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Thursday, 16 December 2021

मेरी नजर में किसानों का तीन काले कानून के खिलाफत में आंदोलन

जुलाई 2020 में केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा संसद में बिना किसी बहस के चुपके से 3 किसान बिल पारित करवाए गए। कुछ ही दिनों में राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाने के पश्चात इसे कानून का रूप मिल गया। यह तीन कृषि कानून थे

1.     कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम - 2020

2.     कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020

3.     आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020

दिसंबर 2021 में वापस ले लिए गए। 1 वर्ष से अधिक चले इस आंदोलन से होने वाले संभवत नुकसान को देखते हुए। इस पूरे वर्ष केंद्र सरकार और उसके समर्थक जहां कृषि कानून के लाभ गिनाते रहे वहीं किसानों का एक बड़ा वर्ग इस कृषि कानून को किसानों के लिए कम व्यापारियों के लिए ज्यादा लाभदायक बता रहे थे। देश के एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में मेरा भी अवलोकन यही कहता है कि यह तीनों कृषि कानून किसानों के लिए थे ही नहीं बल्कि व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इसे बनाया गया था।

            यदि हम पहले कानून कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020 की बात करें तो इसके द्वारा किसानों को अपनी मर्जी से फसल बेचने की स्वतंत्रता दी गई। किसान अपनी फसल को देश के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति, दुकानदार, संस्था, व्यापारी आदि को भेज सकते थे। मेरा जहां तक मानना है कि इस कानून से किसानों को कोई खास लाभ तो नहीं लेकिन व्यापारियों को पूरा लाभ जरूर था। मेरे ऐसा मानने का आधार यह है कि वर्तमान में हमारे देश में किसानों की स्थिति इतनी उन्नत नहीं है कि अपनी उपज को दूसरे राज्य जाकर बेच सकें। उन्नत स्थिति के साथ-साथ समय का भी मसला है। हां, इसके विपरीत व्यापारियों के पास इतना समय और ट्रांसपोर्ट चार्ज जरूर होता है कि वह उत्तर प्रदेश की उपज को गुजरात, महाराष्ट्र या तमिलनाडु में बेच सकें। इस हिसाब से यह कानून विशुद्ध रूप से व्यापारियों के लिए साबित होता है ना कि किसानों के लिए।

दूसरा कानून जो कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 है। यह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से संबंधित था। इस बिल से भी किसानों को नहीं बल्कि व्यापारियों को ही लाभ होता। इसमें कोई शक नहीं कि कंपनियां शुरुआत में किसानों को कांटेक्ट फार्मिंग के प्रति लुभाने के लिए लोकलुभावन स्कीम लाती। जैसा टेलीकॉम सेक्टर में जिओ तथा अन्य कंपनियों ने लाइफ टाइम फ्री वैधता की बात कर कुछ वर्षों बाद रिचार्ज के नाम पर जनता को लूट रहे हैं। इस बात की पूरी गारंटी है कि इस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसान नाम मात्र के जमीन मालिक होते। उस जमीन पर पूरा वर्चस्व कांटेक्ट करने वाली निजी कंपनी का होता। उपज बढ़ाने के लिए अनाप-शनाप केमिकल फर्टिलाइजर उपयोग कर 10 से 20 साल में किसानों की जमीन बंजर बना दिए जाते। जिस पर उद्योग लगाने के अलावा किसानों के पास कोई चारा नहीं होता। ऐसे में उसके पास उद्योग लगाने के पैसे तो होते नहीं, तो उसकी मजबूरी का फायदा कांटेक्ट करने वाली कंपनी उठाते। 2014 में सत्ता में आने के साथ ही बीजेपी सरकार ने मुट्ठी भर पूंजी पतियों को किसानों की भूमि आसानी से दिलाने के लिए भूमि अधिग्रहण बिल लेकर आए थे। लेकिन इसके देशव्यापी विरोध ने सरकार को यह बिल वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया। इस कानून द्वारा किसानों की जमीन को अप्रत्यक्ष रूप से लेने का प्रावधान किया जा रहा था।

            तीसरा कानून जो आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम 2020 था, किसानों को किसी भी उपज का असीमित भंडारण करने की छूट देता था। इससे पहले किसी भी खाद्य वस्तु का एक निश्चित सीमा में ही भंडारण करने का प्रावधान था। पहले और दूसरे कानून की तरह इस कानून का भी सीधा संबंध व्यापारियों के हित से था ना कि किसानों के। इस कानून द्वारा किसान अब किसी भी वस्तु का असीमित भंडारण कर सकते थे। कहने को तो यह कानून किसानों के लिए था लेकिन इसका फायदा तो व्यापारी ही उठा सकते थे। पंजाब और हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो हमारे देश के किसानों की स्थिति दयनीय ही है। उनके लिए खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसे में उनके पास किसी भी खाद्य वस्तु का भंडारण करने का साधन नहीं है जिससे कि उचित समय पर भंडारन गृह से कोई खास खाद्य वस्तु बाजार में उच्च दाम में बेचा जा सके। लेकिन बड़े-बड़े व्यापारियों के पास खाद्य वस्तुओं के भंडारण हेतु गोदाम की कोई कमी नहीं है। यदि है भी तो बड़े-बड़े गोदाम बनाना इन व्यापारियों के लिए कोई खास समस्या नहीं है। इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझ सकते हैं। यदि मैं एक व्यापारी के रूप में देशभर के किसानों से ₹10 किलो के हिसाब से कोई खाद्य पदार्थ खरीद कर इसका भंडारण अपने गोदाम में कर लूं। और इसे मैं बेचू ही नहीं। बाजार में कृत्रिम किल्लत पैदा कर मार्केट रेट जब 50 से ₹100 किलो तक पहुंच जाए तो थोड़ा-थोड़ा कर निकालूं। इससे एक व्यापारी के रूप में मुझे फायदा होगा या उन किसानों को जिससे मैंने ₹10 किलो के हिसाब से वह खाद्य पदार्थ खरीदे।

इन बातों से स्पष्ट है कि यह तीनों कानून केवल व्यापारी हितों को ध्यान में रखते हुए लाए गए थे।

Sunday, 9 August 2020

कोरोना महामारी के दौर में मंदिर-मूर्ति पर विमर्श क्यों?

 

पिछले 8 माह के दौरान कोरोना वायरस ने सभी धर्मों के देवी-देवताओं के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। त्रस्त जनता को देखकर कष्ट से उबारने या किसी न किसी रूप में आकर लोगों की जान बचाने के लिए जाने जाने वाले देवी-देवताओं को भी अपने भक्तों की चिंता नहीं है। ऐसा इन देवी-देवताओं के सबसे बड़े पुजारी या भगवान, ईश्वर, अल्लाह के सबसे करीब होने का दावा करने वाले लोगों के संक्रमित होने के आधार पर कहा जा सकता है। उन्हें अपने ही आराध्य की अलौकिक शक्ति पर विश्वास नहीं है। इसीलिए अपनी रक्षा के लिए ये लोग खुद तो मास्क पहन रहे हैं, मंदिर-मस्जिद में सैनीटाइजर का प्रयोग कर रहे हैं ही, साथ ही अपने आराध्य को भी मास्क पहना रहे हैं। कई मंदिरों में तो मंदिर प्रबंधन समिति को यहाँ तक डर है कि श्रद्धालुओं द्वारा मूर्ति को हाथ लगाने से उनके आराध्य न संक्रमित हो जाएँ व अन्य को संक्रमित कर दें। इसलिए श्रद्धालुओं को मूर्तियों को हाथ तक नहीं लगाने दे रहे हैं। दूर से प्रणाम कर यथाशीघ्र दर्शन कर गर्भगृह से निकलने का निर्देश दे रहे हैं। अधिकांश मंदिरों के कपाट इस महामारी ने बंद करवा दिये हैं। यदि खुले भी हैं तो गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है। पूरे विश्व के कट्टर धार्मिक समुदायों में हाहाकार मचा हुआ है, क्योंकि कर्मकांड करने/कराने के एवज में मिलने वाले परिश्रमिक/दान से होने वाली आय से महरूम हो गया है। विज्ञान की आलोचना करने वाले ये कट्टर धार्मिक वर्ग आज वैज्ञानिकों की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं कि कब इसका टीका मिले और हालात सामान्य हो। नास्तिक (भगवान, ईश्वर, अल्लाह के अस्तित्व को नहीं मानने/चुनौती देने वाले) लोग मौके का फायदा उठाते हुए इन धार्मिक कट्टरपंथियों को छेड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। इससे पूर्व से ही वे इस तथ्य के आधार पर भगवान, अल्लाह के अस्तित्व को नकार रहे हैं कि 500 वर्ष पूर्व जब मंदिर टूटा तो खुद राम भी अपने जन्मस्थान स्थित मंदिर को टूटने से बचा नहीं पाए। एकमात्र अमर देवता राम के परम भक्त हनुमान भी मंदिर को टूटने से बचा नहीं सके। इसी तरह 1992 में मस्जिद को टूटने से अल्लाह भी नहीं बचा सके। नहीं बचा सके तो भी कोई बात नहीं। अगले दिन खुद की अलौकिक शक्ति से ही बनवा कर अपने अस्तित्व का प्रमाण देते। लेकिन वह भी नहीं हुआ। यह हाल है पूरे दिन भर देवी-देवताओं, अल्लाह, ईश्वर, वाहेगुरु की उपासना करने वाले पुरोहित वर्ग का।

          दूसरी तरफ हैं हमारे देश के शासक वर्ग अर्थात सत्तानसीं संवैधानिक पदों पर बैठे अलग-अलग पार्टियों, विचारधारा के जनप्रतिनिधि। ऐसा नहीं है कि उपरोक्त परिस्थितियों से वे परिचित नहीं हैं। बावजूद इसके वे स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी जैसे जन-समस्याओं को दरकिनार कर मीडिया चैनलों, समाचारपत्रों के माध्यम से धार्मिक मुद्दों को उछालने और इसपर विमर्श करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ताकि खुद को संबंधित धर्म के लोगों का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर सकें। इनके इस रवैये के कारण अन्य पार्टियों को भी चाहे-अनचाहे इस तरह के विमर्श में कूदना ही पड़ता है खुद को उस धर्म विशेष का हितैषी बताने के लिए। पार्टी विशेष द्वारा समर्थित मीडिया विपक्षी पार्टियों को इस विमर्श में भाग लेने को मजबूर कर देता है। क्योंकि कोई भी पार्टी बहुसंख्यक वोट बैंक को चाहे-अनचाहे खोना नहीं चाहती। परिणामस्वरूप मीडिया के साथ-साथ आम जनता में विमर्श की धारा ही बदल जाती है। और वे समस्याएँ दब जाती है जिनपर बात किया जाना चाहिए और सत्तारूढ़ सरकार को उस समस्या के समाधान की बात पहुंचानी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हाल ही की घटना 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु भूमि पूजन समारोह को लें तो पूरे देश में हिंदू लोग इस दिन को जश्न के रूप में मनाए जो स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जैसे ही घोषणा की कि अयोध्या से 3 किलोमीटर दूर सरयू नदी के तट पर स्थित एक गाँव में भगवान श्री राम की 251 मीटर ऊंची मूर्ति बनाई जाएगी, इसी राज्य के दो प्रमुख विपक्षी पार्टियां समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी विकास दुबे एनकाउंटर के बाद भाजपा से नाराज ब्राह्मण वोटरों को खुश करने के लिए क्रमशः परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित करने, परशुराम के नामपर अस्पताल बनवाने की घोषणा कर दी। रोचक बात यह है कि कभी मायावती ने ही दलितों व पिछड़ों का वोट पाने के लिए तिलक, तराजू का नारा दिया था। और अब ...। 2022 में कौन सी पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाती है कौन नहीं? इसका फैसला तो जनता करेगी। लेकिन यह उपयुक्त समय नहीं है मूर्ति निर्माण पर बात करने का। क्योंकि इस अनावश्यक विमर्श से देश में विमर्श का मुद्दा परिवर्तित हो जा रहा है। जिसे देखो राम मंदिर, मस्जिद, मूर्ति पर बहस कर रहा है। कोरोना महामारी कितनी तेजी से अपने पैर फैला रहा है, इससे मजदूर वर्ग, निर्धन किसान, डॉक्टर, छोटे-छोटे व्यवसायी किस तरह परेशान हो रहे हैं जैसे मुद्दे चर्चा से गायब हो गए।

          मीडिया चैनलों में जहां विमर्श अस्पताल, स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने, बेरोजगारी की मार झेल रही जनता को रोजगार या नौकरी देने, शिक्षा से दूर होते देश के भावी भविष्य के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने पर होनी चाहिए, उसका स्थान मंदिर-मूर्ति निर्माण ले लेता है। आनेवाले समय में कोरोना महामारी से उपजे हालात के कारण जहां देश की जीडीपी में जबरदस्त गिरावट आने की भविष्यवाणी अर्थशास्त्री कर रहे हैं, ऐसे में हमारे प्रतिनिधियों द्वारा 2 वर्ष बाद रोजगार सृजन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की बात न कर बड़े-बड़े मूर्तियों को बनाकर देश की अर्थव्यवस्था डुबाने की बात करना कोई बुद्धिमानी वाली बात नहीं है। वह भी तब जब जनता यह जान चुकी है कि कोरोना से लड़ने के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं युक्त अस्पताल की आवश्यकता है मंदिर, मस्जिद या मूर्तियाँ बनाने से हमें कोई लाभ होने वाला नहीं है।  अतः जनता भी यह मांग करे कि सरकार, जनप्रतिनिधि सैकड़ों एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर इतने ऊंचे मूर्ति निर्माण पर व्यय होने वाली कम से कम हजारों करोड़ रुपए जैसी बड़ी धनराशि स्वास्थ्य सुविधा सुधार हेतु करे। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो आने वाले चुनाव में देश की जनता को आने वाले विषम हालात को ध्यान में रखते हुए ऐसे मानसिक दिवालिये जनप्रतिनिधियों को आने वाले चुनाव में सबक सिखाने की जरूरत है। उनको चुनने की जरूरत है जो जनता के इन बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज़ उठाए।    

Monday, 27 January 2020

इंटरनेट : नागरिकों का मूल अधिकार


वैश्वीकरण के इस दौर में इंटरनेट किसी भी देश के नागरिकों की प्रमुख आवश्यकता बन गई है। सूचना प्राप्ति से लेकर संचार हेतु प्रमुख माध्यम के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। संचार के साथ-साथ कई बार इसका प्रयोग अनावश्यक अपवाह उड़ाने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। यही कारण है कि किसी क्षेत्र में दंगा भड़कने, उपद्रव के दौरान केंद्र या राज्य सरकार इंटरनेट को बंद कर देती है। हालांकि दंगा भड़कने जैसी स्थिति में इस पर रोक लगाना आवश्यक हो जाता है। लेकिन कई बार सरकार जनता की आवाज को दबाने के लिए भी इसका दुरुपयोग करती है। जैसा कुछ दिनों पूर्व तक कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने, जम्मू कश्मीर को राज्य की जगह 2 केंद्र शासित राज्य बनाने के विरोध में कश्मीर की जनता द्वारा उग्र आंदोलन होने की संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार ने वहां इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी। कोई भी सरकार यदि इंटरनेट पर रोक लगाती है तो यह हमारे मौलिक अधिकारों का हनन है। कश्मीर में इंटरनेट पर लगी पाबंदी समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों की पीठ ने इस मामले पर दिए गए अपने फैसले में 10 जनवरी 2020 को कहा इंटरनेट संविधान का अनुच्छेद 19 के तहत लोगों का मौलिक अधिकार है अर्थात या जीने के हक जैसा ही जरूरी है।

आइए जानते हैं अनुच्छेद 19 के संबंध में
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 भारत के नागरिकों के लिए मौलिक अधिकारों की बात करता है। अनुच्छेद 19(1) के तहत यह हमारे मौलिक अधिकार हैं- सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बिना हथियार किसी जगह शांतिपूर्ण इकट्ठा होने, संघ या संगठन बनाने, कहीं भी स्वतंत्र रूप से घूमने, भारत के किसी भी हिस्से में रहने या बसने, कोई भी व्यवसाय, पेशा अपनाने या व्यापार करने का अधिकार।
सरकार को भी अधिकार है इंटरनेट रोकने का।
हालांकि संविधान प्रदत्त जीवन जीने का अधिकार होने के बावजूद सरकार अपने क्षेत्र में स्थिति को नियंत्रण में करने के लिएकुछ समय के लिए इंटरनेट पर रोक लगा सकती है। ऐसे में दो प्रमुख कानून सरकार के लिए ढाल का काम करते हैं। इनमें से पहला है - कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर - 1973 (सीआरपीसी), इंडियन टेलीग्राफ एक्ट- 1885 और 2017 का टेंपरेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज(पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) रूल्स। इन दोनों कानून के आधार पर ही सरकारी एजेंसी भारत के जिलों या राज्यों में इंटरनेट बंद करने का फैसला लेती है। इसकी एक पूरी प्रक्रिया है। केंद्र या राज्य के गृह सचिव इंटरनेट पर रोक करने का आदेश देते हैं। यह आदेश एसपी या उसके ऊपर के रैंक के अधिकारी के माध्यम से सेवा प्रदाता को भेजा जाता है।

Monday, 3 September 2018

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को 'अर्बन नक्सली' कहना कितना उचित?

जून 2018 में भीमा-कोरेगांव से जुड़े मामले में पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं सुधीर धवाले, महेश राऊत, सोमा सेन, रोमा विल्सन, मानवाधिकार अधिवक्ता सुरेन्द्र गाडलिंग को दिल्ली, मुंबई, नागपुर आदि विभिन्न स्थानों से गिरफ्तार किया था। इनसे संबंध होने के शक के आधार पर पुनः 29 अगस्त 2018 को पुणे पुलिस ने 5 अन्य सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ताओं कवि वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वेरनोन गोन्जाल्विस और अरुण परेरा को गिरफ्तार किया। हैरत की बात यह है कि भीमा-कोरेगांव में दलितों के शौर्य प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन करनेवाले लोगों की पहचान कर गिरफ्तार किया जा रहा है लेकिन इस कार्यक्रम पर हमले कर हिंसा फैलाने का आरोपी संभाजी भिड़े, मिलिंद एकबोटे आदि सत्ता संरक्षण का फायदा उठाते हुए खुलेआम घूम रहे हैं। मामले को संगीन बनाने के लिए इनके पास से प्रधानमंत्री की हत्या करनेसंबंधी एक पत्र भी बरामद होने की बात के आधार पर इस शौर्य प्रदर्शन को माओवादियों से जोड़ा जा रहा है। जबकि इन सभी कार्यकर्ताओं की पृष्ठभूमि यदि खंघालें तो सभी अत्यधिक पढ़े-लिखे, तार्किक-वैचारिक, मृदुल स्वभावी, समाज विज्ञानी, समानता के पोषक, मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो कभी भी नक्सली हिंसा का समर्थन करते हैं। बावजूद इसके सामाजिक न्याय का संदेश देने वाले इन कार्यकर्ताओं को सरकार वामपंथी रुझान रखने वाले मानती है। यदि ये सामाजिक न्याय की बात करते भी हैं तो ये संवैधानिक ही है। फिर सरकार को आखिर इनसे समस्या क्या है?
          इनकी गिरफ्तारी के बाद एक नया शब्द अर्बन नक्सलवादआजकल विमर्श का मुद्दा बना हुआ है। आखिर क्या है यह अर्बन नक्सलवाद’? सुरक्षा एजेंसियां इसे इस रूप में व्याख्यायित करती है कि यह माओवादियों की एक तरह की रणनीति है, जिसमें शहरों में नक्सल गतिविधि व नेतृत्व तलाशने हेतु मध्यवर्गीय कर्मचारियों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों व धार्मिक अल्पसंख्यकों को जोड़ते हुए उन्हें नक्सल बनने का प्रशिक्षण देने का काम किया जाता है। सरकार मानती है कि अर्बन नक्सलवादसंबंधी इस योजना की जानकारी उन्हें 2007 में बिहार के जमुई जिले में हुई नक्सलियों के नौवें कांग्रेस से प्राप्त दस्तावेजों के माध्यम से मिली। सरकार मानती है कि ये अर्बन नक्सली राज्य की शासन व्यवस्था को कमजोर करने का काम करती है, जंगलों में रहनेवाले नक्सलियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराती है। सरकार के खिलाफ माहौल बनाकर उन्हें भड़काती है।
          इस संबंध में मेरा मानना है कि 2007 में सुरक्षा एजेंसियों के हाथ लगे ये अर्बन नक्सलीसंबंधी दस्तावेज़ भी जून 2018 में गिरफ्तार अर्बन नक्सलियों के पास से प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले दस्तावेज़ की तरह ही फर्जी हो सकते हैं। इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सत्ता अपने विरोधियों के आवाज़ दबाने, उन्हें कुचलने के लिए माध्यम के रूप में प्रयुक्त करती रही है। यहाँ सवाल उठता है कि शोसितों के लिए आवाज़ उठाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को नक्सलवादियों के फ्रेम में डालना कितना उचित है? उत्तरस्वरूप कुछ बातों को समझना आवश्यक है-
          यह लड़ाई दो विचारधाराओं की है। जिसमें एक तरफ है कट्टर हिंदुवादी वर्ग जिन्हें सामाजिक समानता से कोई विशेष मतलब नहीं है तो दूसरी तरफ हैं सामाजिक न्याय व समानता की बात करने वाले तार्किक बुद्धिजीवी वर्ग। सत्ताधारी हिंदू विचारधारा वाले एक रणनीति के तहत उनके विचारों से मेल नहीं रखनेवालों को ऐसे ही किसी न किसी संगीन मामलों में फाँसती रही है। इस कारण मुस्लिम-ईसाई व वामपंथी विचारधारा वालों से इनकी झड़प हमेशा चलती रहती है। साथ ही सत्तानसीं होने का इन्हें पर्याप्त लाभ भी मिलता है। इसे इस उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है कि आज यदि कोई मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति किसी संदिग्ध गतिविधियों में हथियार के साथ गिरफ्तार होता है तो हिंदू धार्मिक-वैचारिक कट्टरता का लबादा ओढ़े मीडिया, लोग न्यायालय के फैसले के पूर्व ही उसके नाम के साथ आतंकी शब्द जोड़ सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय को आतंकी, देशद्रोही घोषित कर देते हैं। देश-समाज में उनके प्रति इतनी नफरत फैला देते हैं कि निर्दोषों में भी बाकी जनता को आतंकी नज़र आने लगता है। लेकिन ऐसे ही मामलों में गिरफ्तार हिंदू युवकों के लिए न आतंकी शब्द प्रयुक्त नहीं किया जाता न ही सम्पूर्ण हिंदू समुदाय को आतंकी घोषित कर दिया जाता है। चाहे वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करने में राजस्थान से गिरफ्तार हिंदू व्यवसायी हो, अमृतसर से गिरफ्तार रवि, बीजेपी आईटी सेल में काम करने वाला ध्रुव सक्सेना के साथ हो या हाल ही में महाराष्ट्र एटीएस द्वारा विस्फोटक सामग्रियों के साथ गिरफ्तार सनातन संस्था के 5 हिंदू युवक हों। ये सारे मामले एक से दो दिन में ज़मींदोज़ कर दिये जाते हैं। 
          इन कट्टर हिंदुवादी विचारधारा के लोगों को सबसे ज्यादा समस्या पढ़े-लिखे तार्किक लोगों से है। क्योंकि उनके समक्ष इनकी आस्था, अंधविश्वास ध्वस्त हो जाती है। निरुत्तरता की स्थिति में ये उनके प्रति हिंसात्मक हो जाते हैं, जिसका शिकार नरेंद्र दाभोलकर, एस. एम. कलिबुर्गी, गोविंद पनसारे, गौरी लंकेश आदि हुए। इन्हें समस्या ऐसे लोगों से भी है जो उनकी भेदभाव आधारित जाति व्यवस्था, प्रजातीय श्रेष्ठता की आलोचना कर दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के लिए सामाजिक न्याय की बात करते हैं। ऐसे बुद्धिजीवी लोगों को ये वामपंथी विचारधारा के फ्रेम में रखते हैं। आज कट्टर हिंदुवादी विचारधारा की पहुँच समाज, मीडिया से लेकर औद्योगिक घरानों तक है। सत्ताधारियों से मिलकर उनके विशेषाधिकारों का गलत प्रयोग कर इस विचारधारा के उद्योगपति, पूंजीपति मानवाधिकार हनन की परवाह किए अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। इन कृत्यों से आहात शोषित जनता को मजबूरन क्षेत्र के बुद्धिजीवियों से संपर्क कर न्यायालय के शरण में जाना मजबूरी हो जाती है। ऐसे में एक पढ़े-लिखे, स्वतंत्र सोच के व्यक्ति यदि अपने स्वाभाविक गुण के कारण शक्ति संपन्न वर्ग द्वारा सामाजिक या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति, समुदाय पर होने वाले अन्याय बर्दास्त नहीं कर पाता है। उनके व्यक्तित्व में मौजूद मानवीय मूल्य उन्हें कमजोर या शोषितों के पक्ष में खड़ा होने को मजबूर कर देता है।
          ऐसी स्थिति में यदि कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता उन दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, संसाधन विहीन जनता को कानूनी सलाह देने के साथ-साथ उन्हें अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक कराता है तो वह केवल अपने कर्तव्य का निर्वाहन करता है न कि उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काता है। न ही ये किसी हिंसात्मक कार्रवाई का सहारा लेने का निर्देश देते हैं। बावजूद इसके पूँजीपतियों, निजी कंपनियों द्वारा उन्हें विद्रोह भड़काने वाले एक शत्रु के रूप में देखा जाता है। परिणामस्वरूप पूँजीपतियों के इशारों पर इन्हें रास्ते से हटाने के लिए इनपर अर्बन नक्सलीका ठप्पा लगाकर सरकार द्वारा उन्हें नज़रबंद करवा दिया जाता है। न्यायप्रियता की यह भावना माक्र्स, लेनिन, माओत्से, गांधी, अम्बेडकर, फुले के विचारों को पढ़कर भी कोई भी जाति-धर्म से ऊपर उठकर शोषित दलित-आदिवासियों को न्याय दिलाने की भावना दिल में विकसित कर सकते हैं।
          पूँजीपतियों के साथ-साथ सत्तारूढ़ सरकार की आँखों में ये समाजसेवी चुभते हैं क्योंकि ये सत्ता के पीछे नहीं बल्कि उनके समानान्तर चलने, गलत नीतियों की आलोचना करने में विश्वास करते हैं। एक तरह ऐसा अतः सरकार को इन सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सलीकहना, उनपर हिंसा भड़काने का आरोप लगाना बेबुनियाद है। सरकार को चाहिए कि वह पूँजीपतियों नहीं बल्कि जनता के सेवार्थ काम करते हुए एक स्वस्थ लोकतंत्र स्थापित करे।             
(मूलतः नई दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र वीक ब्लास्ट’ 01-15 सितंबर 2018 अंक में प्रकाशित) 

    

Sunday, 1 July 2018

बलात्कार विरोध की आड़ में सांप्रदायिक राजनीति का खेल


बलात्कार जैसे अपराध को कोई भी धर्म का पुरुष अंजाम दे सकता है, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान । मंदसौर रेप कांड में 7 वर्षीय पीड़िता के प्रति सहानुभूति और आरोपी इरफान के प्रति गुस्सा मुझे भी है । घटना के बाद से ही आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है, लड़की चुकी नाबालिग है इसलिए आरोपी को Pocso act के तहत फांसी तो होगी ही लेकिन सोसल मीडिया पर उसका नाम लेकर फांसी देने की मांग की आड़ में सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाने वाली घिनौनी राजनीति का खेल चल पड़ा है । फेसबुक पर यह खेल विभिन्न समूहों के माध्यम से काफी तेजी से चल रहा है । जानबूझकर इस घटना की तुलना कठुआ और उन्नाव रेप कांड से करते हुए उस समय पीड़िता के पक्ष में इंसाफ मांगने वालों को निशाना बनाया जा रहा है, सिर्फ इसलिए कि उन दोनों कांडों पर बोलनेवालों को हिंदू विरोधी और इस कांड पर चुप रहने वाले को मुसलमानों का हितैषी बताकर हिंदू मुसलमान के मुद्दे जागृत किया जा सके और आने वाले चुनाव में इसका लाभ उठाया जा सके ।
          पूरा देश जानता है कि कठुआ रेप कांड हो या उन्नाव रेप कांड दोनों को मीडिया कवरेज के साथ-साथ सेलिब्रिटी से लेकर आम जनता का जनाक्रोश सिर्फ इसलिए जागृत हुआ था कि दोनों कांड में रेप विक्टिम को इंसाफ देने की जगह आरोपी को बचाने की कोशिश की जा रही थी । न्याय दिलाने वाले वकील सहित उनके अपने आरोपियों के पक्ष में रैली निकाल रहे थे । जबकि मंदसौर कांड का आरोपी जो मुस्लिम धर्म का है, पुलिस गिरफ्त में है, लेकिन उसे बचाने के लिए न कोई मुस्लिम संगठन न अन्य कोई सामने आ रहा । बल्कि एक मुस्लिम संगठन ने तो आरोपी पर गुस्सा दिखाते हुए उसे कब्रिस्तान में भी जगह न देने की घोषणा की है । बहुत से मुस्लिम उसे फांसी देने की मांग करते प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं । अर्थात आरोपी को कोई बचा नहीं रहा । pocso act के तहत उस पर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी ही । वह फांसी की सजा से बच नहीं सकता।
          बावजूद इसके इस मुद्दे को सांप्रदायिक रूप देकर हिन्दू-मुसलमान के बीच तनाव बढ़ाने की सोची समझी साजिश चल रही है । सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए ।

Thursday, 11 February 2016

जेएनयू में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का मतलब

जवाहर लाल नेहरू के विचारों के अतिरिक्त देश में अन्य प्रगतिशील विचारधारा, बुद्धिजीवियों को पैदा करने व उसके विकास में जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थान का बहुत योगदान है । मार्क्सवादियों का गढ़ कहलानेवाला, पूरे भारत की संस्कृति को अपने छोटे से परिसर में समेटा यह संस्थान अपने स्थापना काल से आज तक अपने कर्तव्य को बिना जातिगत या धार्मिक पक्षपात के काफी दृढ़ता पूर्वक अंजाम दिया है । कट्टरपंथियों की आँखों में यह हमेशा से खटकता रहा है यही कारण है कि आज से पूर्व ही आरएसएस के मुखपत्र पंच्जन्य द्वारा इसे देशद्रोहियों का अड्डा तक बता दिया गया ।[1] क्योंकि दोनों की विचारधाराओं में काफी अंतर है । अक्तूबर 2015 से ही आज तक लगातार मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार एवं यूजीसी द्वारा एम.फिल व पीएच.डी शोधार्थियों के शोधवृत्ति 5000, 8000 को खत्म कर शिक्षा के व्यवसायिकरण हेतु डबल्यू.टी.ओ के हाथों बेचे जाने के खिलाफ पूरे देश सहित इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को छोडकर, वामपंथी-अंबेडकरवादी संगठनों के हजारों छात्र-छात्राएँ इस कंपकपाती- नस्तर की तरह चुभती ठंडी में भी दिन-रात खुले आसमान के नीचे रहकर विरोध कर रहे हैं । हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की संलिप्तता व शिक्षा में जाति के आधार पर भेदभाव किए जाने के खिलाफ भी इन छात्र संगठनों ने खुलकर विरोध किया था । देश में शैक्षणिक स्थिति को सुदृढ़ करने के प्रति चिंतनशील, सत्तापक्ष या विपक्ष की परवाह किए बिना अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा रखने वाले ऐसे जेएनयू के छात्रों पर पूरे देश को गर्व की अनुभूति होती है । लेकिन 9 फरवरी 2015 की रात को सांस्कृतिक संध्या के आयोजन के नाम पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरु के फांसी लगाने की तीसरी वर्षी पर हैरतअंगेज़ करनेवाले “कश्मीर की आजादी, भारत की बर्बादी” जैसे देश विरोधी नारे लगाया जाना बहुत ही दुखद है । इन नारों को स्थानीय छात्रों द्वारा रेकॉर्ड की गयी विडियो में स्पष्ट सुना जा सकता है ।[2] इस विडियो में जो कुछ भी देखा-सुना जा रहा है वह वास्तव में भारत के एक नागरिक होने के नाते हमारे लिए एक शर्मनाक घटना है । इस कार्यक्रम में संलिप्त दोषियों की पहचान कर भारत में रहते हुए भी देश की अखंडता के खिलाफ बोलने के लिए इनपर उचित कारवाही किया जाना चाहिए । लेकिन इस घटना के विडियो में नारेबाजी करनेवाले प्रदर्शनकारियों की मानसिकता को भी समझने की आवश्यकता है ।
          विडियो में स्पष्ट सुनाई पड़नेवाले नारों “गो इंडिया गो बैक” कश्मीर की आजादी, भारत की बर्बादी जैसे नारों से यह साफ हो जाता है कि नारेबाजी करनेवाले जेएनयू के ये सभी सम्मिलित छात्र “जम्मू कश्मीर लिबरेसन फ्रंट” जैसे संगठनों से संबन्धित छात्र कार्यकर्ता हैं, जो पिछले 6 दसक से भी अधिक समय से कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत व पाकिस्तान के आपसी किच-किच से तंग आकर या तो भारतीय कब्जे से मुक्त होकर स्वतंत्र कश्मीर बनाना चाहते हैं या अब पिछले 2 वर्षों के राजनीति से त्रस्त होकर मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं । केंद्र में स्थापित काँग्रेस से लेकर वर्तमान बीजेपी की सरकार द्वारा कश्मीर मुद्दे को लेकर कोई ठोस कदम उठा न पाने की स्थिति में यह असंतोष दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है । स्वतंत्र कश्मीर का ख्वाब देखनेवाले जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक सदस्यों में से एक मक़बूल भट्ट की विचारधारा व संसद हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु की फांसी के बाद गुप्त रूप से यह काफी तेजी से फैल रहा है । हालांकि इसकी शुरुवात 1991-92 में ही हो गयी थी जब स्वतंत्र कश्मीर की मांग करने वाले कश्मीर के मुस्लिम कट्टरपंथियों ने भारत के साथ रहने की इच्छा जतानेवाले वहाँ के मूल निवासियों में से एक कश्मीरी पंडितों जो कुल जनसंख्या की 4 प्रतिशत थे, को कश्मीर से खदेड़कर भगा दिया । स्वतंत्र कश्मीर का ख्वाब देखनेवाले अफजल गुरु की फांसी के बाद गुप्त रूप से भारत विरोधी माहोल बन रहा है । जिसकी एक छोटी सी झलक है 9 फरवरी की घटना ।
          पिछले 2 महीने से शोधवृत्ति को लेकर केंद्र सरकार तथा रोहित वेमुला प्रकरण को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पर निशाना साधने वाले इन वामपंथी अंबेडकरवादी छात्र संगठन द्वारा सरकार की नाक में दम करने का ही परिणाम है कि इस मुद्दे को सत्ता समर्थित न्यूज़ चैनल चटखारे लगाकर कुछ से कुछ बोलकर या पूरे देश को दिखा रहे हैं । रोहित प्रकरण में हुई किरकिरी से क्षुब्ध एबीवीपी भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती । इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इनके दुष्प्रचारों से आगे चलकर ये हिंदू मुसलमान प्रकरण का रूप न ले ले । कुछ दिनों पूर्व ही जब एम. फिल एवं पीएच.डी शोधवृत्ति बंद किए जाने के निर्णय के खिलाफ तथा रोहित प्रकरण के खिलाफ दिल्ली पुलिस के लाठियों व वाटर कैनन का सामना कर रहे थे तो एक भी चैनलवाले वहाँ नहीं दिखे । हद तो इस बात की है कि एक न्यूज़ चैनलवाले ऐसे देशद्रोही कृत्यों को रोकने के लिए जेएनयू को बंद करवाने संबंधी प्रस्ताव रख रहे थे । लेकिन इसे बंद करने से समस्या का समाधान होनेवाला नहीं है । आंदोलन को जितना दबाया जाता है वह उतनी ही तेज़ी से और विनाशक होती जाती है । अतः देश में ऐसे महोल न बने इसके लिए भारत सरकार को जल्द से जल्द पाकिस्तान से कश्मीर मुद्दे पर उपयुक्त निर्णय लेने की आवश्यकता है ताकि वहाँ के स्थानीय सैनिक व आतंकवादियों के साये से मुक्त होकर स्वतंत्र जीवन यापन कर सके । उनमें असंतोष की भावना को पाटने का यह एक प्रभावी कदम होगा ।


(दैनिक समाचार पत्र वुमेन एक्सप्रेस के 12/02/2016 के संपादकीय में प्रकाशित)








[1] http://www.ndtv.com/india-news/jnu-home-to-anti-national-block-says-rss-linked-magazine-1239375
[2]https://www.facebook.com/manishkvats/videos/964561933581754/?comment_id=964666586904622&ref=notif&notif_t=like

Tuesday, 26 January 2016

बिहार के सरकारी सेवाओं में 35 प्रतिशत महिला आरक्षण एक प्रशंसनीय कदम

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान द्वारा भारत के समस्त वर्ग सहित स्त्रियों को भी मौलिक अधिकार के अंतर्गत समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, सांस्कृतिक एवं शिक्षा के अधिकार मिले जिससे वी सदियों से वंचित थी । समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14-18) के तहत सभी नागरिकों सहित स्त्रियों को राज्य की तरफ से अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के समक्ष समानता मिली, अनुच्छेद 15 जो कि सामाजिक समानता की बात करता है, द्वारा उन्हें राज्य में जाति, लिंग के भेदभाव से मुक्ति मिली । अनुच्छेद 16 द्वारा राज्याधीन नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के संबंध में समानता मिली । अनुच्छेद 17 के तहत छुवाछुत या अस्पृश्यता को समाप्त कर इन्हें व्यवहार में लाना अपराध घोषित किया गया । स्वतन्त्रता के अधिकार (अनुच्छेद 19-22) के तहत राज्य द्वारा समस्त नागरिकों सहित स्त्रियों को भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा करने की स्वतन्त्रता, संघ बनाने की स्वतन्त्रता, भ्रमण की स्वतन्त्रता, आवास की स्वतन्त्रता, पेशा, व्यापार एवं व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है । शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24) के अंतर्गत न केवल मनुष्यों या स्त्रियों का वस्तुओं की भांति क्रय-विक्रय बल्कि स्त्रियों व बच्चों के अनैतिक व्यापार को भी निषिद्ध किया गया है ।[1]  इस प्रकार भारतीय संविधान द्वारा हजारों वर्षों से राजतंत्रात्मक शासन पद्धति में उपेक्षित एवं शोषित स्त्री वर्ग को अनेक अधिकार प्राप्त हुए जो उनकी दशा एवं दिशा बदल सकते थे । लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के डेढ़ दसक बीत जाने के बाद मौलिक अधिकारों को दिये जाने के बाद भी भारतीय स्त्रियों की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया । 60 के दसक में भी रोजगार, शिक्षा, न्याय तथा राजनीतिक क्षेत्र तक स्त्रियों की पहुँच आदि क्षेत्रों में बहुत कम रही । समानता के अधिकार के बावजूद राज्य में लिंग भेद की प्रथा विद्यमान थी । बालिका भ्रूण हत्या का प्रचलन ज़ोरों पर था । स्त्रियाँ अब भी चहरदिवारी में कैद थी । सरकारी नौकरियों में भी नाम मात्र की भागीदारी थी ।
          अतः भारतीय समाज में महिला की स्थिति के अध्ययन के लिए 1972 ई. में एक राष्ट्रीय समिति का गठन हुआ जिसने 1974 ई. में अपनी रिपोर्ट सी.एस.डब्लू. आई. 1974(द रिपोर्ट ऑफ द कमेटी ऑन द स्टेटस ऑफ वुमेन इन इंडिया) प्रस्तुत की जो कि स्वतंत्र भारत का स्त्रियों की दशा से संबन्धित 473 पन्नों का 9 अध्यायों में बंटा पहला दस्तावेज़ था जिसे टूवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है । इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी आदि सभी क्षेत्रों में स्त्रियों की दुर्दशा के चौंकानेवाले तथ्य सामने आए ।[2] इसके पश्चात स्त्रियों के गिरते सामाजिक स्तर के प्रति चिंता जागी, फलतः एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय, मुंबई ने 1974 में महिला की असमान सामाजिक स्थिति पर शोध के उद्देश्य से महिला अध्ययन केंद्र का गठन किया । इसके साथ ही स्त्रियों को अपने अधिकारों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से हमारे देश में स्त्री अध्ययन पाठ्यक्रम की शुरुवात हुई । इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज बिना आरक्षण के ही बोर्ड या इंटरमिडिएट सहित समस्त प्रतियोगी परीक्षाओं में लड़कों के मुक़ाबले न केवल अधिक संख्या में सफल हो रही हैं बल्कि सरकारी सेवाओं में भी अच्छी संख्या में नियुक्त हो रही हैं । यही कारण है कि देशभर के छोटे बड़े शहरों में महिला डॉक्टर, वकील, पुलिस, के साथ साथ कार व स्कूटर चलती स्त्रियाँ आज के आम दृश्य हो गए हैं ।
          विधानसभा चुनाव के पूर्व 29 अगस्त 2015 को पटना में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने सत्ता में आने से पूर्व अपने आगामी पाँच वर्षीय विजन डोक्यूमेंट का उल्लेख करते हुए वादा किया था कि अगली बार सत्ता में आए तो राज्य के सरकारी नौकरियों में स्त्रियों को 35 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा ।[3] ऐसे में पुनः सत्ता में आने के बाद नितीश कुमार द्वारा बिहार के सरकारी सेवाओं में 35 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान स्त्रियों को न केवल सामाजिक व आर्थिक रूप से स्त्रियों को सशक्त करेगा बल्कि निजी क्षेत्रों सहित सार्वजनिक क्षेत्रों में इनकी पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी । विशेषकर खेतिहर मजदूर, बीड़ी, हथकरघा उद्योग जैसे असंगठित क्षेत्रों में काम करनेवाले स्त्रियों के लिए यह नीति वरदान साबित होगी । आज आवश्यकता है पूरे देश मैं ऐसी नीतियाँ लाने व लागू करने की । जब बिहार जैसा विकास के पथ पर अग्रसर, कम विकसित राज्य अपने राजकीय सेवाओं की सुदृढ़ता के लिए स्थानीय निकाय में 50 प्रतिशत पुलिस और कांस्टेबल भर्ती में 35 प्रतिशत तथा सरकारी सेवाओं में 35 प्रतिशत आरक्षण दे सकता है तो अन्य राज्यों को भी इस संबंध में सोचना चाहिए । हालांकि इसके पूर्व अक्तूबर 2015 में ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान[4] ने तथा अक्तूबर 2014 में गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन राज्य के सरकारी सेवाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया था ।[5] ऐसी स्थिति में जब केंद्र सरकार महिला आरक्षण बिल 18 वर्ष बाद भी, लोक सभा तथा विधानसभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के बिल को 2010 में ही राज्यसभा से पास कराने के बावजूद भी पास नहीं करवा पा रही है, नितीश कुमार, आनंदी बेन तथा शिवराज सिंह चौहान द्वारा स्त्रियों को विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी की वृद्धि के लिए इस नीति को लागू किए जाने का कदम स्वागत योग्य है । ऐसे नीतियों से न केवल हमारे समाज से लैंगिक भेदभाव खत्म होगा बल्कि बेटी को भार समझकर कन्या भ्रूण हत्या पर भी लगाम लगाया जा सकेगा । आज बिहार राज्य के सरकारी सेवा में स्त्रियों की भागीदारी लगभग 10 प्रतिशत है ।[6] जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह भागीदारी 25.51 प्रतिशत है ।[7] उम्मीद है आनेवाले दिनों में यह राष्ट्रीय स्तर को पार कर 50 प्रतिशत हो जाएगा ।

(Women Express के 27/01/2016 के संपादकीय में प्रकाशित)










[1] त्रिवेदी, आर एन, राय एम पी, “भारतीय संविधान” कॉलेज बुक डिपो, जयपुर, 2009 
[2] Sharma Kumud, Sujaya C.P,Towards Equality : Report of the Committee on the   Status of Women in India, Pearson Publication, Delhi, 1974
[3] http://www.freepressjournal.in/bihar-cm-promises-35-reservation-in-govt-jobs-for-women/655385
[4] http://www.ndtv.com/india-news/33-per-cent-quota-for-women-in-government-jobs-in-madhya-pradesh-1237476
[5] http://www.ahmedabadmirror.com/ahmedabad/civic/33-reservation-for-women-in-all-state-government-jobs/articleshow/44807085.cms
[6]http://in.reuters.com/article/india-women-employment-bihar-idINKCN0UY25D
[7] http://labour.nic.in/content/division/women-labour.php

Saturday, 23 January 2016

विचारधारा की लड़ाई ने लील ली रोहित वेमुला की ज़िंदगी

अगस्त 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय में नकुल सिंह साहनी एवं नेहा दीक्षित निर्मित, मुजफ्फरनगर दंगों के लिए उत्तरदायी कारणों की पड़ताल करती डोक्यूमेंट्री फिल्म “मुजफ्फरनगर बाकी है” के प्रदर्शन का जब बीजेपी समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यी छात्रों ने फिल्म को हिन्दुत्व के खिलाफ[1] बताते हुए विरोध किया तो वहीं जेएनयू, हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा सहित पूरे देश के अनेक विश्वविद्यालयों के छात्रों विशेषकर दलित तथा वामपंथी छात्र संगठनों ने प्रदर्शन का समर्थन करते हुए अपने-अपने संबन्धित संस्थानों में एक साथ फिल्म का स्क्रीनिंग किया । 2 घंटे 16 मिनट की इस प्रतिरोधक फिल्म को स्क्रीनिंग के दिन ही लगभग 7 हज़ार लोगों ने काफी रुचि से देखा ।[2] हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के खिलाफ अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन के छात्रों द्वारा फिल्म के प्रदर्शन का समर्थन करते हुए इसका प्रदर्शन किया गया । इसके अगले दिन ही एबीवीपी के एक नेता ने इन्हें गुंडा शब्द से संबोधित किया । जिसके लिए बाद में विश्वविद्यालय के सुरक्षा अधिकारियों से उस नेता ने लिखित माफी भी मांगी । इसके अगले ही दिन एबीवीपी नेता सुशील कुमार ने अंबेडकर स्टूडेंट्स असोशिएशन के 30 छात्रों द्वारा खुद के साथ मारपीट किए जाने का आरोप लगाया । घटना की जांच के बाद प्रोक्टोरियल बोर्ड ने यह पाया कि सुशील कुमार को पीटे जाने का कोई प्रमाण नहीं है ।[3] मौके पर मौजूद सुरक्षा गार्ड ने भी कहा कि मारपीट की कोई घटना नहीं हुई है । कोई जख्म का निशान नहीं है ।[4] इसके बावजूद अंतिम रिपोर्ट में बोर्ड ने 5 अंबेडकर स्टूडेंट्स असोशिएशन के छात्रों को एक सेमेस्टर के लिए निलंबित करने का फैसला किया गया । फैसले का विरोध करने के बाद पूर्व वाइस चांसलर ने इस सज़ा को नए कमेटी द्वारा नए सिरे से जांच होने तक के लिए वापस ले लिया । इस दौरान न केवल एक बीजेपी के एमएलसी ने इस घटना को लेकर पूर्व वीसी आरपी शर्मा से मुलाक़ात की । बल्कि बीजेपी सांसद केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने 17 अगस्त 2015 को मानव संसाधन मंत्री को हैदराबाद विश्वविद्यालय में जातिवादी, राष्ट्रवादी गतिविधियों के गढ़ बनने से संबंधित पत्र लिखा । इसी बीच 21 सितंबर 2015 को नए वाइस चांसलर प्रो. अप्पा राव आ गए । पूर्व वीसी के वादे के अनुरूप इन्होनें कोई जांच कमेटी नहीं बनाई । लेकिन विश्वविद्यालय की सर्वोच्च कार्यकारी समिति ने अपना फैसला देते हुए पहले से भी सख्त सज़ा देते हुए दिसम्बर 2015 में इन पाँच छात्रों को हॉस्टल से निलंबित करने के साथ-साथ उनकी फ़ेलोशिप भी रोक दी गयी ।[5] इस निर्णय के विरोध में इन छात्रों ने हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की । साथ ही अनेक छात्रों के साथ खुले में भी रह रहे थे । अंततः रविवार 17 जनवरी को इन 5 छात्रों में से एक रोहित वेमुला ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली ।
          आत्महत्या के अगले दिन से ही देशभर के विश्वविद्यालयों में रोहित की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सज़ा देने के समर्थन में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया । इसमें बीजेपी सांसद तथा श्रम मंत्री बंडारु दत्तात्रेय तथा स्मृति ईरानी के नाम आने के कारण यह राजनीति का अखाड़ा बन गया है । बीजेपी वाले एक ओर जहां एबीवीपी तथा केंद्रीय मंत्री का पक्ष लेते हुए उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर रोहित को याक़ूब मेनन के फांसी का विरोध करने, बीफ फेस्टिवल का समर्थन करने के कारण उसे राष्ट्रविरोधी करार दे रहे हैं । लेकिन ऐसा कर वे मुद्दे को उलझाना चाहते हैं । ये जो कुछ भी बता रहे हैं वो सही हो सकता है लेकिन इन तथ्यों का रोहित की मौत से कोई लेना देना नहीं है । ये इक्सक्यूज बिलकुल वैसा ही है जैसे नाथुराम गोडसे ने गांधी जी की हत्या की । क्यों की ? तो इसलिए कि उनका अपने सहयोगी मनु और आभा के साथ संबंध था (नए अध्ययन के अनुसार) ।[6] जबकि वास्तविकता ये है कि गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या का कारण पाकिस्तान प्रश्न से संबंधित था । ठीक इसी प्रकार इन छात्रों के निलंबन को मुख्य कारण “मुजफ्फरनगर बाकी है” के दौरान हुई झड़प से है । वो बीफ पार्टी का आयोजन करता था, याक़ूब के फांसी का विरोध करता था ... ये सभी तथ्य मुद्दे को भटकाने के लिए हैं । फिर भी यदि कोई किसी के फांसी की सज़ा का विरोध करता है तो इसमें गलत क्या है ।[7] भगत सिंह के फांसी का हम आज भी विरोध करते हैं भले वो ब्रिटिश सरकार की नज़र में आतंकवादी हों । जबकि ये सर्वविदित है कि बीफ फेस्टिवल का आयोजन एक सांकेतिक प्रतिरोध था ...फासीवादियों के मॉरल पुलिसींग के खिलाफ । ठीक वैसे ही जैसे मॉरल पुलिसींग के खिलाफ केरल से शुरू हुए “किस ऑफ लव” आंदोलन था । जो कि फासीवादी विचारधारा का मुंह चिढ़ाने के लिए आयोजित किया जाता था । राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह, अरविंद केजरीवाल सभी इस अखाड़े में अपनी आजमाइश करने में लग गए हैं ।[8] लेकिन इस सियासत में रोहित की मौत का जो मुख्य कारण है उस पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है । रोहित की मौत का मुख्य कारण ब्राह्मणवादी तथा गैर ब्राह्मणवादी अंबेडकरवादी विचारधारा का टकराव है । ब्राह्मणवादी विचारधारा की गिरफ्त में आज देश का प्रत्येक शिक्षण संस्थान है । विशेषकर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में तो यह कूटकूट कर भरी है । ब्राह्मणवादी विचारधारा के अनुयायी इन बातों से गुरेज करते हैं कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी वर्ग के बच्चे भी एम. फिल या पीएच.डी स्तर की पढ़ाई करें और उन्हें भी हमारी तरह कॉलेजों, विश्वविद्यालय में नौकरियाँ मिले । वास्तव में ऐसे विचारधारा के लोग इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी राजतंत्रात्मक व्यवस्था का अनुसरण करते हुए मनुस्मृति के बनाए नियमों पर चलते हैं । संविधान प्रदत्त आरक्षण के कारण एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग के छात्रों को लेना इनकी मजबूरी है । अन्यथा ऐसी विचारधारा वाले लोग सामान्य वर्ग को छोडकर इन लोगों को देखना भी पसंद नहीं करते । आरक्षण या प्रतिभा के बल पर प्रवेश पाने के बावजूद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उनके निम्न जाति से संबंधित होने का एहसास करवाया जाता है । अंबेडकर स्टूडेंट्स असोशिएशन से जुड़े रोहित वेमुला द्वारा हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति को दिसम्बर 2015 में लिखे इस पत्र से इस तथ्य की पुष्टि होती है “दलित छात्रों के कमरे में एक रस्सी मुहैया करानी चाहिए । इससे पूर्व भी पत्र व्यवहार में यह भी कहा कि “हमलोगों को इस तरह अपमानित करने की जगह नामांकन के समय ही हमें जहर दे देना चाहिए ।[9] यही कारण है कि पिछले 10 वर्षों में हैदराबाद विश्वविद्यालय के 9 दलित छात्रों ने ख़ुदकुशी को अंजाम दिया । अंबेडकरवादी विचारधारा इनके इन्हीं नीतियों का विरोध करती है । रोहित की घटना पर बेबाकी से राय रखनेवाले अंग्रेजी उपन्यासकार चेतन भगत कहते हैं “राजनीति से मुक्त हो शिक्षा परिसर” । लेकिन जहां तक मेरा विचार है शिक्षा परिसर के राजनीति से मुक्त होने से कुछ भी होने वाला है । यदि मुक्त कराना ही है तो शिक्षा परिसर को जाति या ब्राह्मणवादी विचारधारा से मुक्त कराइये ।
                                         
           (वुमेन एक्सप्रेस के 23/01/2016 के संपादकीय में प्रकाशित) 


                                                                                                                 
         




[1] http://www.newslaundry.com/2015/08/05/muzaffarnagar-baaqi-hai-abvp-says-film-against-hinduism-director-insists-its-only-against-fascist-forces/
[2] http://www.firstpost.com/bollywood/blocked-in-delhi-university-documentary-muzaffarnagar-baaqi-hai-is-a-must-watch-2408662.html
[3] http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160119_rahulgandhi_rohit_ia
[4] http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160118_rohit_vemula_apoorvanand_rd
[5] http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160119_rohith_vemula_profile_pk
[6] https://vinaylal.wordpress.com/tag/gandhis-experiments-in-brahmacharya/
[7] http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160118_rohit_vemula_apoorvanand_rd
[8]http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160119_rohith_vemula_political_reactions_ml?ocid=socialflow_facebook
[9] http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160119_rohith_vemula_profile_pk