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Wednesday, 19 August 2026

प्राचीन भारतीय शिक्षा की वैदिक पृष्ठभूमि एवं वेदों का स्वरूप

यह सर्वमान्य है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा की शुरुआत वेदों के अध्ययन से शुरू होती है. शुरुआत में यह श्रुति के रूप में थी बाद में इसे लेखबद्ध किया गया. अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएं’ शारदा प्रकाशन, इलाहाबाद (2016) में लेखक डॉक्टर एस.पी गुप्ता, डॉक्टर अलका गुप्ता अपना मत अभिव्यक्त करते हैं कि ‘प्रारंभ में वेद केवल एक ही था. भिन्न-भिन्न ऋषियों के द्वारा रचित मंत्रों और यज्ञ की विधि बताने वाले ब्राह्मणों का यह एक संग्रह था. उसी में जो मंत्र पद्य के रूप में आते उन्हें 'ऋक' कहते थे. गान रूप में गाए जाने वाले मंत्रों को 'साम' और गद्य रूप में पढ़े जाने वाले मंत्रों को 'यजु' कहा जाता था. प्रारंभ में सभी द्विज उनका अध्ययन करते थे. किंतु जब विद्वानों ने देखा कि संपूर्ण वेद का ग्रहण और धारण मनुष्य की शक्ति से बाहर होता जा रहा है. तब उन्होंने उस वेद को चार भाग में विभक्त कर दिया जिसे चार संहिताओं के रूप में आज हम देखते हैं’.

वेद का मुख्य विषय यज्ञ है. यज्ञ में यजमान और उसकी पत्नी के अतिरिक्त चार ब्राह्मण कार्यकर्ता आवश्यक होते हैं, जिन्हें 'ऋत्विक' कहा जाता है. उनके नाम होतृ, उदगातृ, अध्वर्यु, और ब्रह्मा हैं. जो देवताओं की स्तुति पढ़ता है, उसे होतृ कहा जाता है. गान के रूप में स्तुति करने वाला उदगातृ कहलाता है. अग्नि में आहुति देने वाला अध्वर्यु है, जो यज्ञ का प्रधान कार्यकर्ता होता है. इन तीनों के कार्यों का निरीक्षण करने वाले को 'ब्रह्मा' कहा जाता था. इन चारों के कार्यों को अलग-अलग बांट देने के लिए वेद को चार भागों में विभक्त किया गया, जिससे कि एक-एक भाग या संहिता पढ़ लेने से उससे संबंधित एक कार्य करने की योग्यता पूर्ण हो जाए. यह चार भाग हैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद.

केवल ऋग्वेद का अध्ययन कर लेने वाला होतृ बन सकता है, इसी प्रकार उदगातृ बनने के लिए केवल सामवेद पढ़ लेने की आवश्यकता है. यजुर्वेद संहिता का अध्ययन कर लेने से अध्वर्यु का कार्य चल जाता है. केवल ब्रह्मा के लिए चारों वेदों को पढ़ने की आवश्यकता होती है क्योंकि वह तीनों ‘ऋत्विक’ का निरीक्षक होता था. यदि उनके कार्यों को वह स्वयं न जानता हो तो निरीक्षण कैसे करेगा? इसके अतिरिक्त शांति, पुष्टि, काम करने के लिए उन्हें अथर्ववेद पढ़ने की भी आवश्यकता होती थी, यज्ञ में ब्रह्मा वही हो सकता है जो चतुर्वेदी हो. स्पष्ट है इन्हीं कारणों से हमें कहीं तीन तो कहीं चार वेद बताए जाते हैं.


Tuesday, 18 August 2026

Operation Blackboard : स्कूल में न्यूनतम आधारभूत सुविधाएं सुनिश्चित करने का शुरूआती प्रयास

सन 1986 ईस्वी में राजीव गांधी के नेतृत्वा वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में देश को आगे ले जाने के उद्देश्य से दूसरी शिक्षा नीति (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986) लाई गई. इस दस्तावेज में सभी वर्गों के लिए शिक्षा के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया गया. इस दस्तावेज में प्रत्येक स्कूल में आवश्यक शैक्षिक सुविधाएं व शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने की बात थी. इस दौर में बहुत से प्राथमिक शालाओं में आवश्यक संसाधनों (पर्याप्त कक्षाकक्ष, शिक्षक, TLM  की कमी थी. इन बातों को ध्यान में रखते हुए 1987 ई. में Operation Blackboard योजना की शुरुआत की गई. स्कूल में सीखने का उचित वातावरण मिले इसके लिए प्रत्येक स्कूल में निम्न सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया था -

·       प्रत्येक स्कूल में कम-से-कम दो उपयोगी कक्षाएं या कमरे.

·       कम से कम दो शिक्षक, ताकि विद्यालय केवल एक शिक्षक पर निर्भर ना रहे.

·       आवश्यक शिक्षण सामग्री (TLMs)

·       बच्चों के सीखने के लिए शैक्षिक उपकरण और सामग्री.


Monday, 17 August 2026

NIPUN Bharat Mission: 21वीं सदी के नागरिक निर्माण की ओर एक कदम

NIPUN (National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy) Bharat Mission भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण शिक्षा पहल है, जिसकी शुरुआत, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जुलाई 2021 में हुई. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रावधानों को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई जिसका मुख्य उद्देश्य है कक्षा 3 तक प्रत्येक बच्चों में Foundational Literacy and Numeracy (FLN) अर्थात बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान सुनिश्चित करना। वर्ष 2026-27 तक इस लक्ष्य प्राप्ति का समय निर्धारित किया गया है. यह कक्षा 3 तक प्रत्येक बच्चे (सरकारी या निजी स्कूल का) में दो प्रकार की दक्षताएं सुनिश्चित करने की बात करता है –

(1)    FL (Foundational Literacy) अर्थात बुनियादी साक्षरता –

प्रत्येक बच्चे में बुनियादी साक्षरता की दक्षता भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, या अन्य स्थानीय भाषा) विषय के प्रभावी अध्ययन से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. इसके अंतर्गत कक्षा 3 तक प्रत्येक बच्चे से अपेक्षित है कि वह किसी चित्र को देखकर, उसका अवलोकन कर मौखिक एवं लिखित रूप से वह बता पाए कि चित्र में क्या-क्या (वस्तुओं के नाम) है? चित्र में छिपे संदेश को मौखिक या लिखित रूप से बता पाए. किसी पाठ/कविता/कहानी या छोटे प्रसंग को पढ़ने के बाद वह बता पाए कि यह कविता/कहानी/प्रसंग किससे संबंधित है, इसमें कौन-कौन से पात्र हैं? उनके बीच क्या संवाद हो रहा है? कविता/कहानी/प्रसंग में प्रयुक्त वाक्यों की क्रमबद्धता बता पाए. कविता/कहानी/प्रसंग में प्रयुक्त परिचित शब्दों का अपने संदर्भ (दैनिक जीवन) में उपयोग कर पाए, अपरिचित शब्दों के अर्थ बता पाए. उस कविता/कहानी/प्रसंग को अपनी कल्पना से आगे बढ़ा पाए, उसके अंत को एक अलग मोड़ दे पाए. अपने दिमाग में चल रही बातों (विचारों) को लेखबद्ध कर पाए. सोचकर लिख पाने के कौशल का उपयोग करते हुए कुछ नए कविता-कहानी का सृजन कर पाए.

(2)    FN (Foundational Numeracy) अर्थात बुनियादी संख्याज्ञान –

प्रत्येक बच्चे में बुनियादी संख्याज्ञान की दक्षता गणित विषय के प्रभावी अध्ययन से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. इसके अंतर्गत तीसरी कक्षा के बच्चों से अपेक्षित है कि कक्षा के अंत तक बुनियादी गणित के कौशल से युक्त हों. अर्थात गणितीय अवधारणाओं जैसे संख्या पूर्व अवधारणा (रंग, आकार, माप, स्थिति, वर्गीकरण, एक-एक की संगति, तुलना करना आदि), संख्या समझ (संख्या नाम एवं उसके लिए निर्धारित संकेत, गिनती) संक्रिया (जोड़ना, घटाना, गुणा, भाग) आकृति एवं स्थानिक समझ, मापन (लम्बाई, मानक व अमानक इकाइयों की समझ), पैटर्न, डाटा प्रबंधन, गणितीय सोच का मौखिक या लिखित प्रस्तुतीकरण, गणित का दैनिक जीवन में उपयोग. इसे एक उदाहरण से हम बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. किसी पहली कक्षा के बच्चे को हमने 10 आम दिए और उनसे हम निम्न सवाल पूछे –

·       आम का आकार कैसा है? गोल है, त्रिकोण है या चौकोर?

·       आम को गिन कर और लिखकर बताओ कि आपके पास कितने आम हैं?

·       आपके पास 10 आम हैं 2 और आम मैंने आपको दे दिए अब आपके पास कितने आम हैं?

·       10 आम में से 5 आम अपने दोस्त को दे दो. अब कितने आम आपके पास बचे?

·       10 आम को अपने 1 दोस्त से बांटो. दोनों को कितने-कितने आम मिलेंगे?

·       एक हाथ में 2 आम दुसरे हाथ में 3 आम रखो अब तुलना कर बताओ कौन हल्का है कौन भारी?

दूसरी व तीसरी कक्षा के बच्चों से उनके कक्षा अनुरूप निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप सवाल को modify कर पूछ सकते हैं – जैसे – कक्षा 3 के बच्चों से अपेक्षा है कि 1 से 9999 तक की संख्या से संबंधित संक्रिया हल करना). इस तरह तीसरी कक्षा का कोई बच्चा यदि 1 से 4 अंकों से संबंधित सवालों के सही जवाब दे देते हैं तो हम कह पाएँगे कि उस बच्चे ने FN (Foundational Numeracy) skill हासिल कर लिया है.  

NIPUN Bharat Mission के अंतर्गत उपरोक्त दोनों विषयों से संबंधित दक्षताओं की प्राप्ति पर इसलिए भी जोर दिया गया कि ये दक्षताएं ही आगे की कक्षा के अलग-अलग अवधारणाओं पर समुचित समझ बनाने का काम करते हैं. बिना इसके पर्यावरण अध्ययन, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं को समझ पाना बच्चों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों का क्षमतावर्द्धन भी इसका एक प्रमुख उद्देश्य है. शिक्षकों से अपेक्षा है कि बच्चों में उपरोक्त दोनों विषयों से संबंधित दक्षता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे शैक्षिक विधियों (pedagogy), प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करें जिससे बच्चे खेल-खेल में भरपूर आनंद लेते हुए सीख पाएं. जैसे – खेल आधारित शिक्षण, गतिविधि आधारित शिक्षण, कहानी एवं कविता के माध्यम से शिक्षण, अनुभवात्मक शिक्षण, बाल केंद्रित शिक्षण, TLM का प्रयोग आदि.

एक उदाहरण के माध्यम से इसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है - भाषाई दक्षता लाने के लिए कविता/कहानी को रुचिपूर्ण तरीके से हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव, के साथ सुनाएं (खेल एवं गतिविधि आधारित शिक्षण), कविता/कहानी के पात्रों, प्रमुख घटनाओं पर बच्चों को अपने विचार अभिव्यक्त करने के अवसर दें (बाल केंद्रित शिक्षण). उस कविता/कहानी को Stick Puppet या Hand Puppet के माध्यम से सुनाएं (TLM का प्रयोग). बच्चों से उस कविता/कहानी का नाट्य रूपांतरण करवाएं ((खेल एवं गतिविधि आधारित शिक्षण).

इसी तरह गणितीय दक्षता विकसित करने के लिए किसी भी अवधारणा पर काम करने से पूर्व उससे संबंधित कोई कविता कहानी सुनाएं, या बातचीत करें (कहानी एवं कविता के माध्यम से शिक्षण), बातचीत करते हुए बच्चों को ठोस वस्तुओं की सहायता से उसे अवधारणा तक ले जाएं उदाहरण के लिए अलग-अलग आकर से संबंधित ठोस वस्तु जैसे गोला, बेलन, घन, घनाभ आदि मॉडल पर टॉर्च जलाकर उसकी परछाई का अवलोकन करवाना (TLM का प्रयोग, अनुभवात्मक शिक्षण). धारिता पर काम करते हुए पहले अमानत इकाइयों से पानी को मापना, फिर मानक इकाई से पानी को मापते हुए दोनों के बीच के अंतर समझते हुए धारिता से संबंधित मानक इकाइयों की आवश्यकता को समझना (TLM का प्रयोग, अनुभवात्मक शिक्षण).

उपरोक्त बातों से यह स्पष्ट है कि NIPUN Bharat Mission भाषाई एवं गणितीय अवधारणाओं को rote learning की जगह समझ के साथ सीखने पर बल देता है. इस तकनीक से यदि बच्चों के साथ काम किया जाए तो वे भाषा शिक्षण के उद्देश्यों को समझ पाएँगे, भाषा एवं गणित विषय के अमूर्त अवधारणाओं को मूर्त वस्तुओं के माध्यम से समझ पाएँगे, किसी भी घटना के पीछे निहित कार्य-कारण संबंध को जान पाएँगे जिससे वे logical thinking की ओर अग्रसर हो रहे होंगे, गणित के सवालों को हल करते हुए मानक कलन विधि (standard algorithm) के पीछे निहित तर्क को समझ सकेंगे, अपनी बातों के समर्थन में तर्क देना सीख पाएंगे. इस तरह यह बच्चों में उन भाषाई एवं गणितीय कौशल विकसित करने की बात करता है, जो हमारे बच्चों को 21वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.    


Sunday, 16 August 2026

कब कहेंगे कि बच्चे ने Foundational Literacy दक्षता प्राप्त कर लिया है?

2020 शिक्षा नीति में उल्लेखित बातों/निर्देशों को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से जुलाई 2021 में भारत सरकार द्वारा NIPUN (National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy) Bharat Mission की शुरुआत की गई. तब से FLN शब्द का व्यापक प्रयोग किया जाने लगा. NIPUN Bharat Mission का यह लक्ष्य निर्धारित किया गया कि प्रत्येक बच्चा कक्षा 3 के अंत तक Foundational Literacy and Numeracy (FLN) की दक्षता हासिल कर लें. ऐसा इसलिए कि FLN skill किसी भी बच्चे की आगे की शिक्षा के लिए मजबूत नींव तैयार करने का काम करता है. यहाँ FLN में दो शब्द शामिल है literacy (साक्षरता) और numeracy (संख्या ज्ञान). इस आलेख में हम foundational literacy (बुनियादी साक्षरता) को लेकर अपनी समझ विकसित कर रहे होंगे.  

किसी भाषा में foundational literacy (बुनियादी साक्षरता) skill प्राप्त करने से तात्पर्य है बच्चों में उस targeted भाषा संबंधी ऐसी दक्षता विकसित करना, जिससे कि वह उस भाषा से संबंधित किसी भी वाक्य या प्रसंग को पढ़कर उसका अर्थ ग्रहण करते हुए यह समझ बना सके कि कि उसे वाक्य या प्रसंग में क्या कहा/निर्देशित किया जा रहा है? इस वाक्य या प्रसंग में निहित बात को वह उसी भाषा में या अपनी भाषा में बोलकर या लिखकर अभिव्यक्त कर सके. इसके अतिरिक्त और भी अपेक्षाएं हैं कि उस भाषा के शब्दों में निहित ध्वनियों, वर्णों, मात्राओं की पहचान कर सके. साथ ही इस कौशल का उपयोग वह दैनिक जीवन में कर सके.

इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं. तीसरी कक्षा के किसी एक बच्चे को हमने एक छोटा सा प्रसंग पढ़ने को दिया –

‘एक चिड़िया थी. उसे कहीं से एक मोती मिल गया. उसने उस मोती को अपने नाक में पहन लिया. और एक राजा के महल पर जा बैठी. राजा को देखकर एक गाना गाना शुरू कर दी ‘मैं राजा से बड़ी, मेरी नाक में मोती’ ...

इस 5-6 वाक्यों वाले प्रसंग को हम एक बार और पढ़ने के लिए कहेंगे. प्रसंग को 2 बार पढ़ने के बाद हम उस बच्चे से कुछ सवाल करेंगे. जैसे –

·       चिड़िया को क्या मिला?

·       मोती को नाक में पहनने के बाद चिड़िया कहाँ चली गई?

·       आप राजा की जगह होते तो चिड़िया का गाना सुनकर आपको कैसा लगता? आप क्या करते?

·       आपको मोती मिल जाए तो आप क्या करेंगे?

यदि बच्चा लोग सवालों के जवाब मौखिक रूप से तुरंत दे देता है, साथ ही इन सवालों के उत्तर यदि वह लिखित रूप में भी अभिव्यक्त कर पा रहा है (विशेष रूप से कल्पना आधारित सवाल) तो हम कह पाएंगे कि यह बच्चा किसी प्रसंग को समझ के साथ पढ़ पा रहा है. उसने बुनियादी साक्षरता का कौशल प्राप्त कर लिया है.

2020 शिक्षा नीति से पूर्व ‘literacy’ शब्द को केवल पढ़ने और लिखने की क्षमता के लिए use किया जाता था. लेकिन आरंभिक शिक्षा पर लगातार शोध से एक समझ बनी कि किसी भाषा में शब्द-वाक्य केवल पढ़-लिख पाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे समझना भी उतना ही आवश्यक है. तब से foundational literacy से मतलब समझ के साथ पढ़ना-लिखना समझा जाने लगा है.

Monday, 10 August 2026

नीरस कविता शिक्षण को आकर्षक कैसे बनाएं?

आंगनबाड़ी से लेकर 10वीं बोर्ड परीक्षा तक के सफ़र में हम कई भाषाएं सीखते हैं. जैसे – हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत आदि. शालाओं में भाषा शिक्षक द्वारा साहित्य के कई विधाओं जैसे कहानी, कविता, निबंध, जीवनी, नाटक, यात्रावृत्तांत, व्यंग्य आदि के माध्यम से लक्षित भाषा में सुनने, बोलने, पढ़ने, लिखने के साथ-साथ उस भाषा में कल्पना कर विचार अभिव्यक्त करने का कौशल सिखाया जाता है. इस प्रक्रिया में कहानी के बाद बच्चों के बीच यदि कोई अन्य लोकप्रिय विधा है, तो वह है कविता. आंगनबाड़ी से कविता को हाव-भाव के साथ गाने का जो अनुभव बच्चों को मिलता है उसका सकरात्मक प्रभाव कक्षा 1 में सामान्यतः देखने को मिलता है. लेकिन यह बहुत दिनों तक रह नहीं पाता है. कुछ गिनती के शिक्षकों को छोड़ दें तो अधिकाँश भाषा शिक्षक ऐसे देखने को मिलते हैं जो पाठ्यपुस्तक में दी गई कविता को भी लयबद्ध, हाव-भाव व आवाज़ के उतार चढ़ाव के साथ गाने में झिझक महसूस करते हैं.

शुरुआती कक्षा की कविताओं का यदि हम अवलोकन करें तो बच्चों को आनंद के साथ भाषाई कौशल विकसित करने के बहुत से तत्व मौजूद मिलेंगे जैसे - कविताएं तुकबंदी युक्त मिलेंगे, जिन्हें लयबद्ध गाने  में बच्चों को आनंद आता है. यहाँ तुकबंदी से तात्पर्य है किसी कविता की दो क्रमबद्ध पंक्तियों के अंत में ऐसे शब्दों का प्रयोग जिनका अंतिम शब्द समान ध्वनि वाले हों. उदाहरण के लिए कक्षा 1 की एक कविता को देख सकते हैं -

छह साल की छोकरी,

भरकर लाई टोकरी.

टोकरी में आम है,

नहीं बताती दाम है.

उपरोक्त कविता को यदि हम देखें तो इसकी वाक्य संरचना लेखक द्वारा इस प्रकार बनाया गया है कि पंक्तियों के अंत में ‘छोकरी, टोकरी’ एवं ‘आम है, दाम है’ जैसे समान तुकबंदी वाले शब्द आ रहे हैं. इन दोनों वाक्यों की अंतिम ध्वनि मिलती जुलती है. बच्चों को इन्हें गाने में बहुत आनंद आता है.

क्यों जरूरी है लयबद्ध होकर गाना?

किसी कविता पर काम कर रहे शिक्षक से यह अपेक्षा होती है कि बच्चों को यह मॉडलिंग कर बताएं कि किसी कविता को गाते कैसे हैं? अर्थात किसी कविता को केवल जैसे तैसे पढ़कर वह पाठ पूरा करने की जगह उस कविता को पहले खुद बेहतर तरीके से समझते हुए उसे बच्चों के साथ, पूरी रूचि के साथ, हाव – भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ गाएं. प्रत्येक बच्चे को इस प्रक्रिया में शामिल करें. हाव-भाव और आवाज़ के उतार चढ़ाव के साथ गाने का यह लाभ है कि बच्चे प्रत्येक पंक्तियों से निकलने वाले अर्थ तक आसानी से पहुँच पाते हैं. छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों में ‘शिक्षकों से कुछ बातें’ खंड में इस बिंदु पर जोर देते हुए अपेक्षा की गई है कि शिक्षक कविता व कहानी को हाव-भाव अथवा उतार-चढ़ाव के साथ सुनाने का अभ्यास करें. 

इसके साथ ही कविता में प्रयुक्त सामान तुक वाले शब्दों की ओर अवश्य ही ध्यान दिलाया जाना चाहिए क्योंकि एक तो समान तुक वाले शब्दों को बोलने व गाने में बच्चों को आनंद आता है, जिसके फलस्वरूप बोल रहे शब्दों को, दैनिक दीवान में उनकी उपयोगिता को आत्मसात कर रहे होते हैं, उन शब्दों के उच्चारण को भी बेहतर तरीके से समझ रहे होते हैं. 


Friday, 7 August 2026

भाषा शिक्षण की पद्धतियाँ

प्राथमिक शालाओं में कक्षा पहली से पांचवीं तक हिंदी भाषा शिक्षण कविता, कहानी जैसे अनेक विधाओं के माध्यम से कराई जाती है. यह शिक्षण मुख्यतः पाठ्यपुस्तक पर केंद्रित होता है. दो अलग अलग दौर (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एवं 2020) के पाठ्यपुस्तकों को यदि विश्लेषित किया जाए तो तो इनमें भाषा शिक्षण की दो पद्धतियाँ दृष्टिगत होती हैं - (1) वर्णमाला पद्धति – जिस पद्धति से हम सभी अर्थात 2018 से पूर्व के बच्चों ने हिंदी भाषा पढ़ना-लिखना सीखा. इस पद्धति में पढ़ने की शुरुआत हिंदी वर्णमाला (स्वर एवं व्यंजन) से करते हुए बिना मात्रा वाले शब्द, अलग-अलग मात्राओं/ध्वनियों वाले शब्द पर समझ बनाते हुए शिक्षक कुछ परिचित शब्द, तत्पश्चात अपरिचित शब्दों की समझ के साथ पठन कराते हुए अंत में वाक्य पठन की ओर बढ़ते थे.

दूसरी पद्धति है (2) संदर्भ पद्धति – जिस पद्धति से पढ़ाने के लिए 2018 के बाद छत्तीसगढ़ के कक्षा 1 का पाठ्यपुस्तक निर्मित किया गया था. इस पाठ्यपुस्तक में शुरुआत एक मजेदार बालगीत ‘छह साल की छोकरी’ (शीर्षक - आम की टोकरी) से की गई है. पूर्व की तरह ही अपेक्षा यह थी कि शिक्षक इस मजेदार बालगीत को हाव-भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ सुनाते/वाचन करते हुए, बच्चों को आनंद लेने की प्रक्रिया में शामिल करें, तत्पश्चात बालगीत में प्रयुक्त किसी परिचित शब्द के माध्यम से उस शब्द की बनावट (शब्द को बोर्ड पर लिखते हुए) उसमें प्रयुक्त हुई ध्वनियों पर बात करते हुए किसी वर्ण तक पहुंचा जाए. इससे पूर्व पाठ में दिए गए चित्रों को देखकर समझने (लोगोग्राफिक पठन) और मौखिक रूप से अभिव्यक्त करने संबंधी भी अपेक्षा थी.

पाठ्यपुस्तक के अवलोकन से इतना तो पता चला कि यह तकनीक भाषा सिखाने की पारंपरिक तकनीक से अलग एक प्रयोग था. लेकिन वर्णमाला पद्धति की जगह इस सन्दर्भ पद्धति को लागू करने के पीछे निहित तर्क आज तक समझ नहीं आया. आज अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘पाठशाला : भीतर और बाहर’ के एक आलेख (संवाद) ‘क्या सभी बच्चों को स्कूल में गणित सिखाना चाहिए?’ को पढ़ते हुए इसके पीछे निहित तर्क समझ आया.

संवाद करते हुए भाषाविद आलोक तिवारी कहते हैं, ‘बच्चों को सबसे पहले भाषा सिखाने की जरूरत है. उस भाषा का व्याकरण बाद में. अर्थात कबूतर पहले बताने की जरुरत है, ‘क’ बाद में’. भाषा सिखाने की शुरुआत भी मूर्त रूप में होना चाहिए. यही कारण है कि तब से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यपुस्तक के डिजाईन होने के बीच के समय में प्रशिक्षणों में वर्णमाला पद्धति की जगह सन्दर्भ पद्धति के साथ काम करने को जोर दिया गया.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बच्चों को भाषा सिखाने के लिए पारंपरिक तकनीक की जगह यह पद्धति कहीं ज्यादा असरदार है जो बच्चों को सोचने के साथ साथ अपने पूर्व अनुभव का उपयोग करते हुए अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के मौके देता है. साथ ही यह पद्धति शिक्षकों को मोडलिंग कर बच्चों को जल्दी सीखने के मौके देती है.

Saturday, 6 December 2025

पांच दिवसीय नवीन पाठ्यपुस्तक उन्मुखीकरण कार्यशाला का समापन

 शासकीय माध्यमिक शाला खिलोरा (बेमेतरा) में दिनाँक 2 से 6 दिसंबर 2025 तक पूर्व माध्यमिक शाला के शिक्षकों के लिए नवीन पाठक पुस्तक उन्मुखीकरण कार्यशाला आयोजित की गई। इस पांचदिवसीय कार्यशाला में बेमेतरा विकासखंड के पूर्व माध्यमिक शालाओं के 200 से अधिक शिक्षकों को वर्ष 2025 में लाए गए विज्ञान (जिज्ञासा), सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन), अंग्रेजी (पूर्वी), संस्कृत (दीपकम) विषय के नवीन पाठ्यपुस्तकों का उन्मुखीकरण किया गया। इन विषयों के अतिरिक्त नए जोड़े गए पाठ्यपुस्तक जैसे - खेल एवं योगशिक्षा (खेल यात्रा), कला शिक्षा (कृति 1), व्यावसायिक शिक्षा (कौशल बोध) से भी शिक्षकों को परिचित कराया गया।

शासकीय माध्यमिक शाला, खिलोरा के चार अलग-अलग कमरों में आयोजित इस कार्यशाला में सभी शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मुख्य प्रावधनों से परिचित कराते हुए इसके क्रियान्वयन हेतु बनाए गए दस्तावेज राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) 2023 से परिचित कराया गया। तत्पश्चात इसमें उल्लेखित सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, अंग्रेजी, संस्कृत आदि विषयों को पढ़ाने के उद्देश्य, पाठचर्या के लक्ष्य, शिक्षण विधि, इस हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले शिक्षण सहायक सामग्री, संबंधित सीखने के प्रतिफल, आदि को गतिविधियों के माध्यम से करके बताया गया। शिक्षकों को प्रत्येक विषय का अध्याय वार डेमो कराकर विषय पर गहराई से समझ विकसित करने का प्रयास किया गया।

इन पांच दिनों के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के एक प्रमुख लक्ष्य – ‘बच्चों को 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने’ को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त गतिविधियों पर समझ विकसित किया गया। इन बिंदुओं पर चर्चा केंद्रित रही -

·       कक्षा में अलग-अलग विषय वस्तु पर छोटे-छोटे प्रोजेक्ट देकर बच्चों को स्वयं से समझ के साथ किसी अवधारणा को सीखने के किस प्रकार मौके दिए जा सकते हैं?

·       सीखने की प्रक्रिया में रोचकता लाने के लिए अलग अलग प्रकार की विधियों जैसे - टीएलएम के प्रयोग, रोल प्ले, वाद-विवाद, बातचीत के मौके देकर उनमें आलोचनात्मक चिंतन इसका कौशल लाया जाए?

·       बच्चों के सीखने में शिक्षकों के साथ-साथ समुदाय के विषय विशेषज्ञ की एक स्रोत व्यक्ति के रूप में किस प्रकार सेवाएं लिया जा सकता है?

·       अलग-अलग अवधारणाओं पर समझ बनाने में कक्षा का प्रिंट समृद्ध माहौल किस प्रकार सहायक है?

·       प्रत्येक पाठ शिक्षण के दौरान किन अलग अलग प्रकार के शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जा सकता है?

कार्यशाला के समापन पर पांचवें दिन BEO- Bemetara, BRC – Bemetara एवं DIET, Bemetara के faculty शिक्षकों का उत्साहवर्धन करने हेतु शामिल हुए। सभी शिक्षकों को सक्रिय सहभागिता हेतु सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया। चारों विषय के कुल 12 मास्टर ट्रेनर ने सत्र को संचालित किया। इस कार्यशाला में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, बेमेतरा के तीन सदस्य नेहा (विज्ञान) श्रेया (अंग्रेजी) एवं साकेत (सामाजिक विज्ञान) विषय में शामिल हुए।


Thursday, 2 October 2025

सोनम वांगचुक : Rote Learning से Learn By Doing की ओर ले जाने वाला शिक्षाविद

दिनांक 24 सितंबर 2025 को लेह-लद्दाख के लोगों द्वारा किया जा रहा है आंदोलन अचानक से हिंसक हो जाता है। लेह लद्दाख के लोगों द्वारा अपनी मांगों के समर्थन में किया जा रहा है ये आंदोलन कोई नया आंदोलन नहीं था, बल्कि यह 5 अगस्त 2019 को कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद से ही चलना शुरू हो गया था। भूख हड़ताल जैसे तरीकों से चलाया जा रहा है यह आंदोलन शांतिपूर्ण था, इसीलिए भी स्थानीय मीडिया को छोड़कर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की नज़र इस ओर नहीं गई, गई भी तो भी कोई खास प्रमुखता नहीं मिली। इस हिंसा के लिए लेह-लद्दाख के अति चर्चित शिक्षा सुधारक व क्लाइमेट एक्टिविस्ट के नाम से मशहूर सोनम वांगचुक को जिम्मेदार माना जाता है। वे पिछले 5 वर्षों से लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने एवं पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए गांधीवादी आदर्शों पर चलते हुए अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण आंदोलन करते रहे थे।[i] इस हिंसक आंदोलन के दौरान भी वे भूख हड़ताल पर थे।

एक शांतिपूर्ण आंदोलन के हिंसक रूप ले लेने से 4 लोगों की मौत एवं 80 से अधिक लोग घायल हो जाते हैं।[ii] हिंसा से चिंतित होकर सोनम वांगचुक भूख हड़ताल खत्म कर देते हैं। इसी क्रम में पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनके खिलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जोधपुर (राजस्थान) जेल भेज दिया जाता है। साथ ही सोनम वांगचुक के NGO ‘Himalayan Institute of Alternatives Ladakh’ का FCRA लाइसेंस रद्द कर उनपर वित्तीय अनियमितताओं एवं विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाया जाता है।[iii]    

इसके पश्चात् केंद्र सरकार समर्थित मीडिया चैनलों (जिसे गोदी मीडिया के नाम से जाना जाता है) आईटी सेल ने सोनम वांगचुक की छवि पर कीचड़ उछालने के लिए शैक्षणिक उद्देश्यों को लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश की यात्रा से संबंधित फोटो/विडिओ, अनसन के दौरान किए जा रहे संवादों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर उल-जुलूल आरोप लगाने लग जाते हैं। मज़े की बात यह है कि जिस फोटो/विडिओ का ये इस्तेमाल करते हैं, वह सभी सोनम वांगचुक के सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म से ही लिए गए। सोचने वाली बात यह है कि गलत इरादे से यदि कोई व्यक्ति पाकिस्तान या बांग्लादेश की यात्रा करता है, तो वह इससे संबंधित फोटो या वीडियो क्यों साझा करेगा? वह तो इसे यात्रा को गुप्त रखना चाहेगा। सोनम वांगचुक जैसे तार्किक व्यक्ति से ऐसी उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है।

इनकी रिपोर्टिंग ऐसी है कि आपको लगेगा सोनम वांगचुक ने लद्दाख के युवाओं (जिसे ये Gen-Z संबोधित करते हैं) ने सड़क पर हिंसा फैलाने का आह्वान किया हो।[iv] हालांकि अच्छी बात यह है कि पत्रकारिता की लाज रखने वाले बहुत सारे निष्पक्ष पत्रकारों ने गोदी मीडिया की इस हरकत की चीर फाड़ करते हुए इनकी घटिया हरकतों को लोगों के सामने ला दिया। इनके द्वारा साझा किए जा रहे फोटो वीडियो की वास्तविकता जानने के लिए रवीश कुमार, ध्रुव राठी आदि के बनाये हुए वीडियो देखा जा सकता है।

कौन हैं सोनम वांगचुक

हम सभी ने राजकुमार हिरानी के लेखन-निर्देशन में 2009 ई. में बनी कॉमेडी-ड्रामा ‘थ्री इडियट’ फ़िल्म देखी होगी। उस फ़िल्म में एक करेक्टर फुनसुक वांगड़ू का है, जो लेह-लद्दाख में एक स्कूल चलाता है, बच्चों को नए नए आविष्कार करने के लिए प्रेरित करता है। फुनसुक वांगड़ू का ये करेक्टर सोनम वांगचुक से ही प्रेरित था। फ़िल्म में उनके कई वास्तविक आविष्कारों को दिखाया गया था।[v]

इंजीनियरिंग की पढ़ाई किए सोनम वांगचुक के कार्यों ने देश-दुनिया के लोगों को प्रभावित किया। यही कारण है कि देश-विदेश के लोगों/संस्थाओं के साथ कार्य से प्राप्त अनुभवों को सेमीनार, चर्चा जैसे अलग-अलग आयोजनों के माध्यम से साझा करने हेतु देश-विदेश की यात्रा भी करते रहते हैं। शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में इनके उल्लेखनीय योगदान हैं। दोनों ही क्षेत्र के योगदान एक दूसरे से गुंथे हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए योगदान से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज के साथ साथ पर्यावरण का हित भी जुड़ा होता है। शिक्षा के क्षेत्र में सोनम वांगचुक के कार्यों को यहाँ संक्षेप में जानने समझने का प्रयास आइए करते हैं।

Students Educational and Cultural Movement of Ladakh(SECML) के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

जब हमारे देश में पारंपरिक शिक्षा प्रणाली (जिसमें स्मरण को महत्त्व दिया जाता है) प्रमुखता से प्रचलित था, तब इस प्रणाली से अलग हटकर सोनम वांगचुक ने व्यावहारिक शिक्षा देने के उद्देश्य से लेह के ‘फे’ गाँव में 1988 ई. एक स्कूल Students Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECML) शुरू किया था।[vi] इस स्कूल की शुरुआत विशेष रूप से उन बच्चों के लिए की गई थी जो 10 वीं कक्षा में फेल हो जाने के कारण आगे बढ़ नहीं पाते थे या किसी अन्य कारणों से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते थे, या आर्थिक रूप से कमजोर होते थे।

बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान देने की वकालत करने वाली इस संस्था ने शुरुआत में बच्चों के लिए कार्य किया ही। कालान्तर में सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक सुधार के लिए भी कार्य किया। वर्ष 1998 ई. में जब लद्दाख के 95 % छात्र/छात्राएं 10वीं कक्षा में फेल हो गए थे तो इस संस्था ने सरकार के साथ मिलकर सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की योजना बनाई। 2007 तक संस्था ने स्थानीय सरकार के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने का कार्य किया।[vii] संस्था के शिक्षा सुधार हेतु प्रयास का ही फल था कि 2003-2006 के बीच 50% छात्र/छात्राएं 10वीं की परीक्षा में सफल हुए। इस दौरान संस्था ने शिक्षा क्षेत्र के सक्रिय भागीदारी के बदौलत कई समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान दिलाया। जैसे –

·      पाठ्यपुस्तकों के बच्चों की मातृभाषा में न होने के कारण बच्चों को होने वाली समस्याएँ (प्राथमिक शालाओं में पाठ्यपुस्तक की भाषा उर्दू में, जबकि उच्च प्राथमिक शालाओं में भाषा अंग्रेजी होती थी। इसके विपरीत बच्चों की भाषा लद्दाखी होती थी)

·      पाठ्यपुस्तकों में स्थानीय संदर्भ के शामिल न होने से बच्चों को होने वाली समस्याएं (पाठ्यपुस्तक दिल्ली से प्रकाशित होते थे जिसमें अलग अलग राज्यों के संदर्भ तो होते थे। लेकिन लेह-लद्दाख के नहीं, इससे बच्चे उस पाठ से जुड़ाव महसूस नहीं करते थे)

·      शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था न होने से शिक्षा की गुणवत्ता पर होने वाले प्रभाव (शिक्षक शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक आदि से परिचित नहीं होते थे)  

·      शिक्षकों के प्रत्येक दो वर्षों में होने वाले स्थानांतरण से होने वाली समस्या (प्रत्येक दो वर्ष में शिक्षकों को स्थानांतरित कर दिया जाता था)

·      अभिभावकों का स्कूल से जुड़ाव[viii]

संस्था ने शिक्षा के क्षेत्र की समस्याओं से न केवल स्थानीय सरकार को परिचित कराया बल्कि उस समस्या के समाधान के लिए भी प्रयास किया। उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए संस्था ने 1994 में Operation New Hope (ONH) कार्यक्रम चलाया। उद्देश्य था –

·      Village Education Committee (VECs) बनाकर ग्राम समुदाय को स्कूल से जोड़ना।

·      शिक्षकों को गतिविधि आधारित प्रशिक्षण देना ताकि सीखने की प्रक्रिया को रुचिकर बनाया जा सके।

·      लद्दाख के स्थानीय परिवेश एवं भाषा को ध्यान में रखते हुए शिक्षण सामग्री का निर्माण करना/कराना।

·      शिक्षकों को स्कूल में समर्पण भाव से कार्य करने हेतु प्रेरित करना।

वर्ष 2007 तक इस संस्थान ने शिक्षा के क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के साथ-साथ शालाओं में शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने का हर संभव प्रयास किया। 2007 में लेह के जिलाधिकारी के साथ विवाद के पश्चात् संस्था पर लगाए गए ‘Anti National’ गतिविधियों के आरोप के बाद शिक्षकों की गुणवत्ता पर इस संस्था ने कार्य करना बंद कर दिया। वर्ष 2013 में कोर्ट ने इन आरोपों को बेबुनियाद पाते हुए सोनम वांगचुक को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

यह संस्थान वर्तमान में भी कार्यरत है। यहाँ रहना, खाना, पढ़ाई सभी या तो निःशुल्क होती है, या इसके लिए बहुत ही न्यूनतम पैसे लिए जाते हैं। जीवन जीने के लिए आवश्यक कौशल व मूल्य जैसे जिम्मेदारी, समस्या समाधान, सामूहिक सहयोग, आत्मनिर्भरता, योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन, नेतृत्व कौशल जैसे बिंदुओं पर कार्य किया जाता है। बच्चों में जिन कौशल को विकसित करने की बात भारत सरकार ने हाल-फिलहाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से की गई है, उस पर सोनम वांग्चुक 1990 के दशक से ही कार्य कर रहे हैं। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने हेतु या संस्था लगातार प्रयासरत है।

Students Educational and Cultural Movement of Ladakh(SECML) एक तरह से महात्मा गाँधी के नई तालीम की तर्ज पर विकसित किया गया यह स्कूल है, जहाँ बच्चों को 21वीं सदी के नागरिक के रूप में विकसित करने की योजना पर कार्य किया जा है। यह स्कूल यहाँ के छात्र/छात्राओं के द्वारा ही चलाया जाता है। खाना बनाने, साफ सफाई, बिजली-पानी की देखरेख के साथ-साथ अन्य कई कार्य यहाँ के छात्र/छात्राओं के द्वारा ही किये जाते हैं।

‘सूर्य की गर्मी को संरक्षित कर ठंडे इलाकों में रहने लायक घर बनाना’ ‘पानी के संरक्षण के लिए कृत्रिम ग्लेशियर बनाना’ ‘ग्रीन हाउस फार्मिंग’ जैसे परियोजना कार्य में सोनम वांग्चुक के साथ-साथ यहाँ के छात्र/छात्राओं की भूमिका को पूरी दुनिया जानती है।

Himalayan Institute of Alternative Ladakh’ (HIAL) के माध्यम से शिक्षा, पर्यावरण के क्षेत्र में योगदान

सोनम वांगचुक ने 2017 में ‘Students Educational and Cultural Movement of Ladakh(SECML) से प्राप्त अनुभवों के आधार पर Himalayan Institute of Alternative Ladakh’ (HIAL) नामक एक गैर सरकारी संगठन (NGO) एवं संस्थान की स्थापना की जो पर्यावरण के क्षेत्र में नवाचार के साथ-साथ सामाजिक कार्यों (सामाजिक जागरूकता) को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। करके सीखने (Learning by Doing) के एप्रोच पर यह संस्था कार्य करती है। सोनम वांगचुक इसे ‘रेजिस्टर्ड चैरिटेबल ट्रस्ट’ की संज्ञा देते हैं। सोनम वांग्चुक के अनुसार इस संस्था से अभी तक 400 से अधिक छात्र/छात्राएं पढ़ाई पूरी कर चूके हैं। इस संस्था ने पानी संकट से निपटने के लिए ‘आइस स्तूप प्रोजेक्ट’  जैसी सफल पहल की है।[ix] संस्थान के उल्लेखनीय कार्य के लिए हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री इस संस्था की तारीफ कर चूके हैं।[x]

लेह लद्दाख में हुए हिंसा के लिए सोनम वांगचुक कितने जिम्मेदार हैं, उनपर NSA लगाना कितना जायज है? यह तो अदालत ही तय करेगी। लेकिन उपरोक्त आधार पर यदि हम सोनम वांगचुक के कार्यों को विष्लेषित करें तो उनके कार्य उन्हें एक दूरदर्शी सोच वाला, एक अद्भुत शिक्षाविद, पर्यावरण हितैषी, विदेशों में भारतीयता का मान-सम्मान को बढ़ाने वाला, देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति के रूप में स्थापित करते हैं। उम्मीद करते हैं कि जिस तरह 2007 में इनपर लगे Anti-National गतिविधियों में लिप्त होने के आक्षेप से 2013 में मुक्त हुए और शिक्षा के क्षेत्र में पुनः लेखनीय योगदान देना शुरू किए। वैसे ही वर्तमान में भारत सरकार द्वारा लगाये गए आक्षेपों से शीघ्र ही मुक्त होकर देश को एक सकारात्मक दिशा में ले जाने में योगदान दे रहे होंगे।