प्रबंधन ही श्रेष्ठ उपाय है। लेखक बताते हैं कि मधुमेह रोगियों का आहार ऐसा होना चाहिए कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चर्बी आदि ताकत प्रदान करने वाले घटक शरीर को पर्याप्त मात्रा में मिले। आहार में ऐसे भोजन शामिल करें जिससे विटामिन, क्षार और फाइवर शरीर को मिले। आदर्श वजन बनाए रखने के लिए आवश्यक कैलोरी शरीर को उपलब्ध हो। भोजन की गुणवत्ता मधुमेह रोगी के शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई सामान्य से भी कम श्रम करने वाला अधिक वजन वाला रोगियों तो उसे उसके वजन के अनुसार 20 से 25 कैलोरी प्रति किलो, जबकि कम वजन वाले रोगी को 35 कैलोरी प्रति किलो के हिसाब से आहार लेना चाहिए। यह आहार दिन भर में समान रूप से बंटा होना चाहिए अर्थात् थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करना चाहिए। मधुमेह रोगियों को क्या न खाएं? इसके साथ-साथ क्या खाएं? कब और कितना खाएं? इस संबंध में भी विस्तृत जानकारी होना आवश्यक है। पर्याप्त जानकारी न होने के कारण सामान्यतः लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होती है। मधुमेह रोगियों को संतृप्त चर्बी (वसा) जो घी, मक्खन, नारियल तेल और पाम तेल में होती है, से दूरी बनाकर रखना चाहिए। मूँगफली, तिल, मकई, सोयाबीन के तेल में असंतृप्त चर्बी पाई जाती है। ऐसे असंतृप्त चर्बी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना लाभदायक होता है। दैनिक आहार में रेशा युक्त खाद्य पदार्थ, शाक-भाजी शामिल करना चाहिए।

9.      क्या कसरत या योगासन से मधुमेह को नियंत्रित किया जा सकता है?

मधुमेह को नियंत्रित करने में आहार के बाद दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है कसरत एवं योगासन (आसन, प्राणायाम)। कसरत के दौरान नसों के फैलने-सिकुड़ने की प्रक्रिया से खून में मौजूद अधिकांश ग्लूकोज खर्च हो जाती है, शरीर में संचित चर्बी खर्च होती है। इन सभी क्रियाओं से पेंक्रियाज़ ग्रंथि का काम कम हो जाता है। मधुमेह रोगियों को ऐसे कसरत करना चाहिए जिसमें ज्यादा ज़ोर नहीं लगाना पड़ता है। जैसे चलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, बागवानी करना आदि। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कसरत में नियमितता हो। मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी आसन हैं – उड्डीयानबंध, त्रिकोणासन, योगमुद्रा, धनुरासन, पश्चिमोत्तानासन, कोणासन, सर्वांगासन, मत्स्यासन, शवासन। आसन के अतिरिक्त दो प्राणायाम उपयोगी हैं – उज्जाई एवं भस्त्रिका प्राणायाम।

10.  क्या मधुमेह रोगियों के लिए डायलिसिस मशीन जैसा कोई यंत्र है जो रक्त में से ग्लूकोज की मात्रा को फिल्टर कर बाहर निकाल सके?

मधुमेह रोगियों को डायबिटिक कोमा (बेहोसी) जैसी समस्या से बचाने के लिए इंसुलिन की सुई दी जाती है, जिसे काफी सावधानी से रोगी को दी जाती है। इस दौरान इंसुलिन की मात्रा को लेकर बहुत माथापच्ची की स्थिति रहती है। ऐसे आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए एक ऐसा यंत्र आविष्कृत किया गया है जो शरीर के पेंकियाज़ ग्रंथि जैसा ही काम करते हैं। एक ट्यूब की सहायता से रोगी के रक्त को यंत्र में लगातार भेजा जाता है जहाँ ग्लूकोज की मात्रा का पृथक्करण रहता है। आवश्यक मात्रा में रोगी के शरीर में इंसुलिन को प्रविष्ट किया जाता रहता है। यह यंत्र काफी विशाल होता है। आपातकालीन परिस्थिति से निपटने के लिए ही इसका प्रयोग किया जाता है।

            ऐसे छोटे यंत्र आविष्कृत करने के भी प्रयास हुए जिन्हें रोगी अपने शरीर पर धारण कर सके और अपना दैनिक कामकाज भी जारी रख सकें। विदेश में उपलब्ध ऐसा ही एक यंत्र कमर के पट्टे पर धारण किया जाता है। उस में स्थित सुई को पेड़ू में लगाए रखना पड़ता है। इस यंत्र में खून में स्थित ग्लूकोज की मात्रा मालूम करने की व्यवस्था नहीं होती। उसमें से थोड़ा थोड़ा इनसुलिन रोगी के शरीर में लगातार प्रविष्टि होता रहता है, नाश्ते या भोजन के बाद यन्त्र स्थित एक पंप को दबाकर रोगी को कुछ अधिक इंसुलिन शरीर में प्रविष्ट कराना होता है। हमारे देश में फिलहाल ऐसे यंत्र नहीं के बराबर उपलब्ध हैं।

उपरोक्त जिज्ञासा शांत करने के अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण जानकारी भी पुस्तक से प्राप्त होती है। जैसे -

v इंसुलिन की खोज के लिए नोबल पुरस्कार - सन् 1920 में फ्रेड्रिक बैंटिंग और चार्ल्स बस्ट नाम के वैज्ञानिक ने पैनक्रियाज नामक पाचन ग्रन्थि के स्राव से विशुद्ध इंसुलिन को अलग करने में सफल हुए। उन्होंने बताया कि मधुमेह से पीड़ित प्राणियों को इंसुलिन दिया जाए तो उनके रक्त में अवस्थित शर्करा की मात्रा कम हो जाती है। इस खोज के लिए इन दो वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

v जामुन के बीज का चूर्ण का सेवन करने की सलाह आयुर्वेद के चिकित्सक देते हैं जो कि प्रभावी है। लेकिन मधुमेह रोगियों को जामुन का सेवन करने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि इसमें 15% शर्करा होती है। सेवन से मधुमेह बढ़ सकता है।

अन्य प्रभावी चीजें -

·       प्रत्येक खंड में कही जा रही बात को बेहतर तरीके से समझाने के लिए समुचित रंगीन चित्रों का प्रयोग किया गया है जो पढ़ने की रोचकता को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए चित्र 2.5 देखकर कोई भी बेहतर तरीके से समझ बना सकता है कि मधुमेह के रोगियों का पेशाब मीठा क्यों होता है?

·       Type 1 एवं Type 2 के मधुमेह को बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है।

·       पहली बार पता चला कि मधुमेह के होने के जीवाणु थ्योरी भी अस्तित्व में हैं। लेखक बताते हैं कि पेंक्रियाज ग्रंथि (एक प्रकार का पाचक ग्रंथि) लोब्यूल्स नामक इकाइयों से निर्मित होती है। प्रत्येक लोब्यूल्स में दो प्रकार के कोष होते हैं : अन्तःस्त्रावी (endocrine) एवं बाह्यस्त्रावी (exocrine)। अंतःस्त्रवि कोष के दो कोष होते हैं- बीटा कोष एवं अल्फा कोष। बीटा कोष इंसुलिन बनाते हैं, जबकि अल्फा कोष ग्लूकागोन नामक हारमोन का स्त्राव करते हैं। विषाणु पेनक्रियास ग्रंथि में अवस्थित बीटा कोषों को नष्ट कर देते हैं जिससे मधुमेह होता है।

·       पेशाब, रक्त के माध्यम से मधुमेह के परीक्षण के अलग-अलग जांच विधियों, परीक्षण विधि, जैसे बेनेडिक्ट टेस्ट, ग्लूकोज ऑक्सीडेज टेस्ट, ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट, के बारे में विस्तार से बताया गया है।

·       मधुमेह जिन लोगों का खानदानी इतिहास रहा है उन्हें 30 वर्ष की आयु के बाद स्वेच्छा से आहार नियंत्रण स्वीकार कर लेना चाहिए। आहार नियंत्रण से तात्पर्य है – मीठा खाने व अत्यधिक खाने से तौबा कर लेना। यदि वजन समान्य से ज्यादा है तो अपना वजन नियंत्रण करना शुरू कर देना चाहिए।



Monday, 26 January 2026

उच्च शिक्षा में समानता की लड़ाई: क्यों खटक रहे हैं UGC Equity Regulations 2026?

जाति, धर्म, वर्ग, जेंडर, रंग, भाषा, संस्कृति आदि के नाम पर भेदभाव हमारे वैश्विक समाज की एक कड़वी सच्चाई है। ईश्वर/अल्लाह/भगवान की नज़र में सभी मनुष्यों को सामान मानने वाले लोग/समाज सैद्धांतिक रूप से भले ही कितना भी बड़े-बड़े दावे करे कि हमारा समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त है लेकिन निष्पक्ष रूप से उस समाज का अवलोकन करने पर यह बात हवा-हवाई लगेगी। यह भेदभाव तब और बढ़ जाता है जब उस क्षेत्र में दो अलग-अलग प्रकार के मानव समूह की मौजूदगी हो, दोनों के रंग रूप अलग-अलग हो। दोनों में सांस्कृतिक विविधताएँ हों। वहाँ आपको रंग/वर्ग (अमीर/गरीब) मूल निवासी/विदेशी, संस्कृति आदि के आधार पर भेदभाव देखने को मिलेगा। उदाहरण के रूप में अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका में श्वेत एवं अश्वेत नागरिकों के बीच भेदभाव देखा जा सकता है।  

हमारा देश भारत भी इस भेदभाव/छुआछूत की बिमारी से अछूता नहीं है। सैद्धांतिक रूप से भले ही हमारा देश हर एक नागरिक को समानता का अधिकार (सभी नागरिक एक समान है) देता है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। विवाह में घोड़ी चढ़ने, मूंछ रखने, जनेऊ पहनने आदि से संबंधित समाचार पत्रों में छपने वाले न्यूज इस बात की पोल खोलते नजर आएँगे कि हमारे देश में सभी नागरिक एक समान है। इस वास्तविकता के पीछे आखिर कौन जिम्मेदार है? सरकार या समाज के लोग? सरकार की यदि हम बात करें तो हमारी सरकार के सभी अंग जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि भलिभांति अवगत है कि सभी नागरिक शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से अभी एक समान नहीं है, सभी को समानता की एक पंक्ति में लाने के लिए उन समाज के लोगों को अनेक प्रकार के लोककल्याणकारी योजनाएं, सेवा क्षेत्र की नौकरियों में ला रही है। संवैधानिक संस्थाओं को समावेशी बनाने की हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में पंचायत व्यवस्था में आरक्षण द्वारा राजनीति में समावेशन, शिक्षा एवं सेवा के क्षेत्र में आरक्षण के प्रावधान से समाज में समावेशन के सफल प्रयास को समझा जा सकता है।

समानता का अधिकार मिले 7 दशक (77 वर्ष) हो जाने के बाद भी हमारे देश के नागरिक कितना एक दूसरे की नज़र में समान हैं, इस बात की झलक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की एक विनियम ‘UGC Equity Regulations 2026’ में देखने को मिला। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी 2026 से भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए नियम लागू किये हैं जिसका उद्देश्य है - उच्च शिक्षा में जाति, धर्म, दिव्यंगता आदि के आधार पर हो रहे भेदभाव को रोकना/खत्म करना (समता का संवर्द्धन)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित समता एवं समावेशन को ध्यान में रखते हुए सभी जाति, धर्म, वर्ग, के छात्र-छात्राओं/संकाय सदस्य के हित को ध्यान में रखते हुए इस नियम को लाया गया।

इन नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान (कॉलेज/यूनिवर्सिटी) को एक Equal Opportunity Centre (EOC)/समान अवसर केंद्र बनाना अनिवार्य होगा। यह सेंटर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, दिव्यांग वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को दर्ज करेगा, काउंसलिंग करेगा, जागरूकता फैलाएगा, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की सिफारिश भी करेगा। अपने कैंपस में सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित भी करेगा। 2012 से ही उच्च शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार के सेंटर स्थापित हैं। उन्हें ही संसोधित कर सक्रिय किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त हर संस्थान में समान अवसर केंद्र के अंतर्गत ही एक Equity Committee/समता समिति बनाई जाएगी, जिसमें संस्था प्रमुख, शिक्षक, संस्थान का ही एक गैर शिक्षकीय कर्मचारी, दो छात्र प्रतिनिधि, व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक समाज के दो प्रतिनिधि आदि शामिल होंगे। इस समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा। सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा। यह कमेटी भेदभाव के शिकायत की जांच करेगा, 30 से 60 दिनों में फैसला देगा तत्पश्चात इसकी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगा। संस्था यदि इस संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही करती है या मामले को नजरंदाज करती है तो यूजीसी उस पर कार्रवाई कर सकती है, पाबंदियाँ लगा सकती है। समता समिति उन कार्यों की एक सूची भी तैयार और प्रसारित करेगी जो भेदभाव की श्रेणी में आते हैं। इसके लिए भेदभाव को व्यापक तरीके से परिभाषित किया गया है। इन बिंदुओं को ‘भेदभाव’ के दायरे में रखा गया है –

·       जाति/धर्म/लिंग के आधार पर अपमान या अनुचित व्यवहार

·       मौखिक या मानसिक उत्पीड़न

समता समिति शिकायतकर्ता की सुरक्षा का भी ध्यान रखेगी। इसके लिए वह भेदभाव की सूचना देने वाले हितधारक की पहचान उसके अनुरोध पर गोपनीय रखेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगी कि उसे किसी भी प्रकार से डराया धमकाया नहीं जाए। यदि ऐसा होता है तो यूजीसी उस संबंधित संस्थान पर कार्रवाई कर सकता है। जैसे - यूजीसी संचालित योजनाओं में संस्था के भाग लेने से वंचित करना, कोर्स की मान्यता रद्द करना, उच्च शिक्षा संस्थान के लिस्ट से संस्था को हटाना, आदि।

यूजीसी द्वारा लाए गए इन 8 पृष्ठों वाले नियमों से सवर्ण जाति के लोग/छात्र/छात्राएं/शिक्षक जहाँ चिंतित हैं वहीं आरक्षित वर्ग के लोग हर्षित हैं। आरक्षित वर्ग के लोग इस कदम को सामाजिक भेदभाव खत्म करने/रोकने की दिशा में एक बढ़िया कदम मान रहे हैं। आरक्षित वर्गों के कॉलेज एवं विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राएँ विशेष रूप से हर्षित हैं क्योंकि वे कॉलेज, विश्वविद्यालय में जाति, धर्म, जेन्डर के नाम पर होने वाले भेदभाव की वास्तविकता से भली भाँति परिचित हैं। इस तरह के भेदभाव में सहपाठियों के साथ-साथ शिक्षक, गैर शिक्षकीय कर्मचारी से भी प्रताड़ित हो रहे होते हैं जो उनके उपनाम देख कर उनके साथ व्यवहार में परिवर्तन लाते हैं। सोशल मीडिया से यह समझ आया कि बहुत से सवर्ण बुद्धिजीवी यूजीसी के इस स्टेप की सराहना कर रहे हैं क्योंकि वे समाज में जाति आधारित भेदभाव की वास्तविकता को जानते समझते हैं।

सवर्ण जाति के लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि

·       आरक्षित वर्ग के छात्र/छात्रा इस नियम का गलत उपयोग कर उनकी/उनके बच्चों की छवि, मानसिक स्वास्थ्य और कैरियर का नुकसान कर सकते हैं।

·       उनके बीच हमेशा एक डर का माहौल रहेगा।

·       एक दूसरे के बीच स्वस्थ संवाद की चुनौती रहेगी।

इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस नियम व्यवस्था से दोनों वर्गो के बीच स्वस्थ संवाद की प्रक्रिया बाधित होगी, थोड़ी कमी आएगी। लेकिन इस दौरान सबसे अच्छी बात यह रहेगी कि  उनके आपसी बातचीत में सामन्ती मानसिकता/जातीय दंभ वाले व्यवहार में कमी आएगी। आरक्षित वर्गों के युवाओं को नौकरियों के साक्षात्कार में जिस तरह से Not found suitable (NFS) बता कर आगे बढ़ने की दौड़ से किनारा कर दिया जाता था, उस पर विराम लगाया जा सकेगा। ऐसे भ्रष्ट आचरण करने वाले समता समिति से डरेंगे और भ्रष्टाचार करने से पहले 10 बार सोचेंगे। जाति देखकर Not found suitable (NFS) करने वाले बेनकाब हो रहे होंगे।

इस आठ पृष्ठों वाले नियमों को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि सवर्णों का इससे डरना बेवजह है। यूजीसी के इस कदम का उद्देश्य देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक बहिष्करण को खत्म कर सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है, ताकि सभी नागरिको में एक समतामूलक समाज निर्माण की भावना विकसित हो और 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में हम खुद को और आने वाली पीढ़ी को विकसित करने की दिशा में अग्रसर हो। किसी पर बेवजह भेदभाव के आरोप लगाकर उसका नुकसान करना इस नियम का बिलकुल भी उद्देश्य नहीं है।

यूजीसी के इस प्रावधान की सार्थकता को POSH (Prevention of Sexual Harassment) के नियमों से समझा जा सकता है। 2013 में लाए गए इस कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि ‘कार्यस्थल (स्कूल, कार्यालय, कॉलेज, अस्पताल आदि) पर महिलाएं सुरक्षित महसूस कर बेफिक्र होकर कार्य कर सकें’। इस नियम में ‘सेक्शुअल हैरेसमेंट’ को इतनी गहराई से परिभाषित किया गया है कि इसके समक्ष ‘भेदभाव’ की परिभाषा सतही लगेगी। इस कानून के अनुसार निम्न व्यवहार को ‘Sexual Harassment’ के दायरे में रखा गया –

·       अनचाहा शारीरिक संपर्क या निजी दायरे का उल्लंघन,

·       यौन संबंधों या यौन सेवाओं की मांग करना,

·       बुरी नजर या अनुचित ढंग से देखना,

·       जबरन किए गए सेक्शुअल आचरण, यौन संबंध या हमले,

·       अभद्र प्रदर्शन या यौनिक तौर पर प्रकट हाव-भाव,

·       अनुचित, अंतरंग, सेक्सुल या सेक्सिस्ट बातचीत: ऑनलाइन या ऑफलाइन,

·       अनचाही फ्लर्टिंग, रोमैन्टिक या यौनिक पेशकश या गिफ्ट, आमंत्रण जैसे हाव-भाव,

·       स्त्री के शरीर, कपड़ों, या सेक्शुअल रुझान पर टिप्पणी या सलाह,

जिन कार्यस्थलों/कार्यालयों में इन नियमों के पालन कड़ाई से कराए जाते हैं वहाँ सभी जेंडर (स्त्री, पुरुष, थर्ड जेंडर) के बीच स्वस्थ संवाद की कोई चुनौती ही नहीं होती, बल्कि यथा संभव स्वस्थ संवाद ही होता है। स्वस्थ संवाद के कारण दोनों पक्षों के बीच किसी भी प्रकार के अवांछित/अनुचित व्यवहार भी नहीं होता है। सभी अपने कार्य में लगे रहते हैं। हाँ ! थोड़ा डर का माहौल भी जरूर होता है लेकिन यह डर सहकर्मी स्त्रियों के साथ अनुचित व्यवहार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा होता है। धीरे-धीरे सभी इस माहौल में रहने के आदि हो जाते हैं और इस बात को भी बेहतर तरीके से समझने लगते हैं कि इस प्रकार के तथाकथित कड़े नियम-कानून की हमारे समाज में आवश्यकता क्यों है?  

UGC Equity Regulations 2026’ Prevention of Sexual Harassment act 2013 जैसे नियम कानून हमारे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को और बेहतर करने के लिए ही बनाए जाते हैं। ऐसे में अच्छे नियम-कानून का विरोध करने, इसे वापस लेने की मांग, को किसी भी तरीके से उचित नहीं ठहराया जा सकता। ये सभी प्रावधान हमारे देश के नागरिकों को ही संवैधानिक मूल्यों को समझने, इस अनुसार आचरण करने का समय विकसित कर रहा होगा। फिर भी किसी वर्ग विशेष को यदि इसके अत्यधिक दुरुपयोग होने की संभावना लगती है तो यूजीसी को इसके नियमों को थोड़ा और व्यवस्थित करना चाहिए। हालांकि समता समिति में शामिल सदस्यों को इतना भी कमतर आंकना उपयुक्त नहीं माना जाना चाहिए। 

Saturday, 17 January 2026

मूर्तियों के चक्कर लगाता कुत्ता : भक्ति या भीतर की बेचैनी?

राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 हमें अपने आने वाली पीढ़ी में 21 वीं सदी के कौशल विकसित कर देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने की बात करती है। उनमें आलोचनात्मक चिंतन करने के कौशल विकसित करने को प्रयासरत हैं। यहाँ आलोचनात्मक चिंतन से तात्पर्य है - भावनाओं में बहकर प्रभावित हुए बिना किसी भी विचार, घटना को तर्क, प्रमाण और विवेक के आधार पर गहराई से सोच समझकर परखना फिर उसे स्वीकार करना। सरल शब्दों में यदि इसे समझा जाए तो आलोचनात्मक चिंतन सोचने की वह कला है जिसमे हम हर बात को तर्क और प्रमाण के आधार पर परखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाहता है कि हमारे देश के नागरिको में आलोचनात्मक चिंतन का कौशल नगण्य/नहीं के बराबर है। इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं

बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव नंदपुर स्थित मंदिर में एक कुत्ता वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करने लगता है। कई मीडिया रिपोर्टस स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर बताते हैं कि यह कुत्ता 12 जनवरी को मंदिर में आया था और लगातार 36 घंटे तक बिना कुछ खाये पिए हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करता रहा। इसके बाद कुछ देर के लिए यह कुत्ता बाहर चला गया। फिर वापस 14 जनवरी को यह मंदिर में आता है और माँ दुर्गा की परिक्रमा करने लगता है। इसके बाद वह कुत्ता एक स्थान पर स्थिर बैठा हुआ है। लोग उस कुत्ते को हनुमान जी के एक बहुत बड़े भक्त मानकर उसके ऊपर फूल मालाएं चढ़ाकर उनकी पूजा करना शुरू कर दिए हैं।   

किसी भी व्यक्ति/जीव की पूजा करना, उस पर फूल, माला चढ़ाना गलत नहीं है। अक्सर किसी के सामान्य से हटकर किये गए कार्य को सम्मान देने के लिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह सम्मान भी तभी जायज है जब उस सामान्य से हटकर किये गए कार्य को करने के लिए किसी ने लंबे समय तक अथक मेहनत कर कोई मिसाल कायम किया हो तो। यहाँ बात जीस कुत्ते की हो रही है, जिसे लोग हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त समझकर फूल माला चढ़ाकर पूजा करने लग जा रहे हैं, इससे पूर्व इसके द्वारा कभी भी हनुमान जी की परिक्रमा करने का दावा नहीं किया गया। क्योंकि कुत्ता भी जो कुछ भी कर रहा है उसके पीछे भक्ति नहीं एक मानसिक विकृति है। पशु चिकित्सक इस मानसिक विकृति को अच्छी तरह समझते हैं।  

आलोचनात्मक चिंतन कौशल का उपयोग करते हुए मैंने जानवरों के ऐसे व्यवहार का थोड़ा अध्ययन किया तो पाया कि जैसे उम्र बढ़ने के साथ इंसान के दिमाग में कई प्रकार की विकृतियाँ जैसे अल्जाइमर आने लगती है। जिसके कारण इंसान का व्यवहार बदल जाता है। इसी प्रकार जानवरों में भी इस प्रकार की विकृति उम्र के साथ आती है। कुत्तों में भी उम्र बढ़ने के साथ एक बिमारी देखने को मिलती है। जिसे Dog Dementia के नाम से जाना जाता है। वैसे कुत्तों की औसत आयु 10 से 12 वर्ष होती है ऐसे में 8-10 वर्ष की अवस्था के दौरान उनमें यह बिमारी देखने को मिल सकती है। इस बिमारी के कारण वे अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। जैसे -

·       उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है, परिचित लोगों को भी नहीं पहचान पाते हैं।

·       बिना वजह रात को लगातार भौंकते हैं।

·       उदासी, चिड़चिड़ापन से ग्रसित हो जाते हैं।

पहले हनुमान जी, फिर दुर्गा जी की परिक्रमा कर उदासी की अवस्था में बैठे इस कुत्ते के साथ भी संभवतः यही समस्या हो सकती है। पशु चिकित्सक इसकी बेहतर जांच कर कुत्ते को सुकून भरा जीवन दे सकते हैं। इस अंधविश्वास में जीते हुए कि यह कुत्ता भगवान का भक्त है, हम उसकी पूजा अर्चना कर उसके साथ ज्यादती करें, इससे अच्छा उसे पशु चिकित्सक को दिखाना ज्यादा आवश्यक लगना चाहिए।

इस घटना से मेरी एक और भ्रांति भी दूर हुई। रात को कई बार बेवजह कुत्तों को भौंकते हुए देखा सुना है। अन्य लोगों के साथ-साथ मुझे भी लगता था कि कुत्तों को आत्माएं दिखती है इस कारण से वे उस दिशा में मुंहकर भौंकते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि ‘यहाँ कोई है’। आप समझ आया कि कोई कुत्ता यदि रात को बेवजह भौंक रहा है तो इसका अर्थ है – वह कुत्ता Dog Dementia बिमारी की चपेट में है न कि उसे कोई आत्मा दिख रही है।

याद रखें आलोचनात्मक चिंतन ही वह कौशल है जो हमें अंधविश्वास से मुक्त कर सकती है।

Saturday, 3 January 2026

आईपीएल में बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद: असली मुद्दा या ध्यान भटकाने की चाल?

पिछले कुछ दिनों से राजनेता से लेकर कई कथा वाचक जैसे देवकीनंदन, रामभद्राचार्य आदि बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान पर अलग-अलग सभाओं, मीडिया बाइट्स देने के दौरान भड़कते नजर आए। वे उन्हें ‘गद्दार’ से लेकर कई तरह के अपमानजनक उपमाओं से नवाज़ रहे हैं। ऐसा कहने के पीछे उनके पास कोई ठोस आधार नहीं है। उनको भड़काने का काम कई मीडिया चैनल से लेकर न्यूज एजेंसी कर रही है। ये भड़कने-भड़काने का खेल शाहरुख खान के किसी फ़िल्म को लेकर नहीं था बल्कि शाहरुख खान की मालिकता वाली टीम ‘कोलकाता नाइट राइडर्स’ (जिसमें उनकी 55% हिस्सेदारी है, बाकी के 45% हिस्सेदारी मेहता ग्रुप के पास है) में बांग्लादेश के खिलाड़ी ‘मुस्ताफिजुर रहमान’ को आईपीएल सीज़न 2026 में अपनी टीम की ओर से खेलने के लिए 9.20 करोड़ में खरीदने के कारण था।

हालांकि यह पहला मौका नहीं था जब बांग्लादेशी क्रिकेटर्स को किसी टीम ने खरीदा था। जिस खिलाड़ी को लेकर विवाद शुरू हुआ है वह इससे पूर्व 2016 में सनराइजर्स हैदराबाद, मुंबई इंडियन्स (2018) और दिल्ली कैपिटल्स (2022, 2023 एवं 2025) चेन्नई सुपर किंग्स (2024) जैसे टीम के साथ भी इससे पूर्व जुड़े रहे हैं। सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ दिनों ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह विरोध ट्रेंड करने लगा, मीडिया इसे प्रमुखता देने लगी? आइए इसे समझने का प्रयास करते हैं।  

 दिनांक 16 दिसंबर 2025 को आईपीएल 2026 के लिए देश विदेश के क्रिकेट खिलाड़ियों की नीलामी होती है। जिसमें शाहरुख खान की टीम द्वारा बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्तफिजूर रहमान को खरीदा जाता है। इसके 2 दिन बाद बांग्लादेश में 18 दिसंबर 2025 को कुछ कट्टरपंथियों द्वारा एक हिंदू व्यक्ति दीपू दास की हत्या कर दी जाती है। इस घटना से बांग्लादेश के प्रति भारत के लोगों का आक्रोश बढ़ जाता है। इस घटना का निष्पक्ष अवलोकन करें तो सवाल यह बनता है कि इसमें शाहरुख खान की क्या गलती? पहली बात तो ये है कि मुस्तफिजुर रहमान की नीलामी दीपू दास की हत्या के 2 दिन पूर्व हो चुकी थी। यानी भारतीय लोगों की भावनाएँ भड़कने के 2 दिन पूर्व ही इसकी नीलामी हो चुकी थी। दूसरी बात - खिलाड़ियों को नीलामी में शामिल करने का फैसला आईपीएल को आयोजित करने वाले समिति का था। ऐसे में यदि किसी देश के खिलाड़ी को नीलामी की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है तो इसके लिए उत्तरदायी आईपीएल आयोजित करने वाली समिति है। न कि किसी टीम का मालिक।

ऐसे में सवाल उठता है कि किसी देश के खिलाड़ी को किसी क्रिकेट टूर्नामेंट के खेलाने के लिए ये बीसीसीआई या आप आईपीएल आयोजन समिति का विरोध क्यों नहीं करते? क्या यह अज्ञानता में ऐसा कर रहे हैं? या कोई सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है। मेरा मानना है कि बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद को फालतू मुद्दा बनाने, और बढ़ावा देने के पीछे संगीत सोम, देवकीनंदन, रामभद्राचार्य से लेकर NDTV जैसे घटिया चैनल की सोची समझी साजिश है। मैं यह बात कोई हवा हवाई नहीं कर रहा हूँ, बल्कि इसके पीछे कुछ आधार हैं। पिछले 10 दिन के घटनाक्रम का अवलोकन करें तो पाते हैं कि जो कुछ भी देश भर में घटित हुआ है वह बीजेपी के लिए कलंक की तरह है। इस विमर्श में जो भी राजनेता से लेकर कथावाचक शामिल रहे हैं वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे होते हैं।

अब पिछले 2-3 सप्ताह की घटनाओं का अवलोकन करते हैं।

·       उन्नाव रेप कांड में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सजा प्राप्त पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर की सजा का निलंबन। इस दौरान बीजेपी समर्थित नेताओं/लोगों द्वारा कुलदीप सेंगर का पक्ष लेना (जिससे क्रुद्ध होकर देश की जनता ने बीजेपी को target करते हुए खूब खरी खोटी सुनाई)।

·       अंकिता भंडारी मर्डर में बीजेपी नेता का नाम आना,

·       बीजेपी शासित उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून में नार्थ ईस्ट के student का मर्डर कांड,

·       क्रिसमस के अवसर पर बीजेपी समर्थित संगठनों की गुंडागर्दी और उसपर बीजेपी नेताओं की चुप्पी,

·       इंदौर में दूषित जल से हुई मृत्यु पर बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय द्वारा एक पत्रकार को अपशब्द कहा जाना।

ये घटनाएं बीजेपी के लिए अभिशाप बन रही थी। सोशल मीडिया पर बीजेपी की खूब आलोचना हो रही थी। ऐसे में विमर्श को भटकाने के लिए ये नया शिगूफा छोड़ा गया है। ताकि विमर्श का मुद्दा बदल जाए साथ ही बंगाल चुनाव तक हिंदू मुसलमान मुद्दा जीवित रह सके।

Saturday, 6 December 2025

पांच दिवसीय नवीन पाठ्यपुस्तक उन्मुखीकरण कार्यशाला का समापन

 शासकीय माध्यमिक शाला खिलोरा (बेमेतरा) में दिनाँक 2 से 6 दिसंबर 2025 तक पूर्व माध्यमिक शाला के शिक्षकों के लिए नवीन पाठक पुस्तक उन्मुखीकरण कार्यशाला आयोजित की गई। इस पांचदिवसीय कार्यशाला में बेमेतरा विकासखंड के पूर्व माध्यमिक शालाओं के 200 से अधिक शिक्षकों को वर्ष 2025 में लाए गए विज्ञान (जिज्ञासा), सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन), अंग्रेजी (पूर्वी), संस्कृत (दीपकम) विषय के नवीन पाठ्यपुस्तकों का उन्मुखीकरण किया गया। इन विषयों के अतिरिक्त नए जोड़े गए पाठ्यपुस्तक जैसे - खेल एवं योगशिक्षा (खेल यात्रा), कला शिक्षा (कृति 1), व्यावसायिक शिक्षा (कौशल बोध) से भी शिक्षकों को परिचित कराया गया।

शासकीय माध्यमिक शाला, खिलोरा के चार अलग-अलग कमरों में आयोजित इस कार्यशाला में सभी शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मुख्य प्रावधनों से परिचित कराते हुए इसके क्रियान्वयन हेतु बनाए गए दस्तावेज राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) 2023 से परिचित कराया गया। तत्पश्चात इसमें उल्लेखित सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, अंग्रेजी, संस्कृत आदि विषयों को पढ़ाने के उद्देश्य, पाठचर्या के लक्ष्य, शिक्षण विधि, इस हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले शिक्षण सहायक सामग्री, संबंधित सीखने के प्रतिफल, आदि को गतिविधियों के माध्यम से करके बताया गया। शिक्षकों को प्रत्येक विषय का अध्याय वार डेमो कराकर विषय पर गहराई से समझ विकसित करने का प्रयास किया गया।

इन पांच दिनों के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के एक प्रमुख लक्ष्य – ‘बच्चों को 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने’ को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त गतिविधियों पर समझ विकसित किया गया। इन बिंदुओं पर चर्चा केंद्रित रही -

·       कक्षा में अलग-अलग विषय वस्तु पर छोटे-छोटे प्रोजेक्ट देकर बच्चों को स्वयं से समझ के साथ किसी अवधारणा को सीखने के किस प्रकार मौके दिए जा सकते हैं?

·       सीखने की प्रक्रिया में रोचकता लाने के लिए अलग अलग प्रकार की विधियों जैसे - टीएलएम के प्रयोग, रोल प्ले, वाद-विवाद, बातचीत के मौके देकर उनमें आलोचनात्मक चिंतन इसका कौशल लाया जाए?

·       बच्चों के सीखने में शिक्षकों के साथ-साथ समुदाय के विषय विशेषज्ञ की एक स्रोत व्यक्ति के रूप में किस प्रकार सेवाएं लिया जा सकता है?

·       अलग-अलग अवधारणाओं पर समझ बनाने में कक्षा का प्रिंट समृद्ध माहौल किस प्रकार सहायक है?

·       प्रत्येक पाठ शिक्षण के दौरान किन अलग अलग प्रकार के शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जा सकता है?

कार्यशाला के समापन पर पांचवें दिन BEO- Bemetara, BRC – Bemetara एवं DIET, Bemetara के faculty शिक्षकों का उत्साहवर्धन करने हेतु शामिल हुए। सभी शिक्षकों को सक्रिय सहभागिता हेतु सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया। चारों विषय के कुल 12 मास्टर ट्रेनर ने सत्र को संचालित किया। इस कार्यशाला में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, बेमेतरा के तीन सदस्य नेहा (विज्ञान) श्रेया (अंग्रेजी) एवं साकेत (सामाजिक विज्ञान) विषय में शामिल हुए।