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Saturday, 13 September 2025

कभी कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग ने एक साथ सरकार चलाया था।

1946 में ब्रिटिश हुकूमत के समय हमारे देश में एक अंतरिम (अस्थायी) सरकार बनी थी। उद्देश्य था - आजादी से पहले भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू करना। ब्रिटिश सरकार ने भारत को आजादी देने के लिए एक कैबिनेट मिशन जिसे क्रिप्स मिशन भी कहा जाता है, को भारत भेजा। इस आयोग ने एक संविधान सभा बनाने और तब तक एक अंतरिम सरकार चलाने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव के तहत 1946 में प्रांतीय विधानसभाओं में चुनाव कराए गए। कुल 1585 सीटों पर चुनाव हुए।

कांग्रेस पार्टी को 923 सीट, मुस्लिम लीग को 425 सीट एवं अन्य पार्टियों या स्वतंत्र उम्मीदवार को 237 सीट मिली। कांग्रेस को गैर मुस्लिम क्षेत्रों में बहुमत मिला तो वही मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों में 90% से ज्यादा सीट पर जीत दर्ज की। इससे मुस्लिम लीग को मुसलमानों के एक मात्र प्रतिनिधि होने का अभिमान आ गया।  

इस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे काँग्रेस पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। इस तरह 2 सितंबर 1946 को कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में अंतरिम सरकार बनी। तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड वेवेल एवं उनके पश्चात् लॉर्ड माउंटबेटेन इस अंतरिम (अस्थायी) सरकार की अध्यक्ष थे। जबकि जवाहर लाल नेहरू इसके उपाध्यक्ष थे। यह सरकार 15 अगस्त 1947 तक स्थायी सरकार बनने तक चली।

मजेदार बात यह है कि इस सरकार में पक्ष और विपक्ष (कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि) दोनों शामिल किए गए थे। एक सिख प्रतिनिधि को भी शामिल किया गया था। सभी प्रतिनिधियों को कुछ इस प्रकार से जिम्मेदारियां प्राप्त थी -

·       जवाहरलाल नेहरू (कांग्रेस) के पास विदेशी मामलों की जिम्मेदारी थी।

·       सरदार वल्लभ भाई पटेल (कांग्रेस) के पास गृह विभाग था।

·       डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद (कांग्रेस) के पास खाद्य एवं कृषि विभाग की जिम्मेदारी थी।

·       सी राजगोपालाचारी (कांग्रेस) के पास शिक्षा विभाग को संभालने की जिम्मेदारी थी।

·       जॉन मथाई (कांग्रेस) के पास उद्योग एवं आपूर्ति विभाग, रफ़ी अहमद किदवई (कांग्रेस) के पास संचार विभाग,  

·       बल्देव सिंह (सिक्ख प्रतिनिधि) को रक्षा विभाग संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी।

अक्टूबर 1946 में मुस्लिम लीग के कुछ सदस्यों को भी ब्रिटिश सरकार द्वारा अंतरिम सरकार में शामिल कर लिया गया और उन्हें भी कुछ विभागों की जिम्मेदारी दी गई। जो इस प्रकार थे –

·       लियाकत अली खान (मुस्लिम लीग) को वित्त विभाग

·       अब्दुर रब निश्तर को डाक एवं हवाई विभाग

·       आई आई चुंदरीगर को वाणिज्य विभाग

·       जोगेंद्र नाथ मंडल को विधि (law) विभाग एवं गजनफर अली खान को स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मिली।

यहाँ पर सवाल उठता है कि 1946 की अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के नेताओं को शामिल क्यों किया गया था? इसके पीछे का तर्क क्या था? इसके पीछे 2 मुख्य कारण थे –

1.     चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी दावा करती थी कि वह पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर (विशेष रूप से जो मुसलमानों के लिए आरक्षित थे) मुसलिम लीग के शत प्रतिशत बहुमत ने यह साबित कर दिया कि ‘कांग्रेस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है’। इस चुनाव के परिणाम ने मुसलिम लीग एवं कांग्रेस को बराबरी की स्थिति पर ला खड़ा कर दिया। एक को मुसलमानों का बहुमत प्राप्त था तो दूसरे को गैर मुसलमानों का। ऐसे में ब्रिटिश सरकार को दोनों ही पी पार्टियों के प्रतिनिधियों को अंतरिम सरकार में शामिल करने का निर्णय लेना पड़ा। शुरुआत में मुस्लिम लीग चूंकि पाकिस्तान की मांग पर अड़ी थी। इसीलिए कांग्रेस के साथ सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं थी। लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव एवं सत्ता में हिस्सेदारी की चाह ने अक्टूबर 1946 में अंतरिम सरकार में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा।   

2.     दूसरा एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि उस दौरान मुस्लिम लीग के सर्वोच्च नेता मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग काफी बलवती थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी शुरुआती विरोध के बाद मजबूरन चाहने लगी कि यदि मुस्लिम लीग को सरकार में हिस्सा दिया जाए तो शायद वह विभाजन की मांग से पीछे हट जाएगी या नरम पड़ जाएगी। इसलिए कांग्रेस ने भी पी अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग को शामिल करने के फैसले का कोई खास विरोध नहीं किया।  

कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद थी कि मुस्लिम लीग से सहयोग मिलेगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। मुस्लिम लीग के लियाकत अली को कांग्रेस ने वित्त विभाग दिया। लेकिन लियाकत अली ने अलग अलग विभागों के वित्तीय आवंटन में बार बार अड़चन लगाने के साथ साथ कई अन्य मौकों पर पी ऐसे कार्य किए जिससे कांग्रेस को अपनी नीतियों के लागू करने में अड़चन आया। अधिकांश मौकों पर मुसलिम लीग केवल यह दिखाने का असफल प्रयास करती रही कि मुसलमानों का वास्तविक रहनुमा मुस्लिम लीग है, कांग्रेस नहीं। इस प्रकार अंतरिम सरकार में रहते हुए भी मुस्लिम लीग तोड़फोड़ की राजनीति करती रही। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के नेताओं को यह लगने लगा कि विभाजन ही अंतिम रास्ता बचा है।

उपरोक्त घटनाओं का यदि हम विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने देश को विभाजित होने के प्रयासों को रोकने का हर संभव प्रयास किया, मुस्लिम लीग को सरकार में जगह दी सिर्फ इसलिए कि पाकिस्तान का राग अलापना ये छोड़ दें। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और मजबूरन उसे देश विभाजन को स्वीकार करना पड़ा।

Thursday, 19 June 2025

सम्राट अशोक के जनहित के कार्य

 चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित मौर्य वंश के तीसरे सम्राट के रूप में अशोक की गिनती एक ऐसे महान भारतीय सम्राट के रूप में की जाती है जिन्होंने लगभग 268 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व के बीच शासन किया। अपने दादा चन्द्रगुप्त मौर्य एवं पिता बिंदुसार की विरासत को बढ़ाते हुए अपने शासनकाल में इसे एक नई ऊँचाई (चरमोत्कर्ष) तक पहुंचाया। उस दौरान अशोक के राज्य को ‘मगध साम्राज्य’ के नाम से जाना जाता था। अशोक ने अपने कुशल नेतृत्व से भगत साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बांग्लादेश तक, उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में चोल राज्य तक किया।

अशोक के शासनकाल को राजनीतिक एकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ उत्तम प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक, सांस्कृतिक विकास के लिए भी जाना जाता है। अपने 36 वर्ष के शासन के दौरान लगभग संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। शुरुआत में यह विस्तार जहाँ अपने बाहुबल के दम पर, तो वहीं बाद में अहिंसा और करुणा के दम पर। सम्राट अशोक आपकी प्रशंसा उनके साम्राज्य विस्तार कौशल से कहीं ज्यादा उनके न्यायोचित कानून व्यवस्था, उत्तम प्रशासनिक व्यवस्था व जनहित कार्यों के लिए की जाती है। उनके कार्य आज भी अनुकरणीय हैं –

भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग स्थान से प्राप्त अभिलेख, शिलालेखों से पता चलता है कि उन्होंने लोगों को नैतिकता और सदाचार का पालन करने के लिए प्रेरित किया। सत्य, अहिंसा, करुणा आदि महत्वपूर्ण मूल्यों को बढ़ावा दिया, गरीबों तथा असहायों की सहायता करने के लिए योजनाएं बनाए, समाज में एकता और सौहार्द को बढ़ावा दिया। अलग-अलग अवसरों पर की जाने वाली जानवरों की हत्या पर रोक लगाया। साथ ही उन पशुओं के लिए चिकित्सा सुविधाएं भी शुरू की। अपने राज्य में न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की जो निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से निर्णय देते थे। न्याय सभी वर्गों के लिये समान होता था चाहे वह किसी भी वर्ग या जाति का हो। अपने साम्राज्य के लोगों के जीवन को सुधारने और उनकी भलाई के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए - मनुष्य तथा जानवरों के लिए चिकित्सा सुविधाएँ स्थापित किया। उनके लिए अस्पताल बनवाए, चिकित्सा सेवाओं को बढ़ावा दिया। सड़कों तथा कई नवीन मार्गों का निर्माण करवाया जिससे व्यापार व्यवस्था सुदृढ़ हुई, लोगों की सुविधा के लिए उन मार्गों पर विश्राम गृह तथा पेड़ों की छाया के लिए पेड़ लगवाए। सिंचाई तथा पेयजल की सुविधा के लिए नहरों तथा जलाशयों का निर्माण करवाया।

जिन मूल्यों को अपनाने और उनके साथ जीने की बात अशोक करते हैं, उससे पहले उन्होंने खुद अपनाया, उनके साथ जिया फिर लोगों को भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया। एक कट्टर हिंसक शासक से एक अहिंसा का समर्थक बनने का सफर आकस्मिक नहीं था। कलिंग (वर्तमान में उड़ीसा राज्य में स्थित) के युद्ध में सम्राट अशोक की जीत हुई, लेकिन इस युद्ध में हुई हिंसा और रक्तपात नहीं उन्हें प्रभावित किया। तत्पश्चात उन्होंने अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित बौद्ध धर्म अपना लिया और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए बौद्ध धर्म को अपने सूझबूझ से भारत के साथ-साथ श्रीलंका तक फैलाने का काम किया।

सम्राट अशोक के कार्यों का गहराई से विश्लेषण करें तो उनके कार्य आज भी अनुकरणीय हैं।

Sunday, 12 January 2025

रामकृष्णा परमहंस का जीवन दर्शन

दक्षिणेश्वर के परमहंस के नाम से विश्वविख्यात रामकृष्णा परमहंस की गणना आधुनिक भारत के सर्वप्रमुख सन्यासियों में की जाती है। उनकी महानता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा 1915 में गांधीजी को महात्मा शब्द से संबोधित करने के दो दसक पूर्व ही संस्कृत के महान विद्वान फादर मैक्स मूलर ने 1896 में अपने लिखे एक लेख में उन्हें महात्मा कहकर संबोधित करते हैं (A real Mahatma)[i]   

रामकृष्ण परमहंस देवी काली के एक समर्पित भक्त थे, जिनका जन्म 20 फरवरी 1833 ई. को हुगली जिले के कमरपुरकर गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम गदाधर था। उनके बड़े भाई कलकत्ता के दक्षिणेश्वर में पंडिताई का काम करते थे। दक्षिणेस्वर में ही एक धनाद्य महिला ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। उस मंदिर के लिए पुजारी की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी उस महिला ने गदाधर के बड़े भाई को सौंपी। उन्होंने अपने भाई (गदाधर) को समझाकर उस मंदिर का पुजारी बना दिया। यहीं से गदाधर के जीवन में भक्ति-भाव अपने चरम की ओर जाने लगे। नियमित पूजा-पाठ के साथ-साथ वे चिंतन-मनन की ओर भी अग्रसर होने लगे। उनके मन में माता काली के दर्शन की आकांक्षा दिनों दिन बढ़ने लगी।

काली माता के दर्शन के लिए उनकी व्याकुलता चरम पर थी। कहा जाता है कि माता के दर्शन न होने से वे घोर निराश हो गए थे, एक दिन मंदिर में माता के खड़ग से अपना सिर काटने का जब प्रयास किया तो एकाएक माँ काली ने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए। दर्शन के पश्चात उनकी स्थिति ऐसी हो गयी कि पल-पल में ही वे गंभीर समाधि में चले जाते थे। गदाधर (रामकृष्ण) को इस अवस्था से बाहर निकालने के लिए उनका विवाह कर दिया गया। ऐसा कहा जाता है कि विवाह के पश्चात भी रामकृष्णा परमहंस ने अपनी पत्नी को माता तुल्य ही माना और ब्रह्मचर्य पर विजय प्राप्त किया।

चिंतन-मनन की प्रवृत्ति ने उन्हें इस्लाम की ओर भी आकर्षित किया। इस्लाम धर्म के अनुभव जानने के लिए वे मुस्लिम भी बन गए। उनका कहना था कि किसी को यदि जानना है तो गहराई में समर्पण से कूद जाओ। मुसलमान बनकर घोर साधना करने के पश्चात उन्होंने घोषणा की - इस्लाम धर्म वेदांत के बहुत समीप है’। 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त ग्रंथ

राजस्वी एम आई, ‘विश्वगुरु विवेकानंद’ फिंगरप्रिंट प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019

Muller F Max ‘Ramkrishna: His life and sayings’ Niyogi books, new Delhi, 2019



[i] Muller F Max ‘Ramkrishna: his life and sayings’ Niyogi books, new Delhi, 2019, page no 11


स्वामी विवेकानंद और आज के सन्यासी

 “महाराज, मैं आपको अपनी चिलम नहीं दे सकता”। वह बोला।

“भाई? स्वामी जी ने चौंककर कहा।

“ क्योंकि मैं जाति का भंगी (मेहतर) हूँ। आप कुलीन वंश के सन्यासी और ... “।

स्वामी जी का हाथ स्वयं ही पीछे हट गया और वे अपने रास्ते पर बढ़ चले। अभी वे 10 कदम ही चले थे कि मस्तिष्क में विस्फोट सा हुआ। ‘जिसे जाति कुल और धन का अभिमान हो, वह कभी सन्यासी नहीं हो सकता’। परमहंस के शब्द जैसे उन्हीं के स्वर में चेतना से टकरा रहे थे। ‘यह महीने क्या किया! जाति का क्यों अभिमान तो मुझमें शेष रह गया, तभी तो मैंने उसे अछूत की चिलम न पकड़ी। मेरा ज्ञान और गुरु का उपदेश मुझे कैसे विस्मृत हो गया? ठहर आत्माभिमान! अभी तुझे ठीक करता हूँ’। स्वामीजी तत्काल उस मेहता के पास पहुंचे और उसके पास बैठकर बड़े आराम से चिलम पी और आत्माभिमान का दमन किया।

राजस्वी एम. आई ‘विश्वगुरु विवेकानंद’ फिंगरप्रिंट प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019 को पढ़ते हुए एहसास हुआ कि आज स्वामी विवेकानंद को आदर्श मानने वाले लगभग सभी सन्यासी आज के समय में भयानक जातीय कुंठा से ग्रसित मिलेंगे, जो किसी तथाकथित अस्पृश्य व्यक्ति को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते बर्दास्त नहीं कर सकते, ये सभी यदि स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के विचारों से प्रेरणा ले तो वह दिन दूर नहीं जब ‘अस्पृश्यता’ को हम ‘सती प्रथा’ की तरह इतिहास की किताबों में पढ़ा करेंगे।   

राष्ट्रीय युवा दिवस पर देश के युवा भी इस प्रेरणा को ग्रहण करें।

Saturday, 23 November 2024

पुड्डुचेरी (Puducherry) : तीन राज्यों में फैला केंद्रशासित प्रदेश

महान भारतीय दार्शनिक अरविंद घोष की नगरी के नाम से प्रसिद्ध पुड्डुचेरी (20 सितंबर 2006 तक पांडिचेरी) हमारे देश भारत का एक ऐसा केंद्रशासित प्रदेश है जिसका विस्तार भारत के पूर्वी समुद्र तट (मलाबार तट) के साथ-साथ पश्चिमी तट (कोरोमंडल तट) पर भी है। इसे यूं कहें कि यह केंद्र शासित प्रदेश हमारे देश के तीन अलग-अलग राज्यों में विस्तृत है। इन अलग-अलग राज्यों में इसके भूभाग (संबंधित जिले) स्थित होने के कारण ही इसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया है।[i]

ऐसा क्यों?

दरअसल ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र होने के पश्चात अलग-अलग भारतीय राज्यों की सीमा से लगे चार फ्रांसीसी बस्तियां (उपनिवेश) थी – पुड्डुचेरी एवं कराइकल (दोनों तमिलनाडु से सटी), यनम (आंध्र प्रदेश की सीमा से लगी) और माहे (केरल की सीमा से लगी)। हालांकि एक अन्य उपनिवेश पश्चिम बंगाल स्थित चंदननगर भी था जिसे जून 1949 ई. में जनमत संग्रह कराने के पश्चात मई 1950 ई. में फ्रांसीसी उसका विलय भारत में करने को तैयार होना पड़ा। लेकिन शेष 4 उपनिवेश फ्रांस छोड़ने को तैयार नहीं था। ऐसे में पुड्डुचेरी के फ्रांसीसी कपड़ा मिलों में भारतीय मजदूरों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले कम्युनिष्ट पार्टी के नेता वी. सुबब्ईया के ‘डायरेक्ट एक्शन’ और भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के फ्रांसीसी सरकार से लगातार बनते दवाब से विवश होकर 13 अक्टूबर 1954 को तत्कालीन फ्रांसीसी प्रधानमंत्री पियरे मेन्डेस फ़्रांसे को झुकना पड़ा और पॉन्डिचेरी के भारत में विलय करने के लिए मजबूर होना पड़ा।[ii] इसके पश्चात दिनांक 1 नवंबर 1954 को पांडीचेरी, कराइकल, यमन, माहे जैसे फ्रांसीसी उपनिवेशों को भारत में विलय कर दिया गया।     

प्राचीन काल से ही पल्लव, चोल, विजयनगर साम्राज्य, बीजापुर सल्तनत द्वारा शासित रहने के पश्चात 1674 ई. से यह एतिहासिक व्यापारिक नगर फ़्रांसीसियों के अधिकार क्षेत्र में रही। सूरत से अपने व्यापारिक सफर की शुरुआत करने के पश्चात 1674 ई. में फ्रांसीसी गवर्नर फ्रांसिस मार्टिन ने पुड्डुचेरी (तत्कालीन पांडीचेरी) को एक फ्रांसीसी बस्ती/उपनिवेश के रूप में विकसित किया। 1673 ई. में बीजापुर के सुल्तान के सूबेदार शेर खान लोदी से उन्हें पांडीचेरी एक व्यापारिक केंद्र स्थापित करने के लिए मिला।[iii] इसी क्रम में 1725 ई. में माहे, 1731 ई. में यनम एवं 1739 ई. में कराइकल फ्रांसीसी उपनिवेश/बस्ती के रूप में विकसित किए गए।[iv] थोड़े-थोड़े समय के लिए ये ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार क्षेत्र में भी रहे। लेकिन अलग-अलग समय पर हुए समझौतों से ये नगर केवल व्यापारिक गतिविधियों के लिए फ़्रांसीसियों को वापस मिलता रहा। 280 वर्षों तक फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा शासित एवं विकसित इन फ्रांसीसी उपनिवेशों को 1 नवंबर 1954 को भारतीय संघ में मिलाया गया।[v] इसी क्रम में फ्रांसीसी संसद द्वारा भारत के साथ संधि की पुष्टि मिलने के बाद भारत सरकार के संघ-राज्य क्षेत्र शासन अधिनियम के तहत 16 अगस्त 1962 ई. में पुड्डुचेरी को केंद्रशासित प्रदेश घोषित किया गया। चूंकि पुड्डुचेरी इनमें से सबसे बड़ी बस्ती थी, इसलिए इस नवनिर्मित राज्य के इस नगर को इसकी राजधानी बनाया गया। उपरोक्त उल्लेखित ये 4 नगर (पुड्डुचेरी, कराइकल, यनम और माहे) ही इनके 4 जिले हैं।  

  

 


Friday, 11 August 2023

15 अगस्त के लिए भाषण

आदरणीय ...

आज 15 अगस्त 2023 को हम अपने देश के आजादी की 77वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। ज्ञात हो कि आज से 77 वर्ष पूर्व आज के दिन यानी 15 अगस्त 1947 को हमारा देश ब्रिटिश प्रभुत्व से आजाद हुआ। आज ही के दिन विश्व के मानचित्र पर हमारे देश का उदय एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हुआ। इससे पूर्व हमारे देश पर यूरोपीय देश इंग्लैंड का शासन था। इंग्लैंड के निवासी जिन्हें अंग्रेज का आ जाता था, हमारे देश में व्यापारी के रूप में दाखिल हुए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी के रूप में व्यापार करते हुए यहां के स्थानीय छोटे-छोटे राज्यों से अधिक से अधिक सुविधाएं पाने के लिए उनके संपर्क में रहते हुए, उनके आपसी फूट के कारण यहां के राजनीतिक क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करने लगे और 1757 से 1857 तक एक शक्ति के रूप में संपूर्ण भारत पर अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया। 1857 से लेकर 1947 तक हमारे देश के समस्त संसाधनों का अंग्रेजों ने दोहन किया। यहां के संसाधनों को लूट कर केवल अपने देश का विकास किया। लूटने के साथ-साथ हमारे देश के लोगों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार करते थे। हमारे देश के लोगों ने उनकी इस लूट एवं अपमानजनक व्यवहार का विरोध किया। और उन्होंने यह महसूस किया कि जब तक इस देश पर हमारा शासन स्थापित नहीं हो जाता तब तक इस लूट एवं अपमान से आजादी नहीं मिल सकती। खुदीराम बोस, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सुखदेव-भगत सिंह- राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल आदि देशभक्त क्रांतिकारियों के सम्मिलित प्रयास से 15 अगस्त 1947 को इस लूट एवं अपमानजनक व्यवहार से देशवासियों को आजादी मिली। ब्रिटिश शासन के स्थान पर हमारे देश के लोगों अर्थात भारतीयों द्वारा शासन की शुरुआत हुई। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिया।

          ब्रिटिश शासन से भारतीयों को जो सत्ता मिली वह कोई क्षणिक क्रांति का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके लिए हमारे देश के क्रांतिकारियों, शहीदों, राजनेताओं ने 50 वर्षों तक अथक प्रयास किया। अंग्रेजी शासन के विरोध में कई आंदोलन किए, जेल गए, काला पानी की सजा भोगी, हंसते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए, आंदोलन करते हुए अपनी जान का बलिदान दिया, अंग्रेजों से लड़ने के लिए सेना का गठन किया। इनके योगदान कभी भुलाए नहीं जा सकते। इनके योगदान के लिए ही कवि प्रदीप ने यह गीत लिखी है ... ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी। आज 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आइए हम भी 2 मिनट का मौन रखकर उन क्रांतिकारियों, शहीदों के योगदान को सम्मान दें...

Tuesday, 9 May 2023

महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा बौद्ध धर्म में प्रचलित झूठी मान्यताओं पर कटाक्ष

यायावरी साहित्यकार के नाम से प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन की गणना ऐसे महान विद्वानों के साथ किया जाता है जिन्होंने कहानीकार, संस्मरणकार, इतिहासकार के रूप में हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। साहित्य की शायद ही कोई विधा उनसे अछूती रही हो। अपनी लेखनी से जहां इन्होंने हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध किया वहीं यायावरी जीवन के माध्यम से बौद्ध साहित्यों के संरक्षण के लिए इन्हें पूरी दुनिया सम्मानित नज़र से देखती है। इस योगदान के लिए प्रेमचंद मई 1933 में उनकी प्रशंसा करते हुए में लिखते हैं, राहुल जी कदाचित वह पहले बौद्ध सन्यासी हैं, जिन्होंने तीन वर्ष तिब्बत में रहकर पालि का ज्ञान प्राप्त किया और वहाँ से बौद्ध साहित्य की लगभग 10 हज़ार प्राचीन पुस्तकें लेकर भारत लौटे[1] ज्ञात हो कि बौद्ध धर्म पर शोध के दौरान उन्होंने भारत, तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका, चीन, जापान, ईरान, रूस, इंग्लैंड आदि देशों की यात्रा किया, वहां के इतिहास, भूगोल, संस्कृति को जाना समझा, वहाँ के साहित्यों को भारत लाया, इसका अध्ययन किया एवं इसके संबंध में अपने यात्रा वृतांत में लेखबद्ध किया। इन साहित्यों को भारत लाने के लिए उन्होंने तिब्बत व अन्य देशों के उन दुर्गम स्थानों की भी यात्रा की जहां पैर रखने का कोई भी साहस नहीं कर सका था, जहां जाने में लोग भय खाते थे।[2] अलग-अलग देशों से लाए इन साहित्यों को पटना संग्रहालय में देखा जा सकता है। 9 अप्रैल 1893 ई. को पंदहा गाँव आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे राहुल सांकृत्यायन जी को बचपन में केदारनाथ पांडे के नाम से जाना जाता था। यायावर जीवन जीते हुए 1930 में श्रीलंका यात्रा के दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तब उनका नाम 'राहुल' हो गया। साथ ही संकृति गोत्र से संबंधित होने के कारण अपने नाम के अंत में 'सांकृत्यायन उपनाम लगाते थे। इससे पूर्व कुछ दिनों तक बाबा रामउदार के नाम से परसा (बिहार) स्थित एक मठ के उत्तराधिकारी के रूप में भी कार्य किया। अपने 70 वर्षों के जीवन में उन्होंने 140 प्रकाशित रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक विशिष्ट मुकाम दिया। इसके उप्लक्ष्य में 1958 ई. में उन्हें साहित्य जगत के शिखर पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार से एवं 1963 ई. में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

          राहुल सांकृत्यायन की गिनती साहित्यकार, इतिहासकार के साथ-साथ अपने समय के एक प्रसिद्ध तर्कशास्त्री के रूप में की जाती है। अपने वैज्ञानिक चिंतन एवं तार्किक कौशल का उपयोग करते हुए उन्होंने समाज से अंधविश्वास उन्मूलन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। 1914- 15 ई. के दौरान वे आर्य समाज के संपर्क में रहे जिसके पश्चात समाज में प्रचलित धर्म संबंधी मिथ्या धारणाओं के खंडन करने की प्रवृति उनमें जागृत हुई। वे ईसाई, इस्लाम, यहूदी, बौद्ध के साथ-साथ हिंदू धर्म के अनेक संप्रदायों को झूठा धर्म, वेद एवं विज्ञान के प्रकाश में शीघ्र ही लुप्त हो जाने वाला धर्म समझते थे। वे उपयुक्त तर्क एवं दलील द्वारा प्रतिद्वंदी को अपने रास्ते पर लाने के पक्षपाती थे।[3] अपने कालपी प्रवास के दौरान राहुल सांकृत्यायन द्वारा एक आर्यसमाजी विचारक के रूप में ईसाई पादरियों, एवं सनातन धर्म के विद्वानों से शास्त्रार्थ में भाग लिए जाने का उल्लेख जगदीश प्रसाद बरनवाल राहुल सांकृत्यायन पर लिखे जीवनी में करते हैं।

एक आर्यसमाजी के रूप में राहुल सांकृत्यायन ने हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी काफी गहराई के साथ समझा। बौद्ध धर्म के संपर्क में वे पहली बार तब आए जब उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। 29 अक्टूबर 1922 को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री चुने जाने के पश्चात प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की गया में हुई बैठक में 16 दिसंबर 1922 को शामिल होते हुए यह प्रस्ताव रखा थी बोधगया का महाबोधि मंदिर बौद्धों का है उन्हें वापस मिलना चाहिए। इस घटना के पश्चात उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति एक सहानुभूति पैदा हुई। इसके कुछ दिन पश्चात ही जनवरी 1923 ई. में जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री पद से इस्तीफा देने के पश्चात नेपाल की यात्रा पर वे निकल गए। इस यात्रा के दौरान वे वहां के अनेक बौद्ध स्थल, बौद्ध धर्म गुरु के संपर्क में आए। यात्रा से वापस आने के पश्चात पुनः वे राजनीतिक जीवन में सक्रिय हुए। इसी क्रम में 1925 ई. में उनका परिचय बौद्ध भिक्षु भदंत आनंद कौशल्यायन से हुआ।

बौद्ध धर्म संबंधित अध्ययन के उद्देश्य से तिब्बत यात्रा के दौरान न केवल वहां के बौद्ध सांस्कृतिक-एतिहासिक विरासतों को काफी गहराई से समझने का प्रयास किया बल्कि वहाँ बौद्ध धर्म में व्याप्त झूठी धारणाओं, मान्यताओं जो तार्किकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, पर भी प्रहार किया। 5 अगस्त 1934 को तिब्बत यात्रा के दौरान लिखे एक पत्र में उन्होंने तिब्बत के साथ-साथ अपने देश भारत में भी बौद्ध धर्म में मौजूद झूठे मान्यताओं पर कटाक्ष किया है। अपने यात्रा वृतांत को इस पत्र में लिखते हुए वे कहते हैं 'सभी धर्म स्थान झूठ के अड्डे हैं। शायद उतनी झूठी कथाएं और जगह नहीं मिलेंगे, जितनी धर्म के दरबार में। धर्म वस्तुतः झूठ की आयु को लंबा करने में बड़ा सहायक होता है' तिब्बत के एक स्थान (रे- दिङ लामा से संबंधित) का उल्लेख करते हुए राहुल सांकृत्यायन वहां प्रचलित एक दंतकथा का उल्लेख करते हैं। वह कहते हैं कि रे- दिङ लामा (जिनकी आयु उस दौरान 22 वर्ष की थी) के पैर का एक काले पत्थर पर निशान कांच के भीतर रखा हुआ है। श्रद्धालु भक्तों से कहा जाता है कि बचपन में लामा रिंपो छे ने पैर को महज स्वभाव से पत्थर पर रख दिया था और उस पर यह निशान उतर आया। यदि समंतकूट और नर्मदा नदी की पहाड़ी पर बुद्ध के बड़े-बड़े पद चिन्ह उतर सकते हैं, तो यहां एक अवतारी लामा के छोटे से पद चिन्ह के उतरने में कौन सी असंभव बात हो सकती है’?[4]

राहुल सांकृत्यायन 25 नवंबर 1904 को अपने लिखे एक अन्य पत्र में तिब्बती लामा (ग्य-गर लामा) द्वारा उनके मेजबान रहे एक स्थानीय बूढ़े-बूढ़ी की कांच की मालाओं में जप को और पुण्यदायी बनाने के उद्देश्य से फूँक मारने के प्रकरण पर सवाल उठाते हैं।[5]



[1] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 9  

[2] वही, पृष्ठ सं. 9

[3] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 16

[4] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 23

[5] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 39

 

Tuesday, 21 March 2023

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया? उसी दिन या इस दो महीने के बीच की किसी अन्य तिथि क्यों नहीं?

शालायी बच्चों को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से परिचय कराने, उन मूल्यों के साथ जीने के कौशल विकसित करने के क्रम में बेमेतरा जिले के एक शासकीय उच्च प्राथमिक शाला जाना हुआ। कक्षा छठवीं-आठवीं के बच्चों के साथ होने वाली इस बातचीत के दो चरण थे। पहले चरण में बच्चों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना एवं उनमें उल्लेखित संवैधानिक अवधारणाओं एवं मूल्यों से संबंधित प्रदर्शित कैलेंडर का अवलोकन, अध्ययन करना था, तत्पश्चात मन में उपजे सवालों को एक कागज में लिखना भी था, ताकि दूसरे चरण में कक्षा में बैठकर उनपर बातचीत किया जा सके। बच्चों की ओर से कई प्रकार के सवाल आए। इसी क्रम में एक ऐसा भी सवाल आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सवाल था – हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया”? उस पर्ची पर सवाल पूछने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था, बाद में बच्चों से पूछा भी कि यह सवाल किसकी जिज्ञासा है? लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सवाल की प्रकृति को देखकर ऐसा लगा कि शायद उसी शाला के किसी शिक्षक की ओर से ये सवाल आया हो? यह सोचकर कि इस विषय पर मेरी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, मैंने उस सवाल पर फिर कभी किसी दिन बातचीत करने की बच्चों और शाला के शिक्षकों से सहमति ली। कई प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि नवनिर्मित भारतीय संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक विशिष्ट बात छिपी थी।

          आजाद हिंदुस्तान (भारत) के संचालन हेतु संविधान निर्माण के लिए 9 दिसंबर 1946 ई. में ही भारतीय प्रतिनिधियों से निर्मित कमेटी गठित कर ली गई थी। इस कमेटी ने 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन तक 114 बैठकों में लगातार चर्चा, विमर्श करने के पश्चात इस नवनिर्मित विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंतिम रूप 26 नवंबर 1949 को दिया था। लेकिन कमेटी ने इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि निर्धारित की। इसके पीछे कारण था इस तिथि (26 जनवरी) की विशिष्टता। इस विशिष्टता को समझने के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष पूर्व अर्थात 1929-30 ई. के कुछ घटनाक्रम को समझना पड़ेगा। दिसंबर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन रावी नदी के किनारे लाहौर में हुआ, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। हालांकि प्रारंभ में गांधीजी को इस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया।[i] 1908 ई. से लेकर इस अधिवेशन तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग कर रही थी। इस अधिवेशन के दौरान ही जनवरी 1930 ई. के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि इसी महीने के आखिरी रविवार (26 जनवरी की तिथि) तक ब्रिटिश सरकार यदि भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती है तो भारत खुद को पूरी तरह स्वतंत्र (पूर्ण स्वराज) घोषित कर देगा। अर्थात इस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ने अपना लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज से पूर्ण स्वराज घोषित किया। ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि तक जब इस मांग को नहीं माना तो भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी। इस तिथि को पहली बार देश के अनेक भागों में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।[ii] साथ ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हिंदुस्तान के अलग-अलग भागों के नागरिकों ने शांतिपूर्वक तथा पूर्णनिष्ठा के साथ गांधीजी द्वारा तैयार किए गए पूर्ण स्वराज के शपथ को दुहराते हुए आजादी हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया। 1930 ई. के पश्चात 1947 ई. तक सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन निर्धारित किया। हालांकि उनके द्वारा भी इस कार्य के लिए 15 अगस्त की तिथि चुने जाने के पीछे एक रोचक कारण था। दरअसल 15 अगस्त अंग्रेजों के लिए एक यादगार दिन था। 2 वर्ष पूर्व अर्थात 1945 ई. में 15 अगस्त की तिथि को ही द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के गुट, जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था, के समक्ष जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह एक विशिष्ट दिन था। चूंकि मामला देश की आजादी का था इसलिए भारतीय राजनेताओं को 15 अगस्त 1947 की प्रस्तावित तिथि को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी की तिथि थोड़ी धूमिल पड़ती जा रही थी, क्योंकि इसका स्थान 15 अगस्त की तिथि ने ले लिया था। इस तिथि की महत्ता बरकरार रहे यह सोचकर संविधान निर्माण समिति द्वारा 26 जनवरी 1950 ई. की तिथि को भारतीय संविधान लागू करने की तिथि घोषित की गई।

          यहाँ एक रोचक बात और यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से 1908 ई. से ही जिस डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशिक साम्राज्य) की मांग की थी एवं 1929-30 ई. में जिस पूर्ण स्वराज की बात की थी, दोनों एक साथ पूरी हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि 15 अगस्त 1947 ई. की तिथि को भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से स्वतंत्रता मिली। सर्वोच्च पद वायसराय खत्म हुआ लेकिन एक नए पद गवर्नर जनरल का सृजन हुआ। यह पद ब्रिटिश क्राउन के अधीन होता था। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। वे 1947-48 ई. तक इस पद पर बने रहे। तत्पश्चात चक्रवर्ती राज गोपालाचारी पहले एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। ऐसा इसलिए हुआ कि स्वतंत्रता के समय भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। इसलिए इसके लागू होने के पूर्व अर्थात 25 जनवरी 1950 ई. तक गवर्नर जनरल का पद ही सर्वोच्च पद बना रहा। 26 जनवरी 1950 से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ ही डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ। डोमिनियन स्टेटस से तात्पर्य था - आंतरिक प्रशासन जैसे विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, सैनिक, विदेशी मामले भारतीयों के द्वारा संचालित किए जाएंगे, लेकिन राजा ब्रिटिश साम्राज्य का होगा। इस तरह 26 जनवरी 1950 ई. से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चूंकि इससे पूर्व हमारे देश में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी जिसमें राजा का पद वंशानुगत होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि यही व्यवस्था रहती तो विविध जाति, धर्म, संप्रदाय के मेल से निर्मित नवीन भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं होता। अतः इस व्यवस्था के स्थान पर प्राचीन भारत की ही एक अन्य व्यवस्था गणतन्त्र को चुना गया। राजतंत्र के विपरीत इस व्यवस्था में राजा का पद वंशानुगत न होकर जनता के बीच से चुने जाते थे। इस व्यवस्था में राजा के पद को राष्ट्रपति के नाम से संबोधित किया गया। यही कारण है कि इस तिथि को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को चुना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च संवैधानिक पद था। इससे पूर्व डोमिनियन स्टेटस में गवर्नर जनरल का पद सर्वोच्च होता था।

          26 जनवरी 1950 से इस पद के अस्तित्व में आते ही हमारे देश में गणतंत्रात्मक व्यवस्था लागू हुआ, ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ।



[ii] https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/our-constitution-implemented-on-26-january-know-everything-pcup/834996

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त अन्य स्त्रोत

गुहा रामचंद्र (2012) भारत गांधी के बाद: दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का इतिहासपेंग्विन बुक्स, गुरूग्राम