Monday, 26 January 2026

उच्च शिक्षा में समानता की लड़ाई: क्यों खटक रहे हैं UGC Equity Regulations 2026?

जाति, धर्म, वर्ग, जेंडर, रंग, भाषा, संस्कृति आदि के नाम पर भेदभाव हमारे वैश्विक समाज की एक कड़वी सच्चाई है। ईश्वर/अल्लाह/भगवान की नज़र में सभी मनुष्यों को सामान मानने वाले लोग/समाज सैद्धांतिक रूप से भले ही कितना भी बड़े-बड़े दावे करे कि हमारा समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त है लेकिन निष्पक्ष रूप से उस समाज का अवलोकन करने पर यह बात हवा-हवाई लगेगी। यह भेदभाव तब और बढ़ जाता है जब उस क्षेत्र में दो अलग-अलग प्रकार के मानव समूह की मौजूदगी हो, दोनों के रंग रूप अलग-अलग हो। दोनों में सांस्कृतिक विविधताएँ हों। वहाँ आपको रंग/वर्ग (अमीर/गरीब) मूल निवासी/विदेशी, संस्कृति आदि के आधार पर भेदभाव देखने को मिलेगा। उदाहरण के रूप में अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका में श्वेत एवं अश्वेत नागरिकों के बीच भेदभाव देखा जा सकता है।  

हमारा देश भारत भी इस भेदभाव/छुआछूत की बिमारी से अछूता नहीं है। सैद्धांतिक रूप से भले ही हमारा देश हर एक नागरिक को समानता का अधिकार (सभी नागरिक एक समान है) देता है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। विवाह में घोड़ी चढ़ने, मूंछ रखने, जनेऊ पहनने आदि से संबंधित समाचार पत्रों में छपने वाले न्यूज इस बात की पोल खोलते नजर आएँगे कि हमारे देश में सभी नागरिक एक समान है। इस वास्तविकता के पीछे आखिर कौन जिम्मेदार है? सरकार या समाज के लोग? सरकार की यदि हम बात करें तो हमारी सरकार के सभी अंग जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि भलिभांति अवगत है कि सभी नागरिक शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से अभी एक समान नहीं है, सभी को समानता की एक पंक्ति में लाने के लिए उन समाज के लोगों को अनेक प्रकार के लोककल्याणकारी योजनाएं, सेवा क्षेत्र की नौकरियों में ला रही है। संवैधानिक संस्थाओं को समावेशी बनाने की हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में पंचायत व्यवस्था में आरक्षण द्वारा राजनीति में समावेशन, शिक्षा एवं सेवा के क्षेत्र में आरक्षण के प्रावधान से समाज में समावेशन के सफल प्रयास को समझा जा सकता है।

समानता का अधिकार मिले 7 दशक (77 वर्ष) हो जाने के बाद भी हमारे देश के नागरिक कितना एक दूसरे की नज़र में समान हैं, इस बात की झलक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की एक विनियम ‘UGC Equity Regulations 2026’ में देखने को मिला। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी 2026 से भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए नियम लागू किये हैं जिसका उद्देश्य है - उच्च शिक्षा में जाति, धर्म, दिव्यंगता आदि के आधार पर हो रहे भेदभाव को रोकना/खत्म करना (समता का संवर्द्धन)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित समता एवं समावेशन को ध्यान में रखते हुए सभी जाति, धर्म, वर्ग, के छात्र-छात्राओं/संकाय सदस्य के हित को ध्यान में रखते हुए इस नियम को लाया गया।

इन नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान (कॉलेज/यूनिवर्सिटी) को एक Equal Opportunity Centre (EOC)/समान अवसर केंद्र बनाना अनिवार्य होगा। यह सेंटर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, दिव्यांग वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को दर्ज करेगा, काउंसलिंग करेगा, जागरूकता फैलाएगा, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की सिफारिश भी करेगा। अपने कैंपस में सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित भी करेगा। 2012 से ही उच्च शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार के सेंटर स्थापित हैं। उन्हें ही संसोधित कर सक्रिय किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त हर संस्थान में समान अवसर केंद्र के अंतर्गत ही एक Equity Committee/समता समिति बनाई जाएगी, जिसमें संस्था प्रमुख, शिक्षक, संस्थान का ही एक गैर शिक्षकीय कर्मचारी, दो छात्र प्रतिनिधि, व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक समाज के दो प्रतिनिधि आदि शामिल होंगे। इस समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा। सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा। यह कमेटी भेदभाव के शिकायत की जांच करेगा, 30 से 60 दिनों में फैसला देगा तत्पश्चात इसकी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगा। संस्था यदि इस संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही करती है या मामले को नजरंदाज करती है तो यूजीसी उस पर कार्रवाई कर सकती है, पाबंदियाँ लगा सकती है। समता समिति उन कार्यों की एक सूची भी तैयार और प्रसारित करेगी जो भेदभाव की श्रेणी में आते हैं। इसके लिए भेदभाव को व्यापक तरीके से परिभाषित किया गया है। इन बिंदुओं को ‘भेदभाव’ के दायरे में रखा गया है –

·       जाति/धर्म/लिंग के आधार पर अपमान या अनुचित व्यवहार

·       मौखिक या मानसिक उत्पीड़न

समता समिति शिकायतकर्ता की सुरक्षा का भी ध्यान रखेगी। इसके लिए वह भेदभाव की सूचना देने वाले हितधारक की पहचान उसके अनुरोध पर गोपनीय रखेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगी कि उसे किसी भी प्रकार से डराया धमकाया नहीं जाए। यदि ऐसा होता है तो यूजीसी उस संबंधित संस्थान पर कार्रवाई कर सकता है। जैसे - यूजीसी संचालित योजनाओं में संस्था के भाग लेने से वंचित करना, कोर्स की मान्यता रद्द करना, उच्च शिक्षा संस्थान के लिस्ट से संस्था को हटाना, आदि।

यूजीसी द्वारा लाए गए इन 8 पृष्ठों वाले नियमों से सवर्ण जाति के लोग/छात्र/छात्राएं/शिक्षक जहाँ चिंतित हैं वहीं आरक्षित वर्ग के लोग हर्षित हैं। आरक्षित वर्ग के लोग इस कदम को सामाजिक भेदभाव खत्म करने/रोकने की दिशा में एक बढ़िया कदम मान रहे हैं। आरक्षित वर्गों के कॉलेज एवं विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राएँ विशेष रूप से हर्षित हैं क्योंकि वे कॉलेज, विश्वविद्यालय में जाति, धर्म, जेन्डर के नाम पर होने वाले भेदभाव की वास्तविकता से भली भाँति परिचित हैं। इस तरह के भेदभाव में सहपाठियों के साथ-साथ शिक्षक, गैर शिक्षकीय कर्मचारी से भी प्रताड़ित हो रहे होते हैं जो उनके उपनाम देख कर उनके साथ व्यवहार में परिवर्तन लाते हैं। सोशल मीडिया से यह समझ आया कि बहुत से सवर्ण बुद्धिजीवी यूजीसी के इस स्टेप की सराहना कर रहे हैं क्योंकि वे समाज में जाति आधारित भेदभाव की वास्तविकता को जानते समझते हैं।

सवर्ण जाति के लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि

·       आरक्षित वर्ग के छात्र/छात्रा इस नियम का गलत उपयोग कर उनकी/उनके बच्चों की छवि, मानसिक स्वास्थ्य और कैरियर का नुकसान कर सकते हैं।

·       उनके बीच हमेशा एक डर का माहौल रहेगा।

·       एक दूसरे के बीच स्वस्थ संवाद की चुनौती रहेगी।

इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस नियम व्यवस्था से दोनों वर्गो के बीच स्वस्थ संवाद की प्रक्रिया बाधित होगी, थोड़ी कमी आएगी। लेकिन इस दौरान सबसे अच्छी बात यह रहेगी कि  उनके आपसी बातचीत में सामन्ती मानसिकता/जातीय दंभ वाले व्यवहार में कमी आएगी। आरक्षित वर्गों के युवाओं को नौकरियों के साक्षात्कार में जिस तरह से Not found suitable (NFS) बता कर आगे बढ़ने की दौड़ से किनारा कर दिया जाता था, उस पर विराम लगाया जा सकेगा। ऐसे भ्रष्ट आचरण करने वाले समता समिति से डरेंगे और भ्रष्टाचार करने से पहले 10 बार सोचेंगे। जाति देखकर Not found suitable (NFS) करने वाले बेनकाब हो रहे होंगे।

इस आठ पृष्ठों वाले नियमों को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि सवर्णों का इससे डरना बेवजह है। यूजीसी के इस कदम का उद्देश्य देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक बहिष्करण को खत्म कर सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है, ताकि सभी नागरिको में एक समतामूलक समाज निर्माण की भावना विकसित हो और 21 वीं सदी के नागरिक के रूप में हम खुद को और आने वाली पीढ़ी को विकसित करने की दिशा में अग्रसर हो। किसी पर बेवजह भेदभाव के आरोप लगाकर उसका नुकसान करना इस नियम का बिलकुल भी उद्देश्य नहीं है।

यूजीसी के इस प्रावधान की सार्थकता को POSH (Prevention of Sexual Harassment) के नियमों से समझा जा सकता है। 2013 में लाए गए इस कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि ‘कार्यस्थल (स्कूल, कार्यालय, कॉलेज, अस्पताल आदि) पर महिलाएं सुरक्षित महसूस कर बेफिक्र होकर कार्य कर सकें’। इस नियम में ‘सेक्शुअल हैरेसमेंट’ को इतनी गहराई से परिभाषित किया गया है कि इसके समक्ष ‘भेदभाव’ की परिभाषा सतही लगेगी। इस कानून के अनुसार निम्न व्यवहार को ‘Sexual Harassment’ के दायरे में रखा गया –

·       अनचाहा शारीरिक संपर्क या निजी दायरे का उल्लंघन,

·       यौन संबंधों या यौन सेवाओं की मांग करना,

·       बुरी नजर या अनुचित ढंग से देखना,

·       जबरन किए गए सेक्शुअल आचरण, यौन संबंध या हमले,

·       अभद्र प्रदर्शन या यौनिक तौर पर प्रकट हाव-भाव,

·       अनुचित, अंतरंग, सेक्सुल या सेक्सिस्ट बातचीत: ऑनलाइन या ऑफलाइन,

·       अनचाही फ्लर्टिंग, रोमैन्टिक या यौनिक पेशकश या गिफ्ट, आमंत्रण जैसे हाव-भाव,

·       स्त्री के शरीर, कपड़ों, या सेक्शुअल रुझान पर टिप्पणी या सलाह,

जिन कार्यस्थलों/कार्यालयों में इन नियमों के पालन कड़ाई से कराए जाते हैं वहाँ सभी जेंडर (स्त्री, पुरुष, थर्ड जेंडर) के बीच स्वस्थ संवाद की कोई चुनौती ही नहीं होती, बल्कि यथा संभव स्वस्थ संवाद ही होता है। स्वस्थ संवाद के कारण दोनों पक्षों के बीच किसी भी प्रकार के अवांछित/अनुचित व्यवहार भी नहीं होता है। सभी अपने कार्य में लगे रहते हैं। हाँ ! थोड़ा डर का माहौल भी जरूर होता है लेकिन यह डर सहकर्मी स्त्रियों के साथ अनुचित व्यवहार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा होता है। धीरे-धीरे सभी इस माहौल में रहने के आदि हो जाते हैं और इस बात को भी बेहतर तरीके से समझने लगते हैं कि इस प्रकार के तथाकथित कड़े नियम-कानून की हमारे समाज में आवश्यकता क्यों है?  

UGC Equity Regulations 2026’ Prevention of Sexual Harassment act 2013 जैसे नियम कानून हमारे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को और बेहतर करने के लिए ही बनाए जाते हैं। ऐसे में अच्छे नियम-कानून का विरोध करने, इसे वापस लेने की मांग, को किसी भी तरीके से उचित नहीं ठहराया जा सकता। ये सभी प्रावधान हमारे देश के नागरिकों को ही संवैधानिक मूल्यों को समझने, इस अनुसार आचरण करने का समय विकसित कर रहा होगा। फिर भी किसी वर्ग विशेष को यदि इसके अत्यधिक दुरुपयोग होने की संभावना लगती है तो यूजीसी को इसके नियमों को थोड़ा और व्यवस्थित करना चाहिए। हालांकि समता समिति में शामिल सदस्यों को इतना भी कमतर आंकना उपयुक्त नहीं माना जाना चाहिए। 

Saturday, 17 January 2026

मूर्तियों के चक्कर लगाता कुत्ता : भक्ति या भीतर की बेचैनी?

राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 हमें अपने आने वाली पीढ़ी में 21 वीं सदी के कौशल विकसित कर देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने की बात करती है। उनमें आलोचनात्मक चिंतन करने के कौशल विकसित करने को प्रयासरत हैं। यहाँ आलोचनात्मक चिंतन से तात्पर्य है - भावनाओं में बहकर प्रभावित हुए बिना किसी भी विचार, घटना को तर्क, प्रमाण और विवेक के आधार पर गहराई से सोच समझकर परखना फिर उसे स्वीकार करना। सरल शब्दों में यदि इसे समझा जाए तो आलोचनात्मक चिंतन सोचने की वह कला है जिसमे हम हर बात को तर्क और प्रमाण के आधार पर परखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीती 2020 प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाहता है कि हमारे देश के नागरिको में आलोचनात्मक चिंतन का कौशल नगण्य/नहीं के बराबर है। इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं

बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव नंदपुर स्थित मंदिर में एक कुत्ता वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करने लगता है। कई मीडिया रिपोर्टस स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर बताते हैं कि यह कुत्ता 12 जनवरी को मंदिर में आया था और लगातार 36 घंटे तक बिना कुछ खाये पिए हनुमान जी की मूर्ति की परिक्रमा करता रहा। इसके बाद कुछ देर के लिए यह कुत्ता बाहर चला गया। फिर वापस 14 जनवरी को यह मंदिर में आता है और माँ दुर्गा की परिक्रमा करने लगता है। इसके बाद वह कुत्ता एक स्थान पर स्थिर बैठा हुआ है। लोग उस कुत्ते को हनुमान जी के एक बहुत बड़े भक्त मानकर उसके ऊपर फूल मालाएं चढ़ाकर उनकी पूजा करना शुरू कर दिए हैं।   

किसी भी व्यक्ति/जीव की पूजा करना, उस पर फूल, माला चढ़ाना गलत नहीं है। अक्सर किसी के सामान्य से हटकर किये गए कार्य को सम्मान देने के लिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह सम्मान भी तभी जायज है जब उस सामान्य से हटकर किये गए कार्य को करने के लिए किसी ने लंबे समय तक अथक मेहनत कर कोई मिसाल कायम किया हो तो। यहाँ बात जीस कुत्ते की हो रही है, जिसे लोग हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त समझकर फूल माला चढ़ाकर पूजा करने लग जा रहे हैं, इससे पूर्व इसके द्वारा कभी भी हनुमान जी की परिक्रमा करने का दावा नहीं किया गया। क्योंकि कुत्ता भी जो कुछ भी कर रहा है उसके पीछे भक्ति नहीं एक मानसिक विकृति है। पशु चिकित्सक इस मानसिक विकृति को अच्छी तरह समझते हैं।  

आलोचनात्मक चिंतन कौशल का उपयोग करते हुए मैंने जानवरों के ऐसे व्यवहार का थोड़ा अध्ययन किया तो पाया कि जैसे उम्र बढ़ने के साथ इंसान के दिमाग में कई प्रकार की विकृतियाँ जैसे अल्जाइमर आने लगती है। जिसके कारण इंसान का व्यवहार बदल जाता है। इसी प्रकार जानवरों में भी इस प्रकार की विकृति उम्र के साथ आती है। कुत्तों में भी उम्र बढ़ने के साथ एक बिमारी देखने को मिलती है। जिसे Dog Dementia के नाम से जाना जाता है। वैसे कुत्तों की औसत आयु 10 से 12 वर्ष होती है ऐसे में 8-10 वर्ष की अवस्था के दौरान उनमें यह बिमारी देखने को मिल सकती है। इस बिमारी के कारण वे अजीबोगरीब व्यवहार करने लगते हैं। जैसे -

·       उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है, परिचित लोगों को भी नहीं पहचान पाते हैं।

·       बिना वजह रात को लगातार भौंकते हैं।

·       उदासी, चिड़चिड़ापन से ग्रसित हो जाते हैं।

पहले हनुमान जी, फिर दुर्गा जी की परिक्रमा कर उदासी की अवस्था में बैठे इस कुत्ते के साथ भी संभवतः यही समस्या हो सकती है। पशु चिकित्सक इसकी बेहतर जांच कर कुत्ते को सुकून भरा जीवन दे सकते हैं। इस अंधविश्वास में जीते हुए कि यह कुत्ता भगवान का भक्त है, हम उसकी पूजा अर्चना कर उसके साथ ज्यादती करें, इससे अच्छा उसे पशु चिकित्सक को दिखाना ज्यादा आवश्यक लगना चाहिए।

इस घटना से मेरी एक और भ्रांति भी दूर हुई। रात को कई बार बेवजह कुत्तों को भौंकते हुए देखा सुना है। अन्य लोगों के साथ-साथ मुझे भी लगता था कि कुत्तों को आत्माएं दिखती है इस कारण से वे उस दिशा में मुंहकर भौंकते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि ‘यहाँ कोई है’। आप समझ आया कि कोई कुत्ता यदि रात को बेवजह भौंक रहा है तो इसका अर्थ है – वह कुत्ता Dog Dementia बिमारी की चपेट में है न कि उसे कोई आत्मा दिख रही है।

याद रखें आलोचनात्मक चिंतन ही वह कौशल है जो हमें अंधविश्वास से मुक्त कर सकती है।

Saturday, 3 January 2026

आईपीएल में बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद: असली मुद्दा या ध्यान भटकाने की चाल?

पिछले कुछ दिनों से राजनेता से लेकर कई कथा वाचक जैसे देवकीनंदन, रामभद्राचार्य आदि बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान पर अलग-अलग सभाओं, मीडिया बाइट्स देने के दौरान भड़कते नजर आए। वे उन्हें ‘गद्दार’ से लेकर कई तरह के अपमानजनक उपमाओं से नवाज़ रहे हैं। ऐसा कहने के पीछे उनके पास कोई ठोस आधार नहीं है। उनको भड़काने का काम कई मीडिया चैनल से लेकर न्यूज एजेंसी कर रही है। ये भड़कने-भड़काने का खेल शाहरुख खान के किसी फ़िल्म को लेकर नहीं था बल्कि शाहरुख खान की मालिकता वाली टीम ‘कोलकाता नाइट राइडर्स’ (जिसमें उनकी 55% हिस्सेदारी है, बाकी के 45% हिस्सेदारी मेहता ग्रुप के पास है) में बांग्लादेश के खिलाड़ी ‘मुस्ताफिजुर रहमान’ को आईपीएल सीज़न 2026 में अपनी टीम की ओर से खेलने के लिए 9.20 करोड़ में खरीदने के कारण था।

हालांकि यह पहला मौका नहीं था जब बांग्लादेशी क्रिकेटर्स को किसी टीम ने खरीदा था। जिस खिलाड़ी को लेकर विवाद शुरू हुआ है वह इससे पूर्व 2016 में सनराइजर्स हैदराबाद, मुंबई इंडियन्स (2018) और दिल्ली कैपिटल्स (2022, 2023 एवं 2025) चेन्नई सुपर किंग्स (2024) जैसे टीम के साथ भी इससे पूर्व जुड़े रहे हैं। सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ दिनों ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह विरोध ट्रेंड करने लगा, मीडिया इसे प्रमुखता देने लगी? आइए इसे समझने का प्रयास करते हैं।  

 दिनांक 16 दिसंबर 2025 को आईपीएल 2026 के लिए देश विदेश के क्रिकेट खिलाड़ियों की नीलामी होती है। जिसमें शाहरुख खान की टीम द्वारा बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्तफिजूर रहमान को खरीदा जाता है। इसके 2 दिन बाद बांग्लादेश में 18 दिसंबर 2025 को कुछ कट्टरपंथियों द्वारा एक हिंदू व्यक्ति दीपू दास की हत्या कर दी जाती है। इस घटना से बांग्लादेश के प्रति भारत के लोगों का आक्रोश बढ़ जाता है। इस घटना का निष्पक्ष अवलोकन करें तो सवाल यह बनता है कि इसमें शाहरुख खान की क्या गलती? पहली बात तो ये है कि मुस्तफिजुर रहमान की नीलामी दीपू दास की हत्या के 2 दिन पूर्व हो चुकी थी। यानी भारतीय लोगों की भावनाएँ भड़कने के 2 दिन पूर्व ही इसकी नीलामी हो चुकी थी। दूसरी बात - खिलाड़ियों को नीलामी में शामिल करने का फैसला आईपीएल को आयोजित करने वाले समिति का था। ऐसे में यदि किसी देश के खिलाड़ी को नीलामी की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है तो इसके लिए उत्तरदायी आईपीएल आयोजित करने वाली समिति है। न कि किसी टीम का मालिक।

ऐसे में सवाल उठता है कि किसी देश के खिलाड़ी को किसी क्रिकेट टूर्नामेंट के खेलाने के लिए ये बीसीसीआई या आप आईपीएल आयोजन समिति का विरोध क्यों नहीं करते? क्या यह अज्ञानता में ऐसा कर रहे हैं? या कोई सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है। मेरा मानना है कि बांग्लादेशी खिलाड़ी विवाद को फालतू मुद्दा बनाने, और बढ़ावा देने के पीछे संगीत सोम, देवकीनंदन, रामभद्राचार्य से लेकर NDTV जैसे घटिया चैनल की सोची समझी साजिश है। मैं यह बात कोई हवा हवाई नहीं कर रहा हूँ, बल्कि इसके पीछे कुछ आधार हैं। पिछले 10 दिन के घटनाक्रम का अवलोकन करें तो पाते हैं कि जो कुछ भी देश भर में घटित हुआ है वह बीजेपी के लिए कलंक की तरह है। इस विमर्श में जो भी राजनेता से लेकर कथावाचक शामिल रहे हैं वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे होते हैं।

अब पिछले 2-3 सप्ताह की घटनाओं का अवलोकन करते हैं।

·       उन्नाव रेप कांड में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सजा प्राप्त पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर की सजा का निलंबन। इस दौरान बीजेपी समर्थित नेताओं/लोगों द्वारा कुलदीप सेंगर का पक्ष लेना (जिससे क्रुद्ध होकर देश की जनता ने बीजेपी को target करते हुए खूब खरी खोटी सुनाई)।

·       अंकिता भंडारी मर्डर में बीजेपी नेता का नाम आना,

·       बीजेपी शासित उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून में नार्थ ईस्ट के student का मर्डर कांड,

·       क्रिसमस के अवसर पर बीजेपी समर्थित संगठनों की गुंडागर्दी और उसपर बीजेपी नेताओं की चुप्पी,

·       इंदौर में दूषित जल से हुई मृत्यु पर बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय द्वारा एक पत्रकार को अपशब्द कहा जाना।

ये घटनाएं बीजेपी के लिए अभिशाप बन रही थी। सोशल मीडिया पर बीजेपी की खूब आलोचना हो रही थी। ऐसे में विमर्श को भटकाने के लिए ये नया शिगूफा छोड़ा गया है। ताकि विमर्श का मुद्दा बदल जाए साथ ही बंगाल चुनाव तक हिंदू मुसलमान मुद्दा जीवित रह सके।