मानव
जीवन के सफर में नामक अलग-अलग पड़ाव या अवस्था आते हैं. मानव विज्ञानी इन अवस्थाओं
को अलग-अलग नाम से संबोधित करते हैं. जैसे - शैशवावस्था (जन्म से 2 वर्ष तक)
आरंभिक बाल्यावस्था (2 से 6 वर्ष), उत्तर बाल्यावस्था (6 से 12 वर्ष)
किशोरावस्था (12 से 18 वर्ष) युवावस्था (18 से 40 वर्ष), प्रौढ़ावस्था
(40-60 वर्ष), और वृद्धावस्था (60 वर्ष के बाद). जीवन की इन अवस्थाओं का
आधार हमारे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक विकास में आए बदलाव होते हैं. इस अवस्था
विकास के क्रम में हमारी जिम्मेदारियां बदलती रहती है.
जीवन के सफ़र के साथ-साथ एक और सफ़र हमारे जीवन से जुड़ी होती
है. यह है - शैक्षिक सफर. शिक्षा विज्ञानी इस सफ़र को भी अलग-अलग उद्देश्य और
जिम्मेदारियों में विभाजित करते हुए अलग-अलग नाम से संबोधित करते हैं. जैसे – अनौपचारिक
शिक्षा (वास्तविक जीवन अनुभव से परिवार, समाज में रहते हुए सीखना), औपचारिक शिक्षा
(व्यवस्थित पाठ्यक्रम के माध्यम से शैक्षिक संस्थान में रहते हुए सीखना). औपचारिक
शिक्षा को भी अलग-अलग स्तर में विभाजित किया गया है. जैसे – प्राथमिक शिक्षा
(कक्षा 1 से 5) उच्च प्राथमिक या पूर्व माध्यमिक (कक्षा 6 से 8) माध्यमिक शिक्षा
(कक्षा 9 एवं 10) उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 11 एवं 12) उच्च शिक्षा (स्नातक,
परास्नातक, शोध) आदि.
अपनी क्षमता, आवश्यकता और परिस्थिति के अनुरूप हम सभी
अलग-अलग स्तर तक सफ़र कर पाते हैं. ये अलग बात है कि जागरूकता नहीं होने के कारण
शैक्षिक जीवन में आगे बढ़ते हुए हम इस बात पर ध्यान नहीं दे पाते हैं कि हम शिक्षा
के सफ़र के किस पड़ाव में हैं. सामान्यतः कोई बताने वाला भी नहीं होता है. ऐसे में
एक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति के लिए या एक जिज्ञासु विद्यार्थी को
शैक्षिक सफ़र के इन अवस्थाओं का ज्ञान अवश्य ही होना चाहिए. शिक्षा के अवस्थाओं पर
पहुँचने से पूर्व यहाँ प्रयुक्त दो प्रमुख शब्दावली अनौपचारिक शिक्षा और औपचारिक
शिक्षा को भी समझते हुए चलते हैं.
अनौपचारिक शिक्षा
अनौपचारिक
शिक्षा से तात्पर्य एक ऐसी शिक्षा से है जिसे जीवन के अनुभवों से स्वाभाविक रूप से
सीखा जाता है. जैसे अपने परिवार, समाज, दोस्तों के साथ रहते हुए, दूसरों को देखकर,
सुनकर, अपने अनुभव, अपने गलतियों से सीखते हुए हम भाषा (व्याकरण हिस्से को छोड़कर),
व्यवहार, जीवन जीने के तौर-तरीके, खेती करने से लेकर अलग-अलग प्रकार के काम सीखते
हैं. इसे सीखने के लिए हमारे पास न तो कोई निर्धारित पाठ्यक्रम होता है, न
ही परिवार, समाज के लोग व्यवस्थित रूप से कहीं कक्षा में बैठाकर सिखाते हैं, न ही
उनके द्वारा हमारे सीखने के स्तर का आकलन या मूल्यांकन किया जाता है, और
न ही इसके लिए परिवार या समाज की ओर से किसी प्रकार का प्रमाण पत्र दिया जाता है.
बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक यह चलती रहती है.
औपचारिक शिक्षा
अनौपचारिक
शिक्षा के विपरीत औपचारिक शिक्षा एक व्यवस्थित शिक्षा व्यवस्था होती है जिसका एक निर्धारित
पाठ्यक्रम (क्या पढ़ाया जाएगा), निर्धारित शैक्षिक सत्र (एक/दो/तीन वर्ष) होता है.
साथ ही सिखाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक द्वारा (प्रयोग, गतिविधि व शिक्षण अधिगम
सामग्री का उपयोग करते हुए) व्यवस्थित तरीके से कक्षा में अध्यापन कराया जाता है, तत्पश्चात
बच्चों के सीखने का आकलन किया जाता है, अंत में पाठ्यक्रम पूरा होने पर संबंधित
संस्थान द्वारा प्रमाण पत्र दिया जाता है. क्रमबद्ध तरीके से यह स्तर बढ़ता जाता है.
स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई इस औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत आती है. बच्चों में
अपेक्षित कौशल का विकास जो बच्चे के साथ-साथ देश के विकास में भी योगदान दे, इसका
मुख्य उद्देश्य है.
कौन बेहतर? अनौपचारिक या औपचारिक
हमारा
सीखना जीवन पर्यंत चलता रहता है. शैक्षिक संस्थाओं में हम 3 से 35 वर्ष (आंगनबाड़ी
से लेकर शोध करने तक) औपचारिक रूप से सीख रहे होते हैं जबकि इसके पूर्व और बाद का
सीखना अनौपचारिक रूप से चलता रहता है. आवश्यक कौशल विकसित करने में दोनों का एक
सामान महत्व है.
औपचारिक शिक्षा के विभिन्न स्तर
उपरोक्त
बातों से स्पष्ट है कि पहली कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक औपचारिक शिक्षा के
अंतर्गत आते हैं. इस निर्धारित स्वरुप वाले पाठ्यक्रम को भी अलग-अलग स्तरों में
विभाजित किया गया है –
प्राथमिक स्तर – औपचारिक शिक्षा का यह पहला स्तर है. ‘प्राथमिक’
शब्द का प्रयोग बुनियाद (नींव) के अर्थ में किया जाता है. इस स्तर में बच्चों में
शिक्षा की बुनियाद रखने का कार्य किया जाता है. कक्षा 1 से 5 तक की शिक्षा इसके अंतर्गत आते हैं. इस स्तर
की शिक्षा देने वाले विद्यालयों को प्राथमिक स्कूल के नाम से जाना जाता है. उदाहरण
के लिए – शासकीय प्राथमिक शाला, बेमेतरा. राष्ट्रीय शिक्षा
नीति 2020 में प्राथमिक स्तर को foundational (आंगनवाड़ी के 3 वर्ष एवं कक्षा 1, 2)
और preparatory (कक्षा 3, 4, 5)
स्टेज के अंतर्गत रखा गया है. इस स्तर पर बच्चों में भाषाई एवं गणितीय दक्षता, समाज
एवं पर्यावरण से संबंधित अवधारणा विकसित करने के उद्देश्य से हिंदी, अंग्रेजी,
गणित एवं पर्यावरण अध्ययन (छत्तीसगढ़ के संदर्भ में) से संबंधित न्यूनतम सीखने के
प्रतिफल (Learning Outcomes) प्राप्त कर लेने की अपेक्षा
होती है. अर्थात हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा में समझ के साथ पढ़ना-लिखना, दैनिक जीवन
में प्रयुक्त होने वाले बुनियादी गणित (संख्या समझ, चार संक्रिया, ज्यामितीय आकृतियाँ,
मापन आदि) से संबंधित समझ बनाने की नींव (बुनियाद) इस स्तर रखी जाती है ताकि अगले
स्तर (उच्च प्राथमिक या पूर्व माध्यमिक) पर इन विषयों से संबंधित अमूर्त अवधारणाओं
को बच्चे अच्छी तरह समझ पाएं. कक्षा 1 एवं 2 में बच्चों से जहाँ 2 भाषाओँ में पढ़-लिख
पाने (डिकोडिंग), गणितीय अवधारणाओं, संक्रिया को समझ पाने की अपेक्षा होती है,
वहीँ कक्षा 3,4,5 में किसी भाषा के प्रसंग को समझ के साथ पढ़ पाने, उस भाषा में
अपने विचारों को मौखिक व लिखित रूप से अभिव्यक्त कर पाने की, 3, 4 या 5 अंकों से
संबंधित संक्रिया को हल कर पाने की दक्षता प्राप्त करने की अपेक्षा होती है.
उच्च
प्राथमिक या पूर्व माध्यमिक स्तर - यह प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर के बीच के कड़ी के
रूप में काम करता है. कक्षा 6, 7 एवं 8 इसके अंतर्गत आते हैं. इस स्तर की शिक्षा देने वाले विद्यालयों को
उच्च प्राथमिक/पूर्व माध्यमिक स्कूल के नाम से जाना जाता है. उदाहरण के लिए –
शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला, बेमेतरा. राष्ट्रीय शिक्षा
नीति 2020 में इस स्तर को ‘मिडिल स्टेज’ नाम से संबोधित किया गया है. इस स्टेज में
तीन भाषा विषय (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत), गणित, विज्ञान,
सामाजिक विज्ञान विषय का व्यवस्थित अध्यापन कराया जाता है. वर्तमान
में खेल, योग एवं कला शिक्षण जैसे विषयों को भी शामिल किया
गया है. इस स्तर पर न केवल अलग-अलग विषयों के अलग-अलग शिक्षक की व्यवस्था शुरू
होती है बल्कि शिक्षकों के शिक्षण का तरीका भी बदल जाता है. अलग-अलग विषयों से
संबंधित अवधारणा को रटने की जगह उसके 'क्यों' और 'कैसे' समझने/समझाने पर जोर
दिया जाता है. इस स्टेज में अपेक्षा यह रहती है कि बच्चा सिर्फ यह नहीं रटकर याद
कर ले कि ‘सिंधु घाटी सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी’. बल्कि इस दिशा में सोचना शुरू
करे कि ‘सिंधु घाटी सभ्यता से ऐसे क्या-क्या साक्ष्य, अवशेष मिले हैं जो इस बात को
स्थापित करते हैं कि यह नगरीय सभ्यता थी’. अर्थात बच्चों को आलोचनात्मक चिंतन,
तर्क करने पर जोर दिया जाता है. NCF – SE दस्तावेज में इस स्टेज में सभी विषयों के
शिक्षण को रुचिकर बनाने के लिए कई उपाय बताए गए हैं.
माध्यमिक
स्तर – पूर्व माध्यमिक स्तर पार करने के बाद राष्ट्रीय
शिक्षा नीति 2020 में इस स्तर को secondary stage नाम से संबोधित किया गया है. कक्षा 9 एव 10 इसके अंतर्गत आते हैं. स्कूल
के नाम कुछ इस तरह होते हैं – शासकीय माध्यमिक शाला/उच्च विद्यालय, बेमेतरा. पूर्व
माध्यमिक कक्षा के विषयों को ही थोड़ी अधिक गहराई से पढ़ाया जाने लगता है. शिक्षा का
यह स्तर उनके जीवन की दिशा तय करता है. पूर्व माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का उद्देश्य
जहां जिज्ञासा जगाना होता है, वहीँ माध्यमिक स्तर पर इसका उद्देश्य थोडा व्यापक हो
जाता है. किसी घटना को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जीवन से जोड़ते हुए विश्लेषित कर
अपनी राय बनाने का कौशल विकास इस स्तर पर प्रमुख उद्देश्य हो जाता है.
उच्चतर माध्यमिक स्तर – उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने के पूर्व का स्तर है यह. इसके
अंतर्गत कक्षा 11 एवं 12 आते हैं. अलग-अलग राज्यों में इसे इंटरमीडिएट भी कहा जाता
है. इस स्तर पर बच्चा यह तय करता है कि उसे किस विषय को लेते हुए आगे बढ़ना है? इस
स्तर पर उनके लिए तीन दरवाजे होते हैं – कला, विज्ञान और वाणिज्य. अपनी रूचि के
विषय में वह गहराई में उतरने की शुरुआत करता है. इस स्तर पर बच्चे को स्वतंत्र
चिंतन की ओर ले जाया जाता है. वह किसी घटना के कारण जानने के साथ-साथ समाज पर उसके
दीर्घकालीन प्रभाव, उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए सरकार की नीति का मूल्यांकन
करता है.
उच्च शिक्षा – इस
स्तर पर कोई बच्चा छात्र/छात्रा से आगे बढ़ते हुए विषय विशेषज्ञ बनने की शुरुआत
करने के साथ-साथ अंजाम भी देता है. इसके अंतर्गत 3-4 वर्षीय स्नातक, 2 वर्षीय
स्नातकोत्तर और नवीन ज्ञान का सृजन करने वाली शोध की डिग्री आती है. विद्यालय से
हटकर इनकी पढ़ाई कॉलेज व विश्वविद्यालयों में होती है. यहाँ विद्यार्थी स्वतंत्र
रूप से सीखते हैं, शिक्षक/प्रोफ़ेसर केवल मार्गदर्शक की भूमिका में होते हैं.
इस तरह हमारे देश में शिक्षा का स्तरीकरण किया गया है.


