प्राथमिक
शालाओं में कक्षा पहली से पांचवीं तक हिंदी भाषा शिक्षण कविता, कहानी जैसे अनेक
विधाओं के माध्यम से कराई जाती है. यह शिक्षण मुख्यतः पाठ्यपुस्तक पर केंद्रित
होता है. दो अलग अलग दौर (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एवं 2020) के पाठ्यपुस्तकों
को यदि विश्लेषित किया जाए तो तो इनमें भाषा शिक्षण की दो पद्धतियाँ दृष्टिगत होती
हैं - (1) वर्णमाला पद्धति – जिस पद्धति से हम सभी अर्थात 2018 से पूर्व के बच्चों
ने हिंदी भाषा पढ़ना-लिखना सीखा. इस पद्धति में पढ़ने की शुरुआत हिंदी वर्णमाला (स्वर
एवं व्यंजन) से करते हुए बिना मात्रा वाले शब्द, अलग-अलग मात्राओं/ध्वनियों वाले
शब्द पर समझ बनाते हुए शिक्षक कुछ परिचित शब्द, तत्पश्चात अपरिचित शब्दों की समझ
के साथ पठन कराते हुए अंत में वाक्य पठन की ओर बढ़ते थे.
दूसरी पद्धति है (2) संदर्भ पद्धति – जिस पद्धति से पढ़ाने
के लिए 2018 के बाद छत्तीसगढ़ के कक्षा 1 का पाठ्यपुस्तक निर्मित किया गया था. इस
पाठ्यपुस्तक में शुरुआत एक मजेदार बालगीत ‘छह साल की छोकरी’ (शीर्षक - आम की
टोकरी) से की गई है. पूर्व की तरह ही अपेक्षा यह थी कि शिक्षक इस मजेदार बालगीत को
हाव-भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ सुनाते/वाचन करते हुए, बच्चों को आनंद लेने की
प्रक्रिया में शामिल करें, तत्पश्चात बालगीत में प्रयुक्त किसी परिचित शब्द के
माध्यम से उस शब्द की बनावट (शब्द को बोर्ड पर लिखते हुए) उसमें प्रयुक्त हुई
ध्वनियों पर बात करते हुए किसी वर्ण तक पहुंचा जाए. इससे पूर्व पाठ में दिए गए
चित्रों को देखकर समझने (लोगोग्राफिक पठन) और मौखिक रूप से अभिव्यक्त करने संबंधी भी
अपेक्षा थी.
पाठ्यपुस्तक के अवलोकन से इतना तो पता चला कि यह तकनीक
भाषा सिखाने की पारंपरिक तकनीक से अलग एक प्रयोग था. लेकिन वर्णमाला पद्धति की जगह
इस सन्दर्भ पद्धति को लागू करने के पीछे निहित तर्क आज तक समझ नहीं आया. आज अज़ीम
प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘पाठशाला : भीतर और बाहर’ के एक आलेख
(संवाद) ‘क्या सभी बच्चों को स्कूल में गणित सिखाना चाहिए?’ को पढ़ते हुए इसके पीछे
निहित तर्क समझ आया.
संवाद करते हुए भाषाविद आलोक तिवारी कहते हैं, ‘बच्चों को
सबसे पहले भाषा सिखाने की जरूरत है. उस भाषा का व्याकरण बाद में. अर्थात कबूतर
पहले बताने की जरुरत है, ‘क’ बाद में’. भाषा सिखाने की शुरुआत भी मूर्त रूप में
होना चाहिए. यही कारण है कि तब से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप
पाठ्यपुस्तक के डिजाईन होने के बीच के समय में प्रशिक्षणों में वर्णमाला पद्धति की
जगह सन्दर्भ पद्धति के साथ काम करने को जोर दिया गया.