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Saturday, 17 January 2026

मूर्तियों के चक्कर लगाता कुत्ता : भक्ति या भीतर की बेचैनी?

राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 हमें अपने आने वाली पीढ़ी में 21 वीं सदी के कौशल विकसित कर देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने की बात करती है। उनमें आलोचनात्मक चिंतन करने के कौशल विकसित करने को प्रयासरत हैं। यहाँ आलोचनात्मक चिंतन से तात्पर्य है - भावनाओं में बहकर प्रभावित हुए बिना किसी भी विचार, घटना को तर्क, प्रमाण और विवेक के आधार पर गहराई से सोच समझकर परखना फिर उसे स्वीकार करना। सरल शब्दों में यदि इसे समझा जाए तो आलोचनात्मक चिंतन सोचने की वह कला है जिसमे हम हर बात को तर्क और प्रमाण के आधार पर परखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाहता है कि हमारे देश के नागरिको में आलोचनात्मक चिंतन का कौशल नगण्य/नहीं के बराबर है। इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं

बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव नंदपुर स्थित मंदिर में एक कुत्ता वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करने लगता है। कई मीडिया रिपोर्टस स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर बताते हैं कि यह कुत्ता 12 जनवरी को मंदिर में आया था और लगातार 36 घंटे तक बिना कुछ खाये पिए हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करता रहा। इसके बाद कुछ देर के लिए यह कुत्ता बाहर चला गया। फिर वापस 14 जनवरी को यह मंदिर में आता है और माँ दुर्गा की परिक्रमा करने लगता है। इसके बाद वह कुत्ता एक स्थान पर स्थिर बैठा हुआ है। लोग उस कुत्ते को हनुमान जी के एक बहुत बड़े भक्त मानकर उसके ऊपर फूल मालाएं चढ़ाकर उनकी पूजा करना शुरू कर दिए हैं।   

किसी भी व्यक्ति/जीव की पूजा करना, उस पर फूल, माला चढ़ाना गलत नहीं है। अक्सर किसी के सामान्य से हटकर किये गए कार्य को सम्मान देने के लिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह सम्मान भी तभी जायज है जब उस सामान्य से हटकर किये गए कार्य को करने के लिए किसी ने लंबे समय तक अथक मेहनत कर कोई मिसाल कायम किया हो तो। यहाँ बात जीस कुत्ते की हो रही है, जिसे लोग हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त समझकर फूल माला चढ़ाकर पूजा करने लग जा रहे हैं, इससे पूर्व इसके द्वारा कभी भी हनुमान जी की परिक्रमा करने का दावा नहीं किया गया। क्योंकि कुत्ता भी जो कुछ भी कर रहा है उसके पीछे भक्ति नहीं एक मानसिक विकृति है। पशु चिकित्सक इस मानसिक विकृति को अच्छी तरह समझते हैं।  

आलोचनात्मक चिंतन कौशल का उपयोग करते हुए मैंने जानवरों के ऐसे व्यवहार का थोड़ा अध्ययन किया तो पाया कि जैसे उम्र बढ़ने के साथ इंसान के दिमाग में कई प्रकार की विकृतियाँ जैसे अल्जाइमर आने लगती है। जिसके कारण इंसान का व्यवहार बदल जाता है। इसी प्रकार जानवरों में भी इस प्रकार की विकृति उम्र के साथ आती है। कुत्तों में भी उम्र बढ़ने के साथ एक बिमारी देखने को मिलती है। जिसे Dog Dementia के नाम से जाना जाता है। वैसे कुत्तों की औसत आयु 10 से 12 वर्ष होती है ऐसे में 8-10 वर्ष की अवस्था के दौरान उनमें यह बिमारी देखने को मिल सकती है। इस बिमारी के कारण वे अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। जैसे -

·       उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है, परिचित लोगों को भी नहीं पहचान पाते हैं।

·       बिना वजह रात को लगातार भौंकते हैं।

·       उदासी, चिड़चिड़ापन से ग्रसित हो जाते हैं।

पहले हनुमान जी, फिर दुर्गा जी की परिक्रमा कर उदासी की अवस्था में बैठे इस कुत्ते के साथ भी संभवतः यही समस्या हो सकती है। पशु चिकित्सक इसकी बेहतर जांच कर कुत्ते को सुकून भरा जीवन दे सकते हैं। इस अंधविश्वास में जीते हुए कि यह कुत्ता भगवान का भक्त है, हम उसकी पूजा अर्चना कर उसके साथ ज्यादती करें, इससे अच्छा उसे पशु चिकित्सक को दिखाना ज्यादा आवश्यक लगना चाहिए।

इस घटना से मेरी एक और भ्रांति भी दूर हुई। रात को कई बार बेवजह कुत्तों को भौंकते हुए देखा सुना है। अन्य लोगों के साथ-साथ मुझे भी लगता था कि कुत्तों को आत्माएं दिखती है इस कारण से वे उस दिशा में मुंहकर भौंकते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि ‘यहाँ कोई है’। आप समझ आया कि कोई कुत्ता यदि रात को बेवजह भौंक रहा है तो इसका अर्थ है – वह कुत्ता Dog Dementia बिमारी की चपेट में है न कि उसे कोई आत्मा दिख रही है।

याद रखें आलोचनात्मक चिंतन ही वह कौशल है जो हमें अंधविश्वास से मुक्त कर सकती है।

Sunday, 5 January 2025

चन्द्रमा (Moon) क्यों चमकता है?

रात के अंधेरे में अलग अलग नामों वाले आकाशीय पिंड जैसे ग्रह, उपग्रह, तारे आदि अक्सर चमकते नजर आते हैं। किसी अन्य ग्रह से यदि हमारी पृथ्वी को भी देखा जाए तो यह भी चमकती नज़र आएगी। आखिर इनके चमकने का कारण क्या है? उत्तर है ये सभी आकाशीय पिंड दो कारणों से चमकते हैं-

1.     उन आकाशीय पिंडों का हाइड्रोजन-हीलियम जैसे गैसों से निर्मित होना।

2.     किसी तारे से आ रही प्रकाश का परावर्तन।

    पहले कारण को हम सूर्य का उदाहरण लेते हुए समझ सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सूर्य 70% हाइड्रोजन 28% हीलियम और 2% अन्य गैसों से बना हुआ है। सूर्य की सतह पर मौजूद हाइड्रोजन गैस नाभिकीय संलयन (Nuclear fusion – किसी भी तत्व के दो ऐटम का आपस में जुड़ जाना) प्रक्रिया से हीलियम गैस बनाती है। इस अभिक्रिया के दौरान आउटकम के रूप में काफी विशाल मात्रा में उर्जा, प्रकाश निकलता है। इस कारण सूर्य चमकता है, और हम कह पाते हैं कि सूर्य का अपना प्रकाश स्रोत है।

    दूसरे कारण को हम चंद्रमा का ही उदाहरण लेते हुए समझते हैं। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। इसे उपग्रह के नाम से इसलिए संबोधित किया जाता है कि यह सूर्य की परिक्रमा न कर, पृथ्वी की परिक्रमा करती है। चन्द्रमा 4000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से 27.3 दिनों में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूर्ण करता है। पृथ्वी की तरह ही यह ठोस चट्टानों से निर्मित आकाशीय पिंड है। पृथ्वी की तरह ही यह हाइड्रोजन हिलियम आदि गैसों से निर्मित नहीं है। सूर्य से निकलने वाले प्रकाश इसकी सतह पर पड़कर पृथ्वी पर प्रतिबिंबित होते हैं, इस कारण यह हमें चमकता हुआ दिखाई पड़ता है। इसका आधा हिस्सा जब सूर्य के सामने रहता है, तो सूर्य का प्रकाश इस से परावर्तित होकर हमारे पृथ्वी पर पड़ता है, हमारे आँखों की रेटिना से टकराता है। इससे यह आकाशीय पिंड चमकता हुआ दिखाई पड़ता है।

अध्ययन हेतु प्रयुक्त सामग्री 

1.     https://www.youtube.com/watch?app=desktop&v=IP7ahJsKGA4&t=283s

2. https://navbharattimes.indiatimes.com/world/science-news/what-is-the-sun-made-of-elements-of-sun-how-sun-is-formed-and-produce-energy-hindi/articleshow/91830430.cms




Monday, 30 December 2024

इतिहासकार जीवाश्म की सहायता से पृथ्वी पर किसी के जीवन का इतिहास का पता कैसे लगाते हैं?

जीवाश्म से तात्पर्य है इतिहास के किसी काल खंड में मौजूद रहे किसी भी जीव जंतु के अवशेष। यह अवशेष उनकी हड्डी, अंडे से लेकर उनके मल तक हो सकते हैं। इसका अध्ययन ‘पैलियॉनटोलॉजी’ कहलाता है।

जीवाश्म विज्ञानी इन जीवाश्मों का अवलोकन, अध्ययन कर उनसे संबंधित विभिन्न प्रकार के जानकारियों जैसे उनके शारीरिक संरचना, खाने (शाकाहारी या मांसाहारी), उम्र, वजन, उनके व्यवहार, को संकलित करते हैं। इतिहासकार कई जीवाश्मों के अध्ययन से प्राप्त इन तथ्यों का उपयोग कर, उसकी व्याख्या कर उस करोड़ों साल पूर्व विलुप्त हो चुके जीव-जंतु के इतिहास का पता लगाते हैं। जीवाश्म विज्ञानी वर्तमान में बैक्टीरिया से लेकर डायनासोर जैसे विशाल जीव जंतुओं के जीवाश्मों का पता लगा चुके हैं। इन जीवाश्मों का यदि हम गहराई से अवलोकन करें तो हम पाते हैं कि केवल उन्हीं जीव जंतुओं के जीवाश्म मिलते हैं जिनकी हड्डियाँ या अन्य शारीरिक अंग जैसे खोपड़ी मजबूत थी। 

Saturday, 28 December 2024

भारतीय रेल में Bio-Toilet व्यवस्था कब लागू हुई?

 Facebook पर एक पार्टी क समर्थक के किए post पढ़ रहा था। जिसमें वे कह रहे थे कि '70 साल तक भारतीय रेल की पटरी पर टट्टी बहती रहती थी, *** सरकार ने इससे निजात दिलाया है'। थोड़ी देर के लिए मुझे ये सही लगी और अच्छी भी लगी। फिर थोड़ा doubt हुआ। google पर registered अलग-अलग websites से मदद लिया तो पता चला कि जिस bio - toilet के कारण भारतीय रेल की पटरी लगभग टट्टी मुक्त हुई है उसका सबसे पहला use ग्वालियर-वाराणसी बुंदेलखंड एक्सप्रेस में जनवरी 2011 में किया गया था। इस project की शुरुआत भारतीय रेल द्वारा 2009 में किया गया और 2011 में इसे क्रियान्वित कर लिया गया। दोनों ही कार्य यू पी ए (कॉंग्रेस पार्टी की बहुलता वाले) के कार्यकाल में सम्पन्न हुए।

CAG की report में भी इसे पढ़ा जा सकता है।



Tuesday, 21 March 2023

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया? उसी दिन या इस दो महीने के बीच की किसी अन्य तिथि क्यों नहीं?

शालायी बच्चों को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से परिचय कराने, उन मूल्यों के साथ जीने के कौशल विकसित करने के क्रम में बेमेतरा जिले के एक शासकीय उच्च प्राथमिक शाला जाना हुआ। कक्षा छठवीं-आठवीं के बच्चों के साथ होने वाली इस बातचीत के दो चरण थे। पहले चरण में बच्चों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना एवं उनमें उल्लेखित संवैधानिक अवधारणाओं एवं मूल्यों से संबंधित प्रदर्शित कैलेंडर का अवलोकन, अध्ययन करना था, तत्पश्चात मन में उपजे सवालों को एक कागज में लिखना भी था, ताकि दूसरे चरण में कक्षा में बैठकर उनपर बातचीत किया जा सके। बच्चों की ओर से कई प्रकार के सवाल आए। इसी क्रम में एक ऐसा भी सवाल आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सवाल था – हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया”? उस पर्ची पर सवाल पूछने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था, बाद में बच्चों से पूछा भी कि यह सवाल किसकी जिज्ञासा है? लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सवाल की प्रकृति को देखकर ऐसा लगा कि शायद उसी शाला के किसी शिक्षक की ओर से ये सवाल आया हो? यह सोचकर कि इस विषय पर मेरी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, मैंने उस सवाल पर फिर कभी किसी दिन बातचीत करने की बच्चों और शाला के शिक्षकों से सहमति ली। कई प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि नवनिर्मित भारतीय संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक विशिष्ट बात छिपी थी।

          आजाद हिंदुस्तान (भारत) के संचालन हेतु संविधान निर्माण के लिए 9 दिसंबर 1946 ई. में ही भारतीय प्रतिनिधियों से निर्मित कमेटी गठित कर ली गई थी। इस कमेटी ने 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन तक 114 बैठकों में लगातार चर्चा, विमर्श करने के पश्चात इस नवनिर्मित विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंतिम रूप 26 नवंबर 1949 को दिया था। लेकिन कमेटी ने इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि निर्धारित की। इसके पीछे कारण था इस तिथि (26 जनवरी) की विशिष्टता। इस विशिष्टता को समझने के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष पूर्व अर्थात 1929-30 ई. के कुछ घटनाक्रम को समझना पड़ेगा। दिसंबर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन रावी नदी के किनारे लाहौर में हुआ, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। हालांकि प्रारंभ में गांधीजी को इस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया।[i] 1908 ई. से लेकर इस अधिवेशन तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग कर रही थी। इस अधिवेशन के दौरान ही जनवरी 1930 ई. के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि इसी महीने के आखिरी रविवार (26 जनवरी की तिथि) तक ब्रिटिश सरकार यदि भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती है तो भारत खुद को पूरी तरह स्वतंत्र (पूर्ण स्वराज) घोषित कर देगा। अर्थात इस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ने अपना लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज से पूर्ण स्वराज घोषित किया। ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि तक जब इस मांग को नहीं माना तो भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी। इस तिथि को पहली बार देश के अनेक भागों में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।[ii] साथ ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हिंदुस्तान के अलग-अलग भागों के नागरिकों ने शांतिपूर्वक तथा पूर्णनिष्ठा के साथ गांधीजी द्वारा तैयार किए गए पूर्ण स्वराज के शपथ को दुहराते हुए आजादी हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया। 1930 ई. के पश्चात 1947 ई. तक सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन निर्धारित किया। हालांकि उनके द्वारा भी इस कार्य के लिए 15 अगस्त की तिथि चुने जाने के पीछे एक रोचक कारण था। दरअसल 15 अगस्त अंग्रेजों के लिए एक यादगार दिन था। 2 वर्ष पूर्व अर्थात 1945 ई. में 15 अगस्त की तिथि को ही द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के गुट, जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था, के समक्ष जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह एक विशिष्ट दिन था। चूंकि मामला देश की आजादी का था इसलिए भारतीय राजनेताओं को 15 अगस्त 1947 की प्रस्तावित तिथि को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी की तिथि थोड़ी धूमिल पड़ती जा रही थी, क्योंकि इसका स्थान 15 अगस्त की तिथि ने ले लिया था। इस तिथि की महत्ता बरकरार रहे यह सोचकर संविधान निर्माण समिति द्वारा 26 जनवरी 1950 ई. की तिथि को भारतीय संविधान लागू करने की तिथि घोषित की गई।

          यहाँ एक रोचक बात और यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से 1908 ई. से ही जिस डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशिक साम्राज्य) की मांग की थी एवं 1929-30 ई. में जिस पूर्ण स्वराज की बात की थी, दोनों एक साथ पूरी हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि 15 अगस्त 1947 ई. की तिथि को भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से स्वतंत्रता मिली। सर्वोच्च पद वायसराय खत्म हुआ लेकिन एक नए पद गवर्नर जनरल का सृजन हुआ। यह पद ब्रिटिश क्राउन के अधीन होता था। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। वे 1947-48 ई. तक इस पद पर बने रहे। तत्पश्चात चक्रवर्ती राज गोपालाचारी पहले एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। ऐसा इसलिए हुआ कि स्वतंत्रता के समय भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। इसलिए इसके लागू होने के पूर्व अर्थात 25 जनवरी 1950 ई. तक गवर्नर जनरल का पद ही सर्वोच्च पद बना रहा। 26 जनवरी 1950 से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ ही डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ। डोमिनियन स्टेटस से तात्पर्य था - आंतरिक प्रशासन जैसे विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, सैनिक, विदेशी मामले भारतीयों के द्वारा संचालित किए जाएंगे, लेकिन राजा ब्रिटिश साम्राज्य का होगा। इस तरह 26 जनवरी 1950 ई. से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चूंकि इससे पूर्व हमारे देश में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी जिसमें राजा का पद वंशानुगत होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि यही व्यवस्था रहती तो विविध जाति, धर्म, संप्रदाय के मेल से निर्मित नवीन भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं होता। अतः इस व्यवस्था के स्थान पर प्राचीन भारत की ही एक अन्य व्यवस्था गणतन्त्र को चुना गया। राजतंत्र के विपरीत इस व्यवस्था में राजा का पद वंशानुगत न होकर जनता के बीच से चुने जाते थे। इस व्यवस्था में राजा के पद को राष्ट्रपति के नाम से संबोधित किया गया। यही कारण है कि इस तिथि को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को चुना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च संवैधानिक पद था। इससे पूर्व डोमिनियन स्टेटस में गवर्नर जनरल का पद सर्वोच्च होता था।

          26 जनवरी 1950 से इस पद के अस्तित्व में आते ही हमारे देश में गणतंत्रात्मक व्यवस्था लागू हुआ, ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ।



[ii] https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/our-constitution-implemented-on-26-january-know-everything-pcup/834996

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त अन्य स्त्रोत

गुहा रामचंद्र (2012) भारत गांधी के बाद: दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का इतिहासपेंग्विन बुक्स, गुरूग्राम

 


Sunday, 19 December 2021

गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में कब से माना जाने लगा?

 छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य से गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था। यही कारण है कि इस दौर या इसके बाद में लिखे गए पौराणिक ग्रंथों या अन्य ग्रंथ (11वीं शताब्दी में क्षेमेन्द्र द्वारा लिखित दशावतारचरित एवं 12 वीं शताब्दी में जयदेव द्वारा लिखित गीत गोविंद) या अभिलेखों में ही केवल इन बातों का वर्णन मिलता है। इन्हीं ग्रंथों के आधार पर 11वीं शताब्दी में हिंदुस्तान आए अलबेरूनी भी गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतार मानते हैं।[1] रोचक बात यह है कि इससे पूर्व के brahmanical texts में बुद्ध को नास्तिक या चोर बताया गया है। अश्वमेध यज्ञ कराने के लिए इतिहास में जाना जाने वाला ऐतिहासिक चरित्र पुष्यमित्र शुंग ने तो इनके अनुयायियों को मारकर लाने के एवज में पुरस्कार देने की घोषणा कर दी थी।



[1] D N Jha, ‘Brahmanical intolerance in Early India’ Social scientist, May-June 2016, Page No. 4

 

 

Friday, 22 October 2021

गणित में table के सही उच्चारण

 बचपन में दूसरी कक्षा तक हिंदी माध्यम वाले सरकारी स्कूल में पढ़ा। इस दौरान घर तथा सरकारी स्कूल में घरवाले या शिक्षक जी द्वारा 2 के पहाड़े कुछ इस तरह पढ़ाए जाते थे -

दू एकम दू

दू दुनी चार

दू तिया छे ...


दूसरी कक्षा के बाद parents ने जब दाखिला एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में करा दिया तो अंग्रेजी में मेरे level को देखते हुए स्कूल के principle जी ने मुझे UKG (Upper Kinder Garden) में डाल दिया।

स्कूल और माध्यम बदलते ही 'पहाड़े' टेबल (table) बन गए।

इस दौरान 2 के टेबल कुछ इस तरह टीचर जी द्वारा पढ़ाए जाते थे - 

टू वनजा टू

टू टूजा फोर

टू थ्रीजा सिक्स ...


उस दौरान बिना कुछ सोचे समझे बस रट्टा मार कर याद कर लिए।

आज दो दशक बाद अचानक से इसका अर्थ समझने का ख्याल आया विशेष रूप से यह विचार करने के बाद कि english में वनजा, टूजा, थ्रीजा जैसे कोई शब्द कहीं देखने को आजतक नहीं मिले। Analysis करने के बाद 2 का table कुछ इस तरह सामने आया -

two ones are two 

two twos are four

two threes are six ...

आज ऐसा लग रहा है जैसे महावीर की तरह मुझे भी केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई है। 

Sunday, 30 May 2021

किसी भी क्षेत्र की ऊंचाई मापने के लिए मानक के रूप में समुद्र तल का उपयोग क्यों किया जाता है?

पृथ्वी पर कोई क्षेत्र कितनी ऊंचाई पर स्थित है इसे जानने के लिए समुद्र तल को मानक के रूप में प्रयोग किया जाता है। समुद्र तल को मानक माने जाने के पीछे प्रमुख कारण यह है कि समुद्र तल की ऊंचाई हमेशा एक समान रहती है। विपरीत परिस्थितियों में थोड़ा बहुत ही ऊपर नीचे हो सकता है, लेकिन धरती तल की ऊंचाई हर जगह एक समान नहीं है। कहीं पर्वत है, कहीं पठार है, तो कहीं मैदानी भाग है। अर्थात पृथ्वी तल कहीं ऊंचा है तो कहीं नीचे भी है। इसलिए किसी भी स्थान की ऊंचाई का पता लगाने के लिए समुद्र तल को ही मानक के रूप में भूगोलविदों द्वारा प्रयोग किया जाता है। विशेष रुप से रेल विभाग द्वारा। रेल विभाग द्वारा प्रत्येक स्टेशन पर इसे अंकित करवाया जाता है ताकि अगले स्टेशन के ऊंचाई का पता हो तो लोको पायलट उस अनुरूप ट्रेन के इंजन को खींचने के लिए पावर को मैनेज कर सकें।