Tuesday, 3 July 2018

हिंदी/हिंदी पत्रकारिता के विकास में सरस्वती पत्रिका का योगदान

एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी भी भाषा को समृद्ध करने में उस भाषा की साहित्यिक विधाएँ अर्थात उस भाषा में लिखित कविता, कहानी, निबंध, यात्रा संस्मरण आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्राचीन काल से लेकर बीसवीं सदी तक इन विधाओं ने संस्कृत, फारसी भाषी साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। पत्रकारिता क्षेत्र के दिनों दिन बढ़ती लोकप्रियता, या यूं कहें कि दिन-प्रतिदिन की खबरों को अपनी भाषा में जानने की लोगों की उत्सुकता ने अनेक क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध करने का कार्य किया। हिंदी को भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक लाने में पत्रकारिता व उसके प्रमुख स्तंभों की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ब्रिटिश काल से शुरू हुई पत्रकारिता के साथ-साथ हिंदी भाषा को राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में 'सरस्वती पत्रिका' का विशेष योगदान रहा है। सरस्वती पत्रिका के योगदान पर नज़र डालने से पूर्व एक संक्षिप्त नज़र औपनिवेशिक काल में पत्रकारिता एवं हिंदी पत्रकारिता के उद्भव, विकास व स्थिति पर डालना आवश्यक है ताकि इसके योगदान का थोड़ा तुलनात्मक अध्ययन भी किया जा सके।

पत्रकारिता का एक संक्षिप्त इतिहास

          वैश्विक जगत में पत्रकारिता की शुरुआत 131 ई. पूर्व रोम से मानी जाती है। वैश्विक जगत में पत्रकारिता की शुरुआत 131 ई. पूर्व रोम से मानी जाती है। इस दैनिक समाचार पत्र का नाम था - Acta Dieurna. इसका हिंदी अर्थ है - दिन की घटनाएं। वास्तव में यह पत्थर या धातु की पट्टी होता था जिस पर प्रतिदिन के समाचार अंकित किए जाते थे। ये पट्टियाँ रोम के प्रमुख स्थानों पर रखी जाती थी, इनमें वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णय, लड़ाइयों के निर्णय मुख्यतः अंकित किए जाते थे।[i] मध्यकाल में भी यूरोप के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में पत्रकारिता उद्देश्यों की पूर्ति के लिए 'सूचना पत्र' निकाले जाने का उल्लेख मिलता है। सूचना पत्र में कारोबार, क्रय-विक्रय, मुद्रा के उतार-चढ़ाव संबंधी सूचनाएं हाथ से लिखे जाते थे।

          इसी क्रम में 16 वीं शताब्दी के अंत में यूरोप के शहर स्ट्रॉसबर्ग के एक व्यापारी ने धनवान ग्राहकों के लिए सूचना पत्र हाथ से लिखवा कर प्रकाशित करने का काम शुरू किया। चूंकि हाथ से लिखने का काम काफी महंगा और धीमा होता था, ऐसे में 1605 ईसवी में उसने छापे की मशीन खरीद कर (इसका आविष्कार 15 वीं शताब्दी के मध्य में योहन गुटनबर्ग द्वारा किया जा चुका था) समाचार पत्र छापने लगा। इस समाचार पत्र का उसने नाम दिया - रिलेशन। इसे विश्व का सबसे पहला मुद्रित अखबार माना जाता है। इस छापे की मशीन के अविष्कार ने पत्रकारिता को मोड़ देने का कार्य किया। भारत में भी इसका प्रभाव दिखा। भारत का पहला अखबार 1776 ईस्वी में प्रकाशित हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी का भूतपूर्व अधिकारी विलियम बोल्ट के पास इसके प्रकाशन का जिम्मा था। ईस्ट इंडिया कंपनी एवं सरकार से संबंधित समाचार को यह समाचार पत्र प्रसारित करता था। जेम्स ऑगस्टस हिक्की के समय से पत्रकारिता का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। जेम्स हिकी के काल से समाचार पत्र में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का समावेश देखने को मिलता है। इससे पूर्व यह सरकार की गतिविधियों की सूचना देने भर तक सीमित था। या यों कहें कि सत्तारूढ़ सरकार के मुखपत्र होते थे।

          ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी गेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 ईस्वी में 'बंगाल गजट' नाम से अखबार प्रकाशन शुरू किया। इसके प्रकाशन के साथ ही भारत में पत्रकारिता की शुरुआत होती है।

हिंदी पत्रकारिता का संक्षिप्त इतिहास  

हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 30 मई 1826 ई. से होती है जब युगल किशोर शुक्ल, जो हिंदी भाषी क्षेत्र कानपुर के रहने वाले थे और वकालत करने कलकत्ता (वर्त-;मान कोलकाता) में रहते थे, के सम्पादन में कोलकाता से हिंदी का प्रथम समाचार-पत्र उदन्त मार्तंड का प्रकाशन शुरू हुआ।[ii] यह एक साप्ताहिक अखबार था जिसमें विभिन्न नगरों की सरकारी गतिविधियों के साथ-साथ वैज्ञानिक खोजों से संबंधित समाचार प्रकाशित होते थे। चूंकि यह एक गैर हिंदी प्रदेश से प्रकाशित होता था, जहां इसके पाठक कम संख्या में होते थे। अधिकांश पाठक हिंदी भाषी क्षेत्र के होते थे। उन तक भेजने के लिए डाक संचार एक प्रमुख साधन था, जो काफी खर्चीला था। तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार से डाक खर्च में मदद नहीं मिलने के कारण आर्थिक आभाव में डेढ़ वर्ष के दौरान कुल 79 अंक निकलने के पश्चात 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया।[iii] इसी समाचार पत्र प्रकाशन के लिए प्रत्येक वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उदन्त मार्तंड के पश्चात अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ जैसे बंगदूत, बनारस अखबार, सुधाकर, बुद्धि प्रकाश, समाचार सुधावर्षण, पयामे आजादी, बाल बोधिनी, हरिश्चंद्र मैगजीन, हिंदोस्तान आदि निकाली गई। 1867 ई. में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने प्रारंभ में मासिक, तथा बाद में साप्ताहिक प्रकृति की पत्रिका ‘कवि वचनसुधा’ निकाला जो प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का प्रकाशन करती थी। इसके प्रकाशन के साथ ही हिंदी पत्रकारिता के नए युग का आरंभ माना जाता है। इसके कुछ वर्ष पश्चात 1873 ई. में भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने ही हिंदी की मासिक पत्रिका ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ निकाला जिसमें पुरातत्व, उपन्यास, कविता, आलोचना, ऐतिहासिक, राजनीतिक, साहित्यिक, दार्शनिक लेख-कहानियाँ तथा व्यंग्य प्रकाशित होते थे। तत्पश्चात 1874 ई. में उन्होंने (भारतेन्दु हरिश्चंद्र) महिलाओं के लिए मासिक पत्रिका ‘बाल-बोधिनी’ पत्रिका निकाला,  1877 ई. को बालकृष्ण भट्ट के संपादकत्व में प्रयाग से ‘हिंदी प्रदीप’ मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान की। इसमें नाटक, साहित्य, इतिहास, दर्शन से संबन्धित खबरें रहती थी जो राष्ट्रीयता, निर्भीकता तथा तेजस्विता के स्वर से लैश होती थी। यही कारण है कि ब्रिटिश सरकार इसपर कड़ी नज़र रखती थी। कोलकाता से भारत मित्र (1878) हिंदी का पहला पत्र था जो हजारों की संख्या में छपता था। इनके अतिरिक्त सार सुधा निधि (1879), सज्जन किर्ति सुधाकर (1879), उचित वक्ता (1880), भारतीय जीवन (1884) आदि औपनिवेशिक काल में प्रकाशित होने वाली प्रमुख हिंदी भाषी पत्र पत्रिकाएँ थी।

          इसी क्रम में मदन मोहन मालवीय जी ने अपने सम्पादन में हिंदोस्तान (1885) निकला, जो हिंदी क्षेत्र से प्रकाशित होने वाला प्रथम सम्पूर्ण हिंदी दैनिक पत्र था। इसी क्रम में शुभचिंतक (1887), हिंदी बंगवासी(1896), साहित्य सुधानिधि(1893), नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1896) प्रकाशित हुई। इन सभी पत्रिका का मुख्य उद्देश्य सामाजिक व जातीय उन्नयन के साथ-साथ अंग्रेजी के खिलाफ हिंदी भाषा का प्रचार करना था। क्योंकि 1867 ई. तक विदेशी (अंग्रेजी) शिक्षा के कारण परंपरागत विचारधारा लुप्त होती जा रही थी। इस तरह 1868 ई. से शुरू हुआ हिंदी पत्रकारिता का युग 1900 ई. तक अपने उद्देश्य प्राप्ति में लगा रहा। हिंदी पत्रकारिता का यह युग हिंदी गद्य निर्माण का युग माना जाता है। इस युग के पत्रों में राजनीति साहित्य, व्यंग्य, ललित निबंधों की संख्या अधिक रहती थी। इस युग को भारतेन्दु युग कहा जाता है।

हिंदी पत्रकारिता की इसी कड़ी में 1900 ई. में सरस्वती नामक हिन्दी पत्रिका का इलाहाबाद से प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में इसका नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। क्योंकि अपने प्रकाशन प्रारंभ होने से लेकर 1980 में बंद होने के 80 वर्षों के दौरान हिंदी भाषा को विस्तार देने में इस पत्रिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह अपने समय की सबसे युगांतकारी हिन्दी पत्रिका थी जो अपनी छपाई, सफाई, कागज तथा चित्रों के कारण शीघ्र ही काफी लोकप्रिय हुई। इलाहाबाद से प्रकाशित इस पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ में चिंतामणी घोष ने किया। प्रारंभ में इस पत्रिका को ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का अनुमोदन प्राप्त था जो बाद में समाप्त हो गया। इसके संपादक मण्डल में बाबू राधाकृष्ण दास, बाबू कर्तिका प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरिदास गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुंदर दास थे। 1903 ई. में इसके सम्पादन का कार्यभार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के जिम्मे आ गया। 1920 ई. तक वे इस पत्रिका के संपादक रहे। इस दौरान इलाहाबाद के अतिरिक्त झाँसी तथा कानपुर से भी इसका प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका को प्रकाशित करने का मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषी क्षेत्र में राष्ट्रीय व सांस्कृतिक जागरण करने के साथ-साथ हिंदी रसिकों के मनोरंजन व उनके हिंदी भाषा के सरस्वती भंडार की वृद्धि करना था। इसके पद्य, गद्य, नाटक, पत्र, हास्य, परिहास, कौतुक, पुरावृत्त, विज्ञान, शिल्पकला, सभी संपादक के व्यक्तित्व की घोषणा करते हैं। इस पत्र में साहित्य, पुरातत्व, चरित्र चर्चा, विज्ञान, आलोचना, विवेचन और प्रकीर्ण ये सात शीर्षक होते थे। पत्रिका की भाषा त्रुटिरहित तथा व्याकरणसम्मत होने के कारण इसे विशेषरूप से प्रसिद्धि मिली। जून 1980 ई. में निसीथ राय के सम्पादन के दौर में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

          इस प्रकार 19वीं सदी में हिंदी पत्रकारिता का उद्भव व विकास विषम परिस्थितियों में हुआ। इस समय जो भी पत्र पत्रिकाएँ निकलती थी उनके सामने अनेक बाधाएँ आती। कुछ इस बाधा को पार कर जाती तो कुछ बंद हो जाती।

          18वीं शताब्दी में अपने शुरुआत से लेकर भारत की आजादी के पूर्व तक जहां हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने वाले गिने-चुने पत्र-पत्रिकाएँ हुआ करते थे, आजादी के बाद इनकी संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई। यही कारण है कि 1956 में इनकी संख्या बढ़कर लगभग 1000, तथा 1982-83 में 5000 हो गई। इन पत्रिकाओं के लगातार योगदान से ही आज हिंदी पत्रकारिता संस्था हिंदी भाषी राज्यों के अतिरिक्त लगभग प्रत्येक गैर हिंदी-भाषी राज्यों में सक्रिय है।

Sunday, 1 July 2018

बलात्कार विरोध की आड़ में सांप्रदायिक राजनीति का खेल


बलात्कार जैसे अपराध को कोई भी धर्म का पुरुष अंजाम दे सकता है, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान । मंदसौर रेप कांड में 7 वर्षीय पीड़िता के प्रति सहानुभूति और आरोपी इरफान के प्रति गुस्सा मुझे भी है । घटना के बाद से ही आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है, लड़की चुकी नाबालिग है इसलिए आरोपी को Pocso act के तहत फांसी तो होगी ही लेकिन सोसल मीडिया पर उसका नाम लेकर फांसी देने की मांग की आड़ में सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाने वाली घिनौनी राजनीति का खेल चल पड़ा है । फेसबुक पर यह खेल विभिन्न समूहों के माध्यम से काफी तेजी से चल रहा है । जानबूझकर इस घटना की तुलना कठुआ और उन्नाव रेप कांड से करते हुए उस समय पीड़िता के पक्ष में इंसाफ मांगने वालों को निशाना बनाया जा रहा है, सिर्फ इसलिए कि उन दोनों कांडों पर बोलनेवालों को हिंदू विरोधी और इस कांड पर चुप रहने वाले को मुसलमानों का हितैषी बताकर हिंदू मुसलमान के मुद्दे जागृत किया जा सके और आने वाले चुनाव में इसका लाभ उठाया जा सके ।
          पूरा देश जानता है कि कठुआ रेप कांड हो या उन्नाव रेप कांड दोनों को मीडिया कवरेज के साथ-साथ सेलिब्रिटी से लेकर आम जनता का जनाक्रोश सिर्फ इसलिए जागृत हुआ था कि दोनों कांड में रेप विक्टिम को इंसाफ देने की जगह आरोपी को बचाने की कोशिश की जा रही थी । न्याय दिलाने वाले वकील सहित उनके अपने आरोपियों के पक्ष में रैली निकाल रहे थे । जबकि मंदसौर कांड का आरोपी जो मुस्लिम धर्म का है, पुलिस गिरफ्त में है, लेकिन उसे बचाने के लिए न कोई मुस्लिम संगठन न अन्य कोई सामने आ रहा । बल्कि एक मुस्लिम संगठन ने तो आरोपी पर गुस्सा दिखाते हुए उसे कब्रिस्तान में भी जगह न देने की घोषणा की है । बहुत से मुस्लिम उसे फांसी देने की मांग करते प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं । अर्थात आरोपी को कोई बचा नहीं रहा । pocso act के तहत उस पर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी ही । वह फांसी की सजा से बच नहीं सकता।
          बावजूद इसके इस मुद्दे को सांप्रदायिक रूप देकर हिन्दू-मुसलमान के बीच तनाव बढ़ाने की सोची समझी साजिश चल रही है । सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए ।

Tuesday, 19 June 2018

किन्नर की आरज़ू




स्त्री शरीर में कैद पुरुष या पुरुष शरीर में कैद स्त्री गुण
वैश्विक समाज में बस यही मेरी पहचान है ।
कहने को तो, औरों की तरह इस धरती की ही संतान हैं हम
लेकिन धरावासियों के लिए तो जैसे बिन बुलाए मेहमान हैं हम ।
कैसे बयां करें अपनी बदकिस्मती, अपनी पीड़ा को,
आशीर्वचनों से हम जिस समाज को
लंबी उम्र, खूब तरक्की करने की दुवाएँ देते हैं ।
वही समाज हमें ...
जनाने-मर्दाने से इतर
किन्नर, छक्का, हिजड़ा कहकर हमारा उपहास उड़ाते हैं ।
कैसे बताएं कि प्रकृति प्रदत्त इस नासूर को हम
नियति मान कैसे जीवन भर ढोते हैं ?
नाच-गान से समाज को गुदगुदा कर
भिक्षाटन कर चंद सिक्के कमाते हैं ।
जीते जी नौकरी-रोजगार की जगह
लैंगिक गालियां-झिड़कियाँ ही पाते हैं
इस नरक से छुटकारा मिलने के बाद भी  
ढाई गज जमीन भी नसीब नहीं होती ।
क्यों ?
समाज निर्मित सौन्दर्य के पैमाने में
हम थोड़े अलग-थलग हैं तो क्या हुआ ?
24 कैरेट मर्दानगी नहीं, माँ बनने की क्षमता नहीं,
तो क्या हम इंसान नहीं ?
बहुत जी लिए इस नाच-गान, दुवाएँ देने, तालियाँ पीट-पीट,
भिक्षाटन कर जीवन जीने की परंपरा को,
अब इज्जत-सम्मान भरी ज़िंदगी जीना चाहते हैं हम ।
चाँद-मंगल-दूसरी दुनिया तक जाने की हमारी भी है आरज़ू
अपने अनगिनत सपने को हकीकत में बदलना चाहते हैं हम ।
अपनी इस अभिशप्त ज़िंदगी से मुक्ति चाहते हैं हम ।
अब इज्जत-सम्मान भरी ज़िंदगी चाहते हैं हम । 

{मूल रूप से अलवर (राजस्थान) से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका भर्तृहरि टाइम्स (13 मई - 18 जून 2018) संयुक्तांक में प्रकाशित} 




Saturday, 12 May 2018

मेरी माँ ने बनाया मुझे जेंडर संवेदनशील


बात उन दिनों की है जब मेरी माँ साइटिका बीमारी से पीड़ित होने के कारण ज्यादा चल फिर नहीं पाती थी । 4 सदस्यों वाला हमारा छोटा सा परिवार था । जिसमें हम दो भाई माँ और पिताजी थे । बड़े भैया दिल्ली में रहते हुए स्नातक में अध्ययनरत थे । ऐसे समय में पिताजी और मैं पूरे तन-मन से माँ की सेवा करने, खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई का काम संभालते थे । पिताजी सरकारी स्कूल शिक्षक थे । निश्चित समय पर उनको स्कूल जाना पड़ता था । उनके ड्यूटि जाने के बाद घर में मैं अकेला बचता, इसलिए माँ को खिलना-पिलाना, स्नान कराना, कपड़े बदलवाना, उन्हें पकड़ कर सैर करवाना, घर आए मेहमानों को चाय-नाश्ता कराने की ज़िम्मेदारी मेरी ही होती थी । इसके साथ ही कॉलेज-कोचिंग जाना, पढ़ाई करते-करते पूरा दिन कैसे निकल जाता पता ही नहीं चलता था । एक गृहस्थ स्त्री प्रतिदिन जितना काम करती है उतना या थोड़ा कम मैं भी करता था । इतना काम करने के बाद थकावट इस तरह हावी हो जाती थी कि अगले दिन कोई काम करने की इच्छा ही नहीं होती थी । फिर भी ... । अंततः एक दिन माँ से पूछ ही लिया कि कैसे बिना थके इतना काम प्रतिदिन कर लेती हैं ? प्रश्न सुनकर वह काफी हैरान हो गयी और भावुक होकर समझाई कि एक स्त्री का यह प्रतिदिन का निर्धारित काम है । इतना करने के बाद भी सोचो एक स्त्री के लिए यह सुनना कितना कष्टकारी होता है कि “पूरे दिन घर पर ही रहती हो फिर भी यह काम समय से नहीं हो पाता, आखिर करती क्या हो ?
          उन दिनों ही मुझे ये अनुभव हुआ कि एक पुरुष जितना कार्य घर से बाहर रहकर करता है, उतना ही या उससे ज्यादा सामान्य दिनों में एक स्त्री घर के चहारदीवारी में रहकर करती है । घर में बुजुर्ग व एक-दो बच्चे हों तो काम का बोझ दोगुना-तीनगुना हो जाना स्वाभाविक है । ऐसे में एक पुरुष को तंख्वाह के रूप में उसके श्रम का मूल्य तो प्राप्त हो जाता है लेकिन सुबह से लेकर रात्री विश्राम तक घर के सारे कार्य करते हुए बच्चों, बुजुर्गों की लालन पालन करनेवाली स्त्री के श्रम का कोई मूल्य नहीं दिया जाता । जितना काम प्रतिदिन वह घर पर करती है यदि उसका मूल्य निकाला जाय तो पति के तंख्वाह की दुगनी तंख्वाह की हकदार होगी । नियमतः अपने पति को ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार करने, पूरे दिन उसके घर-परिवार-रिश्तेदार की रखवाली करने वाली स्त्री भी है, और उसे ये हक मिलना चाहिए ।
          खैर हमारे पितृसत्तात्मक विचारधारा प्रधान समाज में फिलहाल तो ऐसा होने से रहा, बावजूद इसके हम समाज के पुरुष उनके प्रति अपना नज़रिया बदल, उनके श्रम को महत्व देते हुए, समाज की स्थापित इस धारणा को खत्म कर सकते हैं कि एक स्त्री घर पर बैठी कोई विशेष काम नहीं करती । या सार्वजनिक क्षेत्र की अपेक्षा निजी क्षेत्र के कार्य आसान होते हैं
          इस अनुभव ने स्त्रियों के प्रति मेरी सोच को बदलने का कार्य किया । जिसके फलस्वरूप आज मैं आलेखों, सभाओं के माध्यम से स्त्रियों के श्रम का महत्व बताने, स्त्री-पुरुष के बीच की खाई खत्म कर समाज को जेंडर संवेदनशील बनाने, पुरुषों के समान अधिकार दिलाने, उनके समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवर्तन लाने आदि उद्देश्यों के साथ आज भी खड़ा हूँ । इस सोच की प्रेरणा स्त्रोत मैं अपनी माँ को मानता हूँ । यही प्रेरणा मुझे स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा खींच लाई जहां प्रतिष्ठित पीएच. डी. पाठ्यक्रम में पंजीकृत हूँ । हमारे परिवार में पिछले 2 पीढ़ियों से पुत्री रत्न पाने का सौभाग्य ही नहीं प्राप्त हुआ था । लेकिन आज भी गर्व गर्व से फूला न समाता हूँ जब मेरी माँ मुझे बेटा की जगह “बेटी” कहकर बुलाती हुए कहती है कि “अब तो लगता ही नहीं कि हमारे घर में बेटी की कमी है” । 

 (वुमेन एक्सप्रेस 12/05/2018 में प्रकाशित)



Tuesday, 24 April 2018

दलित (Dalit)

जब जब भी उनको लगेगा कि
दलित हमसे दूर हो रहे हैं
मंदिर का चढ़ावा कम हो रहा है ।
तब दान पाने के लिए, उन्हें लुभाने के लिए
कुछ न कुछ ऐसा करेंगे
कि आप दलित ही रह जाएं
और उनकी खोखली वर्ण व्यवस्था भी
बनी रह जाय ।
आपको कंधे पर बिठाकर मंदिर प्रवेश कराकर
2000
वर्ष पुरानी प्रथा
ध्वस्त करने का नाटक करेंगे ।
आपके समुदाय से एकाध
मंदिर के पुजारी या महामंडलेश्वर बनाएंगे ।
लेकिन मौका मिलने पर
एहसास दिलाने का मौका कभी नहीं चूकेंगे
कि आप "दलित" हैं ।
आपके वोटों के लिए
आपके ही घर बैठकर
चमचमाते नए थाली में खाकर
आपके हितैषी होने का दिखावा करेंगे ।
मतलब सध जाते ही
फिर से वही जाति सूचक गालियां ।
अपनी स्थिति से असंतुष्ट होकर
आप धर्मांतरण भी कर के देख लीजिये 
मुसलमान या ईसाई बन गए
तो अपने तंत्र मंत्र से आपको
पुनः हिन्दू व दलित बनाने के लिए उसी दलदल में लाने के लिए 
तरह-तरह के कर्मकांड करेंगे ।
'
हिंदुत्व खतरे में है' का आलाप कर
धर्मांतरण करने वाले का मर्दन करेंगे ।
सिवाय एक चीज के
दलितों का उपनयन संस्कार कर
तथाकथित अस्पृश्य से तथाकथित द्विज
बना सकने के ।
क्योंकि इससे उनकी वर्णव्यवस्था, उनका हिन्दुत्व 
खतरे में पड़ जाएगा ।

(मूल रूप से दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र "वीक ब्लास्ट" के 01-15 मई 2018 के अंक में प्रकाशित)


Wednesday, 11 April 2018

इस ‘रामराज्य’ में बलात्कारियों की मौज है ।


'द वायर' की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री तथा जौनपुर से सांसद रहे चिन्म्यानन्द सरस्वती के ऊपर 7 वर्ष से चल रहे बलात्कार (धारा 376) का केस वापस लेने का निर्णय लिए हैं । आखिर ये न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ क्यों ? यदि आरोपी बेगुनाह है तो आप न्यायपालिका पर दबाव डालकर जल्द-से-जल्द फैसला करवाइए । केस वापस लेकर तो आप यही साबित कर रहे हैं कि चिन्म्यानन्द दोषी हैं और उनके राजनीतिक कैरियर को बचाने के लिए आप अपनी शक्ति का गलत प्रयोग कर रहे हैं ।
            आप अपने राज्य में रामराज्य लाने की बात करते हैं । ये कैसा राम राज्य है कि आपके ही राज्य की एक स्त्री जो अब आपकी प्रजा भी है, ने चिन्म्यानन्द सरस्वती के खिलाफ 30 नवंबर 2011 को बलात्कार और धमकाने का केस दर्ज़ कराया था । आज 7 वर्ष बाद भी वह न्याय की प्रतीक्षा में है, लेकिन चिन्म्यानन्द सरस्वती से आपके मधुर संबंध होने के कारण आप एक जघन्य अपराध के आरोपी के अपराध को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं । ये तो आप अपनी एक पीड़ित प्रजा को न्याय नहीं बल्कि सज़ा दिलाने का काम कर रहे हैं । इस तरह तो आगे चलकर वर्तमान में आपकी पार्टी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, जिसपर एक लड़की ने बलात्कार का आरोप लगा है और उसका भाई अतुल सिंह सेंगर जिसपर उस युवती के पिता की हत्या का आरोप है कुछ दिन बाद आप उसका भी केस वापस कर लेंगे ।
            क्यों बदनाम कर रहे हैं रामराज्य के नाम को योगी आदित्यनाथ जी ? आपके ऊपर जो केस चल रहे थे उसे वापस लेकर अपनी जगहँसाई तो पहले ही करवा चुके हैं । अब तो इन हरकतों से बाज आइये ।

Saturday, 7 April 2018

धर्म क्या है ?


धर्म हमारे शरीर पर ढका अदृश्य लबादा है जो हमें जीवन जीने की कला सिखाता है । भौगोलिक स्थितियों के अनुसार इसके नियम-कानून, रीति-रिवाज में भिन्नता होती है । समाज में अशांति फैलाने के लिए जिम्मेदार हमारा धर्म नहीं बल्कि किसी भी धर्म (हिन्दु, मुसलमान सहित समस्त धर्म) के वे कट्टर, मूर्ख या स्वार्थी लोग हैं जो मैं/हम बड़ा/श्रेष्ठ, मैं/हम या हमारे धर्म/रीति-रिवाज अच्छा ... जैसे फर्जी विमर्श फैलाकर धर्म के नाम पर रायता फैलाने का काम करते हैं । कहने को तो ये लोग अपने-अपने धर्म के प्रचारक/संरक्षक हैं लेकिन इस प्रयोजन हेतु हिंसा को स्थान देकर उस धर्म को सबसे अधिक बदनाम यही लोग करते हैं ।