Saturday, 25 March 2017

Anti Romio Squad formation का एक पहलू ये भी

Anti Romeo Squad Planning उत्तर प्रदेश सरकार और Telecom कम्पनियों की सोची समझी साजिश है संस्कृती का बचाव तो Secondry Issue है Primary Issue तो है प्रेमी-प्रेमिका को पार्क के बदले घर में ही कैद करना, ताकि facebook, skypee आदि online apps पर Face to Face बात करवाकर Telecom कम्पनियों को फायदा पहुंचाया जा सके वाह योगी जी इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार. संस्कृती की रक्षा भी हो गयी और telecom कम्पनियों का फायदा भी । 

Wednesday, 15 March 2017

आरक्षण खत्म करने का मूलमंत्र

हमारे देश के कुछ/अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग पश्चिमी देशों जैसे अमेरिका, जापान, इंग्लैंड आदि देशों का उदाहरण देते हुए कहते मिल जाएंगे कि इन देशों में जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था नहीं है इसलिए यहाँ के लोग प्रगतिशील, विकसित हैं तथा इन लोगों के सम्मान का आधार इनकी काबिलियत है । लेकिन ये बुद्धिजीवी आपको कभी ये नहीं बताएँगे कि इन देशों में संभवतः कोई मनुस्मृति जैसी वर्ण या जाति व्यवस्था को बढ़ावा देने वाले text नहीं हैं इसलिए यहाँ काबिलियत के आधार पर लोगों का सम्मान किया जाता है । हालांकि इनमें से कुछ देश अभी भी नस्ल या वर्ग आधारित भेदभाव से मुक्त नहीं हैं । बल्कि श्वेत-अश्वेत के आधार पर भेदभाव व्याप्त है । जहां तक बात हमारे देश भारत की है तो हिंदू धर्म में मनुस्मृति व अन्य संस्कृत धर्मग्रंथ इस वर्ण या जातीय आधारित भेदभाव को बढ़ावा देते हैं । आजादी के 6 दशक बाद भी प्रजातंत्रात्मक व्यवस्था में रहने के बाद भी हम राजतंत्र को छोड़ नहीं पाए हैं । जब तक हिंदू राजतंत्र था तबतक हिंदू धर्मग्रंथ के आधार पर सामाजिक व्यवस्था जायज थी । लेकिन आज हम 6 दशकों से प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं जो मनुस्मृति पर आधारित न होकर भारतीय संविधान पर आधारित है । 
भारतीय संविधान कोई धर्मविशेष शासनव्यवस्था की वकालत नहीं करता है । बल्कि सभी धर्म, जाति व जेंडर इसकी नज़र में समान हैं । लेकिन विडम्बना ये है कि वर्ण, जाति के आधार पर निर्मित नफरत के कीड़े हमारे दिलो-दिमाग पर हजारों वर्षों से इस प्रकार कूट-कूट कर भरे हैं कि दिलो-दिमाग से जाने का नाम ही नहीं लेते । वर्ण आधारित या जातिगत भेदभाव के स्थान पर भारतीय संविधान प्रदत्त समानता का अधिकार का अनुसरण/पालन यदि सही तरीके से किया जाय तो आरक्षण की कोई जरूरत ही नहीं रहेगी । पश्चिमी देशों की तरह हमारे यहाँ भी लोगों को काबिलियत के आधार पर सम्मान मिलने लगेगा ।

Friday, 24 February 2017

गधा विमर्श

"हर कुत्ते का एक दिन आता है" ये बचपन से ही सुनते आया ।
आज हाशिये की ज़िंदगी जी रहे गधे का तो पूरा सप्ताह आ गया ।
मीडिया, सोसल मीडिया, विधायक, सांसदमुख्यमंत्रीप्रधानमंत्री, जिसे देखो "गधा विमर्श" में डूबा हुआ है । मैं भी इससे अछूता नहीं रह सका । खुशी है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के ही बहाने मुख्यधारा के #गाय की जगह #गधे को तो प्राथमिकता मिली। प्रधानमंत्री जी ने जिस तरह से गधा महिमा का गुणगान किया । उम्मीद है गौमाता की तरह गधों के भी अच्छे दिन आएंगे ।

Monday, 20 February 2017

धर्मनिरपेक्ष राज्य में प्रधानमंत्री द्वारा सांप्रदायिक द्वेष फैलाने की कोशिश निंदनीय

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रगति पर है । सभी पार्टियां अपनी अपनी ज़ोर आजमाइश में लगी है । वर्तमान सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी व काँग्रेस गटबंधन अखिलेश सरकार के 5 साल की उपलब्धियां गिनाकर, बहुजन समाज पार्टी अपने 5 वर्ष पूर्व कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाने के साथ-साथ सपा राज में गुंडों के बढ़ते वर्चस्व, कानून व्यवस्था की पोल खोलकरजनता का रुख अपने अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश में लगे हैं । सभी को जनमत अपने अपने पाले में दिख रहा है । विभिन्न पार्टियों द्वारा समर्थित न्यूज़ चैनल, समाचार पत्र exit pole द्वारा अपने अपने समर्थित पार्टियों के पक्ष में real या fake माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है । चुनाव आयोग द्वारा धर्म के नाम पर वोट मांगने संबंधी प्रतिबंध लगाने के बाद राम मंदिर निर्माण मुद्दा, हिंदू मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि मुद्दे, तीन तलाक मुद्दे पर राजनीति की नहीं जा सकती । ऐसे में धार्मिक/जातिगत उन्माद फैलाने में माहिर नेता/नेत्री के मुख पर ताले पड़ गए हैं । हालांकि सोसल मीडिया के माध्यम से दबे पाँव ऐसी हरकतें लगातार चल रही है । 
हैरत की बात ये है कि केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के पास सत्तारूढ़ पार्टी को घेरने का कोई मुकम्मल कारण ढूंढ नहीं पा रही है । नोटबंदी इनके लिए जबर्दस्त मुद्दा हो सकता था लेकिन इस असफल नीति के कारण उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश की जनता को जो फजीहत हुई, इसके कारण कोई इस मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं है । पूरे ढाई वर्ष में ऐसी कोई उपलब्धि भी नहीं है जिसके आधार पर वोट की अपील की जा सके । बीजेपी को इस बात का एहसास पहले से है कि सपा और काँग्रेस को देश/उत्तर प्रदेश के मुसलमान के साथ साथ हिंदू जनता भी सपोर्ट करते हैं । यही कारण है कि 73 लोक सभा सीट होने के बावजूद बीजेपी हताश दिख रही है । ऐसे हताशा भरे समय में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उनके पास communal statement से बढ़िया हथियार कोई हो ही नहीं सकता । अंततः इसका दुरुपयोग 20 फरवरी 2017 को उत्तर प्रदेश की फ़तेहपुर में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कर ही दिया । एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में ऐसे गरिमामयी पद से इसका दुरुपयोग काफी निंदनीय है । श्रीमान जी कम से कम पद की गरिमा का तो ख्याल रखिए । एक तरफ आप खुद धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होने की वकालत करते हैं दूसरी तरफ आपके मंत्री संतरी खुद धर्म और जाति के नाम पर ऐसा करते हैं । तब आपके मुख से एक आवाज़ नहीं निकलती । 
कुछ भी अनर्गल statement देने से पहले बीजेपी को पूर्व वर्षों के दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, केरल विधानसभा चुनाव परिणाम को भी याद रखने की जरूरत है ।  

Sunday, 8 January 2017

किसान आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कौन ?


बैंकों का करोड़ो अरबों रूपये दबाए पूंजीपतियों के ऋण चुकाने के लिए सरकार गरीबी से त्रस्त किसान मजदूर व मध्यवर्ग के गुल्लक के पैसे निकाल बैंकों को देने के लिए कभी जन धन योजना तो कभी काले धन निकालने के बहाने नोटबंदी जैसे scheme ले आती है. करोड अरब रूपये का लोन लेने वाले पूंजीपति खुद अरबों रूपये की कंपनी के मालिक हैं व अधिकांश आपराधिक छवि वाले दिग्गज नेताओं के करीबी भी. जिसके कारण बैंक के अफसर डरकर इनपर कोई कार्रवाई नहीं कर पाती है लेकिन बैंकों के कर्ज तले दबे बैंक के अत्याचार से आत्महत्या करने को मजबूर देश के अन्नदाता किसान के कर्ज माफी के लिए कोई योजना नहीं बनाई जाती है । 
 एक report के अनुसार 2012 के बाद कृषि उत्पादों में लगातार ह्रास हो रही है. किसान भी क्या करें वो अपनी स्थिती सुधारने के लिए एड़ी चोटी एक कर कमरतोड़ मेहनत तो करते हैं लेकिन कभी मौसम की मार तो कभी बाजार उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व ही रायपुर के किसान टमाटर का उचित मूल्य नहीं मिलने के कारण इसे सड़क पर फेंकने या लोगों में बांटने को मजबूर हो गए. लेकिन क्या बांटने या सड़कों पर फेंकने से इनकी समस्या हल नहीं हो सकती . सरकार तो चाहती ही है कि किसानों की कमर टूटे, ताकि परेशान होकर किसान कृषि छोड़कर अन्य धन्धे में आ जाएं और उनकी जमीन पूंजीपतियों को दान कर उनसे कमीशन खाते रहे. किसानों पर इतना ही ध्यान सरकार का रहता तो 3600 करोड किसी पत्थर के पुतले के बदले किसानों को मिलता. डीफोल्टरों की जगह किसानों के क़र्ज़ बैंक यह माफ़ कर देते कि बैंक इनसे क़र्ज़ वसूलने में असमर्थ है. 
 क़र्ज़ तले दबकर किसान बैंक के रवैये से परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार पूंजीपतियों के गोद में चैन की सांस सो रही है . यदि कभी जाग भी गयी तो मरहम के रूप में फसल बीमा का लोलिपॉप थमा दिया जिसका फायदा एन केन प्रकारेन बीमा कंपनियों को ही मिलता है. अप्रत्याशित फायदे देखकर आजकल निजी फसल बीमा कंपनियां थोक संख्या में उभर रही हैं. 
 आखिर सरकार कोई सरकारी संस्था क्यों गठित नहीं करती है जो किसानों की स्थिति में सुधार हेतु कोई कार्यक्रम चला सके जैसे मजदूरों के लिए मनरेगा योजना कुछ राहत की सांस के रूप में आई थी . सरकार का 


ध्यान इस ओर नहीं जाना कहीं किसानों के साथ कोई साजिश तो नहीं ? यदि साजिश है तो आखिर क्या गुनाह है गरीब किसानों का ?

Saturday, 7 January 2017

खतरे में प्रजातंत्र

ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाए रखने के लिए मनुस्मृति व अन्य धर्मशास्त्रों की रचना उत्तर भारतीय किसी एक ब्राह्मण या इनके एक समूह द्वारा की गई ज़िसमें शुद्रों तथा मलेच्छों को वर्चस्व के लिये खतरा मानते हुए, उनका मनोबल तोड़ने के लिये उनके साथ भेद भाव के प्रावधान को धर्माशास्त्रों के साथ जोडकर वैध कर लिया । हालांकि तीसरी सदी ई. के दौरान सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन के फलस्वरूप व्यवसायों में आये परिवर्तन ने शूद्रों व स्त्रियों को एक उम्मीद दिखाई, वेदों के अध्ययन से महरूम दलित व स्त्री वर्ग को बौद्ध व अन्य सम्प्रदायों की ओर पलायन से रोकने के लिए वैदिक साहित्य के स्थान पर पौराणिक साहित्य का अध्ययन करने, इनमें लिखित रीति रिवाजों को अपनाने की छूट तो मिली लेकिन आज पुनः समाज को घोर जातिवादी व्यवस्था की ओर ले जाने के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है । पहले तो केवल अस्पृश्य ही इनकी वर्चस्व के लिए खतरा थे लेकिन आज 2000 वर्ष बाद इनके 3 और दुश्मन बढ़ गए । इसाई, मुसलमान व हिंदू धर्म के ही वामपंथी । इन सभी की एकजुटता देखकर मनुवादी व्यवस्था के अनुयाइयों की छटपटाहट को समझा जा सकता है क्योंकि प्रजातंत्र में ये राजतंत्र वाली धर्मसूत्र जैसे सहित्य लिखकर अपनी सत्ता को बचा नहीं सकते ।

ऐसे में स्वभाविक है अब अपनी सभ्यता/संस्कृति पर इतराने वाले नीचे गिरने की सीमा को पार करते हुए गुंडे मवाली का वेश धरकर धमकाते फिरेंगे कभी धार्मांतरण के नाम पर कभी गाय के नाम पर ।  कभी देशभक्ति के नामपर तो कभी आरक्षण के नाम पर । यदि इनकी सत्ता कमजोर नहीं हुई कोई मजबूत विपक्ष नहीं मिला तो वो दिन दूर नहीं जब मनुवादी व्यवस्था सारी न्यायिक प्रणालियों को ध्वस्त कर प्रजातंत्र के स्थान पर राजतंत्रात्मक, कट्टर जातिवादी समाज के रूप में पुनर्जन्म होगा । 

Monday, 17 October 2016

अंध-आस्था के नाम पर बंद हो भारतीय मुद्रा से खिलवाड़




उत्तर मध्य रेलवे का मुगलसराय-वाराणसी रेलखंड। वाराणसी स्टेशन से मुगलसराय जाने के क्रम में जैसे ही ट्रेन काशी से गंगा पर निर्मित मालवीय रेलवे ब्रिज पार करने लगी, कोच में मौजूद अधिकांश लोग विशेषकर प्रौढ़, वृद्ध यात्री अपने-अपने स्थान से उठकर गंगा को निहारते, प्रणाम करते हुए खिड़की से एक, दो या पाँच के सिक्के गंगा में फेंकने लगे। सिक्के इतनी संख्या में फेंके जा रहे थे कि ट्रेन के शोर के बीच भी लोहे के ब्रिज से टकराने से निकलने वाली सिक्के की छन-छनाहट को स्पष्ट सुना जा सकता था। फेंकने वालों में ऐसे भी लोग थे जो किसी भीख मांगने वाले को देखकर नाक-भौं सिकोड़ लेते थे। मेरे सामने बैठी एक वृद्ध माताजी ने तो 10 रुपए का नोट निकाला, अपने पोते के सिर पर तीन-चार बार नजर उतारने के क्रम में घुमाया और खिड़की के पार गंगा में फेंक दिया। उत्सुकतावश सिक्का फेंकने वाले एक सज्जन से ऐसा किए जाने का कारण जानना चाहा तो बहुत ही दार्शनिक अंदाज में उत्तर मिला कि गंगा में सिक्का फेंकना हमारी (हिंदुओं की) सभ्यता- संस्कृति में सदियों से चली आ रही परंपरा है। हमारे धर्म में गंगा को माता कहा जाता है जिसके पवित्र जल से भागीरथ के 60,000 पितरों को मुक्ति मिली थी। गंगा में स्नान करने से मनुष्य के पाप धुल जाते हैं, इसलिए लोग श्रद्धा से गंगा मईया को द्रव्य दान देते हैं। कुछ ऐसा ही एक अन्य नजारा हरिद्वार के हर की पौड़ी में भी देखने को मिला। एक बंधु गंगा में डुबकी लगाने से पहले एक सिक्का गंगा की तेज धारा में फेंकते हैं और डुबकी लगाते हैं। एक स्थानीय पुजारी से इस संदर्भ में बात किया तो पूर्व की भांति ही उत्तर मिला कि व्यक्ति द्वारा किए गए पाप को धुलकर पुण्य की प्राप्ति हेतु श्रद्धालु माँ गंगा को द्रव्य दान करते हैं। गंगा ही नहीं देश के अन्य तीर्थ स्थानों पर निर्मित कृत्रिम तालाबों के संबंध में भी यही मान्यता प्रचलित है। झारखंड राज्य में देवघर एक शैव तीर्थ है जो दो माह (सावन व भाद्रपद) तक चलने वाले श्रावणी मेले के लिए विश्वप्रसिद्ध है। शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के उद्देश्य से श्रद्धालु मुख्यतः दो गंगा घाटों पर स्नान करते हैं - (1) सुल्तानगंज (भागलपुर, बिहार) का गंगा घाट तथा (2) सीमेरिया (बेगूसराय, बिहार) का गंगा घाट। इन दो महीनों में करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु लगभग इतनी ही संख्या में सिक्के गंगा नदी में दान कर स्नान करते हैं। तत्पश्चात देवघर आकर लंकापति रावण द्वारा स्थापित शिवलिंग (दंतकथानुसार) पर जलाभिषेक करते हैं। मंदिर के नजदीक ही एक बड़ा तालाब शिवगंगाहै। श्रद्धालु इस शिवगंगा में भी पुण्य प्राप्ति के उद्देश्य से सिक्के दानकर स्नान करते हैं। हालांकि यहाँ के एक पुजारी जी का मानना है कि स्थानीय शिवगंगातालाब में द्रव्य दान की परंपरा मंदिर स्थापना काल से ही चली आ रही है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु इसमें स्नान करते हैं जिससे तालाब का पानी अशुद्ध हो जाता है। अतः पानी की शुद्धता को बनाए रखने के उद्देश्य से पहले तांबे के सिक्के को तालाब में डालने की प्रथा प्रचलित हुई लेकिन अब तांबे के सिक्के प्रचलन में नहीं है फिर भी तालाब में सिक्का डालना यहाँ का रिवाज बन गया है। इसी प्रकार गंगोत्री, यमुनोत्री, नर्मदा आदि नदियों सहित समय-समय पर उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद में होने वाले कुम्भ स्नान, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, अमावस्या, मकर संक्रांति, बिहार में प्रचलित कार्तिक स्नान, छठ पूजा के दौरान भी अरबों रुपए के सिक्के अंध-आस्था में नदियों में बहा दिये जाते हैं ।
 हालांकि यह कहना भी अतिशयोक्तिपूर्ण होगा कि सारे सिक्के गंगा नदी में बह जाते हैं । हरिद्वार, इलाहाबाद, वाराणसी सहित अन्य गंगा घाटों पर एक लंबी पतली रस्सी में चुंबक लगाकर सिक्के बीनते या गहरे पानी में गोता लगाकर सिक्के निकालतें सैकड़ों बच्चों व किशोरों को देखा जा सकता है। कई स्थानों पर तो इन सिक्कों को निकालने के लिए ठेके भी लिए-दिये जाते हैं। गोते लगाकर ये लोग सिक्के निकालने का काम करते हैं। फिर भी संभवतः ये प्रतिदिन नदी की तेज धार में डाले गए कुल सिक्कों का 50 प्रतिशत ही निकाल पाते होंगे। बाकी 50 प्रतिशत सिक्के या तो मिट्टी में दब जाते हैं या नदी की तेज धार में बहकर अन्यत्र चले जाते हैं जो शायद ही दुबारा भारतीय खजाने में वापस आ पाते होंगे। तालाब के सिक्कों को तो तालाब की सफाई के क्रम में निकाल लिया जाता है, जो मंदिर कोष में जमा कर लिया जाता है। लेकिन हर की पौड़ी, हरिद्वार की गंगा के तेज धारा या कोई पुल पर खड़ी बस या ट्रेन से फेंके गए सिक्के को निकालने का शायद ही कोई हिम्मत कर पाये। 
 नदियों में सिक्के फेंकने के पीछे कई मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता यह है कि विश्व की सभी मानव सभ्यताएँ शुद्ध जल प्रदान करने वाले नदियों के किनारे ही विकसित होते थे। निवासियों को पेय जल, सिंचाई के लिए नदियों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। इसलिए इन नदियों को पवित्र व आभारी मानकर इनकी पूजा किया जाता था तथा द्रव्य दान करना इस पूजा का ही हिस्सा होता था। एक अन्य मत है कि कुछ समुदाय इस वैज्ञानिक तथ्य से परिचित हुए कि तांबे में पानी के बैक्टीरिया को नष्ट करने की क्षमता होती है। चुकी खाद्यानों से उन्हें ताम्र धातु की प्राप्ति नहीं हो पाती थी। अतः उन्होनें इसका लाभ लेने के उद्देश्य से तांबे के सिक्कों को नदियों व तालाबों में डालना शुरू कर दिया। एक अन्य मान्यता यह है कि हिंदू धर्मावलंबी अपने मृतकों का दाह संस्कार नदियों में ही करते हैं। कई बार बिना जलाए ही मृत शरीर को विसर्जित कर दिया जाता है जिससे उस नदी का जल उस गलित शरीर के हानिकारक बैक्ट्रिया से प्रदूषित हो जाता है। अतः इस प्रदूषण से नदी को बचाने के लिए उसके जल की शुद्धि के लिए तांबे का सिक्का डालने का रिवाज था। 
 उपरोक्त मान्यताएँ सत्य हों या न हों लेकिन आज के समय में इन्हें प्रासांगिक नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि आज हमारे देश में तांबे का सिक्का प्रचलन में नहीं है। ऐसे में निकेल, स्टेनलेस स्टील या लौह धातु से निर्मित सिक्कों को नदियों में पानी शुद्ध करने के उद्देश्य से फेंकना कोई बुद्धिमानी नहीं बल्कि भारतीय मुद्रा के साथ खिलवाड़ करना है। रिजर्व बैंक से प्राप्त एक आर. टी. आई. के अनुसार आरबीआई को 10 रुपए जारी करने में लगभग 10 प्रतिशत का लागत आती है। अर्थात 10 रुपए का नोट जारी करने में रिजर्व बैंक को एक रुपए का खर्च आता है। इसी तरह 1 रुपए के नोट जारी करने में 1 रुपए 14 पैसे का खर्च आता है। एक या दो रुपए के सिक्के ढालने में भी लगभग इतना ही या इससे कुछ कम खर्च आता होगा। ऐसे में यदि प्रतिदिन पूरे देश में 1 लाख श्रद्धालु भी गंगा की तेज धार में सिक्के फेंकते हैं जिसमें से आधे यदि निकाल लिए जाते हैं। इसके बावजूद भी भारत सरकार को प्रतिदिन 50,000 रुपए का तथा सालाना 22 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। आज जबकि हमारे देश में महंगाई अपने चरमोत्कर्ष पर है, आर्थिक स्थिति से तंग आकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में जागरूकता फैलाकर भारतीय मुद्रा से हो रही खिलवाड़ रोककर देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है। भारत सरकार व भारतीय रिजर्व बैंक को इस दिशा में यथाशीघ्र उचित कदम उठाना चाहिए। जिस प्रकार भारतीय रिजर्व बैंक ने नोटों पर कुछ भी लिखना अपराध घोषित किया है, उसी तरह इस अंध-आस्था के कारण भारतीय मुद्रा को होनेवाले नुकसान से बचाने के लिए ऐसे ही कठोर कानून लाने की जरूरत है। यदि रोक नहीं लगाया गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमारा देश भी भयानक आर्थिक मंदी या मुद्रा की कमी से जूझ सकता है। 



(दैनिक समाचारपत्र वुमेन एक्स्प्रेस के 18/10/2016 के संपादकीय पृष्ठ में प्रकाशित)