Tuesday, 6 February 2018

क्या हमारा धर्म स्त्रीद्वेषी है ?

बचपन से ही हमें पढ़ाया जाता रहा है कि स्त्री और पुरुष हमारे समाज रुपी गाड़ी के दो पहिये हैं । एक भी पहिया कमजोर हुआ तो समाज व्यवस्थित रूप से नहीं चल सकता । यदि हम दोनों पहिये के वास्तविक जीवन में झांक कर देखें तो वास्तविकता कुछ यूं नज़र आती है कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज (ऐसा समाज जिसमें समाज की सम्पूर्ण व्यवस्था, निर्णय लेने की स्वतंत्रता पुरुषों के हाथों में स्थित हो) में समाज के साथ-साथ परिवार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद, स्त्री की अपेक्षा पुरुष को ज्यादा वरीयता दिया जाता है । भारतीय संविधान द्वारा लैंगिक आधार पर समानता व स्वतन्त्रता का अधिकार दिये जाने के बावजूद इनकी स्थिति आज भी शोषितों जैसी ही बनी है । हालाँकि 1974 ई. के बाद स्त्रियों की स्थिति में सुधार की दिशा में कार्य करते हुए भारत सरकार ने गंभीरता पूर्वक अनेक कानून बनाये । इसके बावजूद आजादी के 65 वर्ष बाद भी इनकी स्थिति संतोषजनक कही नहीं जा सकती । अनेक क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां आजादी की रोशनी इन्हें देखने को भी नहीं मिलती ।  महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर स्थित शनि धाम के चबूतरे पर महिला प्रवेश निषेध के बाद महिलाओं के एक समूह द्वारा इस परंपरा को तोड़े जाने के लिए आंदोलन के मूड में है । इस घटना ने एक विमर्श को जन्म दिया है कि क्या हमारा धर्म स्त्री द्वेषी है?
उत्तर स्वरूप कहा जा सकता है कि हमारा वर्तमान भारतीय समाज हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी इत्यादि धर्म-संप्रदायों के अनुयायियों से आबाद एक पितृसत्तात्मक मिश्र समाज है । घर से बाहर तो हम संवैधानिक विचारधारा पर चलने को मजबूर हैं लेकिन घर प्रवेश करने के साथ ही पुनः धर्मग्रंथों के सिद्धांतों की जकड़न में कैद हो जाते हैं । इस कारण सभी समाज में स्त्रियों की दशा लगभग एक जैसी ही है और हो भी क्यों नहीं ! हमारे समाज के 90 प्रतिशत से भी अधिक लोग धर्मं पर आधारित नियमों, रीति रिवाजों का ही पालन करते हैं और जब धर्मं ही स्त्री द्वेषी हो तो इस बात की तो पूरी गारंटी है कि समाज भी स्त्री द्वेषी ही होगा ।
 जहाँ तक हिन्दू धर्म के स्त्रियों की बात है इस धर्म के अनुयायी आपको मनुस्मृति के उस श्लोक की दुहाई देते मिल जाएंगे जिसमें कहा गया है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताअर्थात जहां स्त्रियों की पूजा या सम्मान होती है वहाँ देवताओं का वास होता है । लेकिन वास्तविकता कुछ और है । सदियों से धर्म को कंधे पर ढोने के बावजूद जन्म से लेकर अंत्येष्ठी संस्कार तक इन्हें इस भावना से देखा जाता है कि जैसे ये इस समाज के प्राणी ही नहीं हों । राजस्थान की स्त्रियाँ तो जन्म से मृत्यु तक घूंघट में ही दम तोड़ देती है । परिवार में गर्भ धारण की हुई महिला को बड़े बुजुर्ग आपको हमेशा यही आशीर्वाद देते मिल जायेंगे पुत्रवती भवकोई भी पुत्री की कामना नही करता या पुत्रीवती भवका आशीर्वाद नहीं देता क्योंकि मनु के अनुसार परिवार में पुत्र का जन्म ही पिता को मुक्ति दिलाता है । ये जानते हुए भी कि मानव प्रजाति को बढ़ने के लिए यह अनिवार्य है की लड़कियां जन्म ले, बिना इनके पीढ़ी आगे बढ़ ही नहीं सकती । फिर भी ये ही अपेक्षा की जाती है कि इनकी संख्या लड़कों की संख्या से ज्यादा नहीं होने पाए । भले ही वह उच्च वर्ण या जाति वाले परिवार से सम्बंधित क्यों न हो, पुत्री का जन्म लेना दुर्भाग्य का कारण माना जाता है । यही कारण है कि गर्भस्थ माता एवं परिवार द्वारा गर्भ में मौजूद शिशु को पुत्र में बदलने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, कर्मकांड, टोटके, पुंसवन संस्कार किये/कराये जाते हैं । यदि एक लड़की अपने भाई की मृत्यु के बाद जन्म लेती है या उसके जन्म लेने के तुरंत बाद परिवार में कोई लड़का मर जाता है तो दोनों ही स्थिति में वह लड़की ही परिवार एवं पड़ोसियों द्वारा लड़के की मृत्यु के कारण के रूप में देखी जाती है और तब तक वह कोसी जाती है जब तक कि वह उस समाज का एक हिस्सा होती है । कभी कभी तो उसपर गुस्सा उतारते हुए यहां तक कह दिया जाता है कि अरे दुष्ट लड़की तू उसकी जगह पर क्यूँ नही मर गयी। ऐसा सुनने के बाद शायद ही कोई लड़की अगले जन्म में एक लड़की के रूप में जन्म लेना चाहेगी । जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि जैसे वह एक अनिमंत्रित मेहमान है । माहवारी के दौरान उन्हें एक अपवित्र प्राणी के सदृश व्यवहार किया जाता है । मंदिर जाने या पूजा करने के अनुमति नहीं होती । जैसे उसके छूने से उनके देवता अपवित्र हो जाएंगे । अनचाहे रूप से जन्म लेने की स्थिति में उस नवजात बच्ची के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी लीला जन्मवाले दिन ही खत्म कर दी जाती है । ऐसे कुकर्म करते वही पकड़े जाते हैं जो खुद को कट्टर हिंदू कहलाना पसंद करते हैं । यह स्त्री द्वेष नही तो क्या है !
          विद्वानों का मानना है कि किसी भी धर्मं की नींव उस धर्मं के धार्मिक पुस्तकों पर निर्भर करती है ।  हिन्दू धर्मं के धार्मिक पुस्तकों का हमारे ही धार्मिक विद्वानों द्वारा निष्कर्ष निकाला जाता है कि रामायण और महाभारत दोनों ही युद्ध एक स्त्री के कारण हुआ जबकि द्रौपदी को दांव पर लगाने वाले, उसकी अश्मिता लूटने का प्रयास करनेवाले, इस नग्न नृत्य का बैठे-बैठे तमाशा देखने वाले पुरुष थे । रामायण की बात करें तो इसमें भी इस युद्ध के लिए सीता और शूर्पनखा पर दोषारोपण किया जाता है जबकि राम-लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा के नाक कान काट लिया जाना रावण जैसे भाई के लिए बिलकुल अपमानजनक बात थी । दूसरा खुद रावण जिसने अपमान का बदला लेने के लिए सीता का धोखे से अपहरण कर लिया । दोनों ही उदाहरण में एक पुरुष वर्ग दोषी है । लेकिन धर्म का वाचन करने वालों द्वारा इनकी जगह एक स्त्री पर दोष लगा दिया जाता है । भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पत्नी यदि भूल से या जान बूझकर कुछ गलत कर दे तो पति उसके साथ कुछ भी कर सकता है क्योंकि वह उसके अधीन होती है । पति द्वारा जुल्म करने की स्थिति में भी उससे पति के खिलाफ विरोध नहीं करने की अपेक्षा की जाती है क्योंकि हिन्दू धर्म में एक स्त्री द्वारा अपने पति को पलटकर जवाब देना अच्छा नहीं माना जाता है । ये स्त्री द्वेष नही तो क्या है !
 इस्लाम की बात करें तो सैद्धान्तिक रूप से तो इस्लाम में स्त्री पुरुष को समान दर्जा दिया गया है लेकिन व्यावहारिक रूप में स्त्री-पुरुष में भेद किया जाता है । इस्लाम के उदय का एक अन्य कारण यह भी था कि इस्लाम के उदय के पूर्व अरब समाज में अनेक कुप्रथाएँ थी जिससे स्त्रियों का जीवन नरक समान हो गया था । पिता के मरने पर पिता के पत्नियों का बंटवारा भी पुत्रों में हो जाता था । इतना ही नहीं जहां बेटे पिता की पत्नी को रखैल बना लेते थे वहीं बाप भी इस कुकर्म में पीछे नहीं रहता । इस्लाम महिलाओं को मस्जिद में जाकर नमाज़ पढने का अधिकार नही होता जबकि कुरआन में ऐसा कहीं भी देखने को नही मिलता, जबकि मुहम्मद साहब की मृत्यु के काल तक स्त्रियों को मस्जिद में जाकर नमाज पढने का अधिकार था लेकिन जब इस्लाम में खलीफा राज की शुरुवात हुई और उमर पहले खलीफा बने तो उसी समय एक पढ़ी लिखी स्त्री से इनकी कुरआन सम्बन्धी किसी नियम पर बहस हो गयी । उमर को ये बहस, बहस कम अपमान ज्यादा लगा । इसके पश्चात उन्होंने स्त्रियों के मस्जिद में कुरआन पढ़ने पर रोक लगा दिया । काफी दिनों के पश्चात उनको केवल घर पर कुरआन पढ़ने का अधिकार मिला । कुरआन में कहीं भी ये नहीं लिखा है कि स्त्रियों को बुर्का पहनना चाहिए । इसके बावजूद इनपर बुर्का लाद दिया गया । हिन्दू के साथ साथ इस्लाम में भी स्त्री के जन्म को अभिशाप माना जाता है । जन्म लेने के पश्चात इनको कभी दूध में डुबाकर, कभी उसके मुंह में अफीम डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये स्त्री द्वेष नही तो क्या है ?
इसाई धर्म में भी बाइबिल का पुराना संस्करण (ओल्ड टेस्टामेंट) जिसका स्वरुप मातृसत्तात्मक था, 15वीं शताब्दी में नया संस्करण (न्यू टेस्टामेंट) लाकर इसका स्वरूप पितृसत्तात्मक  कर दिया गया । ये स्त्री द्वेष नही तो क्या है ?
अतः कहा जा सकता है कि हमारा धर्म/समाज प्राचीन काल से ही स्त्री द्वेषी रहा है । समस्त धर्मों/संप्रदायों में इसके साक्ष्य भरे पड़े हैं । हालांकि राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, सावित्री बाई फुले, पंडिता रमा बाई सरस्वती, डॉ कर्वे आदि ने स्त्रियों की स्थिति सुधारने में उल्लेखनीय योगदान दिया । यही कारण है कि आज स्त्रियाँ जागरूक होकर देश समाज से अपनी स्थिति में परिवर्तन लाने को प्रयत्नशील हैं । शनि शिंगनापुर के शनि धाम के चबूतरे पर प्रवेश हेतु संघर्ष इसी परिवर्तन लाने की एक कड़ी है ।        

(वुमेन एक्सप्रेस दैनिक समाचार पत्र के 01/02/2016 के संपादकीय में प्रकाशित)

Wednesday, 3 January 2018

राष्ट्रीयता की राह के पत्थर: शौर्य दिवस

विभिन्न धर्मों, जातियों, मानव प्रजातियों का अनुपम संग्रहालय हमारा देश पिछले दो-तीन दसकों से कभी धार्मिक, कभी जातीय उन्माद, वर्चस्व की राजनीति के कारण रणभूमि बन चुका है । नौकरी हेतु आवेदन के क्रम में कितना भी गर्व से हम खुद की राष्ट्रीयता भारतीय लिख दें लेकिन समय आने पर अपनी वास्तविकता दिखाने से नहीं चूकते कि हम भारतीय बाद में हैं, हिंदू, मुसलमान, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, हरिजन, दलित, आदिवासी पहले हैं । उदाहरण के रूप में प्रति वर्ष महिषासुर विजय के रूप में मनाया जाने वाला शौर्य त्योहार विजया दशमी, 6 दिसंबर की बाबरी विध्वंश की वार्षिकी पर शौर्य प्रदर्शन या 1 जनवरी को कोरेगांव भीमा का शौर्य प्रदर्शन, देखे जा सकते हैं । इस तरह के शौर्य प्रदर्शन में एक तरफ प्रचंड आत्मविश्वास, ऊर्जा से परिपूर्ण विजेता पक्ष होता है तो दूसरा अपमानित महसूस करने के बावजूद खून के घूंट पीकर रह जानेवाला पीड़ित समुदाय होता है । ऐसे में यदि शौर्य दिवस आयोजकों को सत्ता पक्ष का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से साथ मिल जाए तो 6 दिसंबर को होनेवाले शौर्य प्रदर्शन शांतिपूर्ण होता है । लेकिन जब सत्ता पक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शौर्य दिवस विरोधियों के साथ हो तो कोरेगांव जैसी हिंसक घटनाएँ जन्म लेती है ।
          शौर्य प्रदर्शन जैसी घटनाएँ क्षणिक रूप से किसी समुदाय विशेष के लिए गौरव का क्षण हो सकता है लेकिन इससे उत्पन्न वैमनस्यता का सबसे बड़ा नुकसान हमारे देश को है । इस वैमनस्यता से हमारी वह राष्ट्रीयता की भावना प्रभावित होती है जिसे जागृत कराने के लिए सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए स्कूल-कॉलेज स्तर पर भारतीय इतिहास के हमारे अध्ययन-अध्यापन पर खर्च करती है । बाबरी विध्वंश का शौर्य दिवस हो, विजया दशमी का शौर्य दिवस हो या कोरेगांव भीमा के महारों का पेशवाओं पर विजय का शौर्य दिवस, सभी धार्मिक व जातिगत वैमनस्यता को बढ़ावा देते हुए हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-आदिवासी, सवर्ण-दलित के बीच अलगाववाद को बढ़ावा देते हैं । यदि ऐसे शौर्य दिवस मनाने की प्रवृत्तियों जिससे एक दूसरे की भावनाओं को आघात पहुंचे, पर सरकार द्वारा अंकुश नहीं लगाया गया तो जिस तरह आज धर्मनिरपेक्ष स्वरूप वाले हमारे देश में हिंदू राष्ट्र बनाने, संविधान को बदलने के सुर सुनाई पड़ते हैं, आगे चलकर जाति-धर्म के नाम पर पृथक राष्ट्र बनाने की मांग चारों तरफ से सुनाई पड़ेंगी । और देश को स्वतन्त्रता पूर्व की राजनीतिक स्थिति में पहुँचते देर नहीं लगेगी जब सम्पूर्ण भारत सैकड़ों रियासतों से आबाद एक भौगोलिक क्षेत्र था ।
साकेत बिहारी
शोधार्थी – पीएच.डी.

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
(Women Express 04/01/2018 अंक में प्रकाशित) 

Wednesday, 27 December 2017

‘वन्दे मातरम’ विमर्श की आवश्यकता क्यों?

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय लिखित उपन्यास आनंदमठ के गीत वन्दे मातरम के गायन को लेकर पिछले 3 वर्षों से हमारे देश के समाचार चैनल अखाड़ा बने हुए हैं। यह विवाद कोई नया नहीं है बल्कि इसकी जड़ स्वतन्त्रतापूर्व की रही है। स्वतंत्रता पूर्व इस बोल से घृणा करने की वजह थी कि जिस उपन्यास आनंद मठ से यह गीत लिया गया है उसमें मुसलमान शासकों को शोषक के रूप में दिखाते हुए, मुसलमानों के लिए ओछे शब्दों को प्रयुक्त कर उनके प्रति घृणा दिखाया गया है, जो प्रारम्भ में अंग्रेजों के लिए किया गया था। बाद में अंग्रेजों की जगह न केवल मुसलमानों को डाल दिया गया, बल्कि अंग्रेजों की जय-जयकार भी की गयी। इस गीत में हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बहुलता होने के कारण ही  इसे राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है, जबकि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय में यह जनमानस में रवीद्रनाथ टैगोर की जन-गण-मन से भी अधिक लोकप्रिय था।
          23 दिसंबर 2017 को ‘सिर्डी साईं बाबा’ संस्थान द्वारा आयोजित ग्लोबल साईं मंदिर ट्रस्ट सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू द्वारा मुसलमानों द्वारा वंदे मातरम गाने की समस्या को लेकर उठाए गए सवाल के बाद यह विमर्श एवं विवाद का मुद्दा बन गया है। इस विमर्श में एक तरफ तथाकथित देशभक्त’(हिंदू सहित अन्य धर्मावलम्बी) हैं तो दूसरी तरफ तथाकथित अदेशभक्त (पारंपरिक इस्लामी धर्मावलम्बी) वर्ग। अदेशभक्त इस संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है कि तथाकथित देशभक्त वर्ग द्वारा वन्दे मातरम कहने को देशभक्ति का पैमाना बताया जा रहा है। गहराई से विचार किया जाए तो इस वन्दे मातरम विमर्श को बढ़ावा देने का उद्देश्य बाहर से दिखाने के कुछ और और अंदर से कुछ और ही प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है कि वर्तमान में इस विवाद/विमर्श के बहाने सरकार इस्लामी समुदाय को देशभक्ति के सर्टिफिकेट देने की आड़ में उनकी कट्टर धार्मिक मान्यताओं की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उन्हें अदेशभक्त घोषित कर केवल हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है।
          इस्लामी धर्मावलम्बियों द्वारा राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम का उच्चारण या गायन नहीं करना वर्तमान में कोई राष्ट्रवाद का नहीं बल्कि धार्मिकता का मामला है। यदि राष्ट्रीयता का मामला होता तो वे राष्ट्रगान जन गण मन गायन से भी परहेज करते। ऐसी स्थिति में बहुदेववाद सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले हिंदू धर्मावलम्बी निःसंकोच वन्दे मातरम बोलकर देशभक्त का तमगा तो पा जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ एकेश्वरवाद में विश्वास करने वाले कट्टर इस्लामिक धर्मावलम्बी इसके उच्चारण को लेकर थोड़े असहज हो जाते हैं, क्योंकि इस्लामी धार्मिक मान्यतानुसार एक इस्लामी धर्मावलम्बी को केवल अल्लाह की इबादत करना ही सुन्नत माना गया है। इनके अतिरिक्त अन्य किसी की इबादत के उद्देश्य से सजदा करने को इस्लामी परंपरा के खिलाफ माना जाता है। ऐसे में वे भारत को ईश्वरीय माता के रूप में मानते हुए उसकी इबादत में वंदना करना इस्लामिक धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ मानते हैं। ऐसी स्थिति में कट्टर इस्लामिक धर्मावलम्बी देशभक्ति के प्रमाणपत्र से वंचित हो जा रहे हैं। भले ही उनके दिल में कितना भी देश के लिए समर्पण की भावना क्यों न हो।
          हालांकि इस्लाम का दूसरा पक्ष सूफिवाद ऐसे सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता है, क्योंकि सूफी परंपरा में पीरी, मुरीदी (गुरु शिष्य) परंपरा में कदमबोशी व सजदा जैसे कर्मकांड अभी भी प्रचलन में हैं। प्रगतिशील सोच के इस्लामी धर्मावलम्बी भी इसके उच्चारण को लेकर असहज नहीं होते हैं। धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठ चुके आज के हजारों मुस्लिम युवा इसे न गाने को एक दक़ियानूसी सोच बताते हैं। जिनका मानना है कि यदि इसके उच्चारण से किसी का धर्म भ्रष्ट होता है तो न्यूज़ चैनलों पर वंदे मातरम विमर्श करने वाले मौलवी-मौलाना तो वाद विवाद में दर्जनों बार इसका उच्चारण करते हैं तो क्या इससे उनका धर्म भ्रष्ट नहीं होता है।
          इस्लामी धर्मावलम्बियों के इस कट्टर धार्मिकता पर उग्र हिन्दुत्व के लोग खुद को प्रगतिशील सोच/विचारधारा युक्त दिखाने के लिए इन पर आक्षेप लगाते देखे जा सकते हैं कि इतना भी धर्मांध होना ठीक नहीं। धर्म, राष्ट्र से सर्वोपरि नहीं होना चाहिए। ऐसे छद्म प्रगतिशील लोगों को यदि कहें कि विविध खान-पान की संस्कृतियों वाले हमारे इस धर्मनिरपेक्ष भारत देश में ईसाई, इस्लामी, हिंदू धर्म के अंतर्गत कुछ अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लोग गौमांस का बहुत ही चाव से सेवन करते हैं, इसलिए गौमांस पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए और हो सके तो आपको भी इसका सेवन करना चाहिए, तो इनकी प्रगतिशील सोच की खाल ओढ़े धार्मिक कट्टरता को बेनकाब होने में जरा भी समय नहीं लगेगा। तुरंत यह गर्जना कानों को छेद देगी कि मैं हिंदू हूँ ... हमारे धर्म मे ...।
          इस संदर्भ में दोनों की धर्मांधता को समझा जा सकता है। जैसे हिंदू धर्मावलम्बी चिकन, बकरे का मांस तो खा सकते हैं लेकिन बीफ नहीं, क्योंकि उनका धर्म गौमांस सेवन की इजाजत नहीं देता। वह काम जैसे आपके धर्म में पाप समझा जाता है उसे आप नहीं कर सकते हैं, वैसे ही कट्टर इस्लामिक लोगों को उनका धर्म अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत/वंदना करना सुन्नत नहीं माना जाता। इसलिए वे धार्मिक प्रतीकों से युक्त इस राष्ट्रगीत (वन्दे मातरम) के गायन से हिचकते हैं। अन्य राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान जन गण मन बोलने/गायन से तो कभी कोई समस्या देखने सुनने को तो नहीं मिलती। अतः उनसे ऐसा जबरन बोलने के लिए मजबूर करना, किसी हिन्दू को जबरन गौ मांस खाने के लिए मजबूर करने जैसा ही है। दोनों धर्मावलंबियों की अपनी अपनी धार्मिक मान्यताएं हैं जिनका हर किसी को सम्मान करना चाहिए। सरकार को भी अपनी अखंडता बनाए रखने के लिए राष्ट्र, राष्ट्रगान व राष्ट्रगीतों को दैवीय रूप प्रदान करने से बचना चाहिए । संभव हो सके तो मुसलमानों के लिए अन्य राष्ट्रगीत गाने की छूट दे, क्योंकि राष्ट्रगीत का गायन ही राष्ट्रभक्ति का पैमाना है तो अनेकों राष्ट्रगीतों में से एक उनके लिए भी हो जिनमें धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग न हो।
          हालांकि मेरे विचार से आज के समय में दोनों ही विचार प्रासंगिक नहीं हैं। दोनों धर्मावलंबियों को इन पारंपरिक मान्यताओं को छोड़कर वर्तमान में समय की मांग के अनुसार आचरण करना चाहिए। ये विचार राजतंत्रीय शासन प्रणाली में एक पुरातन समय में प्रासंगिक होंगे जब राजा का धर्म ही प्रजा के लिए मान्य होता था। आज गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में हमें अपने विचार परिवर्तन करते हुए भारतीय संविधान के अनुसार आचरण करने की आवश्यकता है ।
                                                साकेत बिहारी
शोधार्थी – पीएचडी

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
(मूल रूप से HASTKSHEP.COM Online Portal पर प्रकाशित 
http://www.hastakshep.com/hindiopinion/vandematram-16327) 

Tuesday, 24 October 2017

चार दिवसीय अनुष्ठान छठ पूजा का मिथक एवं यथार्थ

हर वर्ष विक्रम संवत, चैत्र व कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से शुरू होकर षष्ठी तिथि तक चलनेवाला लोक आस्था का महापर्व छठ मूलतः बिहार, झारखंड व पूर्वी उत्तरप्रदेश में उतना ही ज़ोरशोर से मनाया जाता है जितना ओणम केरल में, गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र में, रथयात्रा उड़ीसा में । यह त्योहार देश की सीमा के पार मौरिशस, नेपाल, फिजी, त्रिनिदाद, ब्रिटेन व अमेरिका आदि देशों में प्रवासी बिहारियों के माध्यम से अपनी पहचान बना चुका है । प्राचीन काल से ही चला आ रहा यह चार दिवसीय त्योहार ऋग्वैदिककालीन प्रमुख देवता “आदित्य या सूर्य” की उपासना के लिए जाना जाता है । देशभर में सूर्य उपासना से संबंधित अनेक त्योहार मनाए जाते हैं । जैसे मकर संक्रांति (सम्पूर्ण उत्तर भारत में), सम्ब दशमी (उड़ीसा में), रथ सप्तमी (आंध्र प्रदेश) में । इनमें से छठ पूजा का भी विशेष महत्व है । चैत्र व कार्तिक मास के षष्ठी तिथि को मनाए जाने के कारण यह आम जनमानस में षष्ठी पूजा के नाम से प्रचलित है । छठ पूजा इसका ही अपभ्रंश रूप है ।
          सामूहिक रूप से मनाए जाने के कारण धर्म व जातिगत भेदभावों वाले इस देश में यह त्योहार सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है । पवित्रता का त्योहार होने के बावजूद पूजन हेतु हिंदू सामाजिक व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर स्थित डोम या अन्य जो बांस से दौरे, डलिया, सूप बनाने का काम करते हैं, दिया व प्रसाद हेतु मिट्टी के बर्तन बनानेवाले कुम्हार तक इस त्योहार के 4 दिनों तक भेदभाव से मुक्त देखे जा सकते हैं । इस दौरान श्रद्धालुओं को जाति-धर्म, अमीरी-गरीबी, महिला-पुरुष के बीच भेदभाव से रहित देखा जा सकता है । चैत्र व कार्तिक मास के चतुर्थी तिथि से नहाय-खाय जिसमें कद्दू भात (पका चावल) प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, से यह अनुष्ठान परिवार के वयोवृद्ध सदस्य द्वारा शुरू होता है । अगले दिन पंचमी को खरना के अंतर्गत अरवा चावल व दूध से बने प्रसाद का भोग लगाया जाता है । षष्ठी तिथि की संध्या को पकवानों, फल से सजे सूप, दौरे, डलिया को नदी, तालाब के किनारे दूध व जल से डूबते सूर्य को व सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही इस 4 दिवसीय अनुष्ठान का समापन हो जाता है । इस अनुष्ठान को हठयोग भी कहा जाता है क्योंकि व्रती को इन चार दिनों तक व्रत रखने के नियम पालन करने पड़ते हैं ।  
          हिंदू धर्मावलम्बियों के साथ-साथ कुछ अजलाफ़ मुस्लिम परिवारों जो कभी हिंदू धर्म के ही हिस्से हुए करते थे (कालांतर में अस्पृश्यता की समस्या या अन्य कारणों से धर्मांतरण कर लिए) को भी इस त्योहार में काफी सक्रिय देखा जा सकता है । गाँव, समाज का हिस्सा होने के कारण छठ पूर्व गाँव, नदी घाटों की साफ-सफाई से लेकर सप्तमी तिथि को अर्घ्य की समाप्ति (पारण) तक सेवाभावना से शामिल रहते हैं । मधेपुरा के अनेक मुस्लिम परिवार 2008 से ही लगातार छट पूजा करते आ रहे हैं ।[i] हालांकि पिछले 2 दसकों से लोगों पर बाजारवाद, जातिवाद व सांप्रदायिकता के हावी होने के कारण यह दृश्य लगातार लुप्त होता जा रहा है ।
          हिंदू धर्म के अन्य त्योहारों के विपरीत इसमें किसी पुजारी की कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती है । सभी कर्मकांड व्रती द्वारा ही किए जाते हैं । हालांकि हाल के दिनों में पूजन घाटों पर सूर्य देवता की प्रतिमा स्थापना के बढ़ते प्रचलन से इसमें पुजारियों की भागीदारी दृष्टिगत होने लगी है । क्योंकि मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा बिना पुजारी की उपस्थिती व कर्मकांड के संभव ही नहीं । थोड़ा बहुत छोड़कर कोई ख़र्चीले कर्मकांड को अंजाम नहीं दिया जाता है । आडंबरों से दूर प्रकृति के देवता को समर्पित यह त्योहार लैंगिक असमानता को दूर करने का एक सार्थक संदेश देता है । क्योंकि इस व्रत को स्त्री पुरुष दोनों ही करने के अधिकारी होते हैं । सर्वाधिक संख्या स्त्रियों की ही देखी जाती है ।
          सूर्य उपासना या छठ मनाए जाने की रामायण व महाभारत के आख्यानों से संबंधित अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित है । एक मान्यता के अनुसार छठ पूजा की शुरुआत सूर्यपुत्र कर्ण ने की थी जो प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्य देते थे । पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य व लंबी उम्र के लिए सूर्य उपासना किए जाने संबंधी मिथक भी प्रचलित है । एक अन्य मान्यता के अनुसार वनवास के लिए जब राम, लक्ष्मण और सीता के साथ निकले थे तो सीता ने गंगा नदी पर स्थित मुगदल ऋषि के आश्रम में गंगा जी से सकुशल वनवास काल बीत जाने की प्रार्थना की थी । वनवास के बाद अयोध्या पहुँचकर जब राम ने राजसूय यज्ञ करने का संकल्प लिया तो गुरु वशिष्ठ जी के कहने पर कि बिना मुगदल ऋषि के आए राजसूय यज्ञ सफल नहीं होगा, राम और सीता मुगदल ऋषि के आश्रम आए जहां ऋषि ने सीता को छठ पूजन करने की सलाह दी । उनकी सलाह पर सीता ने मुंगेर स्थित गंगा नदी में एक टीले पर सूर्यदेव का पूजन कर पुत्र की कामना की ।[ii] मान्यता है कि मुगदल ऋषि के नामपर ही इस क्षेत्र का नाम मुगदलपुर से अपभ्रंश होकर मुंगेर हो गया ।[iii] मुंगेर में गंगा नदी के मध्य स्थित सीता के चरण-चिन्ह को इस मान्यता का आधार माना जाता है ।
          सीतापद मंदिर से ही संबंधित एक अन्य मान्यता आनंद रामायण में वर्णित है जिसके अनुसार राम द्वारा एक ब्राह्मण रावण के वध किए जाने पर जब राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा तो इस पाप से मुक्ति के लिए मुनि वशिष्ठ ने तत्कालीन मुंगेर अर्थात मुगदलपुरी में ऋषि मुग्दल के पास राम और सीता को भेजा । राम को ऋषि मुद्गल ने वर्तमान कष्टहरणी घाट में ब्रह्महत्या मुक्ति यज्ञ करवाया तथा सीता को अपने पति को ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त कराने के लिए षष्ठी व्रत करने का निर्देश दिया ।
          ऐसे दर्जनों किंवदंतियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं जिनमें कोई समानता नहीं है । सीतापद मंदिर से संबंधित दो अलग-अलग कथाएँ किसी को भी भ्रम में डाल देती हैं कि सत्य किसे मानें । हमारे देश में किसी भी स्थान को प्रसिद्धि दिलाने के लिए, श्रद्धालुओं, पर्यटकों को लुभाने के लिए उन्हें किसी मिथकीय कथाओं से संबद्ध करने की प्राचीन परंपरा रही है । उदाहरण के लिए झारखंड की राजधानी रांची के नजदीक स्थित एक जल के स्त्रोत को देखें, जहां छठ पूजा में स्थानीय लोग अर्घ्य देते हैं । इस सोते (स्त्रोत) के बारे में मान्यता है कि द्रोपदी ने इस सोते के पास छठ किया था । सोचनेवाली बात है कहाँ उत्तर पश्चिम भारत में स्थित कुरुक्षेत्र, कहाँ पूर्वी भारत में स्थित रांची । वैज्ञानिक दृष्टि से इन किंवदंतियों की जांच करने पर अनेकों त्रुटि दृष्टिगत होती है । यदि मुगदल ऋषि वाले दंतकथा की प्रामाणिकता को ही विश्लेषित करें तो वर्तमान उत्तर प्रदेश स्थित अयोध्या व बिहार राज्य स्थित मुंगेर (मुगदल ऋषि का आश्रम, किवदंती अनुसार) के बीच की दूरी 590 – 600 किलोमीटर है । औसतन 60 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से कोई आधुनिक टैक्सी 10 से 12 घंटे लगाएगी । त्रेता युगीन रथ से तो पूरे 2 दिन, जबकि वनवास के दौरान पैदल आने में पूरे एक सप्ताह भी लग जाएंगे । अयोध्या से दक्षिण चलते हुए राम द्वारा केवट की नाव से गंगा पार करने का उल्लेख तो मिलता है । लेकिन 600 किलोमीटर पूर्व आकर फिर से दक्षिण तरफ जाने की बात गलत लगती है । इसके अतिरिक्त रामायण में किसी मुगदल ऋषि का उल्लेख नहीं मिलता है, महाभारत में मुगदल ऋषि का उल्लेख मिलता है लेकिन उनका निवास स्थान कुरुक्षेत्र बताया गया है । ऐसे में षष्ठी पूजा का वास्तविक इतिहास जान पाना काफी कठिन कार्य है ।
          भारत में सूर्य पूजा काफी प्राचीन परंपरा रही है । इतिहासकार जयदेव मिश्र पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर बिहार में छठ पूजा की प्राचीनता 200 ई. पू. निर्धारित करते हैं । कुषाण वंश के सिक्कों से भी सूर्य उपासना का साक्ष्य मिलता है । राज्य में देव (औरंगाबाद) के अतिरिक्त अनेक प्राचीन सूर्य मंदिर पंडारक, मनेर, बड़गांव (नालंदा), सहरसा, से लेकर गया में देखे जा सकते हैं । कश्मीर के मातंग सूर्य मंदिर व उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर के विपरीत देव सूर्यमन्दिर को पूरे देश का एकमात्र सूर्यमंदिर माना जाता है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमभिमुख है ।[iv] इतिहासकार इस मंदिर के निर्माण का काल निर्धारन गुप्तोत्तर काल करते हैं ।[v] सूर्यपूजक कौन थे, उनके क्रमिक विकास का विस्तृत इतिहास आदि आज भी ऐसे अनछूए पहलू हैं जिनपर पर्याप्त शोध की संभावना है ।
                                                                          
                                                                                     साकेत बिहारी, वर्धा (महाराष्ट्र)

(नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र वुमेन एक्सप्रेस 25/10/2017 अंक के छठ पर्व विशेष पृष्ठ पर प्रकाशित)





[i] https://www.ekbiharisabparbhari.com/2017/10/13/bihar-muslim-celebrate-chhath/
[ii] https://www.ekbiharisabparbhari.com/2017/10/20/bihar-mother-sita-did-the-first-chhath/
[iii] http://livecities.in/munger/mother-sita-had-done-chhath-puja-here/
[iv] https://www.ekbiharisabparbhari.com/2017/10/13/chhath-surya-mandir/
[v] https://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/Sun-god-being-worshipped-since-Vedic-period/articleshow/44954463.cms

Sunday, 6 August 2017

डॉ. अम्बेडकर के अपमान का सिलसिला कब तक ?


बचपन में नाई द्वारा बाल काटने से मना किए जाने के साथ शुरू हुआ डॉ. भीम राव अम्बेडकर के अपमान का सिलसिला 1956 ई. में बौद्ध धर्म अपनाने के पूर्व तक अनवरत चलता रहा । आज भारतीय स्वतन्त्रता के 70 वर्ष बाद भी यह अनवरत जारी है । कभी आजम खान द्वारा[i], कभी मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के शिक्षकों द्वारा[ii], कभी जैसलमेर के पार्क में लगी उनकी आदम कद प्रतिमा के साथ अभद्रता[iii], प्रहार कर आदि । अधिसंख्य मामले तो समाचार पत्रों में आते भी नहीं । ताज़ा मामला स्वच्छ भारत निर्माण कार्यक्रम की आड़ में भारत सरकार द्वारा जारी किये गए विज्ञापन का है ।[iv] यह विज्ञापन दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लगाया गया है, जिसमें चार्ल्स डार्विन के मानव विकास सिद्धान्त को चित्रात्मक रूप में दिखाते हुए डॉ. अम्बेडकर को विकसित मनुष्य के रूप में एक कचरे के डब्बे में आपके अंदर के बाबा साहब को जागृत करें” इस नारे के साथ कूड़ा फेंकते हुए दिखाया गया है । वास्तव में यह विज्ञापन नहीं बल्कि विज्ञापन की आड़ में डॉ अम्बेडकर को अपमानित करने, उन्हें नीचा दिखाने की सोची समझी साजिश है ।
            केंद्र में सत्ता प्राप्त करने के साथ ही नव निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2 अक्तूबर 2014 को गांधी जयंती के दिन से इस संकल्प के साथ कि “गांधी जी के 150वें जयंती अर्थात 2 अक्तूबर 2019 तक पूरे देश को साफ सुथरा बना देंगे” स्वच्छ भारत निर्माण कार्यक्रम की नींव डाली थी ।[v] थोड़े बहुत विरोध के बीच पूरे देश की जनता ने स्वच्छता जागरूकता लानेवाले इस कार्यक्रम की तारीफ भी की । उनके आलोचक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी ने भी इसी तर्ज़ पर अपने राज्य में स्वच्छ दिल्ली अभियान कार्यक्रम भी संचालित किया ।  रेलवे में चाय के डिस्पोजल कप से लेकर नव प्रचलित 500, 2000 रुपए के नोट सहित कई उत्पादों पर भारत सरकार के इस कार्यक्रम के प्रचार को देखा जा सकता है । स्वच्छ भारत निर्माण हेतु भारत सरकार का यह कदम प्रशंसनीय है । इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली जी ने 2015 में 0.5 प्रतिशत सेस (टैक्स) भी लगाने की घोषणा की थी ।[vi] प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में कोई भी सरकार किसी कार्यक्रम को सफल बनाने, इसे आम जनमानस में पहुंचाने के लिए बॉलीवुड, खेल, समाज सेवा की दुनिया के मशहूर हस्तियों का ब्रांड एम्बेस्डर के रूप में चुनाव करती है । भारत सरकार ने ऐसा किया भी । अमिताभ बच्चन, सलमान खान, शंकर महादेवन, सचिन तेंदुलकर, अनुष्का शर्मा[vii], कल्पना यादव[viii] प्रियंका चोपड़ा, बाबा रामदेव, काजोल[ix] बाबा राम रहीम आदि इस अभियान से समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर ब्रांड एम्बेस्डर, प्रशंसक के रूप में जुड़े । इस क्रम में फरवरी 2017 में बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी को भी स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम का ब्रांड एम्बेस्डर भी नियुक्त किया गया ।[x] ऐसे में नियमानुसार डॉ. अम्बेडकर की जगह शिल्पा शेट्टी को कूड़ा बीनते हुए दिखाया जाना चाहिए था । लेकिन इस विज्ञापन को बनानेवाले अंत्योदय ग्रुप और इसे अभिप्रमाणित करने वाले अधिकारी ने किया कुछ और ही । यदि डॉ. अम्बेडकर को ही स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम का प्रेरणा स्त्रोत बनाना था तो शिल्पा शेट्टी को ब्रांड एम्बेस्डर बनाने, इसपर लाखों-करोड़ों खर्च करने से मंत्रालय या सरकार को क्या लाभ हुआ ?
            भारतीय संविधान निर्माण से लेकर देश में समता मूलक समाज के निर्माण हेतु योगदान देने वाले डॉ अम्बेडकर के प्रति विज्ञापन निर्माताओं की सोच के आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि ऐसे लोग कभी डॉ. अम्बेडकर के समाज सुधार के संबंध में पढ़ना तो दूर इनके उल्लेखनीय कार्यों के बारे में कभी सुना भी नहीं होगा । डॉ. अम्बेडकर के संबंध में पढ़ा होता तो पता चलता कि इस समाजसुधारक ने हाशिये पर स्थित समाज के एक बड़े हिस्से को नगर का कूड़ा, गंदगी बीनना नहीं बल्कि हजारों वर्षों से तथाकथित हिंदू समाज के उस गंदगी को साफ करने की बात सिखाई जो मानव-मानव में भेद-भाव को बढ़ावा दे रहा था । हिंदू सहित भारतीय समाज की जिस गंदगी को मिटाने की बात वे करते थे, उसे समूल नष्ट करने के लिए आज फिलहाल कम से कम दस प्रतिशत लोग जागरूक हो चुके हैं । जिस दिन 25-30 प्रतिशत जनमानस में इस गंदगी को मिटाने की भावना जागृत हो गयी उस दिन से धर्म, जाति व्यवस्था के नाम पर फैली गंदगी के साथ-साथ डॉ. अम्बेडकर को कूड़ा बीननेवालों के रूप में  रूप में प्रदर्शित करनेवालों के दिमाग में मौजूद कचरा, गंदगी भी खत्म हो जाएगी ।
            इस आलेख का तात्पर्य केवल इतना है कि डॉ. अम्बेडकर से ईर्ष्या रखनेवाले समाज के प्रबुद्ध वर्ग से एक अपील है कि आप पर किसी सत्ता, संस्था का कोई दवाब नहीं है भारतीय संविधान निर्माता, समाज सुधारक डॉ. भीम राव अम्बेडकर का जबरन सम्मान करने, नाम लेने, उनके विचारों को मानने का, लेकिन आपको कोई हक भी नहीं है उन्हें नीचा दिखाने या अपमानित करने का ।





[i] https://www.youtube.com/watch?v=7PNtu3EGlXk
[ii] https://www.youtube.com/watch?v=7FQRAL2LlEo
[iii] http://www.amarujala.com/jaipur/insult-of-statue-of-dr-ambedkar-in-jaisalmer
[iv] http://www.jansatta.com/trending-news/goi-ad-on-delhi-rly-stn-shows-dr-ambedkar-picking-up-trash/393516/
[v] http://www.inkhabar.com/national/7062-reality-check-of-swakch-bharat-abhiyaan
[vi] http://www.inkhabar.com/national/8992-0.5%20per-cent-cess-to-fund-the-Swachh-Bharat-programme
[vii] http://www.dnaindia.com/entertainment/report-anushka-sharma-joins-amitabh-bachchan-chosen-as-brand-ambassador-of-swachh-bharat-abhiyaan-2302410
[viii] http://www.hindustantimes.com/india-news/swachh-bharat-mission-newly-wed-bride-is-brand-ambassador-for-etah/story-RkBVPw5aucjKjP5AfBhGpK.html
[ix] http://www.inkhabar.com/entertainment/6605-Kajol-will-attend-UN-and-Global-Citizen-Festival
[x] http://www.amarujala.com/india-news/shilpa-shetty-as-swachh-bharat-brand-ambassador

(दैनिक समाचारपत्र वुमेन एक्सप्रेस संपादकीय 07-08-2017 में प्रकाशित)