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Tuesday, 21 March 2023

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया? उसी दिन या इस दो महीने के बीच की किसी अन्य तिथि क्यों नहीं?

शालायी बच्चों को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से परिचय कराने, उन मूल्यों के साथ जीने के कौशल विकसित करने के क्रम में बेमेतरा जिले के एक शासकीय उच्च प्राथमिक शाला जाना हुआ। कक्षा छठवीं-आठवीं के बच्चों के साथ होने वाली इस बातचीत के दो चरण थे। पहले चरण में बच्चों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना एवं उनमें उल्लेखित संवैधानिक अवधारणाओं एवं मूल्यों से संबंधित प्रदर्शित कैलेंडर का अवलोकन, अध्ययन करना था, तत्पश्चात मन में उपजे सवालों को एक कागज में लिखना भी था, ताकि दूसरे चरण में कक्षा में बैठकर उनपर बातचीत किया जा सके। बच्चों की ओर से कई प्रकार के सवाल आए। इसी क्रम में एक ऐसा भी सवाल आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सवाल था – हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया”? उस पर्ची पर सवाल पूछने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था, बाद में बच्चों से पूछा भी कि यह सवाल किसकी जिज्ञासा है? लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सवाल की प्रकृति को देखकर ऐसा लगा कि शायद उसी शाला के किसी शिक्षक की ओर से ये सवाल आया हो? यह सोचकर कि इस विषय पर मेरी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, मैंने उस सवाल पर फिर कभी किसी दिन बातचीत करने की बच्चों और शाला के शिक्षकों से सहमति ली। कई प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि नवनिर्मित भारतीय संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक विशिष्ट बात छिपी थी।

          आजाद हिंदुस्तान (भारत) के संचालन हेतु संविधान निर्माण के लिए 9 दिसंबर 1946 ई. में ही भारतीय प्रतिनिधियों से निर्मित कमेटी गठित कर ली गई थी। इस कमेटी ने 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन तक 114 बैठकों में लगातार चर्चा, विमर्श करने के पश्चात इस नवनिर्मित विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंतिम रूप 26 नवंबर 1949 को दिया था। लेकिन कमेटी ने इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि निर्धारित की। इसके पीछे कारण था इस तिथि (26 जनवरी) की विशिष्टता। इस विशिष्टता को समझने के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष पूर्व अर्थात 1929-30 ई. के कुछ घटनाक्रम को समझना पड़ेगा। दिसंबर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन रावी नदी के किनारे लाहौर में हुआ, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। हालांकि प्रारंभ में गांधीजी को इस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया।[i] 1908 ई. से लेकर इस अधिवेशन तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग कर रही थी। इस अधिवेशन के दौरान ही जनवरी 1930 ई. के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि इसी महीने के आखिरी रविवार (26 जनवरी की तिथि) तक ब्रिटिश सरकार यदि भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती है तो भारत खुद को पूरी तरह स्वतंत्र (पूर्ण स्वराज) घोषित कर देगा। अर्थात इस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ने अपना लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज से पूर्ण स्वराज घोषित किया। ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि तक जब इस मांग को नहीं माना तो भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी। इस तिथि को पहली बार देश के अनेक भागों में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।[ii] साथ ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हिंदुस्तान के अलग-अलग भागों के नागरिकों ने शांतिपूर्वक तथा पूर्णनिष्ठा के साथ गांधीजी द्वारा तैयार किए गए पूर्ण स्वराज के शपथ को दुहराते हुए आजादी हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया। 1930 ई. के पश्चात 1947 ई. तक सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन निर्धारित किया। हालांकि उनके द्वारा भी इस कार्य के लिए 15 अगस्त की तिथि चुने जाने के पीछे एक रोचक कारण था। दरअसल 15 अगस्त अंग्रेजों के लिए एक यादगार दिन था। 2 वर्ष पूर्व अर्थात 1945 ई. में 15 अगस्त की तिथि को ही द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के गुट, जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था, के समक्ष जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह एक विशिष्ट दिन था। चूंकि मामला देश की आजादी का था इसलिए भारतीय राजनेताओं को 15 अगस्त 1947 की प्रस्तावित तिथि को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी की तिथि थोड़ी धूमिल पड़ती जा रही थी, क्योंकि इसका स्थान 15 अगस्त की तिथि ने ले लिया था। इस तिथि की महत्ता बरकरार रहे यह सोचकर संविधान निर्माण समिति द्वारा 26 जनवरी 1950 ई. की तिथि को भारतीय संविधान लागू करने की तिथि घोषित की गई।

          यहाँ एक रोचक बात और यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से 1908 ई. से ही जिस डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशिक साम्राज्य) की मांग की थी एवं 1929-30 ई. में जिस पूर्ण स्वराज की बात की थी, दोनों एक साथ पूरी हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि 15 अगस्त 1947 ई. की तिथि को भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से स्वतंत्रता मिली। सर्वोच्च पद वायसराय खत्म हुआ लेकिन एक नए पद गवर्नर जनरल का सृजन हुआ। यह पद ब्रिटिश क्राउन के अधीन होता था। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। वे 1947-48 ई. तक इस पद पर बने रहे। तत्पश्चात चक्रवर्ती राज गोपालाचारी पहले एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। ऐसा इसलिए हुआ कि स्वतंत्रता के समय भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। इसलिए इसके लागू होने के पूर्व अर्थात 25 जनवरी 1950 ई. तक गवर्नर जनरल का पद ही सर्वोच्च पद बना रहा। 26 जनवरी 1950 से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ ही डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ। डोमिनियन स्टेटस से तात्पर्य था - आंतरिक प्रशासन जैसे विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, सैनिक, विदेशी मामले भारतीयों के द्वारा संचालित किए जाएंगे, लेकिन राजा ब्रिटिश साम्राज्य का होगा। इस तरह 26 जनवरी 1950 ई. से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चूंकि इससे पूर्व हमारे देश में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी जिसमें राजा का पद वंशानुगत होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि यही व्यवस्था रहती तो विविध जाति, धर्म, संप्रदाय के मेल से निर्मित नवीन भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं होता। अतः इस व्यवस्था के स्थान पर प्राचीन भारत की ही एक अन्य व्यवस्था गणतन्त्र को चुना गया। राजतंत्र के विपरीत इस व्यवस्था में राजा का पद वंशानुगत न होकर जनता के बीच से चुने जाते थे। इस व्यवस्था में राजा के पद को राष्ट्रपति के नाम से संबोधित किया गया। यही कारण है कि इस तिथि को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को चुना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च संवैधानिक पद था। इससे पूर्व डोमिनियन स्टेटस में गवर्नर जनरल का पद सर्वोच्च होता था।

          26 जनवरी 1950 से इस पद के अस्तित्व में आते ही हमारे देश में गणतंत्रात्मक व्यवस्था लागू हुआ, ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ।



[ii] https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/our-constitution-implemented-on-26-january-know-everything-pcup/834996

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त अन्य स्त्रोत

गुहा रामचंद्र (2012) भारत गांधी के बाद: दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का इतिहासपेंग्विन बुक्स, गुरूग्राम

 


Tuesday, 6 November 2018

सरकार चलाने वाले लोग देशभक्त या धर्मभक्त ?


जेएनयू में तथाकथित देश विरोधी नारे लगने की घटना के बाद देशद्रोही, देशभक्त, राष्ट्रवाद शब्द विमर्श का मुद्दा बन गया था। जेएनयू में इन मुद्दों पर अनेकों दिन तक खुले सत्र में चर्चा आयोजित हुए जिसमें प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ-साथ देश भर के अकादमिक जगत के साथ-साथ सामाजिक, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने विचार प्रेषित किए। लगभग समस्त मीडिया संस्थान भी  इस विमर्श पर कई दिनों तक पैनल बनाकर चर्चा करते रहे। इन चर्चाओं में देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटने वाले गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाते नज़र आए कि पाकिस्तान हमारा शत्रु है। उसके प्रति हमदर्दी दिखाने वाला भारतीय चाहे वह हिंदू, मुसलमान या किसी भी धर्म का हो, देशद्रोही है। इस दौरान कई गड़े मुर्दे भी उखड़े जिसपर जान-बूझकर विमर्श कर हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। जैसे भारत व पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के समय भारतीय मुसलमानों की बड़ी संख्या द्वारा पाकिस्तानी टीम को सपोर्ट करना, उनकी जीत पर पटाखे फोड़कर जश्न मनाना, शाहिद अफरीदी, शोएब अख्तर सहित अन्य पाकिस्तान के स्टार क्रिकेट खिलाड़ियों के प्रशंसक होने को मीडिया पैनलिस्ट ने देशद्रोही कार्य करार दे दिया। ऐसा कर उन पैनलिस्टों ने एक धारणा बना दी कि आपने यदि किसी भी मामले में पाकिस्तान का पक्ष लिया तो आप देशद्रोही करार दिये जाएंगे। मुसलमानों से घृणा करने वाले इन नफरत के सौदागरों ने इस्लामी झंडे को पाकिस्तानी झंडा बताकर उनके पाकिस्तानी समर्थक होने, देशद्रोही होने का काफी दुष्प्रचार किया। मेरे कहने का ये तात्पर्य नहीं है कि हमारे ही देश में रहकर हमारे ही देश के खिलाफ कोई ऐसा काम करे जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो, को देशद्रोही नहीं कहा जाए बल्कि मैं ज़ोर देकर कहता हूँ कि हमारे देश का कोई भी व्यक्ति चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान देश के इज्जत, प्रतिष्ठा की बेला में अपने देश भारत को छोड़कर यदि पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, नेपाल या अन्य देशों का पक्ष ले, अपने देश की खुफिया सूचनाएँ दुश्मन देश को पहुंचाए तो बेशक उन्हें देशद्रोही कहा जाए।
          लेकिन ये नियम कानून सभी के लिए हो। किसी को कोई रियायत नहीं मिले। सरकार भी खुद इसे अमल में लाए। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि सरकार भी इस मुद्दे पर काफी ढुलमुल रही है। हाल ही में असम में चुनाव जीतने के बाद केंद्र व कई राज्यों की बीजेपी सरकार जिस प्रकार पाकिस्तानी, बांग्लादेशी हिंदू नागरिकों के साथ व्यवहार कर रही है, उनकी देशभक्ति पर भी प्रश्नचिन्ह उठता है। हाल ही में गृह मंत्रालय ने सिटिज़न एक्ट 2016 में संशोधन करते हुए देश के 7 राज्यों के गृह सचिवों व जिलाधिकारियों को यह शक्ति दी है कि इस एक्ट के सेक्शन 6 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान से बिना वैध दस्तावेज़ के आए बौद्ध, ईसाई, हिंदु, जैन, पारसी आदि अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों को इन देशों की सीमा से लगे राज्य भारतीय नागरिकता के सर्टिफिकेट दे सकते हैं यदि वह 6 वर्ष भारत में रह चुका है। पहले यह अवधि 11 वर्ष थी, 2016 में संशोधन के बाद इसे घटाकर 6 वर्ष कर दिया गया।[i] हैरत की बात यह है कि इसमें इस्लामी धर्मावलम्बी शामिल नहीं हैं। एक तरफ केंद्र सरकार 1971 ई. के बाद भारतीय सीमा में बिना इजाजत आए बंग्लादेशी शरणार्थियों जिसमें अधिकांश मुस्लिम हैं, को घुसपैठिए, देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए भारतीय नागरिकता देने से इनकार कर असम, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से उन्हें वापस अपने देश बांग्लादेश भेजना चाहती है तो वहीं हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने की बात कर रही है। इसी प्रकार राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार पाकिस्तान से आए विस्थापित हिंदू परिवारों के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए रियायति दर पर आवासीय भूमि आवंटित करने की बात करती हैं। राजस्थान में पाकिस्तानी विस्थापितों के लिए काम करने वाली एक स्वयंसेवी संस्था सीमांत लोक संगठन के अनुसार राजस्थान में कुल 5 लाख पाकिस्तानी हिंदू विस्थापित बसे हैं।[ii] यहाँ सवाल यह उठता है कि जब बिना वैध दस्तावेज़ के साथ हमारे देश में रह रहे बांग्लादेशी यदि देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं तो इन 5 लाख हिंदू पाकिस्तानी के प्रति सरकार की सोच इतनी सकारात्मक रखते हुए उन्हें अपने देश में क्यों बसाना चाहते हैं? जबकि ये 5 लाख विस्थापित हिंदू ऐसे देश पाकिस्तान से संबंधित हैं जिन्हें हम दुश्मन देश मानते हैं। इस दृष्टि से तो इनसे देश की सुरक्षा को बांग्लादेशियों से भी अधिक खतरा है। कोई भी आतंकी हिंदू शरणार्थी बनकर पाकिस्तान के लिए नापाक हरकतों को अंजाम दे सकता है। पाकिस्तान के मुक़ाबले बांग्लादेश से तो ऐसी कोई शत्रुता ही नहीं है। एक समुदाय/धर्मावलम्बी के साथ राष्ट्रीयता के आधार पर व्यवहार, तो दूसरे के साथ धार्मिकता के आधार पर व्यवहार ! सिर्फ इसलिए कि जिसे बाहर भेजने की बात कर रहे हैं वे मुसलमान हैं जिन्हें सरकार की विचारधारा के लोग अपना शत्रु समझते हैं। और जिसको बसाने की बात कर रहे हैं वे हिंदू हैं। उनके प्रति हमदर्दी केवल इसलिए है कि दोनों का धर्म एक है।
          जब पाकिस्तानियों व बांग्लादेशियों के साथ उनकी राष्ट्रीयता नहीं बल्कि धर्म के आधार पर ही व्यवहार करना है तो फिर ये देशभक्ति का ढोंग करने का क्या मतलब??? जिन बांग्लादेशियों के प्रति आप घृणा सूचक शब्द घुसपैठिए प्रयुक्त करते हैं, यदि वह हिंदू बांग्लादेशी हो, जिस पाकिस्तानी के खिलाफ आप दिनरात जहर उगलते हैं यदि वे हिंदू पाकिस्तानी हों तो वह घुसपैठी, जासूस या आतंकी नहीं हो सकता क्या? फिर उन्हें हमारे देश में बसने की पूरी इज्जत के साथ इजाजत क्यों है? उन्हें वापस क्यों नहीं भेजा जाता।
          यदि सरकार में बैठे लोग सचमुच देशभक्त हैं तो किसी भी देश के नागरिक, चाहे वह अमेरिकी, बांग्लादेशी या पाकिस्तानी हो, उसे उसकी राष्ट्रीयता के आधार पर धार्मिकता की परवाह किए बिना उन्हें एक विदेशी के रूप में देखते हुए व्यवहार करना चाहिए। सिटीजन एक्ट 1955 में फिर से संसोधन कर यह कानून बनाया जाय कि बिना वैध दस्तावेज़ के भारत आए विदेशियों को बसने की इजाजत नहीं दी जा सकती। विशेष रूप से देश की सुरक्षा को देखते हुए पाकिस्तान के लोगों को, चाहे वह किसी भी धर्म के हों। नहीं तो सरकार में बैठे लोगों को खुल कर इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि वह देशभक्त नहीं बल्कि देशभक्त की खाल ओढ़े हिंदू व संबंधित संप्रदाय के धर्मभक्त हैं। और इस धर्मभक्ति के लिए देशभक्ति भी कुर्बान है। वैसे आपकी इस धर्मभक्ति से एक बात तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान या बांग्लादेश के मुसलमानों से हमदर्दी दिखाने वाले हमारे देश के मुसलमान और आपमें कोई अंतर नहीं है। दोनों को अपने धर्मावलंबी प्रिय हैं चाहे वह किसी देश के हों। इसलिए अगली बार उनके पाकिस्तानी मुस्लिमों के प्रति हमदर्दी दिखाने पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबां में झांक लेना।
साकेत बिहारी
अजीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन
डी. आई. बेमेतरा (छत्तीसगढ़)



[i] http://www.prsindia.org/uploads/media/Citizenship/Citizenship%20(A)%20bill,%202016.pdf
[ii] https://aajtak.intoday.in/story/vasundhra-govt-relaxed-land-allotment-policy-now-pak-hindu-migrants-can-purchase-land-in-rajasthan-1-1034901.html?fbclid=IwAR2-98sw6X6DU2urZTrywHSVv0icQ_1FbmG2GLSsz1FVxZVYvTolWgW-r20

Friday, 14 September 2018

हिंदी दिवस के शुभकमना संदेश में अंग्रेजी का अपमान क्यों ?




कोई एक भाषी बनकर आप देश - दुनिया को जान समझ नहीं सकते। यदि हम हिंदी भाषी हैं तो पश्चिमी दुनिया की सभ्यता, संस्कृति को जानने के लिए हमारे लिए अंग्रेजी उतना ही जरूरी है जितना एक पश्चिमी देश के अंग्रेजी भाषी नागरिक को भारतीय सभ्यता-संस्कृति को जानने, समझने के लिए हिंदी।

वैश्वीकरण के इस दौर में व्यापार, पर्यटन, मीडिया आदि क्षेत्र में संभावनाओं को देखते हुए पश्चिमी या गैर हिंदी अंग्रेजी भाषी देशों में भी हिंदी भाषा सीखने की प्रवृत्ति वैसे ही बढ़ रही है जैसे हमलोगों में अंग्रेजी सीखने की प्रवृत्ति।

इसलिए हिंदी दिवस की बधाई दीजिये लेकिन अंग्रेजी सहित अन्य दूसरे mainstream भाषाओं का अपमान कर नहीं बल्कि हिंदी के साथ-साथ उनका भी सम्मान कर।

मन से इस बासी ख्याल को निकालिये कि ये हमारे विरोधी रहे अंग्रेजों की भाषा है इसलिए हिंदी दिवस पर अंग्रेजी का अपमान करने से आप राष्ट्रवादी हो जाएंगे।

याद रखें अंग्रेजी भाषा के अपमान से एक ब्रिटिश नागरिक को भी उतना ही कष्ट होता है जितना किसी के द्वारा हिंदी के अपमान करने से हम आपको।

बाकी हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।

Wednesday, 3 January 2018

राष्ट्रीयता की राह के पत्थर: शौर्य दिवस

विभिन्न धर्मों, जातियों, मानव प्रजातियों का अनुपम संग्रहालय हमारा देश पिछले दो-तीन दसकों से कभी धार्मिक, कभी जातीय उन्माद, वर्चस्व की राजनीति के कारण रणभूमि बन चुका है । नौकरी हेतु आवेदन के क्रम में कितना भी गर्व से हम खुद की राष्ट्रीयता भारतीय लिख दें लेकिन समय आने पर अपनी वास्तविकता दिखाने से नहीं चूकते कि हम भारतीय बाद में हैं, हिंदू, मुसलमान, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, हरिजन, दलित, आदिवासी पहले हैं । उदाहरण के रूप में प्रति वर्ष महिषासुर विजय के रूप में मनाया जाने वाला शौर्य त्योहार विजया दशमी, 6 दिसंबर की बाबरी विध्वंश की वार्षिकी पर शौर्य प्रदर्शन या 1 जनवरी को कोरेगांव भीमा का शौर्य प्रदर्शन, देखे जा सकते हैं । इस तरह के शौर्य प्रदर्शन में एक तरफ प्रचंड आत्मविश्वास, ऊर्जा से परिपूर्ण विजेता पक्ष होता है तो दूसरा अपमानित महसूस करने के बावजूद खून के घूंट पीकर रह जानेवाला पीड़ित समुदाय होता है । ऐसे में यदि शौर्य दिवस आयोजकों को सत्ता पक्ष का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से साथ मिल जाए तो 6 दिसंबर को होनेवाले शौर्य प्रदर्शन शांतिपूर्ण होता है । लेकिन जब सत्ता पक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शौर्य दिवस विरोधियों के साथ हो तो कोरेगांव जैसी हिंसक घटनाएँ जन्म लेती है ।
          शौर्य प्रदर्शन जैसी घटनाएँ क्षणिक रूप से किसी समुदाय विशेष के लिए गौरव का क्षण हो सकता है लेकिन इससे उत्पन्न वैमनस्यता का सबसे बड़ा नुकसान हमारे देश को है । इस वैमनस्यता से हमारी वह राष्ट्रीयता की भावना प्रभावित होती है जिसे जागृत कराने के लिए सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए स्कूल-कॉलेज स्तर पर भारतीय इतिहास के हमारे अध्ययन-अध्यापन पर खर्च करती है । बाबरी विध्वंश का शौर्य दिवस हो, विजया दशमी का शौर्य दिवस हो या कोरेगांव भीमा के महारों का पेशवाओं पर विजय का शौर्य दिवस, सभी धार्मिक व जातिगत वैमनस्यता को बढ़ावा देते हुए हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-आदिवासी, सवर्ण-दलित के बीच अलगाववाद को बढ़ावा देते हैं । यदि ऐसे शौर्य दिवस मनाने की प्रवृत्तियों जिससे एक दूसरे की भावनाओं को आघात पहुंचे, पर सरकार द्वारा अंकुश नहीं लगाया गया तो जिस तरह आज धर्मनिरपेक्ष स्वरूप वाले हमारे देश में हिंदू राष्ट्र बनाने, संविधान को बदलने के सुर सुनाई पड़ते हैं, आगे चलकर जाति-धर्म के नाम पर पृथक राष्ट्र बनाने की मांग चारों तरफ से सुनाई पड़ेंगी । और देश को स्वतन्त्रता पूर्व की राजनीतिक स्थिति में पहुँचते देर नहीं लगेगी जब सम्पूर्ण भारत सैकड़ों रियासतों से आबाद एक भौगोलिक क्षेत्र था ।
साकेत बिहारी
शोधार्थी – पीएच.डी.

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
(Women Express 04/01/2018 अंक में प्रकाशित) 

Wednesday, 27 December 2017

‘वन्दे मातरम’ विमर्श की आवश्यकता क्यों?

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय लिखित उपन्यास आनंदमठ के गीत वन्दे मातरम के गायन को लेकर पिछले 3 वर्षों से हमारे देश के समाचार चैनल अखाड़ा बने हुए हैं। यह विवाद कोई नया नहीं है बल्कि इसकी जड़ स्वतन्त्रतापूर्व की रही है। स्वतंत्रता पूर्व इस बोल से घृणा करने की वजह थी कि जिस उपन्यास आनंद मठ से यह गीत लिया गया है उसमें मुसलमान शासकों को शोषक के रूप में दिखाते हुए, मुसलमानों के लिए ओछे शब्दों को प्रयुक्त कर उनके प्रति घृणा दिखाया गया है, जो प्रारम्भ में अंग्रेजों के लिए किया गया था। बाद में अंग्रेजों की जगह न केवल मुसलमानों को डाल दिया गया, बल्कि अंग्रेजों की जय-जयकार भी की गयी। इस गीत में हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बहुलता होने के कारण ही  इसे राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है, जबकि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय में यह जनमानस में रवीद्रनाथ टैगोर की जन-गण-मन से भी अधिक लोकप्रिय था।
          23 दिसंबर 2017 को ‘सिर्डी साईं बाबा’ संस्थान द्वारा आयोजित ग्लोबल साईं मंदिर ट्रस्ट सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू द्वारा मुसलमानों द्वारा वंदे मातरम गाने की समस्या को लेकर उठाए गए सवाल के बाद यह विमर्श एवं विवाद का मुद्दा बन गया है। इस विमर्श में एक तरफ तथाकथित देशभक्त’(हिंदू सहित अन्य धर्मावलम्बी) हैं तो दूसरी तरफ तथाकथित अदेशभक्त (पारंपरिक इस्लामी धर्मावलम्बी) वर्ग। अदेशभक्त इस संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है कि तथाकथित देशभक्त वर्ग द्वारा वन्दे मातरम कहने को देशभक्ति का पैमाना बताया जा रहा है। गहराई से विचार किया जाए तो इस वन्दे मातरम विमर्श को बढ़ावा देने का उद्देश्य बाहर से दिखाने के कुछ और और अंदर से कुछ और ही प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है कि वर्तमान में इस विवाद/विमर्श के बहाने सरकार इस्लामी समुदाय को देशभक्ति के सर्टिफिकेट देने की आड़ में उनकी कट्टर धार्मिक मान्यताओं की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उन्हें अदेशभक्त घोषित कर केवल हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है।
          इस्लामी धर्मावलम्बियों द्वारा राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम का उच्चारण या गायन नहीं करना वर्तमान में कोई राष्ट्रवाद का नहीं बल्कि धार्मिकता का मामला है। यदि राष्ट्रीयता का मामला होता तो वे राष्ट्रगान जन गण मन गायन से भी परहेज करते। ऐसी स्थिति में बहुदेववाद सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले हिंदू धर्मावलम्बी निःसंकोच वन्दे मातरम बोलकर देशभक्त का तमगा तो पा जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ एकेश्वरवाद में विश्वास करने वाले कट्टर इस्लामिक धर्मावलम्बी इसके उच्चारण को लेकर थोड़े असहज हो जाते हैं, क्योंकि इस्लामी धार्मिक मान्यतानुसार एक इस्लामी धर्मावलम्बी को केवल अल्लाह की इबादत करना ही सुन्नत माना गया है। इनके अतिरिक्त अन्य किसी की इबादत के उद्देश्य से सजदा करने को इस्लामी परंपरा के खिलाफ माना जाता है। ऐसे में वे भारत को ईश्वरीय माता के रूप में मानते हुए उसकी इबादत में वंदना करना इस्लामिक धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ मानते हैं। ऐसी स्थिति में कट्टर इस्लामिक धर्मावलम्बी देशभक्ति के प्रमाणपत्र से वंचित हो जा रहे हैं। भले ही उनके दिल में कितना भी देश के लिए समर्पण की भावना क्यों न हो।
          हालांकि इस्लाम का दूसरा पक्ष सूफिवाद ऐसे सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता है, क्योंकि सूफी परंपरा में पीरी, मुरीदी (गुरु शिष्य) परंपरा में कदमबोशी व सजदा जैसे कर्मकांड अभी भी प्रचलन में हैं। प्रगतिशील सोच के इस्लामी धर्मावलम्बी भी इसके उच्चारण को लेकर असहज नहीं होते हैं। धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठ चुके आज के हजारों मुस्लिम युवा इसे न गाने को एक दक़ियानूसी सोच बताते हैं। जिनका मानना है कि यदि इसके उच्चारण से किसी का धर्म भ्रष्ट होता है तो न्यूज़ चैनलों पर वंदे मातरम विमर्श करने वाले मौलवी-मौलाना तो वाद विवाद में दर्जनों बार इसका उच्चारण करते हैं तो क्या इससे उनका धर्म भ्रष्ट नहीं होता है।
          इस्लामी धर्मावलम्बियों के इस कट्टर धार्मिकता पर उग्र हिन्दुत्व के लोग खुद को प्रगतिशील सोच/विचारधारा युक्त दिखाने के लिए इन पर आक्षेप लगाते देखे जा सकते हैं कि इतना भी धर्मांध होना ठीक नहीं। धर्म, राष्ट्र से सर्वोपरि नहीं होना चाहिए। ऐसे छद्म प्रगतिशील लोगों को यदि कहें कि विविध खान-पान की संस्कृतियों वाले हमारे इस धर्मनिरपेक्ष भारत देश में ईसाई, इस्लामी, हिंदू धर्म के अंतर्गत कुछ अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लोग गौमांस का बहुत ही चाव से सेवन करते हैं, इसलिए गौमांस पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए और हो सके तो आपको भी इसका सेवन करना चाहिए, तो इनकी प्रगतिशील सोच की खाल ओढ़े धार्मिक कट्टरता को बेनकाब होने में जरा भी समय नहीं लगेगा। तुरंत यह गर्जना कानों को छेद देगी कि मैं हिंदू हूँ ... हमारे धर्म मे ...।
          इस संदर्भ में दोनों की धर्मांधता को समझा जा सकता है। जैसे हिंदू धर्मावलम्बी चिकन, बकरे का मांस तो खा सकते हैं लेकिन बीफ नहीं, क्योंकि उनका धर्म गौमांस सेवन की इजाजत नहीं देता। वह काम जैसे आपके धर्म में पाप समझा जाता है उसे आप नहीं कर सकते हैं, वैसे ही कट्टर इस्लामिक लोगों को उनका धर्म अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत/वंदना करना सुन्नत नहीं माना जाता। इसलिए वे धार्मिक प्रतीकों से युक्त इस राष्ट्रगीत (वन्दे मातरम) के गायन से हिचकते हैं। अन्य राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान जन गण मन बोलने/गायन से तो कभी कोई समस्या देखने सुनने को तो नहीं मिलती। अतः उनसे ऐसा जबरन बोलने के लिए मजबूर करना, किसी हिन्दू को जबरन गौ मांस खाने के लिए मजबूर करने जैसा ही है। दोनों धर्मावलंबियों की अपनी अपनी धार्मिक मान्यताएं हैं जिनका हर किसी को सम्मान करना चाहिए। सरकार को भी अपनी अखंडता बनाए रखने के लिए राष्ट्र, राष्ट्रगान व राष्ट्रगीतों को दैवीय रूप प्रदान करने से बचना चाहिए । संभव हो सके तो मुसलमानों के लिए अन्य राष्ट्रगीत गाने की छूट दे, क्योंकि राष्ट्रगीत का गायन ही राष्ट्रभक्ति का पैमाना है तो अनेकों राष्ट्रगीतों में से एक उनके लिए भी हो जिनमें धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग न हो।
          हालांकि मेरे विचार से आज के समय में दोनों ही विचार प्रासंगिक नहीं हैं। दोनों धर्मावलंबियों को इन पारंपरिक मान्यताओं को छोड़कर वर्तमान में समय की मांग के अनुसार आचरण करना चाहिए। ये विचार राजतंत्रीय शासन प्रणाली में एक पुरातन समय में प्रासंगिक होंगे जब राजा का धर्म ही प्रजा के लिए मान्य होता था। आज गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में हमें अपने विचार परिवर्तन करते हुए भारतीय संविधान के अनुसार आचरण करने की आवश्यकता है ।
                                                साकेत बिहारी
शोधार्थी – पीएचडी

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
(मूल रूप से HASTKSHEP.COM Online Portal पर प्रकाशित 
http://www.hastakshep.com/hindiopinion/vandematram-16327) 

Tuesday, 23 May 2017

देश की एकता के लिए खतरा है धर्म-जाति के नाम पर सेना का गठन

राजतंत्र से लेकर लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में राज्य की सर्वप्रमुख ज़िम्मेदारी होती है अपने नागरिकों की सुरक्षा करना । काबिलाई शासन व्यवस्था से लेकर राजतंत्रात्मक व्यवस्था में जनपद या राज्य द्वारा कुछ मामूली कर के बदले अपने नागरिकों को सुरक्षा देने की शुरुआत हुई । आज गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में भी सुरक्षा के नाम पर हर वर्ष हम सरकार को कर या टैक्स देते हैं जिससे सरकार हमारे लिए शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था देने के साथ-साथ, पुलिस तथा सेना गठित कर हमें सुरक्षा प्रदान करती है । बावजूद इसके धर्म, जाति, समुदाय रक्षा के नाम पर पिछले 70 वर्षों से अलग-अलग सेना, दल का निर्माण लगातार होता रहा है । इन सेनाओं, दलों के अपने अलग-अलग स्वार्थ होते है । हैरत की बात तो यह है कि छोटे-छोटे बच्चों, किशोर-किशोरियों को टारगेट कर उन्हें इस सेना में शामिल किया जाता है । तत्पश्चात अपनी सभ्यता-संस्कृति की जानकारी देने से अधिक दूसरे धर्मों, दूसरे जातियों पर कीचड़ उछालने, उनकी बुराई करने, उनसे नफरत करने की सीख देने के साथ-साथ उनसे लड़ने के लिए अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है । जिस स्त्री को वे शिक्षा के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र चलाने की विधा सीखने से हजारों वर्षों तक दूर रखे थे, आजकल उन्हें सबसे सॉफ्ट टारगेट माना जाता है । इन किशोर-किशोरियों का ऐसा ब्रेनवॉश किया जाता है कि इनकी कोई स्वतंत्र सोच नहीं रह जाती । जो इन्हें बताया जाता है उससे इतर वे सोच नहीं पाते हैं । स्वार्थ के आगे मानवता भी इन्हें बौनी लगती है । जिस की पूर्ति हेतु ये इतने कट्टर हो जाते हैं कि पुलिस तंत्र भी इनके तांडव के सामने बेबस नज़र आती है । ऐसे में लोकतंत्र को बचाने हेतु सरकार का ये कर्तव्य होना चाहिए कि धर्म जाति के नाम पर उग आए समस्त अवांछित निजी सेनाओं, दलों को गैर कानूनी घोषित कर उनपर प्रतिबंध लगाकर नागरिक पुलिस को सुदृढ़, सुव्यवस्थित करे । सरकार द्वारा यदि इनके महत्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण करने हेतु कारगर कदम उठाया नहीं किया गया तो देश में गृहयुद्ध तो तय है ही । बल्कि इसका फायदा उन पड़ोसी मुल्कों को हो सकता है जो लगातार हमपर गिद्ध नज़र गड़ाए रहते हैं । इतिहास गवाह है गृहयुद्ध या अंतर्देशीय युद्ध के घातक परिणामों का । इसलिए ऐसे युद्धानुकूल परिस्थितियों को दूर करने में ही बुद्धिमानी होगी । अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पूरा देश गृह युद्ध की आग में झुलशता नज़र आएगा । 

(वुमेन एक्सप्रेस संपादकीय 25 मई 2017 में प्रकाशित) 




Saturday, 22 April 2017

लोकतंत्र की विफलता के लिए जिम्मेदार सरकार

एक अशिक्षित व्यक्ति अपनी ज़िंदगी में उलझकर संविधान प्रदत्त अपने अधिकारों-कर्तव्यों को कभी भी गहराई से जान नहीं पता है । सरकार (केंद्र व राज्य) भी इसे अपने नागरिकों को बताने में कोई खास दिलचस्पी नहीं लेती है, केवल 5वीं-10वीं कक्षा के दौरान नागरिक शास्त्र विषय के अंतर्गत नाममात्र के लिए यह हमें तब बताया जाता है जब हम Mature भी नहीं होते हैं । वयस्क होने पर जब हमें इन अधिकारों-कर्तव्यों के जानकारी की अत्यधिक आवश्यकता होती है तब भी सरकार की तरफ से कोई कार्यक्रम या कार्यशाला आयोजित नहीं किया जाता है । कार्यशाला के स्थान पर नागरिकों को धार्मिक व जातिगत विमर्श में जबरन धकेल दिया जाता है ताकि इसी में उलझ कर वे अपनी ज़िंदगी काटती रहें और सरकार हमें धोखे में रखकर अपनी मनमानी करती रहे । 
यही कारण है कि सरकार को Social Science & Humanities संबंधित विषयों से उच्च शिक्षा (M.Phil/Ph.D) प्राप्त कर रहे शोधार्थियों से इन्हें समस्या होती है । समस्या से निपटने के लिए कभी इनकी fellowship तो कभी सीटें खत्म/कम कर दी जाती है कभी फीस वृद्धि भी हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जाता है । बाकी Engineering/Medical शोधार्थियों से इन्हें कोई समस्या नहीं क्योंकि ये जानते हैं कि इन्हें Lab से फुर्सत ही नहीं तो समाज या अपने अधिकारों के बारे में क्या सोचेंगे । अपने निर्णय मनवाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सभी हथियार प्रयुक्त कर दिये जाते हैं । मान लिए तो ठीक नहीं तो लाठी और राजद्रोह कानून आपके लिए ही बनाए गए हैं । 

Monday, 20 February 2017

धर्मनिरपेक्ष राज्य में प्रधानमंत्री द्वारा सांप्रदायिक द्वेष फैलाने की कोशिश निंदनीय

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रगति पर है । सभी पार्टियां अपनी अपनी ज़ोर आजमाइश में लगी है । वर्तमान सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी व काँग्रेस गटबंधन अखिलेश सरकार के 5 साल की उपलब्धियां गिनाकर, बहुजन समाज पार्टी अपने 5 वर्ष पूर्व कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाने के साथ-साथ सपा राज में गुंडों के बढ़ते वर्चस्व, कानून व्यवस्था की पोल खोलकरजनता का रुख अपने अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश में लगे हैं । सभी को जनमत अपने अपने पाले में दिख रहा है । विभिन्न पार्टियों द्वारा समर्थित न्यूज़ चैनल, समाचार पत्र exit pole द्वारा अपने अपने समर्थित पार्टियों के पक्ष में real या fake माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है । चुनाव आयोग द्वारा धर्म के नाम पर वोट मांगने संबंधी प्रतिबंध लगाने के बाद राम मंदिर निर्माण मुद्दा, हिंदू मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि मुद्दे, तीन तलाक मुद्दे पर राजनीति की नहीं जा सकती । ऐसे में धार्मिक/जातिगत उन्माद फैलाने में माहिर नेता/नेत्री के मुख पर ताले पड़ गए हैं । हालांकि सोसल मीडिया के माध्यम से दबे पाँव ऐसी हरकतें लगातार चल रही है । 
हैरत की बात ये है कि केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के पास सत्तारूढ़ पार्टी को घेरने का कोई मुकम्मल कारण ढूंढ नहीं पा रही है । नोटबंदी इनके लिए जबर्दस्त मुद्दा हो सकता था लेकिन इस असफल नीति के कारण उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश की जनता को जो फजीहत हुई, इसके कारण कोई इस मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं है । पूरे ढाई वर्ष में ऐसी कोई उपलब्धि भी नहीं है जिसके आधार पर वोट की अपील की जा सके । बीजेपी को इस बात का एहसास पहले से है कि सपा और काँग्रेस को देश/उत्तर प्रदेश के मुसलमान के साथ साथ हिंदू जनता भी सपोर्ट करते हैं । यही कारण है कि 73 लोक सभा सीट होने के बावजूद बीजेपी हताश दिख रही है । ऐसे हताशा भरे समय में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उनके पास communal statement से बढ़िया हथियार कोई हो ही नहीं सकता । अंततः इसका दुरुपयोग 20 फरवरी 2017 को उत्तर प्रदेश की फ़तेहपुर में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कर ही दिया । एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में ऐसे गरिमामयी पद से इसका दुरुपयोग काफी निंदनीय है । श्रीमान जी कम से कम पद की गरिमा का तो ख्याल रखिए । एक तरफ आप खुद धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होने की वकालत करते हैं दूसरी तरफ आपके मंत्री संतरी खुद धर्म और जाति के नाम पर ऐसा करते हैं । तब आपके मुख से एक आवाज़ नहीं निकलती । 
कुछ भी अनर्गल statement देने से पहले बीजेपी को पूर्व वर्षों के दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, केरल विधानसभा चुनाव परिणाम को भी याद रखने की जरूरत है ।  

Saturday, 7 January 2017

खतरे में प्रजातंत्र

ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाए रखने के लिए मनुस्मृति व अन्य धर्मशास्त्रों की रचना उत्तर भारतीय किसी एक ब्राह्मण या इनके एक समूह द्वारा की गई ज़िसमें शुद्रों तथा मलेच्छों को वर्चस्व के लिये खतरा मानते हुए, उनका मनोबल तोड़ने के लिये उनके साथ भेद भाव के प्रावधान को धर्माशास्त्रों के साथ जोडकर वैध कर लिया । हालांकि तीसरी सदी ई. के दौरान सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन के फलस्वरूप व्यवसायों में आये परिवर्तन ने शूद्रों व स्त्रियों को एक उम्मीद दिखाई, वेदों के अध्ययन से महरूम दलित व स्त्री वर्ग को बौद्ध व अन्य सम्प्रदायों की ओर पलायन से रोकने के लिए वैदिक साहित्य के स्थान पर पौराणिक साहित्य का अध्ययन करने, इनमें लिखित रीति रिवाजों को अपनाने की छूट तो मिली लेकिन आज पुनः समाज को घोर जातिवादी व्यवस्था की ओर ले जाने के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है । पहले तो केवल अस्पृश्य ही इनकी वर्चस्व के लिए खतरा थे लेकिन आज 2000 वर्ष बाद इनके 3 और दुश्मन बढ़ गए । इसाई, मुसलमान व हिंदू धर्म के ही वामपंथी । इन सभी की एकजुटता देखकर मनुवादी व्यवस्था के अनुयाइयों की छटपटाहट को समझा जा सकता है क्योंकि प्रजातंत्र में ये राजतंत्र वाली धर्मसूत्र जैसे सहित्य लिखकर अपनी सत्ता को बचा नहीं सकते ।

ऐसे में स्वभाविक है अब अपनी सभ्यता/संस्कृति पर इतराने वाले नीचे गिरने की सीमा को पार करते हुए गुंडे मवाली का वेश धरकर धमकाते फिरेंगे कभी धार्मांतरण के नाम पर कभी गाय के नाम पर ।  कभी देशभक्ति के नामपर तो कभी आरक्षण के नाम पर । यदि इनकी सत्ता कमजोर नहीं हुई कोई मजबूत विपक्ष नहीं मिला तो वो दिन दूर नहीं जब मनुवादी व्यवस्था सारी न्यायिक प्रणालियों को ध्वस्त कर प्रजातंत्र के स्थान पर राजतंत्रात्मक, कट्टर जातिवादी समाज के रूप में पुनर्जन्म होगा ।