Wednesday, 19 August 2026

प्राचीन भारतीय शिक्षा की वैदिक पृष्ठभूमि एवं वेदों का स्वरूप

यह सर्वमान्य है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा की शुरुआत वेदों के अध्ययन से शुरू होती है. शुरुआत में यह श्रुति के रूप में थी बाद में इसे लेखबद्ध किया गया. अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएं’ शारदा प्रकाशन, इलाहाबाद (2016) में लेखक डॉक्टर एस.पी गुप्ता, डॉक्टर अलका गुप्ता अपना मत अभिव्यक्त करते हैं कि ‘प्रारंभ में वेद केवल एक ही था. भिन्न-भिन्न ऋषियों के द्वारा रचित मंत्रों और यज्ञ की विधि बताने वाले ब्राह्मणों का यह एक संग्रह था. उसी में जो मंत्र पद्य के रूप में आते उन्हें 'ऋक' कहते थे. गान रूप में गाए जाने वाले मंत्रों को 'साम' और गद्य रूप में पढ़े जाने वाले मंत्रों को 'यजु' कहा जाता था. प्रारंभ में सभी द्विज उनका अध्ययन करते थे. किंतु जब विद्वानों ने देखा कि संपूर्ण वेद का ग्रहण और धारण मनुष्य की शक्ति से बाहर होता जा रहा है. तब उन्होंने उस वेद को चार भाग में विभक्त कर दिया जिसे चार संहिताओं के रूप में आज हम देखते हैं’.

वेद का मुख्य विषय यज्ञ है. यज्ञ में यजमान और उसकी पत्नी के अतिरिक्त चार ब्राह्मण कार्यकर्ता आवश्यक होते हैं, जिन्हें 'ऋत्विक' कहा जाता है. उनके नाम होतृ, उदगातृ, अध्वर्यु, और ब्रह्मा हैं. जो देवताओं की स्तुति पढ़ता है, उसे होतृ कहा जाता है. गान के रूप में स्तुति करने वाला उदगातृ कहलाता है. अग्नि में आहुति देने वाला अध्वर्यु है, जो यज्ञ का प्रधान कार्यकर्ता होता है. इन तीनों के कार्यों का निरीक्षण करने वाले को 'ब्रह्मा' कहा जाता था. इन चारों के कार्यों को अलग-अलग बांट देने के लिए वेद को चार भागों में विभक्त किया गया, जिससे कि एक-एक भाग या संहिता पढ़ लेने से उससे संबंधित एक कार्य करने की योग्यता पूर्ण हो जाए. यह चार भाग हैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद.

केवल ऋग्वेद का अध्ययन कर लेने वाला होतृ बन सकता है, इसी प्रकार उदगातृ बनने के लिए केवल सामवेद पढ़ लेने की आवश्यकता है. यजुर्वेद संहिता का अध्ययन कर लेने से अध्वर्यु का कार्य चल जाता है. केवल ब्रह्मा के लिए चारों वेदों को पढ़ने की आवश्यकता होती है क्योंकि वह तीनों ‘ऋत्विक’ का निरीक्षक होता था. यदि उनके कार्यों को वह स्वयं न जानता हो तो निरीक्षण कैसे करेगा? इसके अतिरिक्त शांति, पुष्टि, काम करने के लिए उन्हें अथर्ववेद पढ़ने की भी आवश्यकता होती थी, यज्ञ में ब्रह्मा वही हो सकता है जो चतुर्वेदी हो. स्पष्ट है इन्हीं कारणों से हमें कहीं तीन तो कहीं चार वेद बताए जाते हैं.