Sunday, 27 September 2026

गुरुकुल से NEP 2020 तक: कैसे बदला भारत में शिक्षा का प्रबंधन?

वर्तमान में हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था को प्रबंधित करने के लिए अलग-अलग स्तर पर अधिकारी नियुक्त हैं. शिक्षा विभाग, राज्य, जिला, ब्लाक स्तर के शिक्षा अधिकारी के माध्यम से प्रबंधित हो रहा है. यहाँ एक सवाल उठता है कि क्या ये प्रबंधन व्यवस्था हमारे देश में प्राचीन काल से विद्यमान थी? क्या प्राचीन काल में भी ऐसे ऐसे अलग-अलग स्तर पर प्रबंधित करने वाले अधिकारी होते थे? जवाब है नहीं. प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षण संस्थाओं को प्रबंधित करने की कोई विशेष संगठन उपलब्ध होने के साक्ष्य नहीं मिलते हैं. शिक्षक सामान्यतः किसी मंदिर, मस्जिद या सार्वजनिक स्थान पर बच्चों को एकत्र कर पढ़ाते थे. राजा या सरकार की ओर से इस कार्य के लिए किसी भी प्रकार का मानदेय/वेतन उन्हें नहीं मिलता था. बल्कि बच्चों के अभिभावक की ओर से इसके बदले में उस शिक्षक को धन या अनाज प्राप्त होता था, विद्यार्थियों के भिक्षाटन कर राजस्व प्रबंध करने के उल्लेख भी मिलते हैं. इसके बरक्श वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो आज शिक्षकों को सरकार (केंद्र व राज्य) की तरफ से वेतन से लेकर अनेक प्रकार के भत्ते मिलते हैं, इनकी निगरानी के लिए संकुल, ब्लॉक, जिला स्तर पर अधिकारी नियुक्त किये गए हैं. ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर इस व्यवस्था की शुरुआत कब हुई? स्वतंत्रता के बाद या इसके पूर्व? जवाब है ब्रिटिश शासनकाल.

हमारे देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल से शुरू होती है. 1757 ई. में बंगाल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हो गया था. इसी क्रम में ब्रिटिश क्राउन का चार्टर एक्ट 1813 आया जिसके माध्यम से व्यापार और धन अर्जित कर ब्रिटिश क्राउन को भेजने के काम में लगे ईस्ट इंडिया कंपनी को शिक्षा (पाश्चात्य शिक्षा) के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी भी दी गई. इस अधिनियम के अनुसार भारत में शिक्षा के विकास के लिए प्रति वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी को इस कार्य में इसाई मिशनरियों से सहयोग लेने का भी प्रावधान इस एक्ट में था. फलस्वरूप मिशनरियों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा, यूरोपी (पश्चिमी) साहित्य, विज्ञान संबंधी ज्ञान के प्रसार की प्रक्रिया शुरू हुई. अपने प्रभावक्षेत्रों {बंगाल, मद्रास (वर्तमान चेन्नई) और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) प्रेसीडेंसी} में अपने देश (इंग्लैंड) जैसे विद्यालय स्थापित करने में रूचि ली. इसी क्रम में 1854 का wood’s Despatch से इन शालाओं के प्रबंधन की शुरुआत होती है. इस दस्तावेज में पहली बार शिक्षा के प्रशासन के लिए एक व्यवस्थित सरकारी ढांचा बनाने की स्पष्ट रूपरेखा दी गई. चूँकि उनके द्वारा स्थापित विद्यालयों में कई कक्षाएं होते थे, अलग-अलग कक्षाओं और विषयों को पढ़ाने के लिए अनेक अध्यापक होते थे. इसलिए इनके व्यवस्थित प्रबंध की आवश्यकता होती थी, इस आवश्यकता के फलस्वरुप ही उन्होंने हमारे देश में शैक्षिक प्रबंधन का क्रमबद्ध रूप से विकास किया. यहां प्रबंधन से तात्पर्य है किसी संगठन को संचालित व नियंत्रित करने वाले क्रियाकलाप.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 1948-49 के राधाकृष्णन आयोग, 1964-66 के कोठारी आयोग से लेकर भारत की तीसरी शिक्षा नीति (2020) के बीच जिला व स्थानीय स्तर पर शिक्षा प्रबंधन की व्यवस्था सुदृढ़ की गई. शुरुआत में में इन शिक्षा अधिकारियों की भूमिका विद्यालयों के निरीक्षण और प्रशासन तक सीमित थी, उनका ध्यान इस और ज्यादा रहता था कि ' स्कूल चल रहे हैं या नहीं? शिक्षक पढ़ा रहे हैं या नहीं? स्कूल की व्यवस्था प्रस्तावित नियमों के अनुसार चल रही है या नहीं? लेकिन 2020 शिक्षा नीति में शैक्षिक सहयोग (supportive supervision) और मॉनिटरिंग को अधिक महत्व दिया जाने लगा. अर्थात स्कूल या शिक्षक को अकादमिक सहयोग की जरूरत है तो अधिकारी न केवल उस स्कूल/शिक्षक के लिए ट्रेनिंग आयोजित करें बल्कि कक्षा में डेमो टीचिंग के माध्यम से अपेक्षित सहयोग करें.

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त पुस्तक/सामग्री

·       Charles Wood, ‘The Dispatch of 1854, on General Education in India’, London, Paragraph 15 – 21.

·       गुप्ता, डॉ. अलका, एस पी, ‘आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएं’ शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद, 2016