प्राथमिक
शालाओं में कक्षा पहली से पांचवीं तक हिंदी भाषा शिक्षण कराई जाती है. दो अलग अलग
दौर के पाठ्यपुस्तकों को देखा जाए तो भाषा शिक्षण की दो पद्धतियाँ दृष्टिगत होती
हैं - (1) वर्णमाला पद्धति – जिस पद्धति से हम सभी अर्थात 2018 से पूर्व के बच्चों
ने पढ़ा. इस पद्धति में पढ़ने की शुरुआत वर्णमाला से करते हुए बिना मात्रा वाले शब्द
होते हुए परिचित शब्द, तत्पश्चात बड़े-बड़े अपरिचित शब्दों की समझ के साथ पठन. अंत
में वाक्य पठन की ओर बढ़ते थे.
दूसरी पद्धति है (2) संदर्भ पद्धति – जिस पद्धति से पढ़ाने
के लिए 2018 के बाद छत्तीसगढ़ के कक्षा 1 का पाठ्यपुस्तक निर्मित किया गया था. इस
पाठ्यपुस्तक में शुरुआत एक मजेदार बालगीत ‘छह साल की छोकरी’ (शीर्षक - आम की
टोकरी) से की गई है. अपेक्षा यह थी कि बालगीत में प्रयुक्त किसी परिचित शब्द के
माध्यम से उस शब्द की बनावट उसमें प्रयुक्त हुई ध्वनियों पर बात करते हुए किसी
वर्ण तक पहुंचा जाए. इससे पूर्व पाठ में दिए गए चित्रों को देखकर समझने (लोगोग्राफिक
पठन) और मौखिक रूप से अभिव्यक्त करने संबंधी अपेक्षा थी.
पाठ्यपुस्तक के अवलोकन से इतना तो पता चला कि यह तकनीक
भाषा सिखाने की पारंपरिक तकनीक से अलग एक प्रयोग था. लेकिन वर्णमाला पद्धति की जगह
इस सन्दर्भ पद्धति को लागू करने के पीछे निहित तर्क आज तक समझ नहीं आया. आज अज़ीम
प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘पाठशाला : भीतर और बाहर’ के एक आलेख
(संवाद) ‘क्या सभी बच्चों को स्कूल में गणित सिखाना चाहिए?’ को पढ़ते हुए समझ आया.
भाषाविद आलोक तिवारी कहते हैं, ‘बच्चों को सबसे पहले भाषा
सिखाने की जरूरत है. उस भाषा का व्याकरण बाद में. अर्थात कबूतर पहले बताने की
जरुरत है, ‘क’ बाद में’. भाषा सिखाने की शुरुआत भी मूर्त रूप में होना चाहिए. यही
कारण है कि तब से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यपुस्तक के
डिजाईन होने के बीच के समय में प्रशिक्षणों में वर्णमाला पद्धति की जगह सन्दर्भ
पद्धति के साथ काम करने को जोर दिया गया.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बच्चों को भाषा सिखाने
के लिए पारंपरिक तकनीक की जगह यह पद्धति कहीं ज्यादा असरदार है जो बच्चों को सोचने
के साथ साथ अपने पूर्व अनुभव का उपयोग करते हुए अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के
मौके देता है.