Saturday, 16 May 2026

30 की उम्र के बाद आहार नियंत्रण: Diabetes से बचाव का सबसे जरूरी कदम

वर्ष 2026 की शुरुआत एक ऐसे न्यूज़ के साथ हुई जिसने मेरे जीवन जीने के तरीके को बदल दिया। अनियमित खान पान को नियमित कर दिया। समोसा, कचौरी, जलेबी, केला व अन्य मिठाई, जो मेरा प्रिय हुआ करता था, को हमेशा के लिए मुझे दूर कर दिया। स्कूल विजिट के दौरान अचानक से मुझे घबराहट का एहसास हुआ। किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए बिना देर किये पास स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दाढ़ी (बेमेतरा, छत्तीसगढ़) में चिकित्सकीय परामर्श लिया। जांच में डॉक्टर ने हाई ब्लड प्रैशर (High Blood Pressure) एवं डायबिटीस (Diabetes) की पुष्टि किया। जांच से आधे घंटे पहले एक समोसा खाया था यह मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं था। 40 वर्ष की उम्र, दो छोटे-छोटे बच्चे (एक की उम्र 5 वर्ष, दूसरे की 3 माह), नाममात्र बैंक बैलेंस से लेकर और भी बहुत कुछ मेरी दिमाग में अगले एक माह तक घूमते रहे। अच्छी बात ये थी कि इन चिंताओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इन्हें दूर करने का हर संभव उपाय किया। कभी-कभी के धूम्रपान छोड़ने से लेकर प्रतिदिन के Brisk Walk को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाया।

            एक बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है – आवश्यकता आविष्कार की जननी है। इस रोग से पीछा छुड़ाने की इच्छा/जिद ने मुझे diabetes एवं blood pressure के बारे में अधिक से अधिक जानने की आवश्यकता जागृत किया। फलस्वरूप डॉक्टर से लेकर chat GPT जैसे AI प्लैटफ़ार्म का भरपूर उपयोग किया इस बीमारी को गहराई से जानने-समझने के लिए। चिकित्सक से ज्यादा सहयोग तो नहीं मिला लेकिन AI ने जरूर थोड़ी बहुत जिज्ञासा शांत की। जिज्ञासा इसलिए भी थी कि इस रोग से लड़ने के लिए इसके प्रत्येक पहलू की जानकारी प्राप्त करने को आवश्यक कदम मानता था। इससे संबंधित असीमित जिज्ञासा ने मुझे इस पुस्तक (डायबिटीस, हाई ब्लड प्रेसर दूर रखिए जीवन भर) तक पहुंचाया। जहां तक मुझे याद है इस पुस्तक को मैंने student life (Ph.D.) के दौरान 2018 के आसपास वर्धा (महाराष्ट्र) खरीदा था अपने पिताजी को गिफ्ट करने के लिए (क्योंकि वह भी diabetes patient थे, और मेरी दिली इच्छा थी उनको यह पुस्तक भेंट करूँ ताकि वे इसे पढ़कर diabetes के एक-एक पहलू को समझते हुए उसके नियंत्रण के हरसंभव प्रयास कर सकें)। हालांकि यह हो नहीं सका अलग-अलग कारणों से। Diabetes को समझने के लिए इससे संबंधित एक पुस्तक मैंने ऑनलाइन ऑर्डर भी किया। उसके आने के पूर्व ही एक दिन अचानक से यह पुस्तक मुझे मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में दिख गया। बस फिर क्या था – व्यस्त दिनचर्या में थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर अपनी जिज्ञासा शांत किया। डॉ. धीरेन गाला, डॉ. संजय गाला लिखित नवनीत पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 184 पृष्ठों की यह पूरी पुस्तक दो भागों में बंटी है। दोनों ही भाग बहुत ही उपयोगी है। पहला भाग जहां diabetes से संबंधित है, दूसरा भाग हाई ब्लड प्रेसर (High Blood Pressure) से। दूसरे भाग की बात फिर कभी कर रहे होंगे। पहले भाग को पढ़ने के बाद बहुत हद तक मेरी असीमित जिज्ञासा शांत हुई। जैसे -

1.      डायबिटिस (मधुमेह) से तात्पर्य क्या है?

जीवाणुजन्य रोग के विपरीत डायबिटिस (मधुमेह/मधुप्रमेह) एक संस्कृतिजन्य (disease of civilization) रोग है जो इन्स्युलिन (insulin) नामक एक हॉरमोन (Harmon) की कमी से होता है। इस रोग का सीधा संबंध हमारे शरीर के पैनक्रियाज नामक ग्रंथि से है। इस ग्रंथि में दो कोष – अल्फा कोष एवं बीटा कोष होते हैं। बीटा कोष इंसुलिन बनाते हैं। श्रमरहित जीवन, अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट व शर्करायुक्त खाद्य पदार्थों के सेवन अर्थात अयोग्य रहन-सहन का परिणाम है यह रोग। यह संक्रमण से फैलने वाला रोग तो नहीं है लेकिन किसी को यदि यह रोग हो जाता है तो आनुवांशिक/वंशपरंपरागत बढ़ता जाता है।

            मधुमेह दो प्रकार के होते हैं, जिसे type 1 और type 2 मधुमेह कहा जाता है। कम उम्र में ही इंसुलिन की कमी के कारण उत्पन्न होने वाला मधुमेह Type 1 एवं (2) शरीर में इंसुलिन के विरुद्ध प्रतिकार (insulin resistance) के परिणामस्वरूप होने वाला मधुमेह Type 2 कहलाता है। प्रथम प्रकार के मधुमेह को बाल्यावस्था का मधुमेह कहा जाता है। जबकि दूसरे प्रकार के मधुमेह को प्रौढ़ावस्था का मधुमेह कहा जाता है। इंसुलिन की कमी के कारण या जब शरीर तैयार इंसुलिन का उपयोग नहीं कर पाता है तो खून में शर्करा की मात्रा असामान्य ढंग से बढ़ जाती है। ऐसे में हमारा शरीर खून में संचित शर्करा को अंततः पेशाब के माध्यम से निकालने लगती है। इस व्याधि/रोग को ही मधुमेह कहा जाता है। यह एक जीवन भर का रोग है। जिसे ठीक नहीं किया जा सकता। लेकिन उचित उपायों से उसे नियंत्रण में रखा जा सकता है। उसके दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है।

2.      इंसुलिन क्या है?

इंसुलिन हमारे शरीर के पैनक्रियाज ग्रंथि से निकलने वाला एक अंतःस्त्राव या हार्मोन है जो रक्त (खून) में स्थित शर्करा/ग्लूकोज की मात्रा को शरीर के एक-एक कोशिका में पहुंचा कर कम/नियंत्रित करता है। पेंक्रियाज़ में दो कोष क्रमशः अल्फा एवं बीटा कोष होता है। बीटा कोष से इंसुलिन का स्त्राव होता है। हमारे शरीर में मौजूद करोड़ों कोशिका उस ग्लूकोज से शरीर के लिए ऊर्जा बनाती है। यदि खून में ग्लूकोज की मात्रा कोषों की आवश्यकताओं की अपेक्षा अधिक हो जाता है तो इंसुलिन उसका रूपान्तरण ग्लायकोजेन या चर्बी में करके उसका संग्रह यकृत या चर्बी के कोषों में करता है। यह शरीर में प्रोटीन के निर्माण के लिए भी सहायक होता है। शरीर में यदि इसकी कमी हो जाए या शरीर की कोशिका इसका प्रतिरोध करने लगे तो रक्त में शर्करा की मात्रा अत्यधिक हो जाती है। जिससे मधुमेह नामक रोग की चपेट में आ जाता है।    

3.      मधुमेह रोगियों का वजन कम क्यों होता जाता है?

इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध के कारण रक्त में स्थित ग्लूकोज शरीर के अलग-अलग भागों में नहीं जा पाता है। न ही ग्लायकोजेन (चर्बी) में उसका रूपान्तरण हो पाता है। ऐसे समय में शरीर अपने भीतर संग्रहित चर्बी और प्रोटीन का विघटन कर उन्हें निश्चित कोषों तक पहुंचाने का प्रयत्न करता है। इस जमा चर्बी के नष्ट होने से मधुमेह के रोगी का वजन घटने लगता है।

4.      मधुमेह रोगियों को बार-बार पेशाब क्यों लगता है?

खून में जब ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है और इंसुलिन प्रतिरोध के कारण कोशिका तक वह पहुँच नहीं पाता है तो शरीर यकृत या चर्बी कोषों में मौजूद चर्बी का बहुत तेजी से विघटन कर कोशिका तक पहुंचाने का प्रयास करता है। इस विघटन से शरीर में कीटोन द्रव्य उत्पन्न होता है। अम्लीय होने के कारण ये कीटोन रक्त को विषाक्त बनाते हैं। इन बड़े मात्रा में मौजूद विषैले किटोन द्रव्यों को शरीर पेशाब के माध्यम से शरीर के बाहर निकालने का प्रयत्न करता है। इस कारण रोगी को बार-बार पेशाब लगती है।

5.      किसी व्यक्ति को मधुमेह होने के क्या कारण हैं?

किसी व्यक्ति के मधुमेह से ग्रसित होने के पीछे कोई एक कारण नहीं होता है। बल्कि मधुमेह होना कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे –

·       आनुवांशिक कारण – माता पिता को यदि मधुमेह है तो बच्चे को भी होने की अधिक संभावना रहती है। हालांकि वास्तविकता यह भी है कि किसी व्यक्ति का वजन यदि आदर्श वजन से 30 प्रतिशत कम हो तो वह मधुमेह से बच जाता है।  

·       शारीरिक स्थूलता (शरीर का अधिक वजनी होना) – किसी परिवार में यदि मधुमेह रोगी न भी हों तो भी कोई व्यक्ति मधुमेह की चपेट में आ सकता है, यदि वह अधिक वजन वाला स्त्री या पुरुष हो। ऐसा माना जाता है कि मधुमेह स्थूलता का कानूनन पति है। अधिक वजन वाले लोग आसानी से मधुमेह का शिकार बनते हैं।

·       अयोग्य व अत्यधिक आहार – संशोधित (refined) एवं प्रक्रियायुक्त (processed) खाद्य पदार्थ मधुमेह को accelerate करते हैं। अत्यधिक आहार को पचाने के लिए शरीर को अधिक पाचक रसों और इंसुलिन का उत्पादन करना पड़ता है। अधिक काम करने के कारण अंत में पैंक्रियास थक जाता है। परिणामस्वरूप इंसुलिन का उत्पादन प्रभावित होता है।

·       अपर्याप्त शारीरिक श्रम - शारीरिक परिश्रम के दौरान स्नायु रक्त में स्थित अधिकांश शर्करा का उपयोग कर डालते हैं, परिणामस्वरूप पेनक्रियास ग्रंथि का बोझ काफी कम हो जाता है। लेकिन शारीरिक श्रम यदि समुचित मात्रा में न हो तो इसका दुष्प्रभाव पैनक्रियाज पर पड़ता है।

इसके अतिरिक्त वाइरस का संक्रमण, मानसिक तनाव, कुछ होर्मोंस का प्रतिकूल प्रभाव आदि भी अन्य कारण हैं।

6.      मधुमेह के लक्षण क्या-क्या हैं?

Type 1 Diabetes के लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगत होता है, लेकिन प्रौढावस्था का डायबीटीज (Type 2 Diabetes) इस तरह दबे पांव आता है कि रोगी को उसके आने की भनक तक नहीं लग पाता। मधुमेह रोगियों में निम्न प्रकार के लक्षण देखने को मिलते हैं –

·       अत्यधिक और बार-बार पेशाब आना।

·       मुँह सूखना और बहुत प्यास लगना।

·       बहुत भूख लगना।

·       शरीर का वजन धीरे धीरे कम होना।

·       थकावट और कमजोरी होना तथा शरीर में दर्द होना।

·       मानसिक थकावट एकाग्रता का अभाव।

इसके अतिरिक्त घाव भरने में विलंब होना, चश्मे के नंबर में बार-बार परिवर्तन होना, हाथ-पैर का दुखना या सुन्न पड़ जाना, आदि मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं।

7.      मधुमेह से होने वाली समस्याएँ क्या-क्या हैं?

·       डायबीटिक कोमा - यह समस्या मुख्यतः टाइप वन डायबिटीज़ के रोगियों में देखने को मिलते हैं। चर्बी के विघटन के कारण बनने वाले कीटोन द्रव्य को शरीर पेशाब के माध्यम से बाहर निकालने का प्रयास करता है। इससे रोगी को बार-बार पेशाब होती है। अत्यधिक मात्रा में पेशाब होने के कारण शरीर में पानी कम हो जाता है। जिससे रक्त से कीटोन द्रव्यों की सांद्रता बढ़ जाती है। इन अम्लीय कीटोन द्रव्यों का मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे वह धीरे-धीरे बेहोश हो जाता है।

·       हाइपोग्लिसेमिक कोमा –रक्त में शर्करा कम करने के लिए कुछ लोग अलग-अलग प्रकार के तरीके अपनाने लगते हैं, जैसे - अत्यधिक दवा का सेवन करना, खाना कम कर देना, अधिक शारीरिक श्रम करना। इन कारणों से कभी-कभी रक्त में शर्करा या ग्लूकोज की मात्रा अत्यधिक कम हो जाती है जिससे बेहोसी आ जाती है। इसे हाइपोग्लिसेमिक कोमा कहा जाता है।  

·       शरीर में छोटे-बड़े फोड़े होना और देर से भरना।   

·       तीव्र गैंग्रीन – हाथ पैर की उँगलियों में झुंझुनाहट होना।  

·       स्पर्श संवेदना बढ़ने से हाथ-पैर में जलन होना (विशेष रूप से रात के समय)

इसके अतिरिक्त स्पर्श संवेदना कम होने से पैर में झुनझुनी, मूत्राशय की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव (Urine Infection), आँख तथा नेत्रपटल पर प्रतिकूल प्रभाव, दृष्टि का ह्रास (मोतियाबिंद), प्रजननतंत्र पर दुष्प्रभाव, पैर पर दुष्प्रभाव आदि समस्याएँ समान्यतः देखने को मिलती है।   

8.      मधुमेह के उपचार में हमारा आहार कैसा होना चाहिए?

मधुमेह में चिकित्सा की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से रोगियों की होती है। आहार के साथ-साथ, कसरतें, योगासन, दवाएं, एक्यूप्रेसर, लोहचुंबक चिकित्सा से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अधिक वजन वाले मधुमेह रोगियों के लिए आहार प्रबंधन ही श्रेष्ठ उपाय है। लेखक बताते हैं कि मधुमेह रोगियों का आहार ऐसा होना चाहिए कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चर्बी आदि ताकत प्रदान करने वाले घटक शरीर को पर्याप्त मात्रा में मिले। आहार में ऐसे भोजन शामिल करें जिससे विटामिन, क्षार और फाइवर शरीर को मिले। आदर्श वजन बनाए रखने के लिए आवश्यक कैलोरी शरीर को उपलब्ध हो। भोजन की गुणवत्ता मधुमेह रोगी के शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई सामान्य से भी कम श्रम करने वाला अधिक वजन वाला रोगियों तो उसे उसके वजन के अनुसार 20 से 25 कैलोरी प्रति किलो, जबकि कम वजन वाले रोगी को 35 कैलोरी प्रति किलो के हिसाब से आहार लेना चाहिए। यह आहार दिन भर में समान रूप से बंटा होना चाहिए अर्थात् थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करना चाहिए। मधुमेह रोगियों को क्या न खाएं? इसके साथ-साथ क्या खाएं? कब और कितना खाएं? इस संबंध में भी विस्तृत जानकारी होना आवश्यक है। पर्याप्त जानकारी न होने के कारण सामान्यतः लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होती है। मधुमेह रोगियों को संतृप्त चर्बी (वसा) जो घी, मक्खन, नारियल तेल और पाम तेल में होती है, से दूरी बनाकर रखना चाहिए। मूँगफली, तिल, मकई, सोयाबीन के तेल में असंतृप्त चर्बी पाई जाती है। ऐसे असंतृप्त चर्बी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना लाभदायक होता है। दैनिक आहार में रेशा युक्त खाद्य पदार्थ, शाक-भाजी शामिल करना चाहिए।

9.      क्या कसरत या योगासन से मधुमेह को नियंत्रित किया जा सकता है?

मधुमेह को नियंत्रित करने में आहार के बाद दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है कसरत एवं योगासन (आसन, प्राणायाम)। कसरत के दौरान नसों के फैलने-सिकुड़ने की प्रक्रिया से खून में मौजूद अधिकांश ग्लूकोज खर्च हो जाती है, शरीर में संचित चर्बी खर्च होती है। इन सभी क्रियाओं से पेंक्रियाज़ ग्रंथि का काम कम हो जाता है। मधुमेह रोगियों को ऐसे कसरत करना चाहिए जिसमें ज्यादा ज़ोर नहीं लगाना पड़ता है। जैसे चलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, बागवानी करना आदि। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कसरत में नियमितता हो। मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी आसन हैं – उड्डीयानबंध, त्रिकोणासन, योगमुद्रा, धनुरासन, पश्चिमोत्तानासन, कोणासन, सर्वांगासन, मत्स्यासन, शवासन। आसन के अतिरिक्त दो प्राणायाम उपयोगी हैं – उज्जाई एवं भस्त्रिका प्राणायाम।

10.  क्या मधुमेह रोगियों के लिए डायलिसिस मशीन जैसा कोई यंत्र है जो रक्त में से ग्लूकोज की मात्रा को फिल्टर कर बाहर निकाल सके?

मधुमेह रोगियों को डायबिटिक कोमा (बेहोसी) जैसी समस्या से बचाने के लिए इंसुलिन की सुई दी जाती है, जिसे काफी सावधानी से रोगी को दी जाती है। इस दौरान इंसुलिन की मात्रा को लेकर बहुत माथापच्ची की स्थिति रहती है। ऐसे आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए एक ऐसा यंत्र आविष्कृत किया गया है जो शरीर के पेंकियाज़ ग्रंथि जैसा ही काम करते हैं। एक ट्यूब की सहायता से रोगी के रक्त को यंत्र में लगातार भेजा जाता है जहाँ ग्लूकोज की मात्रा का पृथक्करण रहता है। आवश्यक मात्रा में रोगी के शरीर में इंसुलिन को प्रविष्ट किया जाता रहता है। यह यंत्र काफी विशाल होता है। आपातकालीन परिस्थिति से निपटने के लिए ही इसका प्रयोग किया जाता है।

            ऐसे छोटे यंत्र आविष्कृत करने के भी प्रयास हुए जिन्हें रोगी अपने शरीर पर धारण कर सके और अपना दैनिक कामकाज भी जारी रख सकें। विदेश में उपलब्ध ऐसा ही एक यंत्र कमर के पट्टे पर धारण किया जाता है। उस में स्थित सुई को पेड़ू में लगाए रखना पड़ता है। इस यंत्र में खून में स्थित ग्लूकोज की मात्रा मालूम करने की व्यवस्था नहीं होती। उसमें से थोड़ा थोड़ा इनसुलिन रोगी के शरीर में लगातार प्रविष्टि होता रहता है, नाश्ते या भोजन के बाद यन्त्र स्थित एक पंप को दबाकर रोगी को कुछ अधिक इंसुलिन शरीर में प्रविष्ट कराना होता है। हमारे देश में फिलहाल ऐसे यंत्र नहीं के बराबर उपलब्ध हैं।

उपरोक्त जिज्ञासा शांत करने के अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण जानकारी भी पुस्तक से प्राप्त होती है। जैसे -

v इंसुलिन की खोज के लिए नोबल पुरस्कार - सन् 1920 में फ्रेड्रिक बैंटिंग और चार्ल्स बस्ट नाम के वैज्ञानिक ने पैनक्रियाज नामक पाचन ग्रन्थि के स्राव से विशुद्ध इंसुलिन को अलग करने में सफल हुए। उन्होंने बताया कि मधुमेह से पीड़ित प्राणियों को इंसुलिन दिया जाए तो उनके रक्त में अवस्थित शर्करा की मात्रा कम हो जाती है। इस खोज के लिए इन दो वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

v जामुन के बीज का चूर्ण का सेवन करने की सलाह आयुर्वेद के चिकित्सक देते हैं जो कि प्रभावी है। लेकिन मधुमेह रोगियों को जामुन का सेवन करने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि इसमें 15% शर्करा होती है। सेवन से मधुमेह बढ़ सकता है।

अन्य प्रभावी चीजें -

·       प्रत्येक खंड में कही जा रही बात को बेहतर तरीके से समझाने के लिए समुचित रंगीन चित्रों का प्रयोग किया गया है जो पढ़ने की रोचकता को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए चित्र 2.5 देखकर कोई भी बेहतर तरीके से समझ बना सकता है कि मधुमेह के रोगियों का पेशाब मीठा क्यों होता है?

·       Type 1 एवं Type 2 के मधुमेह को बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है।

·       पहली बार पता चला कि मधुमेह के होने के जीवाणु थ्योरी भी अस्तित्व में हैं। लेखक बताते हैं कि पेंक्रियाज ग्रंथि (एक प्रकार का पाचक ग्रंथि) लोब्यूल्स नामक इकाइयों से निर्मित होती है। प्रत्येक लोब्यूल्स में दो प्रकार के कोष होते हैं : अन्तःस्त्रावी (endocrine) एवं बाह्यस्त्रावी (exocrine)। अंतःस्त्रवि कोष के दो कोष होते हैं- बीटा कोष एवं अल्फा कोष। बीटा कोष इंसुलिन बनाते हैं, जबकि अल्फा कोष ग्लूकागोन नामक हारमोन का स्त्राव करते हैं। विषाणु पेनक्रियास ग्रंथि में अवस्थित बीटा कोषों को नष्ट कर देते हैं जिससे मधुमेह होता है।

·       पेशाब, रक्त के माध्यम से मधुमेह के परीक्षण के अलग-अलग जांच विधियों, परीक्षण विधि, जैसे बेनेडिक्ट टेस्ट, ग्लूकोज ऑक्सीडेज टेस्ट, ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट, के बारे में विस्तार से बताया गया है।

·       मधुमेह जिन लोगों का खानदानी इतिहास रहा है उन्हें 30 वर्ष की आयु के बाद स्वेच्छा से आहार नियंत्रण स्वीकार कर लेना चाहिए। आहार नियंत्रण से तात्पर्य है – मीठा खाने व अत्यधिक खाने से तौबा कर लेना। यदि वजन समान्य से ज्यादा है तो अपना वजन नियंत्रण करना शुरू कर देना चाहिए।