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Saturday, 17 January 2026

मूर्तियों के चक्कर लगाता कुत्ता : भक्ति या भीतर की बेचैनी?

राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 हमें अपने आने वाली पीढ़ी में 21 वीं सदी के कौशल विकसित कर देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने की बात करती है। उनमें आलोचनात्मक चिंतन करने के कौशल विकसित करने को प्रयासरत हैं। यहाँ आलोचनात्मक चिंतन से तात्पर्य है - भावनाओं में बहकर प्रभावित हुए बिना किसी भी विचार, घटना को तर्क, प्रमाण और विवेक के आधार पर गहराई से सोच समझकर परखना फिर उसे स्वीकार करना। सरल शब्दों में यदि इसे समझा जाए तो आलोचनात्मक चिंतन सोचने की वह कला है जिसमे हम हर बात को तर्क और प्रमाण के आधार पर परखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाहता है कि हमारे देश के नागरिको में आलोचनात्मक चिंतन का कौशल नगण्य/नहीं के बराबर है। इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं

बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव नंदपुर स्थित मंदिर में एक कुत्ता वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करने लगता है। कई मीडिया रिपोर्टस स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर बताते हैं कि यह कुत्ता 12 जनवरी को मंदिर में आया था और लगातार 36 घंटे तक बिना कुछ खाये पिए हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करता रहा। इसके बाद कुछ देर के लिए यह कुत्ता बाहर चला गया। फिर वापस 14 जनवरी को यह मंदिर में आता है और माँ दुर्गा की परिक्रमा करने लगता है। इसके बाद वह कुत्ता एक स्थान पर स्थिर बैठा हुआ है। लोग उस कुत्ते को हनुमान जी के एक बहुत बड़े भक्त मानकर उसके ऊपर फूल मालाएं चढ़ाकर उनकी पूजा करना शुरू कर दिए हैं।   

किसी भी व्यक्ति/जीव की पूजा करना, उस पर फूल, माला चढ़ाना गलत नहीं है। अक्सर किसी के सामान्य से हटकर किये गए कार्य को सम्मान देने के लिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह सम्मान भी तभी जायज है जब उस सामान्य से हटकर किये गए कार्य को करने के लिए किसी ने लंबे समय तक अथक मेहनत कर कोई मिसाल कायम किया हो तो। यहाँ बात जीस कुत्ते की हो रही है, जिसे लोग हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त समझकर फूल माला चढ़ाकर पूजा करने लग जा रहे हैं, इससे पूर्व इसके द्वारा कभी भी हनुमान जी की परिक्रमा करने का दावा नहीं किया गया। क्योंकि कुत्ता भी जो कुछ भी कर रहा है उसके पीछे भक्ति नहीं एक मानसिक विकृति है। पशु चिकित्सक इस मानसिक विकृति को अच्छी तरह समझते हैं।  

आलोचनात्मक चिंतन कौशल का उपयोग करते हुए मैंने जानवरों के ऐसे व्यवहार का थोड़ा अध्ययन किया तो पाया कि जैसे उम्र बढ़ने के साथ इंसान के दिमाग में कई प्रकार की विकृतियाँ जैसे अल्जाइमर आने लगती है। जिसके कारण इंसान का व्यवहार बदल जाता है। इसी प्रकार जानवरों में भी इस प्रकार की विकृति उम्र के साथ आती है। कुत्तों में भी उम्र बढ़ने के साथ एक बिमारी देखने को मिलती है। जिसे Dog Dementia के नाम से जाना जाता है। वैसे कुत्तों की औसत आयु 10 से 12 वर्ष होती है ऐसे में 8-10 वर्ष की अवस्था के दौरान उनमें यह बिमारी देखने को मिल सकती है। इस बिमारी के कारण वे अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। जैसे -

·       उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है, परिचित लोगों को भी नहीं पहचान पाते हैं।

·       बिना वजह रात को लगातार भौंकते हैं।

·       उदासी, चिड़चिड़ापन से ग्रसित हो जाते हैं।

पहले हनुमान जी, फिर दुर्गा जी की परिक्रमा कर उदासी की अवस्था में बैठे इस कुत्ते के साथ भी संभवतः यही समस्या हो सकती है। पशु चिकित्सक इसकी बेहतर जांच कर कुत्ते को सुकून भरा जीवन दे सकते हैं। इस अंधविश्वास में जीते हुए कि यह कुत्ता भगवान का भक्त है, हम उसकी पूजा अर्चना कर उसके साथ ज्यादती करें, इससे अच्छा उसे पशु चिकित्सक को दिखाना ज्यादा आवश्यक लगना चाहिए।

इस घटना से मेरी एक और भ्रांति भी दूर हुई। रात को कई बार बेवजह कुत्तों को भौंकते हुए देखा सुना है। अन्य लोगों के साथ-साथ मुझे भी लगता था कि कुत्तों को आत्माएं दिखती है इस कारण से वे उस दिशा में मुंहकर भौंकते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि ‘यहाँ कोई है’। आप समझ आया कि कोई कुत्ता यदि रात को बेवजह भौंक रहा है तो इसका अर्थ है – वह कुत्ता Dog Dementia बिमारी की चपेट में है न कि उसे कोई आत्मा दिख रही है।

याद रखें आलोचनात्मक चिंतन ही वह कौशल है जो हमें अंधविश्वास से मुक्त कर सकती है।

Friday, 12 September 2025

ग्रहण के दुष्प्रभाव संबंधी मिथ्या धारणाओं को तोड़ने की बेला

पिछले दिनों 7 सितंबर 2025 को एक खगोलीय घटना ‘चंद्र ग्रहण’ हुई थी। इसके कुछ दिनों के बाद आने वाले 21 सितंबर 2025 को एक अन्य खगोलीय घटना ‘सूर्य ग्रहण’ देखने को मिलने वाली है। यह इस साल का दूसरा सूर्यग्रहण होगा। इससे पूर्व 29 मार्च को आंशिक सूर्यग्रहण देखने को मिला था। जो भारत में नहीं दिखा था। 21 सितंबर को होने वाला सूर्यग्रहण भी आंशिक सूर्य ग्रहण ही है, साथ ही यह भी भारत में नहीं दिखेगा।  बावजूद इसके हमारे देश के अंधविश्वास फैलाने वाले बहुत से मीडिया संस्थान इससे होने वाले दुष्प्रभाव से बचने के उपाय बताने के कार्य में लग गए हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन से जब यह स्पष्ट है कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण कोई दैविक नहीं बल्कि एक खगोलीय घटना है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालते। इस दौरान किए गए कार्य ना अशुभ होते हैं, न ही इस दौरान कोई अपवित्र होता है। फिर भी यह ज्योतिष विज्ञान के जानकार अंधविश्वास फैलाने का कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हैरत की बात यह है कि जिन क्षेत्रों में सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण दिखाई पड़ता है, वहाँ ग्रहण के तथाकथित दुष्प्रभाव से मुक्त होने के कपोल कल्पित उपाय तो बताते ही हैं, इसके साथ-साथ जिन क्षेत्रों में यह ग्रहण नहीं दिखाई पड़ता है, वहाँ के लोगों को भी इसके दुष्प्रभाव का डर दिखाकर उन्हें कर्मकांड जैसे फर्जी गतिविधियों में भी घसीटने का काम करते हैं। भोले भाले लोग भी उनकी बातों में आकर, दुष्प्रभाव के डर को कम करने के लिए बिल्कुल वैसा ही करने लगते हैं, जैसा यह उन्हें बताते हैं।   

यहाँ सवाल उठता है कि आखिर इस अंधविश्वास को फैलाने के पीछे निहित कारण क्या है? जवाब है कि यह अंधविश्वास इसलिए फैला रहे हैं क्योंकि इससे उनकी कमाई जुड़ी है। इस प्रक्रिया का अवलोकन करेंगे तो पता चलता है कि ज्योतिष का कारोबार करने वाले एक जाति के लोग ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए अलग अलग प्रकार के कर्मकांड कराने का निर्देश देते रहते हैं। इस कर्मकांड को कराने में उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहभागिता रहती है। उस कर्मकांड को कराने के बदले उन्हें दक्षिणा मिलती है। ग्रहण के बाद तथाकथित पवित्र नदियों में स्नान करने का निर्देश उनके द्वारा दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि लोग नदियों में स्नान कर आस पास बने मंदिर में जाकर पूजा करेंगे, वहाँ मंदिरों में दान करेंगे, पुजारियों को दान या दक्षिणा देंगे, जिससे उनकी, उनकी कुटुम्बों की कमाई हो रही होगी।

ये लोग 21 वीं सदी में रहकर पांचवीं सदी में जी रहे हैं। ऐसे जीने से उनकी लोगों को ठगकर आजीविका चलती है, इसलिए वे इस प्रकार की व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहते। क्योंकि इससे उनका हित जुड़ा है। लेकिन बाकी लोग तो फोकट में पैसे बर्बाद कर रहे हैं न उस कर्मकांड के लिए आवश्यक सामग्री को खरीदकर, फर्जी कर्मकांड का मेहनताना देकर। हम तथाकथित पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, वहाँ से जल लेकर नजदीक स्थित देवालयों में जाते हैं, वहाँ उस जल को किसी देवी देवता पर ऐसे चढ़ाने के लिए नहीं नहीं कहा जाता, उस पात्र में थोड़ा सा चंदन लगाकर मौजूद जल को किसी मंत्र को पढ़कर संकल्पित करने का ढोंग किया जाता है। उसके बदले 10 20 की मांग की जाती है। कल्पना कीजिए किसी छोटे से नदी के किनारे स्थित छोटे से मंदिर में यदि 100 लोग ही पूजा करने जाते हैं, बदले में 10 वहाँ के पुजारियों को देते हैं तो बैठे-बैठे पूरे दिन के वे कितना कमा लिए?

मज़े की बात यह है कि इस दुनिया में अरबों लोग ऐसे हैं जो इन कर्मकांडों से दूर होकर बिना इस मोहपाश में फंसे बेहतरीन जीवन जी रहे हैं। कर्मकांड करने वालों की तुलना में कहीं ज्यादा सुखी संपन्न जीवन व्यतीत कर रहे होते है।

अब हमें जरूरत है हमारे समाज में सदियों से प्रचलित मिथ्या धारणाओं की पहचान कर, उससे खुद को अलग करने की। सभी प्रकार के धारणाओं पर, उसकी सत्यता पर, वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता पर विचार करने की।



Saturday, 30 August 2025

अंधविश्वास परोसते सोशल मीडिया पोस्ट

फेसबुक में अपने पोस्ट की visibility और reach को बढ़ाने के लिए लोग अलग अलग तरीके अपना रहे हैं। इसमें कोई बुराइ नहीं है। क्योंकि वर्तमान समय में बहुत से लोगों को इससे रोजगार मिल रहा है, कमाई का अवसर उपलब्ध कराया जा रहा है। लोगों की आमदनी बढ़ रही है। लेकिन बुराई तब है जब आप इसके माध्यम से समाज में अंधविश्वास परोस रहे हों। स्वतंत्रता के पश्चात से ही हमारे शैक्षिक नीतियां इस प्रकार बनाई जा रही है जिससे हममें वैज्ञानिक सोच विकसित हो, लेकिन जब आप अपने प्रोफ़ाइल से अंधविश्वास को परोस रहे होते हैं, तो आप भारत सरकार के इस नेक कार्य में बाधा बन रहे होते हैं।

मामला एक फेसबुक प्रोफाइल (जो कि एक Un-professional News Channel लगा) से संबंधित है। रिपोर्टिंग कर रहा शख्स एक किन्नर से यह कहलवा रहा है कि जो भी इस पोस्ट पर ‘जय श्रीराम’ कमेंट करेगा उसके लिए मैं दुआ करूँगी कि उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। मेरे देखे जाने तक 1500 से ज्यादा कमेंट उस पोस्ट पर ‘जय श्रीराम’ के रूप में ही आ चुके थे।

मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ, इस कारण सरकारी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्र यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया पेज/प्रोफाइल मुझे बहुत पसंद आते हैं। इन न्यू चैनल/प्रोफाइल के माध्यम से मुझे एक से बढ़कर एक खोजी पत्रकारिता करने वाले युवा साथी मिले। उनके वीडियो देखकर मुझे काफी संतुष्टि मिलती है। लेकिन इस वीडियो को देखने के बाद मुझे उतनी ही असंतुष्टि हुई। थोड़ा बहुत गुस्सा भी आया। असंतुष्टि इसलिए कि वह व्यक्ति अंधविश्वास परोस रहा था। इसमें दो प्रकार के अंधविश्वास थे - पहला अंधविश्वास तो यह कि किसी ऐरे-गैरे पोस्ट पर ‘जय श्रीराम’ कमेंट सेक्शन में लिखने से किसी की मनोकामना पूर्ण होगी। दूसरा अंधविश्वास यह कि किसी किन्नर की दुआएं/आशीर्वाद काम करती हैं।

थर्ड जेंडर के रूप में जाने जाने वाले किन्नर समुदाय के प्रति मुझे सहानुभूति है, सड़कों पर, ट्रेन में भिक्षाटन करते, लोगों के झिड़कियाँ, अपशब्द सुनते देख कर मुझे भी उनके लिए बहुत दुख होता है। हमेशा यह सोचता हूँ कि जितनी जल्दी हो सके ये भी समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर स्त्रियों और पुरुषों की तरह हर प्रकार के अधिकार का उपभोग कर सके। हज़ारों वर्षों से करते आ रहे अपने पारम्परिक काम ‘नवजात बच्चों को दुआएं देना’ से मुक्त हों। बच्चों को दुआएं/आशीर्वाद देना एक बेकार का आडंबर है, जो लोगों को अंधविश्वासी बनाते हैं। इनकी दुवाओं/आशीर्वाद में जरा भी असर होता तो सड़क पर भीख मांगकर गुजारा करने की जगह इनकी जिंदगी महलों, आलीशान कोठियों में कट रही होती।

देश विदेश के सभी धन्ना सेठ इनको पकड़-पकड़ कर, तस्करी कर लाते, खूब खिलाते-पिलाते और दिन-रात एक करते हुए दुआ/आशीर्वाद देने का व्यापार करवा रहे होते।

AI द्वारा निर्मित 



Sunday, 29 December 2024

धर्मांतरण (Religious Conversion) रोकने हेतु उपयुक्त उपाय

 धर्मांतरण हमारे देश में धार्मिक विवाद का एक प्रमुख कारण है। इस कार्य को ईसाई मिशनरी प्रमुखता से अंजाम देते रहे हैं विशेष रूप से ब्रिटिश काल से। इन ईसाई मिशनरियों के मुख्य target होते हैं तथाकथित हिंदू समाज के तथाकथित दलित और आदिवासी जनता। तरह तरह के प्रलोभन देकर वे भोली भाली जनता को ईसाई धर्म में धर्मांतरण करते हैं। अपने धर्म की ओर लोगों को आकर्षित करने के लिए हमारे देश के ऐसे क्षेत्र जहाँ बुनियादी सुविधाएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि नहीं पहुँच पाए हैं, में उपलब्ध कराकर खुद को उनके लिए सरकार से बेहतर साबित कर अपने धर्म की ओर लाने का प्रयास करते हैं।

अधिकांश धर्मांतरित करने वाले व्यक्ति की गणना हिंदू वर्णव्यवस्था के अंतर्गत शुद्र या अस्पृश्य जातियों, जनजातियों में की जाती है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा जीवन के अंतिम पड़ाव में बौद्ध धर्म अपना लेने के बाद से अस्पृश्य जातियों से संबंधित उनके अनुयायी प्रति वर्ष नागपुर में बौद्ध धर्म भी अपना कर बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या लगातार बढ़ा रहे हैं। हिंदू कट्टरपंथियों को यह धर्मांतरण फूटी आंख नहीं सुहाती है। विशेष रूप से ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण। झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ आदि में जैसे ही इन्हें खबर मिलती है, ये पहुँच जाते हैं, उस धर्मान्तरित व्यक्ति के शुद्धिकरण के लिए।

आखिर कारण क्या है इस धर्मांतरण का? और अधिकांश धर्मांतरण तथाकथित हिंदुओं के ही क्यों होते हैं? क्या तथाकथित हिंदू बहुसंख्यक हैं, इसलिए हिंदू धर्मांतरण की ही खबरें हमें मिल पाती हैं? कोई मुस्लिम व्यक्ति के ईसाई बनने के उदाहरण देखने को मिलते हैं क्या? उत्तर है संभवतः नहीं। अपवाद स्वरूप कुछ उदाहरण हो सकते हैं। इतिहासकार इरफान हबीब मध्यकालीन भारत पर लिखे अपनी पुस्तक में बताते हैं कि दलित जातियों को मुस्लिम शासकों से मिले स्नेह के कारण वे स्वेच्छा से इस्लाम में धर्मांतरित हुए। कुछ हद तक ये बात तार्किक लगती है। संभवतः यही मुख्य कारण हैं लोगों के ईसाई धर्मांतरण के। जिन इलाकों में ईसाई धर्मांतरण अधिक हुआ है वहां से भी जातिगत भेदभाव व खराब आर्थिक स्थिति इस बात पर मुहर लगाते हैं। यही कारण है कि अपने सामाजिक-आर्थिक स्थिति से असंतुष्ट लोग धर्मांतरण का रास्ता अपनाते हैं। हालांकि ये चमत्कार से रोगी को ठीक करने के लिए शिविर आयोजित करते हैं, जो कि केवल एक पाखंड, झूठ होता है और कुछ नहीं।

वैसे तो भारतीय संविधान अपने नागरिको को अपनी पसंद के धर्म चुनने की आजादी देती है, लेकिन धर्मांतरण रोकने वाले लोग इन नियमों से अनजान होते हैं। यदि हिंदू धर्म के तथाकथित उच्च जातियों के लोग SC, ST के साथ जाति के नाम पर भेदभाव ऐसे ही करते रहे, जैसा भारतीय संविधान बनने के पूर्व करते रहे थे, तो धर्मांतरण रुकने से रहा। लोग चोरी छिपे आज या कल धर्मांतरण करेंगे ही, क्योंकि उन्हें लगता है कि जीस नए धर्म को ये लोग अपनाने जा रहे हैं, वह उन्हें समानता का अधिकार देता है। हालांकि यह बात एक मृग मरीचिका जैसी है। इस्लाम हों या ईसाई इन लोगों को मूल धर्म वाले अलग नजर से ही देखते हैं। तथाकथित हिंदू समाज के तथाकथित उच्च जाति के लोग इन सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को घृणा की नजर से यदि देखना बंद कर दें, धर्मांतरण रुक जाएगा। किसी को शुद्धिकरण की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी।

Sunday, 12 November 2023

अंधविश्वास को बढ़ावा देता हमारा त्यौहार

दीपावली के अवसर पर सजी बाजार में खूब रौनक थी। धनतेरस के दिन से ही लोगों की भीड़ को देखकर सभी दुकानदार, व्यवसायी के चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी। कुछ व्यवसायी तो सुबह से ही सामान देते-देते थककर चूर थे, लेकिन मुनाफे को और बढ़ाने की चाहत उन्हें आराम करते नहीं देखना चाहती थी। सोने चांदी की दुकान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, रेडीमेड कपड़ों की दुकान, मिट्टी के दिये की दुकान, पटाखे की दुकान, मिठाई की दुकान आदि पर जितनी भीड़ थी, आम दिनों में उतनी भीड़ शायद ही कभी देखने को मिले। सभी लोग अपने-अपने जरूरत के समान प्रसन्नता के साथ खरीद रहे थे। बाजार घूमते-घूमते अपने एक मित्र के मेडिकल की दुकान पर उनसे भेंट-मुलाकात करने पहुंच गया। वहां भी भीड़ थी, लेकिन वह उस दिन के भीड़ से अलग थी। अब आपके परिजन अस्पताल में भर्ती हों, और आप उनकी दवाई के लिए आए हों, तो स्वाभाविक है आप थोड़े अलग नजर आएंगे ही। वहां बैठा ही था कि दोस्त ने एक जगह साथ चलने को कह दिया। हम दोनों फुटपाथ किनारे लगे एक अस्थाई दुकान, जो दोस्त के किसी जान-पहचान वाले की दुकान थी, और उन्होंने केवल दो-तीन दिनों के लिए लगाया था, पर पहुंचे। दोस्त ने लक्ष्मी-गणेश की एक मूर्ति एवं उनसे संबंधित कुछ पूजन सामग्री खरीदी एवं अपने गंतव्य के लिए चल दिए। जितनी भीड़ अन्य दुकानों पर थी जिसकी चर्चा मैंने पूर्व में की, उतनी ही भीड़ इन दुकानों पर भी थी। गरीब से लेकर अमीर तक के लोग इस दुकान पर रुक कर अलग-अलग आकार वाले लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों को खरीद कर ले जा रहे थे। इस तरह की दुकान देखना मेरे लिए कोई नया अनुभव नहीं था, पिछले 25 वर्षों से इस तरह की दुकान दीपावली के अवसर पर सजी दिखती रही है। करीब 10-15 वर्ष पहले अपने मां-पिताजी के साथ आकर हमने भी ऐसी दुकानों से लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति एवं पूजन सामग्री खरीदने के लिए इस भीड़ का हिस्सा बने थे।

            लेकिन इस बार की बात थोड़ी अलग थी। तार्किक सोच/विचार के कौशल ने मुझे सोचने पर थोड़ा विवश किया। मेरे मन में विचार चलने लगा कि सोने चांदी की दुकानों पर, इलेक्ट्रॉनिक समान की दुकानों पर भीड़ इसलिए होती है कि धनतेरस एवं दीपावली को लोग शुभ अवसर मानते हैं। एवं ऐसे मौकों पर वे अपने सुख-सुविधा की चीजों में इजाफा कर रहे होते हैं, इस अवसर पर कंपनियों की ओर से मिलने वाले छूट भी उन्हें आकर्षित करती हैं। वे जो कुछ भी खरीद रहे होते हैं वह उनके जरूरत की चीज होती है, जो उनका मनोरंजन करने, काम को आसान बनाने, समृद्ध दिखने में मदद करती है। लेकिन मूर्तियों की दुकानों पर आने वाले भीड़ को उन मूर्तियों को खरीदने से क्या फायदा मिलता है? इसके उद्देश्य को समझने हेतु अपने दोस्त से बाइक पर बैठे-बैठे सवाल किया – दुकान में तो मूर्ति लगी हुई है ही फिर यह नई मूर्ति ले जाने का क्या मतलब?’ (इसके पीछे निहित कारण को मैं भी भली-भांति जानता था, फिर भी कोई और बात निकल कर आए यह सोचकर पूछ लिया) दोस्त की तरफ से कोई नया जवाब नहीं आया। बल्कि इस फालतू लगने वाले सवाल के लिए खरी-खोटी भी सुना दी, क्योंकि उसे पता था कि मैं इतना भी अज्ञानी नहीं हूँ जो इसके पीछे के कारण को समझ न पाऊँ। फिर भी उसने मेरे एक शोधार्थी होने का मान रखा और बताया। उसके अनुसार हर दीपावली को अपने घर, दुकान में हम लक्ष्मी गणेश की मूर्ति स्थापित करते हैं। लक्ष्मी धन की देवी हैं, उनके स्थापित रहने से घर, दुकान या किसी प्रतिष्ठान में सुख, समृद्धि आती है। प्रतिवर्ष इसे बदले जाने के कारण के संदर्भ में वह कुछ बात नहीं पाया। गणेश प्रतिमा के 10 दिनों में विसर्जन के पीछे निहित कारण एक जगह पढ़ा था कि 'धार्मिक ग्रंथों के अनुसार श्री वेदव्यास ने गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे श्री गणेश ने अक्षरशः लिखा था। 10 दिन बाद जब वेदव्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत बढ़ गया है। तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के सरोवर में ले जाकर ठंडे पानी से स्नान कराया था, इसलिए गणेश स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है[i] (विसर्जन के इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह एक काल्पनिक कहानी जैसी ही प्रतीत होती है।)

            गौर करने वाली बात यह है कि प्रतिवर्ष दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी-गणेश भगवान की ये मूर्तियां मूर्तिकारों द्वारा काफी बड़ी संख्या में बनाए जाते हैं, एवं दुकानदारों द्वारा बेचे जाते हैं। मान्यता बस इतनी है कि घर, दुकान या किसी प्रतिष्ठान में उनकी मूर्ति होने से वहाँ धन-सुख-संपदा-खुशियां आएंगे। अपना लाभांश रखकर वह दुकानदारों को देते हैं, दुकानदार अपना लाभांश रखकर ग्राहक को देते हैं। यहां तक धन का आवक तो समझ में आता है, लेकिन किसी घर, दुकान या प्रतिष्ठान में इन मूर्तियों के होने से धन का आना समझ से परे है। और इन मूर्तियों की वैधता केवल एक साल ही समझी जाती है। अगले साल कोई और मूर्ति पहले की जगह लगाना ही होता है। हर साल एक निश्चित दिन पर लोग इन मूर्तियों को अपने-अपने घर-दुकान ले जाते हैं, पंडित से प्राण प्रतिष्ठा के बिना इन्हें वैधता नहीं मिलती है।

            विडंबना ये है कि गृहस्थ और भगवान के बीच मध्यस्तता करने वाला पुजारी के वैदिक या पौराणिक ग्रन्थों में लिखित मंत्र पढ़कर मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। प्राण प्रतिष्ठा कर्मकांड करने का तात्पर्य है पहले यह मूर्ति केवल पत्थर की थी, इस कर्मकांड के बाद स्वयं भगवान इस मूर्ति में विराजमान हो जाते हैं। और जिस घर या दुकान में वह होते हैं, वहां की सुरक्षा करते हैं, उसके यश कीर्ति में मदद करते हैं, धन की वर्षा करते हैं। इसमें और भी कई शुभ इच्छाएँ जोड़े जा सकते हैं। पुजारी के इतना करने के बाद भी उन मूर्तियों की उपस्थिति में ही दुकानों/घरों में चोरी हो जाती है, शॉर्ट सर्किट होने से दुकान/घर तबाह हो जाते हैं। यहाँ तक कि चोरी-डकैती भी हो जाती है।  लेकिन ये मूर्ति कुछ कर नहीं पाती। बल्कि आग लगने के बाद भी इन मूर्तियों को उस आग में जलकर या धुएं से काला होते भी देखा है। अर्थात अपनी ही सुरक्षा नहीं कर पाती। मजे की बात ये है कि प्राण प्रतिष्ठा कर्मकांड करने वाले पुजारी भी अपने घर, मंदिर में यदि कीमती सामान रखे हो, तो उनको भी भगवान से ज्यादा ताला पर भरोसा होता है। उनके साथ-साथ प्रत्येक सामान्य गृहस्थ को भी ताले पर ही भरोसा होता है, उन मूर्तियों पर नहीं।

            दीपावली के अवसर पर पुजारी द्वारा मूर्तियों के प्राण प्रतिष्ठा की गतिविधि प्रतिवर्ष कराई जाती है लेकिन गृहस्थ की गरीबी कभी दूर नहीं हो पाती। इसके पीछे दो कारण निहित हो सकते हैं – (1) मंत्र के माध्यम से प्राण प्रतिष्ठा एक ढोंग, दिखावा है। (2) यदि प्राण प्रतिष्ठा ढोंग नहीं है तो ऐसे मूर्तियों को अपने घर, दुकान में जगह देना इस कामना के साथ कि यह हमारी गरीबी को दूर करेगी, हमारे घर/दुकान की रक्षा करेंगी, पूरी तरह अंधविश्वास है।  ऐसे में आधुनिक काल अर्थात तार्किक युग में जीवन यापन कर रहे हम लोगों का एक परम कर्तव्य है कि प्राचीन काल से ही फैले ऐसे अंधविश्वास, कर्मकांड को अपने जीवन में न्यून स्थान दें। इस अंधविश्वास के पालन करते रहने से आपकी समृद्धि तो नहीं लेकिन इन कर्मकांडों के करने पर अनावश्यक रूप से आपका धन जरूर खर्च होगा। अर्थात आपके केवल धन की हानि हो सकती है, लाभ नहीं। हालांकि हमारे जीन में घुसे-बैठे अंधविश्वास, पाखंड के इस मकड़जाल से मुक्त होना बहुत ही मुश्किल कार्य है, लेकिन छोटे-छोटे लक्ष्य प्राप्त कर इस अंधविश्वास से ऊपर उठते हुए इससे मुक्त हुआ जा सकता है।

Saturday, 11 November 2023

सोशल मीडिया के शॉर्ट विडियो एवं हमारी ज़िम्मेदारी

बचपन में हमें 3 दिन का विशेष रूप से इंतजार होता था – शुक्रवार, शनिवार, रविवार। मनोरंजन की दृष्टि से सप्ताह के यह तीन दिन काफी महत्वपूर्ण दिन होते थे। शुक्रवार और शनिवार को रात के 9:30 बजे दूरदर्शन चैनल पर फिल्म दिखाया जाता था, वहीं रविवार को शाम के 4:00 बजे का समय इसके लिए निर्धारित था। उस दौर में घर में बैठकर खेले जाने वाले खेल की अपेक्षा घर के बाहर भाग दौड़ वाले खेल ज्यादा लोकप्रिय थे। गर्मी के दिनों में ही केवल कड़ी धूप या गर्मी के दौरान इनडोर खेल ज्यादा खेले जाते थे। पूरा दिन स्कूल में बिताने, तत्पश्चात भाग दौड़ वाले खेल खेलने के बाद रात के 9:00 बजे तक इतना सामर्थ नहीं होता था कि इससे ज्यादा जागने के लिए अपनी आँखों को मना सकें। अर्थात 9:00 बजे रात तक स्वाभाविक रूप से नींद आ जाती थी। किसी दिन यदि जागे रह भी जाते तो माँ, पिताजी या दादाजी द्वारा डांट फटकार सुनने को मिल जाती इस स्टेटमेंट के साथ कि ‘Early to bed and early to rise, makes a man healthy, wealthy and wise’ और अंततः प्रवचन सुनकर सोना ही पढ़ता था। अगले दिन स्कूल में जब दो-तीन साथी रात की फिल्मों का जिक्र कर रहे होते थे तो एक अफसोस था होता था कि काश हम भी फिल्म देख सके होते।

          ऐसे में फिल्म देखने के लिए रविवार का दिन मिलता था। 4:00 बजने का बेसब्री से इंतजार होता था। लेकिन तब भी इतना भी आसान नहीं होता था फिल्म देख पाना क्योंकि तब आज की तरह 24 घंटे बिजली भी नहीं रहती थी, इनवर्टर, सौर ऊर्जा का नाम किसी ने सुना भी नहीं था। ऐसे में बिजली न होने पर 12 या 24 वोल्ट के बैटरी पर हमारी निर्भरता ज्यादा होती थी। उसे दौर में जिन घरों में टीवी होते थे, वहां वोल्टेज बढ़ाने के लिए स्टेबलाइजर, चार्जर और बैटरी भी होते थे। जिस समय बिजली होती थी बैटरी चार्ज किया जाता था, बिजली न होने पर टीवी में जब कुछ देखना हो तो बैटरी से टीवी चलाया जाता था। हम भी अपने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी को बैटरी से चला कर फिल्मों का आनंद लिया करते थे। कभी-कभी जब कोई बहुत ही चर्चित फिल्म आती तो बिजली एवं बैट्री चार्ज न होने की स्थिति में गाँव के किसी के ट्रैक्टर की बैटरी निकलवा कर फिल्मों को देखा जाता था।

          उसे समय आज की तरह बहुत सारे चैनल भी नहीं हुआ करते थे, एकमात्र दूरदर्शन चैनल ही हमारे डिजिटल मनोरंजन का सहारा होता था। हां ! एंटीना को इधर-उधर घुमाने पर डीडी मेट्रो जरूर आता था, लेकिन उसे देखने या ना देखने का कोई मतलब ही नहीं होता था, क्योंकि वह केवल बड़े-बड़े शहरों में दिखाए जाते थे, बहुत ही कम सिग्नल गांव तक आते थे। उस दौर में हमने नया-नया पढ़ना सीखा था, ऐसे में हर लिखी हुई चीज को पढ़ने का एक जुनून था। यही कारण है कि फिल्म की कास्टिंग से लेकर फिल्म के अंत तक जो भी लिखित सामग्री आई थी, उसे बिना पढ़े छोड़ते नहीं थे। कुछ को समझते थे, कुछ सर के ऊपर से निकल जाते थे। जिज्ञासा तो होती थी सर के ऊपर से निकलने वाले कंटैंट के मायने को समझने की, लेकिन कोई समझा भी नहीं पाते थे। lyricist/lyrics, choreography ऐसे ही कुछ शब्द थे। यह अलग बात है कि उस अंग्रेजी शब्द के मायने समझने वाले कोई नहीं थे। फिल्म शुरू होते ही हम कलाकार के नाम से लेकर फिल्म बनाने में सहयोग देने वाले लोगों के नाम पढ़ते थे। इस दौरान एक सीन को हम लोग अक्सर पूरा नहीं पढ़ पाते थे, लेकिन हां! इतना देखने में जरुर सफल हो जाते थे कि फिल्म कितने रील की है। अधिकांश फिल्म 16-17 या 18 रील के होते थे। वह दिखाई जाने वाली चीज सेंसर बोर्ड के द्वारा जारी किया गया एक सर्टिफिकेट होता था, जिसमें  यह प्रमाणित होता था कि यह फिल्म किस दर्शक वर्ग के लिए बनी है? अधिकांश प्रसारित फिल्में U, U/A प्रमाणित होते थे। हालांकि दिखाए जा रहे इन सर्टिफिकेट के वास्तविक मायने की समझ तो उस दौर के पेरेंट्स को पता भी नहीं थे। आज भी फिल्म देखनेवाले आधे से ज्यादा जनसंख्या को इसके मायने नहीं पता होंगे।

          आज 25 वर्ष बाद का दौर बिल्कुल उसके उलट है। तब बहुत सीमित संख्या में ऐसे मनोरंजक वीडियो बनते थे, बहुत ही सीमित नायक-नायिकाएँ-विलन होते थे। आज वीडियो या फिल्म देखने के लिए शुक्रवार, शनिवार, रविवार जैसे किसी दिन विशेष का इंतजार नहीं करना पड़ता। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब खोलिए तरह-तरह के वीडियो आपकी सेवा में हाजिर है। स्मार्ट/मोबाइल फोन, सोशल मीडिया के क्षेत्र में आई क्रांति ने देश के प्रत्येक नगर, गांव को एक मिनी फिल्म इंडस्ट्री बना दिया है। युवा से लेकर वृद्ध तक सभी अपने अभिनय कौशल, नृत्य कौशल, संगीत कौशल, मस्करी करने का कौशल आदि के दम पर खुद के घर में ही मिनी फिल्म इंडस्ट्री स्थापित कर लिया है। यह उनके अभिव्यक्ति कौशल को निखारने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त भी कर रहा है। विज्ञापन के माध्यम से होने वाले आय से वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। यही कारण है कि आए दिन हम मुख्य धारा के मीडिया चैनलों द्वारा 'यूट्यूबरों का गांव' जैसे स्टोरी कवर करते देखते सुनते रहते हैं।

          इनमें से अधिकांश युवा/लोग छोटे-छोटे 5 से 10 मिनट के वीडियो बनाकर उसे अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपलोड कर देश- विदेश के लोगों को मनोरंजित कर रहे हैं। इनके माध्यम से वे नए-नए ज्ञान, मनोरंजन करने के साथ-साथ जीवंत उदाहरणों द्वारा उन मूल्यों को भी प्रसारित करने का कार्य कर रहे हैं जिसकी अपेक्षा हमारा भारतीय संविधान हमसे करता है। इन मूल्यों के साथ जीना सिखाने में प्राथमिक कक्षाओं में नैतिक शिक्षा विषय के अंतर्गत, या हिंदी विषय के अंतर्गत कविता कहानियां के सार के रूप में एक स्तर पर समझ बना चुके होते हैं। ऐसे में जब वीडियो के माध्यम से उन बातों का दोहराव होता है तो उसके प्रासंगिक/अप्रासंगिकता के बारे में हम सोचना- विचारना शुरू कर देते हैं। वीडियो बनाने का प्रभाव जब इस रूप में परिलक्षित होता है तो एक यूट्यूबर के लिए यह गौरवशाली पल होता है। गौरवशाली पल से इसलिए संबोधित किया जा रहा है कि आपके वीडियो को देखकर दर्शक वर्ग आत्मावलोकन करते हैं एवं जहां खुद में सुधार लाने की गुंजाइश होती है, उसे पर वे कार्य करते हैं।  

          इसका एक दूसरा पक्ष भी है। दर्शक वीडियो को शुरू से अंत तक दर्शक देख सकें इसके लिए ऐसे भड़कदार विषय पर वास्तविक लगने वाले वीडियो बनाए जाने का चलन बढ़ रहा है जिससे लोग प्रभावित होकर उसे वायरल कर दें। जैसे - कुछ यूट्यूबर तीन-चार पात्रों को मिलाकर पैसे के लिए ब्लैकमेलिंग करने जैसे पटकथा लिखकर उसका वीडियो बनाते हैं और ऐसे दावों के साथ साझा करते हैं जैसे वे वास्तविक हों। इन कहानियों में एक शोषक एवं एक शोषित आसानी से देखे जा सकते हैं। इस दौरान वे दर्शकों के भी स्वाद का ध्यान रखते हैं, जैसे वीडियो में दिख रही लड़की को पूरे मेकअप के साथ भड़कदार कपड़े पहनाना नहीं भूलते। ऐसे ही ब्लेकमेल करने, उसका पर्दाफास कर तथाकथित शोषित को शोषण से मुक्त करवा कर खुद को हीरो के रूप में दिखाने वाली कहानियों को थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ दूसरे चैनल को भी ऐसी सामग्री परोसते हुए देखा जा सकता है।

          कुछ यूट्यूबर भूत की हंटिंग करने जैसे कार्य में लगे हुए हैं, भूतों वाले मास्क लगाकर, 10 से 15 मिनट की कहानी को अपने ओवर एक्टिंग से इतना भयावह बना देते हैं, कि लोग इसे देखते ही भूत को सच मानकर धड़ाधड़ लाइक शेयर करना शुरू कर देते हैं, जिससे उनकी व्यू इतनी बढ़ जाती है कि जो वीडियो को नहीं भी देखे हैं उनमें भी उत्सुकता आ जाती है कि आखिर क्या है इसमें? ऐसा कर वे वैज्ञानिक सोच की जगह अंधविश्वास फैलाने का कार्य कर रहे होते हैं। देखकर हैरानी होती है कि वीडियो में दिखने वाले भूत या चुड़ैल वीडियो में दिख रहे जांबाज़ भूत पकड़ने वालों के हाथ पैर खींच रहे होते हैं लेकिन उनके साथ-साथ उनके पीछे दौड़ रहे कैमरामैन को वह छू भी नहीं पाते। जिनके पास आलोचनात्मक चिंतन करने का कौशल है वह कमेंट सेक्शन में जाकर उनकी पोल खोल रहे होते हैं, उनके बेवकूफ बनाने को अपशब्द कह रहे होते हैं। लेकिन वीडियो बनाने वालों पर इन बातों का कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे जानते हैं कि उनके सब्सक्राइबर को संवेदनशील/हॉरर कंटेंट देखना और शेयर करना पसंद है। क्योंकि वे भूत के अस्तित्व में होने को अपने दिलों दिमाग में बसाए बैठे हैं। ऐसे में भूत दिखना उनके लिए कौतूहल वाला विषय होता है।  

          इन वीडियो को अलग-अलग दर्शक वर्ग अपने अपने स्वार्थ के अनुसार उसे वीडियो को काट छांटकर अपने अकाउंट से पोस्ट कर रहे होते हैं। हाल ही में एक फेसबुक ग्रुप जो ब्राह्मणवाद के खिलाफत के लिए आवाज उठाने का काम करता था, पर एक वीडियो शेयर किया गया। वह वीडियो एक स्क्रिप्ट वीडियो का छोटा सा भाग था, मनोरंजन के लिए इस ड्रामे को बनाया गया था। इस वीडियो में यह दिखाया गया था कि एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अपनी बेटी समान एक बालिका को अनाथ आश्रम से उठा लाया और उससे विवाह कर लिया। वास्तविकता यह है कि अनाथ आश्रम से किसी भी बालिका को लाकर उससे विवाह कर लेना कोई आसान काम नहीं है। अनाथ आश्रम वाले अपने बच्चों को यूं ही नहीं किसी के पास भेज देते हैं। इसका एक प्रोटोकॉल होता है। कैमरा के एंगल, मूवमेंट से लेकर आवाज की शुद्धता तक अवलोकन करने से पता लगा कि यह एक ड्रामा वीडियो है जिसका उद्देश्य केवल मनोरंजन हो सकता है। लेकिन उसे पेज के द्वारा इसे एक ब्राह्मण द्वारा अपनी बेटी की उम्र के लड़की के साथ विवाह करने जैसे दावे के साथ साझा किया जा रहा था। उसके कमेंट सेक्शन में जब गया तो पता चला कि उसे पेज की विचारधारा को फॉलो करने वाले सभी लोग ब्रह्मा सरस्वती आदि का जिक्र करते हुए उस जाति के लोगों को पानी पी पीकर कोस रहे थे। वीडियो पर कमेंट करने वाले लोग इस घटना को सही मानकर इसे शेयर भी कर रहे थे। उन्हें पता ही नहीं था कि वे वास्तविक नहीं ड्रामा वीडियो को शेयर कर रहे हैं, जो वास्तविकता से कोसो दूर हो सकते हैं। वीडियो के सभी पात्र अभिनय कर रहे होते हैं। इसके कुछ दिनों पूर्व ही उसी पुरुष अभिनेता की जयमाला स्टेज पर एक सुंदर लड़की द्वारा उसे दुत्कार कर भाग जाने का एक शॉर्ट वीडियो वायरल हुआ था। तब भी लोग इसे सच मानकर मुस्लिम कीवर्ड के साथ साझा कर रहे थे।

          ऐसा इसलिए होता है कि ऐसे कंटेंट को देखना हमें झकझोरने जैसा होता है, जो हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाए। यूट्यूबर हमारी आपकी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर अपने लिए पैसे बनाने की फिराक में लगे रहते हैं। ऐसे सेंसिटिव कंटेंट पर वीडियो बनाने से उस विडियो को देखने वाले की संख्या लाखों-करोड़ों में बहुत जल्दी चली जाती है जिससे पैसे कमाना आसान हो जाता है।

          ऐसे शॉर्ट वीडियो के प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए कोई सेंसर बोर्ड नहीं होता। ऐसे में हमारी आपकी जिम्मेदारी हो जाती है कि इस तरह के वीडियो के झांसे में आकर कोई असंवैधानिक कदम न उठाएं। या आपसी फूट को बढ़ावा न दें। किसी भी वीडियो को देखने के लिए उसके वास्तविकता तक पहुंचाने के लिए खुद में आलोचनात्मक चिंतन करने का कौशल विकसित करें, एवं समझदारी से उन वीडियो को देखें एवं शेयर करें।


Tuesday, 9 May 2023

महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा बौद्ध धर्म में प्रचलित झूठी मान्यताओं पर कटाक्ष

यायावरी साहित्यकार के नाम से प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन की गणना ऐसे महान विद्वानों के साथ किया जाता है जिन्होंने कहानीकार, संस्मरणकार, इतिहासकार के रूप में हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। साहित्य की शायद ही कोई विधा उनसे अछूती रही हो। अपनी लेखनी से जहां इन्होंने हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध किया वहीं यायावरी जीवन के माध्यम से बौद्ध साहित्यों के संरक्षण के लिए इन्हें पूरी दुनिया सम्मानित नज़र से देखती है। इस योगदान के लिए प्रेमचंद मई 1933 में उनकी प्रशंसा करते हुए में लिखते हैं, राहुल जी कदाचित वह पहले बौद्ध सन्यासी हैं, जिन्होंने तीन वर्ष तिब्बत में रहकर पालि का ज्ञान प्राप्त किया और वहाँ से बौद्ध साहित्य की लगभग 10 हज़ार प्राचीन पुस्तकें लेकर भारत लौटे[1] ज्ञात हो कि बौद्ध धर्म पर शोध के दौरान उन्होंने भारत, तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका, चीन, जापान, ईरान, रूस, इंग्लैंड आदि देशों की यात्रा किया, वहां के इतिहास, भूगोल, संस्कृति को जाना समझा, वहाँ के साहित्यों को भारत लाया, इसका अध्ययन किया एवं इसके संबंध में अपने यात्रा वृतांत में लेखबद्ध किया। इन साहित्यों को भारत लाने के लिए उन्होंने तिब्बत व अन्य देशों के उन दुर्गम स्थानों की भी यात्रा की जहां पैर रखने का कोई भी साहस नहीं कर सका था, जहां जाने में लोग भय खाते थे।[2] अलग-अलग देशों से लाए इन साहित्यों को पटना संग्रहालय में देखा जा सकता है। 9 अप्रैल 1893 ई. को पंदहा गाँव आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे राहुल सांकृत्यायन जी को बचपन में केदारनाथ पांडे के नाम से जाना जाता था। यायावर जीवन जीते हुए 1930 में श्रीलंका यात्रा के दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तब उनका नाम 'राहुल' हो गया। साथ ही संकृति गोत्र से संबंधित होने के कारण अपने नाम के अंत में 'सांकृत्यायन उपनाम लगाते थे। इससे पूर्व कुछ दिनों तक बाबा रामउदार के नाम से परसा (बिहार) स्थित एक मठ के उत्तराधिकारी के रूप में भी कार्य किया। अपने 70 वर्षों के जीवन में उन्होंने 140 प्रकाशित रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक विशिष्ट मुकाम दिया। इसके उप्लक्ष्य में 1958 ई. में उन्हें साहित्य जगत के शिखर पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार से एवं 1963 ई. में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

          राहुल सांकृत्यायन की गिनती साहित्यकार, इतिहासकार के साथ-साथ अपने समय के एक प्रसिद्ध तर्कशास्त्री के रूप में की जाती है। अपने वैज्ञानिक चिंतन एवं तार्किक कौशल का उपयोग करते हुए उन्होंने समाज से अंधविश्वास उन्मूलन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। 1914- 15 ई. के दौरान वे आर्य समाज के संपर्क में रहे जिसके पश्चात समाज में प्रचलित धर्म संबंधी मिथ्या धारणाओं के खंडन करने की प्रवृति उनमें जागृत हुई। वे ईसाई, इस्लाम, यहूदी, बौद्ध के साथ-साथ हिंदू धर्म के अनेक संप्रदायों को झूठा धर्म, वेद एवं विज्ञान के प्रकाश में शीघ्र ही लुप्त हो जाने वाला धर्म समझते थे। वे उपयुक्त तर्क एवं दलील द्वारा प्रतिद्वंदी को अपने रास्ते पर लाने के पक्षपाती थे।[3] अपने कालपी प्रवास के दौरान राहुल सांकृत्यायन द्वारा एक आर्यसमाजी विचारक के रूप में ईसाई पादरियों, एवं सनातन धर्म के विद्वानों से शास्त्रार्थ में भाग लिए जाने का उल्लेख जगदीश प्रसाद बरनवाल राहुल सांकृत्यायन पर लिखे जीवनी में करते हैं।

एक आर्यसमाजी के रूप में राहुल सांकृत्यायन ने हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी काफी गहराई के साथ समझा। बौद्ध धर्म के संपर्क में वे पहली बार तब आए जब उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। 29 अक्टूबर 1922 को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री चुने जाने के पश्चात प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की गया में हुई बैठक में 16 दिसंबर 1922 को शामिल होते हुए यह प्रस्ताव रखा थी बोधगया का महाबोधि मंदिर बौद्धों का है उन्हें वापस मिलना चाहिए। इस घटना के पश्चात उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति एक सहानुभूति पैदा हुई। इसके कुछ दिन पश्चात ही जनवरी 1923 ई. में जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री पद से इस्तीफा देने के पश्चात नेपाल की यात्रा पर वे निकल गए। इस यात्रा के दौरान वे वहां के अनेक बौद्ध स्थल, बौद्ध धर्म गुरु के संपर्क में आए। यात्रा से वापस आने के पश्चात पुनः वे राजनीतिक जीवन में सक्रिय हुए। इसी क्रम में 1925 ई. में उनका परिचय बौद्ध भिक्षु भदंत आनंद कौशल्यायन से हुआ।

बौद्ध धर्म संबंधित अध्ययन के उद्देश्य से तिब्बत यात्रा के दौरान न केवल वहां के बौद्ध सांस्कृतिक-एतिहासिक विरासतों को काफी गहराई से समझने का प्रयास किया बल्कि वहाँ बौद्ध धर्म में व्याप्त झूठी धारणाओं, मान्यताओं जो तार्किकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, पर भी प्रहार किया। 5 अगस्त 1934 को तिब्बत यात्रा के दौरान लिखे एक पत्र में उन्होंने तिब्बत के साथ-साथ अपने देश भारत में भी बौद्ध धर्म में मौजूद झूठे मान्यताओं पर कटाक्ष किया है। अपने यात्रा वृतांत को इस पत्र में लिखते हुए वे कहते हैं 'सभी धर्म स्थान झूठ के अड्डे हैं। शायद उतनी झूठी कथाएं और जगह नहीं मिलेंगे, जितनी धर्म के दरबार में। धर्म वस्तुतः झूठ की आयु को लंबा करने में बड़ा सहायक होता है' तिब्बत के एक स्थान (रे- दिङ लामा से संबंधित) का उल्लेख करते हुए राहुल सांकृत्यायन वहां प्रचलित एक दंतकथा का उल्लेख करते हैं। वह कहते हैं कि रे- दिङ लामा (जिनकी आयु उस दौरान 22 वर्ष की थी) के पैर का एक काले पत्थर पर निशान कांच के भीतर रखा हुआ है। श्रद्धालु भक्तों से कहा जाता है कि बचपन में लामा रिंपो छे ने पैर को महज स्वभाव से पत्थर पर रख दिया था और उस पर यह निशान उतर आया। यदि समंतकूट और नर्मदा नदी की पहाड़ी पर बुद्ध के बड़े-बड़े पद चिन्ह उतर सकते हैं, तो यहां एक अवतारी लामा के छोटे से पद चिन्ह के उतरने में कौन सी असंभव बात हो सकती है’?[4]

राहुल सांकृत्यायन 25 नवंबर 1904 को अपने लिखे एक अन्य पत्र में तिब्बती लामा (ग्य-गर लामा) द्वारा उनके मेजबान रहे एक स्थानीय बूढ़े-बूढ़ी की कांच की मालाओं में जप को और पुण्यदायी बनाने के उद्देश्य से फूँक मारने के प्रकरण पर सवाल उठाते हैं।[5]



[1] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 9  

[2] वही, पृष्ठ सं. 9

[3] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 16

[4] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 23

[5] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 39

 

Saturday, 15 April 2023

अंधविश्वास के मकड़जाल से मुक्त होने का समय

 ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।

          इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी।  

          सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है। 

Tuesday, 21 March 2023

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया? उसी दिन या इस दो महीने के बीच की किसी अन्य तिथि क्यों नहीं?

शालायी बच्चों को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से परिचय कराने, उन मूल्यों के साथ जीने के कौशल विकसित करने के क्रम में बेमेतरा जिले के एक शासकीय उच्च प्राथमिक शाला जाना हुआ। कक्षा छठवीं-आठवीं के बच्चों के साथ होने वाली इस बातचीत के दो चरण थे। पहले चरण में बच्चों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना एवं उनमें उल्लेखित संवैधानिक अवधारणाओं एवं मूल्यों से संबंधित प्रदर्शित कैलेंडर का अवलोकन, अध्ययन करना था, तत्पश्चात मन में उपजे सवालों को एक कागज में लिखना भी था, ताकि दूसरे चरण में कक्षा में बैठकर उनपर बातचीत किया जा सके। बच्चों की ओर से कई प्रकार के सवाल आए। इसी क्रम में एक ऐसा भी सवाल आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सवाल था – हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया”? उस पर्ची पर सवाल पूछने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था, बाद में बच्चों से पूछा भी कि यह सवाल किसकी जिज्ञासा है? लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सवाल की प्रकृति को देखकर ऐसा लगा कि शायद उसी शाला के किसी शिक्षक की ओर से ये सवाल आया हो? यह सोचकर कि इस विषय पर मेरी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, मैंने उस सवाल पर फिर कभी किसी दिन बातचीत करने की बच्चों और शाला के शिक्षकों से सहमति ली। कई प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि नवनिर्मित भारतीय संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक विशिष्ट बात छिपी थी।

          आजाद हिंदुस्तान (भारत) के संचालन हेतु संविधान निर्माण के लिए 9 दिसंबर 1946 ई. में ही भारतीय प्रतिनिधियों से निर्मित कमेटी गठित कर ली गई थी। इस कमेटी ने 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन तक 114 बैठकों में लगातार चर्चा, विमर्श करने के पश्चात इस नवनिर्मित विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंतिम रूप 26 नवंबर 1949 को दिया था। लेकिन कमेटी ने इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि निर्धारित की। इसके पीछे कारण था इस तिथि (26 जनवरी) की विशिष्टता। इस विशिष्टता को समझने के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष पूर्व अर्थात 1929-30 ई. के कुछ घटनाक्रम को समझना पड़ेगा। दिसंबर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन रावी नदी के किनारे लाहौर में हुआ, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। हालांकि प्रारंभ में गांधीजी को इस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया।[i] 1908 ई. से लेकर इस अधिवेशन तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग कर रही थी। इस अधिवेशन के दौरान ही जनवरी 1930 ई. के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि इसी महीने के आखिरी रविवार (26 जनवरी की तिथि) तक ब्रिटिश सरकार यदि भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती है तो भारत खुद को पूरी तरह स्वतंत्र (पूर्ण स्वराज) घोषित कर देगा। अर्थात इस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ने अपना लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज से पूर्ण स्वराज घोषित किया। ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि तक जब इस मांग को नहीं माना तो भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी। इस तिथि को पहली बार देश के अनेक भागों में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।[ii] साथ ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हिंदुस्तान के अलग-अलग भागों के नागरिकों ने शांतिपूर्वक तथा पूर्णनिष्ठा के साथ गांधीजी द्वारा तैयार किए गए पूर्ण स्वराज के शपथ को दुहराते हुए आजादी हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया। 1930 ई. के पश्चात 1947 ई. तक सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन निर्धारित किया। हालांकि उनके द्वारा भी इस कार्य के लिए 15 अगस्त की तिथि चुने जाने के पीछे एक रोचक कारण था। दरअसल 15 अगस्त अंग्रेजों के लिए एक यादगार दिन था। 2 वर्ष पूर्व अर्थात 1945 ई. में 15 अगस्त की तिथि को ही द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के गुट, जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था, के समक्ष जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह एक विशिष्ट दिन था। चूंकि मामला देश की आजादी का था इसलिए भारतीय राजनेताओं को 15 अगस्त 1947 की प्रस्तावित तिथि को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी की तिथि थोड़ी धूमिल पड़ती जा रही थी, क्योंकि इसका स्थान 15 अगस्त की तिथि ने ले लिया था। इस तिथि की महत्ता बरकरार रहे यह सोचकर संविधान निर्माण समिति द्वारा 26 जनवरी 1950 ई. की तिथि को भारतीय संविधान लागू करने की तिथि घोषित की गई।

          यहाँ एक रोचक बात और यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से 1908 ई. से ही जिस डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशिक साम्राज्य) की मांग की थी एवं 1929-30 ई. में जिस पूर्ण स्वराज की बात की थी, दोनों एक साथ पूरी हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि 15 अगस्त 1947 ई. की तिथि को भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से स्वतंत्रता मिली। सर्वोच्च पद वायसराय खत्म हुआ लेकिन एक नए पद गवर्नर जनरल का सृजन हुआ। यह पद ब्रिटिश क्राउन के अधीन होता था। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। वे 1947-48 ई. तक इस पद पर बने रहे। तत्पश्चात चक्रवर्ती राज गोपालाचारी पहले एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। ऐसा इसलिए हुआ कि स्वतंत्रता के समय भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। इसलिए इसके लागू होने के पूर्व अर्थात 25 जनवरी 1950 ई. तक गवर्नर जनरल का पद ही सर्वोच्च पद बना रहा। 26 जनवरी 1950 से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ ही डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ। डोमिनियन स्टेटस से तात्पर्य था - आंतरिक प्रशासन जैसे विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, सैनिक, विदेशी मामले भारतीयों के द्वारा संचालित किए जाएंगे, लेकिन राजा ब्रिटिश साम्राज्य का होगा। इस तरह 26 जनवरी 1950 ई. से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चूंकि इससे पूर्व हमारे देश में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी जिसमें राजा का पद वंशानुगत होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि यही व्यवस्था रहती तो विविध जाति, धर्म, संप्रदाय के मेल से निर्मित नवीन भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं होता। अतः इस व्यवस्था के स्थान पर प्राचीन भारत की ही एक अन्य व्यवस्था गणतन्त्र को चुना गया। राजतंत्र के विपरीत इस व्यवस्था में राजा का पद वंशानुगत न होकर जनता के बीच से चुने जाते थे। इस व्यवस्था में राजा के पद को राष्ट्रपति के नाम से संबोधित किया गया। यही कारण है कि इस तिथि को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को चुना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च संवैधानिक पद था। इससे पूर्व डोमिनियन स्टेटस में गवर्नर जनरल का पद सर्वोच्च होता था।

          26 जनवरी 1950 से इस पद के अस्तित्व में आते ही हमारे देश में गणतंत्रात्मक व्यवस्था लागू हुआ, ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ।



[ii] https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/our-constitution-implemented-on-26-january-know-everything-pcup/834996

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त अन्य स्त्रोत

गुहा रामचंद्र (2012) भारत गांधी के बाद: दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का इतिहासपेंग्विन बुक्स, गुरूग्राम