Tuesday, 13 April 2021

डॉ. भीमराव अंबेडकर : संक्षिप्त जीवन वृतांत

शुरुआत करते हैं हिस्ट्री टीवी 18 एवं सीएनएन-आईबीएन चैनल के द्वारा वर्ष अगस्त 2012 में आयोजित एक चुनाव सर्वेक्षण 'द ग्रेटेस्ट इंडियन आफ्टर गांधी' से जिसमें डॉक्टर अंबेडकर को प्रथम स्थान पर चुना गया।[i] उन्हें 2 करोड़ वोट मिले। अब सवाल ये है कि आखिर इस व्यक्तित्व में ऐसी क्या खास बात है/थी जो इनके अनुयायी इनको इतना सम्मान देते हैं, चौक-चौराहों पर इनके आदमकद मूर्तियाँ बहुतायत देखने को मिलती हैं? इन प्रश्नों के उत्तर उनके जीवन-संघर्ष में झाँकने के बाद ही खोजा जा सकता है। तो आइये इसका उत्तर ढूँढने का प्रयास करते हैं –

            भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौर में डॉ. अंबेडकर को एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है। इस विषय में उनकी विद्वता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस, गांधीजी के कटु आलोचक होने के बावजूद भी 1947 में जब देश को स्वतंत्रता मिली और एक नए संविधान बनाने की बात की जा रही थी तब उन्हें न केवल प्रथम कानून मंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में जगह मिली बल्कि संविधान बनाने वाली ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी नियुक्त किया गया। डॉ. अंबेडकर को सामाजिक, राजनैतिक तथा धार्मिक क्षेत्र में मुख्यतः तीन बड़े कार्यो के लिए भारत की बहुसंख्य जनता अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करती हैं। यह 3 बड़े कार्य हैं - अछूतों को भारतीय राजनीति तथा विमर्श के केंद्र में लाने तथा सामाजिक न्याय दिलवाने हेतु उनका योगदान, भारतीय संविधान के प्रारूप निर्माण तथा विधि व्यवस्था संचालन हेतु योगदान, बौद्ध धर्म में एक नए आयाम 'नवयान' जोड़ने के लिए। इनमें से अधिकांश कार्य उन्होंने उस दौर के समानांतर में किए जब हमारे देश में गांधी, नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस आदि राजनीतिज्ञ देश को ब्रिटिश प्रभुत्व से आजाद कराने (राजनैतिक आजादी) हेतु काँग्रेस पार्टी के बैनर तले प्रयासरत थे। इसके समानांतर डॉ. अंबेडकर एक स्वतंत्र समाजसुधारक के रूप में देश की बहुसंख्य तथाकथित अछूत जाति के लोगों को सामाजिक भेदभाव से आजादी दिलाने हेतु सक्रिय रूप से प्रयासरत थे। भारत के राजनीतिक स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान भले ही प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखता है। लेकिन हमारे देश की बहुसंख्य जनता को हिंदू धर्म की विकृत सामाजिक व्यवस्था से आजाद कराने (सामाजिक आजादी) के लिए उनका अद्वितीय योगदान है। यही कारण है कि आम जनमानस के बीच उन्हें बाबासाहब, बोधिसत्व, भारतीय संविधान के जनक, समाजसुधारक, भारत के प्रथम कानून मंत्री आदि उपनामों से जाना जाता है।

            डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 ई. को वर्तमान मध्य प्रदेश के महू नामक ग्राम में एक महार जाति में हुआ था। उस दौरान महार जाति के लोगों का पारंपरिक कार्य गांव से मृत जानवरों को बाहर ले जाना होता था। अन्य वर्ण-जाति के लोग इस कार्य को घृणित समझते थे। जिसके कारण हिंदू सामाजिक व्यवस्था में महारों की स्थिति अछूतों की थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आने से उनकी स्थिति कुछ परिवर्तित हुई। कंपनी को अपने मिल से लेकर सेना के लिए मजदूरों की आवश्यकता थी। ऐसे समय में अपने पारंपरिक कार्य को छोड़कर काफी संख्या में महार व अन्य अस्पृश्य जातियों के बहुसंख्य लोग कंपनी/ब्रिटिश सरकार की सेवा में मजदूर या सैनिक रूप में लग गए। अंबेडकर के दादा मालोजी सकपाल उनमें से एक थे। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल भी ईस्ट इंडिया कंपनी की ब्रिटिश भारतीय सेना के मऊ छावनी में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे।

डॉ. अंबेडकर का शैक्षणिक जीवन

डॉक्टर अंबेडकर 3 साल के थे जब उनके पिताजी सेवानिवृत्त हुए। वे खुद अंग्रेजी तथा मराठी माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी के स्कूल से पढ़े लिखे थे, शिक्षा के महत्व को वे अच्छी तरह समझते थे। इस कारण उन्होंने डॉ. अंबेडकर की शिक्षा का पर्याप्त ख्याल रखा। पढ़ाई-लिखाई में बेहतर होने के बावजूद तथाकथित अस्पृश्य जाति महार से संबंधित होने के कारण उन्हें बचपन से ही कदम-कदम पर जातिगत भेदभाव (अस्पृश्यता) का सामना करना पड़ा। उनका वास्तविक नाम रामजी सकपाल था। एक ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर जो 'अंबाबडे' नामक ग्राम (रामजी मालोजी सकपाल का भी पैतृक गाँव) से थे तथा इस कारण अपने नाम के साथ अंबडवेकर उपनाम लगाते थे, के निर्देश पर उनके नाम से सकपाल हटाकर अंबडवेकर (कालांतर में अंबेडकर) कर दिया गया। लेकिन इससे भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। चूंकि उनके पिताजी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में थे, इसलिए शिक्षा ग्रहण करने के राह में कोई विशेष कठिनाई नहीं आई। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा संचालित स्कूल में उन्हें प्रवेश मिल गया। लेकिन इस दौरान भी तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थानुरूप लोगों की सोच के कारण उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। क्योंकि तत्कालीन हिंदू परंपराओं के अनुसार अछूत जाति के लोगों को शिक्षा प्राप्त करने, संपत्ति रखने, उच्च जाति के हिंदुओं के संपर्क में आने का अधिकारी नहीं समझा जाता था।[ii]

            1897 ई. में डॉक्टर अंबेडकर का दाखिला मुंबई के एलफिंस्टन हाई स्कूल में हुआ जहां वे एकमात्र अस्पृश्य छात्र थे। 1907 ई. में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात अगले वर्ष 1908 ई. में मुंबई के ही एलफिंस्टन कॉलेज में प्रवेश लिया। रोचक बात यह है कि एलफिंस्टन कॉलेज के वे पहले अस्पृश्य छात्र थे। बरौदा महाराजा की ओर से इस कॉलेज में अध्ययन करने हेतु छात्रवृत्ति भी मिली। इसी क्रम में 1913 ई. में उन्हें बड़ौदा महाराजा सयाजीराव गायकवाड तृतीय द्वारा स्थापित एक योजना के तहत न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के अवसर प्रदान करने हेतु 3 साल के लिए 755 प्रति माह बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति प्राप्त हुई।[iii] इसके अंतर्गत 22 वर्ष की अवस्था में उन्हें अमेरिका जाकर पढ़ने का मौका मिला। इसी दौरान 9 मई 1917 को उन्होंने मानव विज्ञानी एलेग्जेंडर गोल्डनवेजर द्वारा आयोजित एक सेमिनार में "भारत में जातियां : प्रणाली उत्पत्ति और विकास" विषय पर एक लेख प्रस्तुत किया जो उनका पहला प्रकाशित कार्य था।[iv] अक्टूबर 1913 ई. में डॉ. अंबेडकर लंदन चले गए जहां उन्होंने विधि अध्ययन में स्नातक हेतु दाखिला लिया। इसी क्रम में इसके पश्चात 1922 ई. में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त किया। उनकी थीसिस ‘The Evolution of Provincial Finance in British India’ नाम से प्रकाशित हुई।[v]  

    इसी बीच जून 1917 ई. में वह अपने अध्ययन को अस्थाई रूप से बीच में छोड़कर भारत वापस आ गए और बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में कार्य करने लगे। जहां उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। अंततः नौकरी छोड़कर एक शिक्षक तथा लेखाकार के रूप में काम करने लगे। इस दौरान बंबई में रहते हुए वकालत भी किया लेकिन इस क्षेत्र में वे असफल रहे। क्योंकि जातिगत भेदभाव के कारण उनको केस नहीं मिलते थे।[vi] 1920-1923 के दौरान लंदन विश्वविद्यालय से 'द प्रॉब्लम ऑफ रूपी' विषय पर अर्थशास्त्र में डी.एससी. की उपाधि प्राप्त की।[vii]

अप्रैल 1906 ई. में जब वे 15 वर्ष की अवस्था के थे तक डॉक्टर अंबेडकर का विवाह 9 वर्षीय रमाबाई आंबेडकर से हुआ था। उनकी मृत्यु के पश्चात मधुमेह बीमारी से अस्वस्थ डॉक्टर अंबेडकर अपने देखरेख के लिए 1948 में डॉक्टर सविता अंबेडकर के साथ दूसरा विवाह कर लिया।

समाजसुधारक के रूप में डॉ. अंबेडकर

भारत सरकार अधिनियम 1919 को तैयार कर रही साउथबॉरो समिति के समक्ष डॉ. अंबेडकर को जब आमंत्रित किया गया तो पर्याप्त साक्ष्य के आधार पर उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अछूतों के लिए उनकी जनसंख्या के आधार पर पृथक निर्वाचन क्षेत्र और आरक्षण देने की मांग की। अछूतों के नेतृत्वकर्ता के रूप में डॉक्टर अंबेडकर को ब्रिटिश सरकार द्वारा आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में अपना पक्ष रखने का मौका मिला जहां उन्होंने अछूतों तथा अन्य धर्मावलंबियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाने के प्रावधान को रखा। गांधीजी इस प्रस्ताव के खिलाफ थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने भी 1932 में डॉ. अंबेडकर के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। और अछूतों तथा अन्य धर्मावलंबियों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की घोषणा हुई। ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय की खिलाफत में गांधीजी ने पुणे के यरवदा जेल में आमरण अनशन की घोषणा कर दी। हालांकि डॉ. अंबेडकर को गांधीजी की बात माननी पड़ी। सितंबर 1932 के पूना पैक्ट से इस बात पर सहमति बनी कि अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र नहीं होगा।

            इससे पूर्व 1920 ई. में मुंबई में रहते हुए ही उन्होंने एक साप्ताहिक समाचार पत्र मूकनायक के प्रकाशन का कार्य शुरू किया। इसका इस्तेमाल वे रूढ़ीवादी हिंदू राजनेताओं तथा जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनीतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना के लिए करते थे। मुंबई हाईकोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस करते हुए उन्होंने अस्पृश्यों की शिक्षा को बढ़ावा दिया। इसके लिए उन्होंने 1923 ई. में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की इसका मुख्य उद्देश्य था महारों व अन्य अस्पृश्य जातियों के लोगों के अधिकारों की रक्षा करना व इनके बीच शिक्षा तथा सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो का नारा दिया।

            इस दौरान उन्होंने अछूतों को मंदिर में प्रवेश हेतु (इस दौरान अछूतों का मंदिरों में प्रवेश निषेध था), सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने के अधिकार (उच्च जाति के लोगों का आरक्षित तालाब होता था) दिलाने हेतु कई अहिंसक आंदोलन भी किया। अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले संस्कृत ग्रंथ मनुस्मृति की प्रति को भी उन्होंने 1925 में जलाकर अस्पृश्यता का प्रतिरोध किया। 1927 ई. में सवर्णों के लिए आरक्षित तालाब की परंपरा को तोड़ने के उद्देश्य से चावदार तालाब आंदोलन शुरू किया। सैद्धांतिक रूप से यह तालाब तो सभी के लिए खुला था लेकिन व्यावहारिक रूप से यह अछूतों के लिए बंद था। इसे महाद टैंक सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। हालांकि 1937 ई. तक न्यायालय के निर्णय आने तक यह तालाब अछूतों के लिए बंद ही रहा।

            इसी क्रम में 1930 ई. में उन्होंने नासिक के कालाराम मंदिर में अछूतों के प्रवेश के लिए आंदोलन शुरू किया। जिसमें लगभग 15000 डॉ. अंबेडकर के समर्थकों ने भाग लिया था। जब सभी आंदोलनकारी मंदिर के गेट तक पहुंचे तो गेट पर खड़े ब्राह्मण अधिकारियों ने मंदिर के गेट को बंद कर दिया। विरोध प्रदर्शन उग्र होने पर गेट को खोल दिया गया। जिसके परिणाम स्वरूप दलितों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिली।

डॉ. अंबेडकर का राजनैतिक जीवन

1936 में डॉ. अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (स्वतंत्र लेबर पार्टी) की स्थापना की जिसने 1937 के केंद्रीय विधानसभा चुनाव में 15 सीट पर लड़े चुनाव में से 12 सीट जीती थी। चूंकि इस पार्टी के अधिकतर उम्मीदवार अछूत समुदाय से थे इसलिए बाद में उन्होंने इसका नाम परिवर्तित कर सीड्यूल कास्ट्स फेडेरेसन कर दिया। 1946 के चुनाव में इस पार्टी को बहुत नुकसान हुआ। यहाँ तक कि डॉ. अंबेडकर अपनी सीट भी नहीं बचा सके। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान डॉ. अंबेडकर कांग्रेस के खिलाफ तथा ब्रिटिश सरकार के पक्ष में खड़े रहे। ब्रिटिश सरकार के साथ खड़े होने के पीछे उनका तर्क था कि विदेशी शासन से मुक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण आंतरिक लोगों की दासता और शोषण से मुक्ति है।[viii] डॉ. अंबेडकर इसके लिए किसी भी भारतीय पार्टी से ज्यादा योगदान ब्रिटिश सरकार का मानते थे। वे यह मानते थे कि किसी राष्ट्र के निर्माण के लिए लोगों को एकता के सूत्र में बंधना आवश्यक है। बिना इसके राष्ट्रवाद का कोई मतलब नहीं। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी उनको एंटी नेशनल के रूप में प्रस्तुत कर रही थी। इस दौरान कॉंग्रेस तथा उनके बीच कई मुद्दों पर तीखी नोक-झोंक भी हुई।

भारतीय संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में योगदान

1946 के चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन जिसमें डॉ. अंबेडकर खुद अपनी सीट भी नहीं बचा पाए थे, के बावजूद स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अस्तित्व में आई कांग्रेस सरकार ने गांधीजी के निर्देश पर डॉ. अंबेडकर को न केवल देश के प्रथम कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया बल्कि भारतीय संविधान के प्रारूप समिति का अध्यक्ष भी निर्वाचित किया। डॉक्टर अंबेडकर की अध्यक्षता में तैयार किए गए भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को एक समान समझते हुए न केवल उनके स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी और सुरक्षा प्रदान की गई। बल्कि अपने धर्म को मानने की आजादी दी गई, अस्पृश्यता और भेदभाव के सभी रूपों को गैरकानूनी बनाया गया। स्त्री/ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के लिए नागरिक सेवाओं तथा कॉलेजों में, नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था दी गई।

            26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के पश्चात पश्चिमी देशों की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे। इसके लिए 'हिंदू कोड बिल' लागू करने को लेकर संसद सदन के अधिकांश सदस्यों के साथ तालमेल नहीं बिठा सके। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इस बिल के पक्ष में थे। उनका मानना था कि भारतीय समाज के आधुनिकीकरण के लिए यह बिल एक उपयुक्त कदम है। जबकि इसके विपरीत इस बिल का विरोध करने वाले सांसदों का मानना था कि यह बिल हिंदू सामाजिक व्यवस्था को अस्त व्यस्त कर देगा। सांसदों के बढ़ते रोष को देखते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने 1947 से 1951 तक कानून मंत्री के रूप में योगदान देने के पश्चात 27 सितंबर 1951 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1952 में हुए चुनाव तथा उपचुनाव में वे अपनी सीट नहीं बचा सके। अपने मृत्यु के कुछ समय पूर्व 1956 में उन्होंने एक नई पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की।

डॉ. अंबेडकर के स्त्री संबंधी विचार

डॉ आंबेडकर के स्त्री दृष्टि की झलक उनकी पत्र-पत्रिकाओं में देखी जा सकती है। हिंदू धर्म में स्त्रियों की स्थिति से अवगत कराने के उद्देश्य से उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का काफी बारीकी से अध्ययन कर अनेक लेख लिखे। जैसे 'हिंदू नारी का उत्थान और पतन' 'नारी और प्रति क्रांति' आदि। स्त्रियों की खराब स्थिति के लिए वे पितृसत्तात्मक मानसिकता को जिम्मेदार मानते थे। लेकिन उनका यह भी मत था कि अलग-अलग धर्मों में इसके अलग-अलग स्तर हैं। इस आधार पर वे हिंदू या इस्लाम की अपेक्षा बौद्ध धर्म को स्त्रियों के लिए बेहतर मानते थे। हिंदू धर्म अंतर्गत अछूत जातियों के स्त्रियों को वे सर्वाधिक पीड़ित मानते थे क्योंकि उनका शोषण दोहरे स्तर पर होता था। एक तो पितृसत्तात्मक समाज-परिवार द्वारा दूसरा अछूत जाति में जन्म लेने के कारण। हिंदू धर्म में स्त्रियों की इस स्थिति के लिए वे हिंदू ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था जो मनुस्मृति पर आधारित थी, को जिम्मेदार मानते थे। यही कारण है कि हिंदू स्त्रियों की स्वतंत्रता, शिक्षा, संपत्ति अधिकार, तलाक आदि अधिकार छीनने वाले ग्रंथ मनुस्मृति की वे खुलकर आलोचना करते थे। साथ ही स्त्रियों की बेहतर स्थिति के लिए बौद्ध धर्म की तारीफ भी करते थे। क्योंकि हिंदू धर्म के विपरीत बौद्ध स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार था। स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए वे उनकी शिक्षा (जिसे वे उत्प्रेरक मानते थे) पर ज़ोर देते थे। 1927 में उनके संपादन में प्रकाशित पत्रिका 'बहिष्कृत भारत' के माध्यम से उन्होंने अस्पृश्यों के साथ-साथ स्त्री शिक्षा का मुद्दा उठाते हुए अस्पृश्य स्त्रियों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया। इसी क्रम में ज्योतिबा फुले की तरह उन्होंने भी अपनी अनपढ़ पत्नी रमाबाई को न केवल पूरी तल्लीनता के साथ पढ़ाया बल्कि वे उन्हें अपने साथ सभाओं में भी ले जाया करते थे। यही कारण है कि उनके आंदोलनों में स्त्रियों की सहभागिता को देखा जा सकता है। जल्दी ही उनकी पत्नी विभिन्न सभाओं में अपनी बात, अपनी समस्याएं खुल कर रखने लगी। डॉ. अंबेडकर द्वारा गठित समता सैनिक दल में एक महिला प्रकोष्ठ भी था जिसकी अध्यक्ष रमाबाई अंबेडकर थी।[ix] उन्होंने अन्य स्त्रियों को भी अपने साथ जोड़ने का कार्य किया। विशेष रूप से वेणुभाई भटकर, रंगूबाई शुभरकर उनके साथ सक्रिय रही। महाद टैंक सत्याग्रह, मनुस्मृति दहन से लेकर पुणे के काला राम मंदिर में प्रवेश में हजारों स्त्रियां सक्रिय रही। मनुस्मृति के प्रति को जलाने वाले आंदोलन में 50 से भी अधिक अशोक समुदाय की स्त्रियां शामिल थी। 12 अक्टूबर 1829 के पार्वती मंदिर में प्रवेश का नेतृत्व नानाबाई कांबले के जिम्मे था। कालाराम मंदिर प्रवेश के दौरान भी सीताबाई, गीताबाई, रमाबाई आदि स्त्रियां कार्यकर्ताओं के भोजन पानी के इंतजाम में लगी रही।[x] इस तरह गांधीजी के बाद डॉक्टर अंबेडकर को एक ऐसे दूसरे नेता के रूप में देखा जा सकता है जिन्होंने स्त्रियों को आंदोलन से जोड़ने का काम किया।

हिंदू कोड बिल द्वारा स्त्रियों को समानता का अधिकार देने का प्रयास

डॉ. अंबेडकर बहुसंख्य हिंदुओं के लिए एक ही प्रकार की संहिता तैयार करना चाहते थे। मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि धर्मों का व्यक्तिगत कानून तो था लेकिन इनकी तरह हिंदुओं का कोई एक समान नहीं बल्कि बिखरा हुआ कानून था। विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक पुत्र/पुत्री रखने का एक समान कानून नहीं था। इस उद्देश्य से प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथों/ स्मृति ग्रंथ/ शास्त्रों के अध्ययन के आधार पर डॉ. अंबेडकर ने सर अकबर हैदरी तथा सर बी. एन. राय की सहायता से हिंदू कोड बिल तैयार किया। यह बिल हिंदुओं के बिखरे नियम कानून को एक जगह समेट कर समय परिवर्तन के साथ उग आए खरपतवारों को नष्ट करने का एक माध्यम तो था साथ ही विवाह, तलाक, गोद लेने, पिता की संपत्ति में पुत्र के साथ पुत्री का भी भागीदार होना आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष थे, जो स्त्रियों के लिए वरदान साबित हो सकते थे। जैसे - स्वतंत्रता पूर्व तक हिंदू स्त्रियों को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था, जबकि बृहस्पति स्मृति में स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार दिया गया है। तलाक का भी प्रावधान नहीं था, लेकिन कौटिल्य तथा पराशर स्मृति में तलाक का प्रावधान था। इसलिए अंबेडकर ने हिंदू स्त्रियों के लिए वरदान साबित होने वाले इन प्रावधान को अपने द्वारा तैयार किए गए हिंदू कोड बिल में जगह दिया। लेकिन दुर्भाग्य वश यह बिल काफी विरोध के कारण सदन में पास नहीं हो पाया।  

डॉ. अंबेडकर का पत्रकारिता जीवन

जिस उद्देश्य के साथ डॉ. अंबेडकर बढ़ रहे थे उसे पूर्ण करने में उन्होंने पत्रकारिता का भरपूर उपयोग किया। सत्यशोधक समाज के नेता ज्योतिबा फुले द्वारा 1877 में प्रकाशित पत्र 'दीनबंधु' से प्रेरणा लेते हुए वे इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हुए। व्यवस्थित रूप से उनकी पत्रकारिता जीवन की शुरुआत 1917 से ही शुरू हो जाती है जब बंबई (वर्तमान मुंबई) के 'सिडनेहम' कॉलेज में अध्यापक की नौकरी करने के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में हाथ आजमाने कूद पड़े। तत्कालीन पत्रकारिता संस्थानों में उच्च जातियों के वर्चस्व से वे क्षुब्ध थे जो अस्पृश्यता उन्मूलन से संबंधित कोई भी लेख, विचार प्रेषित नहीं करते थे। समाचार पत्रों में सामाजिक, धार्मिक, जातिवादी व्यवस्था, पिछड़ों तथा अछूतों की दयनीय स्थिति या उनके शिक्षा से संबंधित सवालों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। इसलिए अस्पृश्यों को अपनी सामाजिक स्थिति से अवगत कराने तथा उन्हें संगठित करने के लिए उन्होंने समय-समय पर अनेक पत्रिकाओं का संपादन का प्रकाशन किया। उनकी पत्रकारिता के मुख्य मुद्दे होते थे - ब्रिटिश सत्ता, इसाई मिशनरियों द्वारा कराए जाने वाले धर्मांतरण का विरोध करना, अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले ब्राह्मणवादी सोच की आलोचना करना। इसी क्रम में 1920 ई. में सर्वप्रथम मराठी भाषा की पाक्षिक मूकनायक (1920-23) नामक पत्रिका को शुरू किया। कोल्हापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज ने इस कार्य के लिए डॉक्टर अंबेडकर को ढाई हजार रुपये आर्थिक सहायता प्रदान किए। इस पत्रिका के लिए डॉक्टर अंबेडकर ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाते हुए, अस्पृश्यों को जागृत एवं आपस में संगठित करने के लिए 40 लेख लिखे। इसके बाद के कुछ वर्षों में मराठी भाषा में ही बहिष्कृत भारत (1927-29)’, ‘समता/जनता (1928) प्रबुद्ध भारत (1954) आदि पत्रिकाओं का संपादन किया। इसके अलावा भी अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहे थे। उनकी पत्रकारिता का उद्देश्य धन अर्जन करना नहीं था बल्कि उनका विश्वास वैकल्पिक पत्रकारिता में था। इस कल्याणकारी, अव्यवसायिक पत्रिका निकालने के कारण कई बार उन्हें कर्ज में डूबना पड़ा। पत्रकारिता के माध्यम से किस प्रकार पैसे बटोरे जा सकते हैं, इस बात का उन्हें ज्ञान था, लेकिन अपनी पत्रिका में भ्रम फैलाने वाले विज्ञापनों, विलायती शराब आदि के विज्ञापनों से वे परहेज करते थे।

डॉ. अंबेडकर का धार्मिक जीवन

1935 में एक सभा में सार्वजनिक रूप से उन्होंने कहा था 'मैंने एक हिंदू के रूप में जन्म लिया है लेकिन एक हिंदू नहीं मरूंगा'। ऐसा करने के पीछे एक मजबूत आधार था, वह आधार था - हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जातिगत सर्वोच्चता के आधार पर व्यक्ति से भेदभाव। अपने इस संकल्प के पश्चात उन्होंने कई धर्मों जैसे इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, बौद्ध का काफी गहराई से अवलोकन, अध्ययन किया। और अंततः बौद्ध धर्म को एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प के रूप में पाया। 14 अक्टूबर 1956 को अशोक (विजया) दशमी के दिन नागपुर में डॉ. अंबेडकर तथा उनके 5 लाख समर्थकों ने बौद्ध धर्म अपना लिया।

            इसके कुछ ही दिनों बाद 65 वर्ष की आयु में 6 दिसंबर 1956 को मधुमेह की बीमारी से लंबे समय तक लड़ते हुए डॉ. अंबेडकर की मृत्यु हो गई।

इस तरह डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस प्रकार से संघर्ष कर देश के बहुसंख्य जनता को एक सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार दिलवाने में योगदान दिया उसके लिए देश की जनता उनके लिए कृतज्ञता प्रकट करती है। गांधीजी के बाद देश के सबसे महान व्यक्ति का खिताब जनता द्वारा डॉ. भीमराव अंबेडकर को दिया जाना इस कृतज्ञता का फल है।

साकेत बिहारी

अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

अध्ययन हेतु प्रयुक्त सहायक ग्रंथ



[ii] Sanghrakshita (1986) Ambedkar and Buddhism, Windhorse Publication, Page No. 6

[iii] Naudet Jules, Ambedkar and the critique of the caste society, laviedesidees.fr, 27 November 2009, Page No. 2

[v] Sanghrakshita (1986) Ambedkar and Buddhism, Windhorse Publication, Page No. 7

[vi] Naudet Jules, Ambedkar and the critique of the caste society, laviedesidees.fr, 27 November 2009, Page No. 2

[vii] Sanghrakshita (1986) Ambedkar and Buddhism, Windhorse Publication, Page No. 7

[viii] Ray Ishita Aditya, Ray SarbaPriya (2011) An Insight into B.R Ambedkar’s Idea of Nationalism in the context of India’s Freedom Movement, Developing Country Studies, Vol.1, No. 1, ISSN 2225-0565, Page No. 27

[ix] More, Vijay G. (2011) Dr. B. R. Ambedkar’s Contribution for Women’s Right, Variorum, Multi Disciplinary e Research Journal, Vol 2, Page No. 5

[x] मेघवाल, कुसुम (2010) भारतीय नारी के उद्धारक डॉ. बी. आर. अंबेडकर सम्यक प्रकाशन, पृष्ठ सं. 114





Friday, 29 January 2021

साहसपुर (बेमेतरा) के 13वीं - 14वीं शताब्दी के शिव मंदिर का भ्रमण

बेमेतरा (छत्तीसगढ़) से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सहसपुर ग्राम स्थित 13वीं शताब्दी में नागवंशी/गोंड राजाओं द्वारा नागर मंदिर निर्माण शैली में निर्मित शिव मंदिर का आज भ्रमण एक शानदार अनुभव रहा। बेमेतरा दुर्ग राजकीय राजमार्ग पर स्थित यह ऐतिहासिक शिव मंदिर मध्यकालीन वास्तु कला का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। समय के प्रभाव से यह मंदिर धीरे-धीरे खंडित होता जा रहा है। 

बावजूद इसके संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ इसे संरक्षित करने का कोई कसर नहीं छोड़ रही। विभाग की ओर से मंदिर के रखरखाव के लिए एक स्थाई केयर टेकर नियुक्त किया गया है। भोरमदेव (कवर्धा जिला, छत्तीसगढ़) के शिव मंदिर की तरह ही गर्भगृह के अलावा 16 पिलर पर स्थित मंडप और उसके नीचे नंदी की मूर्ति इस मंदिर की मुख्य विशेषता है। यही विशेषता इसी काल में निर्मित दो अन्य शिव मंदिरों लाखामंडल और केदारनाथ (दोनों उत्तराखंड) में भी देखने को मिलता है। मंदिर के गर्भ गृह में एक काले पत्थर से निर्मित शिवलिंग स्थापित है, लेकिन भोरमदेव के शिव मंदिर की तरह इस मंदिर के बाहरी दीवारों पर मिथुन आकृतियां नहीं है।

बिहार के शिव मंदिरों के विपरीत ना भोरमदेव में न सहसपुर स्थित इस मंदिर में अलग से पार्वती मंदिर देखने को नहीं मिला। जो शोध का एक अच्छा विषय हो सकता है। प्राचीन शिव मंदिर से लगभग 15 - 20 मीटर की दूरी पर ही इस शैली में निर्मित एक अन्य मंदिर भी है जिसे वर्तमान में बजरंगबली का मंदिर कहा जाता है। शुरुआत में ऐसा लगा कि यह बजरंगबली का सबसे प्राचीनतम मंदिरों में से एक हो सकता है। मेरे इस भ्रम को टूटने में ज्यादा समय नहीं लगा जब उस मंदिर के बगल संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग (छत्तीसगढ़) द्वारा लगाए गए एक नीले रंग की बोर्ड पर मेरी नजर पड़ी। इसमें स्पष्ट लिखा था कि परवर्ती काल में ग्राम वासियों द्वारा इस मंदिर में बजरंगबली हनुमान जी की प्रतिमा गर्भगृह में स्थापित कर दिए जाने के कारण इस मंदिर का नाम बजरंगबली मंदिर पड़ गया।

 प्राचीन शिव मंदिर की तरह ही एक चबूतरे पर 8 पिलर पर की सहायता से मंडप बनाया गया है।

संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग (छत्तीसगढ़) की ओर से मंदिर के रखरखाव हेतु रखे गए केयरटेकर के अनुसार सहसपुर ग्रामीण को छोड़ दिया जाए तो इक्के दुक्के लोग कभी-कभी इस मंदिर को देखने आ जाते हैं। यदि आप भी ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण का शौक रखते हैं तो इस ओर भी नजर डाल सकते हैं।





Saturday, 14 November 2020

लक्ष्मी : अंधविश्वास मुक्त समाज में अंधविश्वास परोसती फिल्म

काफी दिनों से अक्षय कुमार की movie "लक्ष्मी" का इंतज़ार था। लव जिहाद वाला angle सामने आने के बाद ऐसा लगा कि कहीं इसके रिलीज की ऐसी की तैसी न हो जाए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कल डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज होने के बाद आज इत्मिनान से इसे देख ही लिए। फिल्म के प्रथम half में मुझे समझ नहीं आया कि ये Horror movie में सास बहू की जबरदस्ती और बेकार वाली comedy देने का क्या तुक है??? यदि ये comedy नहीं होती तो यह औसत दर्जे की फ़िल्म हो सकती थी। 

उससे भी ज्यादा अजीब यह लगा कि अंधविश्वास का पोल खोलने वाला एक extra ordinary mind के व्यक्ति को इतना बकलोल दिखाया गया जिसे पता ही नहीं चल रहा कि सड़े मांस की बदबू विकेट से यदि आ रही है तो इसके पीछे क्या कारण हो सकता है??? गाना भी जबरदस्ती ठूसा गया है। एक दो सीन जैसे ढोंगी बाबा की पोल खोलने वाला सीन, लक्ष्मी किन्नर का stage पर दमदार speech के अलावा कोई ऐसे सीन नहीं हैं इस फ़िल्म में कि इसे दुबारा देखा जा सके। कुल मिलाकर ये दुबारा देखने लायक फ़िल्म नहीं है। मैं तो झेल गया शायद आप नहीं झेल पाएंगे।


अंधभक्ति का चश्मा हटाती, बंद आँख खोलती ‘आश्रम वेब सिरीज़’

28 अगस्त 2020 को एम एक्स प्लेयर पर रिलीज प्रकाश झा की वेब सीरीज आश्रम लोगों के बीच इतनी लोकप्रिय हुई कि प्रकाश झा को जल्दी ही इसका सीजन 2 लाना पड़ गया। पहले सीजन में 'जातिगत भेदभाव' जहां सबसे रोमांचक कड़ी था, वहीं सीजन 2 में बाबा का ठरकीपन, ड्रग्स का कारोबार एवं सरकार बनाने में भूमिका। इसमें कहीं भी बाबा के धर्म को दिखाया नहीं गया है। वह कौन से धर्म, संप्रदाय को मानते हैं कुछ भी नहीं बताया गया है। किसी देवी देवता का अपमान भी नहीं किया गया है। यह किसी भी धर्म संप्रदाय से जुड़ा हो सकता है चाहे वह हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, कबीर पंथ ही क्यों ना हो। क्योंकि भौतिक सुख की चाह रखने वाले आज हर धर्म संप्रदाय में मौजूद हैं। और ये लालसा कभी भी किसी भी मनुष्य में जागृत हो सकती है। लेकिन यह अपराध तब बन जाता है जब आप पूरी दुनिया को इस व्यसन से दूर रहने का संदेश देने के बावजूद आप खुद उसमें लिप्त होते हैं। आश्रम वेब सिरीज़ के दूसरे पार्ट में लोगों को लड्डू के माध्यम से ड्रग्स का आदि बनाकर नशा मुक्ति केंद्र चलाना ऐसे ही हास्यास्पद और गुस्सा दिलाने वाले कृत्य हैं। और ऐसा भी नहीं है कि ये कपोल कल्पित हैं। बल्कि समय-समय पर समाचार पत्रों, मीडिया रिपोर्टों में ऐसे अययास नशे का कारोबार करने वाले ठरकी लोगों को बेनकाब होते देखा/पढ़ा जा सकता है। 

           इस सच्चाई से रूबरू होने के बावजूद हमारे देश के कई संगठन आश्रम वेब सीरीज के दूसरे सीजन का विरोध कर रहे हैं। हालांकि उनके इस विरोध का कोई लाभ नहीं हुआ। न ही प्रकाश झा को कोई नुकसान। और 11 नवंबर 2020 को दूसरा सीजन रिलीज कर दिया गया। फिर भी इस विरोध करने का तात्पर्य स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि ऐसे संगठन बाबाओं के इस कृत्य को अपने धर्म के किसी बाबा से जुड़ा हुआ मान रहा है। उन्हें यह लगता है प्रकाश झा आश्रम शब्द को बदनाम कर रहे हैं। लेकिन आश्रम शब्द को वास्तव में जो लोग बदनाम कर रहे हैं उनके खिलाफ इनका एक लफ़्ज़ भी नहीं निकलता, बल्कि या तो यह उनकी गोद में बैठे होते हैं, या उस आश्रम को अपनी गोद में बिठाए रखते हैं। ऐसे आश्रमों पर जब भी कोई आक्षेप लगता है तो उनके लिए लठैत तक बन जाते हैं।

           ऐसे संगठनों के अनुयाई सोशल मीडिया पर इनका बहिष्कार करने का संदेश दे रहे होते हैं। बहिष्कार का कारण पूछा तो गोलमोल जवाब देते नजर आएंगे। हिंदुत्व की रक्षा की दुहाई देंगे। उन्हें यह लगता है कि ऐसे वेब सीरीज से समाज में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, आश्रम की छवि धूमिल होगी।  जबकि वास्तविकता यह है कि आज के तार्किक युग में इसकी कम संभावना नित्य कम होती जा रही है। बल्कि ऐसे वेब सीरीज का लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। ऐसी वेब सीरीज ना केवल दर्शकों का मनोरंजन कर रहे होते हैं, बल्कि उनमें कई अच्छी चीजें भी विकसित हो रही होती है। विशेष रूप से कीसि भी विश्वास को तार्किकता के आधार पर निरीक्षण करने का कौशल। उदाहरण के लिए यदि आप इस वेब सीरीज के दोनों भाग देखें, तो आपको भी एहसास होगा कि किसी भी व्यक्ति या धार्मिक परिवार के अनुयाई बनने से पहले उसके अलग-अलग आयामों पर गंभीरता से विचार करें। परिवार में जुड़ने से पहले उसके उन पहलुओं पर जरूर गौर करें जिसके बारे में इस वेब सीरीज के दोनों भागों में दिखाया गया है। परिवार के लोग आपको अपने संगठन से जोड़ने के लिए किस प्रकार अपने दिखावटी परोपकारी कार्यों से आप का मन मोह कर आपका खुदा बन जाते हैं और विषम परिस्थिति में आपकी मजबूरी का फायदा उठाते हैं इस बात को बहुत अच्छी तरह से इस वेब सीरीज के माध्यम से दिखाया गया है। समय निकालकर हम सभी को जरूर देखना चाहिए।

सौजन्य - MX Player 

 


Sunday, 11 October 2020

लाखामंडल (उत्तराखंड) पांडव गुफा : मिथक एवं यथार्थ

दिनांक 3 अक्टूबर 2016, अपने मां-पिताजी के साथ गंगोत्री, यमुनोत्री यात्रा के लिए हर की पौड़ी, हरिद्वार से एक ट्रेवल एजेंसी के वाहन से निकला। वैष्णो देवी की यात्रा के बाद यह दूसरा मौका था जब मां-पिताजी के साथ तीर्थस्थल भ्रमण के लिए निकला था। तब मैं भी धार्मिक हुआ करता था। इससे पूर्व एक ऐसा भी समय था जब उठने के बाद गायत्री मंत्र के उच्चारण से दिन की शुरुआत होती थी। शाम को बिना गायत्री चालीसा पढ़े सोता नहीं था। आगे चलकर ऐसा भी समय आया जब गायत्री जी की कृपा पाने के लिए गायत्री मंत्र को जपना छोड़कर अखिल भारतीय गायत्री परिवार संस्थान, शांतिकुंज (हरिद्वार) द्वारा प्रकाशित मंत्र लेखन पुस्तिका में प्रतिदिन कम से कम दो पेज अर्थात लगभग 50 बार गायत्री मंत्र लिखा करता था। परिवार या जीवन में जब भी कोई समस्या या विषम परिस्थिति आती तो यह काम 2 – 4 गुणा बढ़ जाता। ऋग्वैदिक काल की प्रमुख देवी गायत्री जी के प्रति लगाव बचपन से ही था, क्योंकि हमारे दादा जी गायत्री परिवार के सदस्य थे। और उनके संपर्क में रहकर हम लोग भी गायत्री उपासना में लीन हो गए। हालांकि इतिहास विषय से एम. ए. करने के दौरान अलग-अलग धर्म-संप्रदायों के क्रमबद्ध विकास के इतिहास, उनके आपसी टकराव, उस टकराव को रोकने में विफल इन देवी-देवताओं संबंधी तथ्यों ने मेरे बंद चक्षु को थोड़ा बहुत खोलने का काम किया। इसी दौरान ही 2010 में बाबरी मस्जिद विध्वंस पर आए फैसले ने मुझे सोचने को मजबूर किया कि जिस राम जी के सेवक हनुमान जी को हिंदू धर्म का एकमात्र जीवित देवता माना जाता है, जिन के डर से भूत पिशाच तक नजदीक नहीं आते हैं, आखिर उनके रहते उनके आराध्य देव राम जी का मंदिर कोई कैसे तोड़ सकता है, वह भी उनकी तथाकथित जन्मभूमि अयोध्या पर बना हुआ मंदिर। यदि वास्तव में उनका अस्तित्व है तो राम या हनुमान जी की कृपा से 500 साल पहले उस मंदिर को टूटना नहीं था। यदि टूट भी गया तो अगले दिन उनके प्रभाव या चमत्कार से स्वयं ही वह मंदिर बन जाना था जैसे हमारे जमुई (बिहार) के सिमेरिया गांव स्थित महादेव मंदिर को अपरूपी (रातों रात विश्वकर्मा भगवान के चमत्कार से निर्मित) कहा जाता है (जो कि एक मिथक है, वास्तविकता कुछ और है। कभी इसके भी मिथक और यथार्थ पर लिखने की योजना है क्योंकि हमारे देश में ऐसे मनगढ़ंत चमत्कारिक किस्से भरे पड़े हैं जो केवल अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं)। लेकिन अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

          इस दौरान सभी धार्मिक आख्यानों को संदेह भरी नजरों से देखने, उन्हें तार्किकता की कसौटी पर कसने तथा उसकी वास्तविकता का पता लगाने की प्रवृत्ति मुझमें विकसित होने लगी। धीरे-धीरे मेरे अंदर यह धारणा मजबूत होती गई कि इस तरह आँख मूंदकर किसी धार्मिक आख्यान को सच तो नहीं मानूँगा, बल्कि उसकी तह तक जाकर क्या सही है? क्या गलत? खोजकर निकालूँगा। 2012 के पश्चात धार्मिक अंधभक्ति को त्यागते हुए धार्मिक भ्रष्टाचार को नजदीक से समझना शुरू कर दिया। ज्ञान चक्षु खोलकर सही को सही और गलत हो गलत कहने का कौशल खुद में विकसित कर रहा था। इस दौरान घर पर कुछ कर्मकांड कराने आए पंडितों से भी किसी भी बात को खोद-खोद कर पूछते हुए झगड़ बैठता था। इन पंडितों से गुस्सा इसलिए भी आता था कि मेरे वैवाहिक जीवन में क्लेश की वजह राहु और शनि की दशा से जोड़कर इन ग्रहों की शांति के लिए अलग-अलग जाप करवाने को लेकर छह-छह हज़ार रुपए ठग लिए। इस मंत्र जाप से कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि पति-पत्नी का संबंध विच्छेद ही हुआ।

          इसी दौरान 2016 में मां-पिताजी ने चार धाम यात्रा करने की इच्छा जाहिर की। तब तक मैं बहुत हद तक धार्मिक रीति-रिवाजों से किनारा करना शुरू कर दिया। लेकिन मां-पिताजी की इच्छा का सम्मान करते हुए, साथ ही साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में घूमने की मेरी दिली इच्छा के कारण रेलवे टिकट बुक किया और हरिद्वार पहुंच गए। तत्पश्चात पहला पड़ाव यमुनोत्री की ओर निकल पड़ा।

          ऋषिकेश से पहाड़ों की चढ़ाई शुरू हो जाती है। सर्पीले रास्ते, मनमोहक नजारे, ऊपर से वैन में लगे डॉल्बी डिजिटल साउंड में 'मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी' जैसे मधुर भक्ति गाने का तड़का यात्रा के आनंद को दोगुना कर दिया। मसूरी घाटी में कुछ समय बिताने के पश्चात आगे बढ़ा। रास्ते में ही पड़ने वाला केंपटी फॉल ने मन तो मोह ही लिया, उसी मार्ग में एक ऐसा भी भव्य मंदिर मिला जहां बड़े-बड़े शब्दों में स्पष्ट रूप से दान देने को मना करने संबंधी निर्देश लिखे । अपनी छोटी सी ज़िंदगी में मैंने पहला ऐसा मंदिर देखा जहां दान देने की मनाही थी, साथ ही प्रसाद मुफ्त में ही दिया जाता था। वैन का ड्राइवर बहुत ही मिलनसार था। कौन से ढाबे पर बढ़िया खाना मिलता है उन्हें अच्छी तरह पता था। पूरे रास्ते वह बढ़िया बढ़िया खाना-नाश्ता कराते गया। हरिद्वार से मसूरी तक हम दोनों बहुत ही अच्छे से घुल-मिल चुके थे। बात-बात में ही हमने उनसे आग्रह किया कि रास्ते में यदि कोई अन्य भी तीर्थ या पर्यटक स्थल मिले तो वहां भी हमें जरूर ले चलें। मसूरी से आगे बढ़ते ही उन्होंने बताया कि रास्ते में ही 60 किलोमीटर दूर एक लाखामंडल जगह है जहां केदारनाथ की तरह ही बहुत प्राचीन शिव मंदिर है। यहां एक ऐसा भी शिवलिंग है जिसपर जल चढ़ाने पर आपको अपना परछाई उस शिवलिंग में दिखेगा। इतना ही नहीं यही वह जगह है जहां दुर्योधन ने पांडवों की हत्या करने के लिए लाख निर्मित महल बनवाया था। यहां ले जाने के लिए ड्राइवर महोदय ने 500 अतिरिक्त पैसे की मांग की। ऐसे चमत्कारी जगह को देखने से हम चूकना नहीं चाहते थे इसलिए बिना शर्त उनकी बात मान लिया। यमुनोत्री की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग से यमुना नदी पार कर लगभग 3 से 5 किलोमीटर की दूरी तय कर हम लोग लाखामंडल ग्राम स्थित उस वीरान पड़े मंदिर में पहुंचे। नागर शैली में पूर्णतः पत्थर से निर्मित इस मंदिर की भव्यता का प्राचीन व बिना रंग-रोगन के बावजूद कोई जवाब नहीं था। यह बहुत ही प्राचीन मंदिर था जो एक पाँच फीट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर 1-2 एकड़ भूमि के दायरे में काले स्लेटी रंग के पत्थर से निर्मित था। मंदिर को देखते ही मेरे अंदर का इतिहासकार जाग उठा। मां-पिताजी जहां पूजा पाठ करने में लग गए वहीं मैं मंदिर के इतिहास को खंघालने में लग गया। प्लेटफॉर्म के बाईं छोर पर मंदिर का गर्भ गृह स्थित था जहां एक शिवलिंग के अतिरिक्त पत्थर की भित्ति पर कई देवी देवताओं की मूर्तियाँ खुदी थी बिल्कुल ऐसा जैसे भोरमदेव (छत्तीसगढ़) का शिव मंदिर। अंतर बस इतना था कि भोरमदेव (छत्तीसगढ़) के मैथुन मूर्तियों की जगह अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण थी। चारों तरफ से अलग-अलग देवताओं जैसे विष्णु, गणेश, कार्तिकेय आदि की मूर्तियों के बीच में एक शिवलिंग था। मैं मंदिर से लेकर उन सभी देवी देवताओं की तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर ही रहा था कि मंदिर के मुख्य पुजारी की आवाज़ आई 'कहां से आए हैं’? हम ने जवाब दिया, बिहार से और यमुनोत्री जा रहे हैं, इस मंदिर के बारे में भी सुना तो चले आए इसके पश्चात वह पुजारी हमें मंदिर से दाहिनी ओर खुले आसमान के नीचे  स्थित एक विशाल शिवलिंग के पास ले गया। उस विशाल शिवलिंग से थोड़ी दूर पर पत्थर निर्मित दो आदमक़द आकार के द्वारपाल स्थित थे। हमने जब पुजारी से इस विशाल शिवलिंग के बारे में पूछा तो वह हमें वास्तविक इतिहास बताने की जगह मिथक में लेते चला गया। पुजारी के अनुसार, जब पांडव अज्ञातवास में थे तो उसी समय इसी स्थान पर धर्मराज युधिष्ठिर ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इस लिंग के सामने पश्चिम की ओर मुख कर दो द्वारपाल खड़े हैं। इस शिवलिंग की यह विशेषता थी कि कोई भी मृत्यु को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति इन द्वारपालों के सम्मुख रख दिया जाए तो पुजारी के द्वारा अभिमंत्रित किया हुआ जल छिड़कते ही वह जीवित हो जाता, मृत्यु को प्राप्त करते समय मुख से राम राम नहीं कहा तो राम-राम शब्द का उच्चारण कर ले, गंगाजल नहीं पिया तो पी ले, इस प्रकार जो भी मृत प्राणी यहां लाया जाता वह कुछ पलों के लिए जीवित हो जाता है फिर बैकुंठ धाम प्राप्त कर लेता है पुजारी पूरे तन-मन से मिथकीय कहानी बताता जा रहा था और मैं उसके इस बकवास से पीछा छुड़ाने के लिए उससे अलग होने की नाकामयाब कोशिश कर रहा था। क्योंकि मुझे पता था कि मृत्यु के बाद कोई भी व्यक्ति एक पल के लिए भी पुनर्जीवित नहीं होता है। और यदि वास्तव में यह वैसा चमत्कारी स्थान होता तो गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ छोड़कर श्रद्धालु पहले यहां आते। यह मंदिर परिसर इतना वीरान नहीं होता। देवघर (झारखंड) में रावण के द्वारा स्थापित शिवलिंग की वास्तविकता, असम में हिडिंबा के वंशजों की कपोल कल्पित कहानियों को मैं पहले से जानता था इसलिए इस युधिष्ठिर द्वारा स्थापित शिवलिंग की मनगढ़ंत थ्योरी को नकारने में मुझे कोई भी दुविधा नहीं हुई। इसके आगे पुजारी जी ने बताया कि यहीं पर दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाख से निर्मित महल बनवाया था। सभी पांडव यहां से एक गुप्त रास्ते से निकलने में कामयाब हुए। इस गुप्त रास्ते को थोड़ी दूर पर स्थित एक गुफा के रूप में देखा जा सकता है। समय के प्रभाव के कारण यह गुप्त रास्ता बंद हो गया

पुजारी के इतना कहते ही मेरा मन जल्द से जल्द उस गुफा को देखने का करने लगा। इसके पश्चात वह पुजारी हमें एक अनोखी शिवलिंग के पास ले गया जिसके बारे में ड्राइवर ने पहले ही बताया था कि जल चढ़ाने के बाद इस शिवलिंग में आपको अपनी परछाई दिखेगी। खुली छत के नीचे स्थित इस शिवलिंग को देखने मां-पिताजी, पुजारी और ड्राइवर के साथ मैं भी वहां पर पहुंचा। माँ और पिताजी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के हैं, इसलिए तुरंत उन्होंने अपने बैग से पीतल की एक छोटी सी लोटकी निकाली, उसमें जल भरा और ध्यान लगाते हुए उस जल को शिवलिंग पर अर्पित किया। देखकर तो बिल्कुल आश्चर्य हुआ कि शिवलिंग पर जल चढ़ाते ही आसपास के सभी लोगों की अख्श उस शिवलिंग में दिखने लगा था।


मां पिताजी हैरान हुए पर मै बिल्कुल नहीं। मां पिताजी इसे चमत्कार मांनते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े थे, तो वहीं मेरे आंख और दिमाग उस कारण को ढूंढने में लगे हुए थे जिसके कारण शिवलिंग में परछाई दिख रही थी। इतना सोचते-सोचते मेरी नजर थोड़ी दूर पर स्थित कई खंडित या अर्ध निर्मित शिवलिंग पर पड़ी। मैंने पुजारी से पूछा, 'यहां एक ही जगह इतनी इतनी शिवलिंग क्यों हैं'? पुजारी ने बताया यह सभी अलग-अलग आकार के शिवलिंग यहां खुदाई में मिले हैं जिसे एक जगह इकट्ठा कर दिया गया। यहीं से मुझे इस चमत्कार का कारण समझ में आ गया। इतनी संख्या में अलग-अलग आकार के शिवलिंग को देखकर मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि यह युधिष्ठिर द्वारा स्थापित शिवलिंग या शैव क्षेत्र नहीं बल्कि एक प्राचीनकालीन शिवलिंग तथा अन्य देवी देवताओं की मूर्ति निर्माण कला का प्रसिद्ध केंद्र रहा होगा। और यह सभी अर्ध निर्मित शिवलिंग, अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, यह तथाकथित चमत्कारी शिवलिंग इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उस चमत्कारी शिवलिंग में अक्स उभरना कोई चमत्कार नहीं था बल्कि कारीगरी का उत्कृष्ट प्रदर्शन था। चूंकि यह स्थान शिवलिंग तथा मूर्ति निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा था, इसलिए कारीगरों द्वारा इस शिवलिंग को इतनी बारीकी से घिसकर तराशा गया कि वह इतना चिकना हो गया कि उस पर पानी पढ़ते ही सामने खड़ा वस्तु या व्यक्ति उस में प्रतिबिंबित होने लगता है।

          पुजारी की एक और बात मेरे मन में खटकी वह यह थी कि यह सभी शिवलिंग खुदाई में प्राप्त हुए हैं यह सोचते हुए कि यदि इस ग्राम में खुदाई हुई है तो जरूर किसी न किसी को यहां के इतिहास का पता होगा। कम से कम भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग को तो जरूर। उत्सुकता वश मैंने पुजारी से पूछा, 'इस ऐतिहासिक क्षेत्र के इतिहास पर क्या किसी ने कुछ लिखा है क्या’? पुजारी ने यह भाँपते हुए कि मैं उनकी मिथकीय कहानियों को विश्वास करने में कोई रुचि नहीं ले रहा हूँ, नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ, मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। और वह किसी दूसरे काम में लग गया। इसके पश्चात हम चारों लोग घूम-घूम कर पूरे मंदिर का भ्रमण करने लगे।


इतने में ही मेरी नजर एक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक लेख पर पड़ी। इसे पढ़कर मेरी जिज्ञासा थोड़ी शांत हुई। इस अभिलेख के अनुसार,

'भगवान शिव को समर्पित नागर शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण लगभग 12वीं 13वीं शताब्दी में हुआ था। क्षेत्र से बहुतायत में पाए स्थापत्य अंगों/ वास्तु अंगों तथा मूर्तियों के अवशेषों से ज्ञात होता है कि पूर्व में यहां अनेक शिव मंदिर रहे होंगे परंतु वर्तमान में केवल यही मंदिर शेष बचा। प्रस्तर निर्मित पिरामिड आकार संरचना के नीचे के स्तर में पाए गए ईंटों द्वारा निर्मित संरचना के आधार पर लाखामंडल की प्राचीनतम तिथि पांचवी से आठवीं शताब्दी ईस्वी जाती है।  मंदिर परिसर से ही प्राप्त छठी शताब्दी के एक प्रस्तर अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि सिंहपुर के राजपरिवार से संबंधित राजकुमारी ईश्वरा ने अपने पति चंद्रगुप्त जो जालंधर के राजा का पुत्र था, के निधन पर सद्गति एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु इस शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।

अधीक्षण पुरातत्वविद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

पूरा मामला यह था कि लाखामंडल स्थित इस शैव मंदिर का संबंध महाभारत काल से नहीं बल्कि आरंभिक मध्य काल से था, उस दौर में यह मूर्ति निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा होगा यही कारण है कि यहां पर काफी संख्या में अर्ध निर्मित शिवलिंग के साथ-साथ अच्छी तरह पॉलिश कर बनाए गए शिवलिंग देखे जा सकते हैं। बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में इस स्थान पर सिंहपुर राज परिवार की राजकुमारी ईश्वरा ने अपने पति चंद्रगुप्त के सम्मान में यह शैव मंदिर बनवाया। हालांकि यह अभी शोध का विषय है कि सिंहपुर राज परिवार किस क्षेत्र से संबंधित हैं।

          अब बात करते हैं पांडव के लाखगृह से एक गुफा होकर बच निकलने की। मंदिर के मुख्य गेट के नजदीक ही एक और बोर्ड देखा जा सकता है जिसमें इस मंदिर के नाम का उल्लेख मरड़ेश्वर महादेव मिलता है। इस बोर्ड में ही यह उल्लेख किया गया है लाखामंडल में पांडवों को जीवित जलाने हेतु लाक्षागृह का निर्माण कराया गया था। मंदिर के मुख्य पुजारी भी इस बात को दोहराते हैं। महाभारत में यह प्रसंग इस प्रकार है,

जब भीष्म पितामह धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करने के लिए कहते हैं। तो दुर्योधन धृतराष्ट्र से कहते हैं कि 'पिताजी एक बार यदि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो जाएगा तो यह राज्य सदा के लिए पांडवों का हो जाएगा और हम कौरवों को उनका सेवक बनकर रहना पड़ेगा। इस पर धृतराष्ट्र कहते हैं कि युधिष्ठिर हमारे कुल की संतानों में सबसे बड़ा है इसलिए इस राज्य पर उसी का अधिकार है। इसके अलावा भीष्म तथा प्रजाजन भी उसी को राजा बनाना चाहते हैं। इसलिए हम इस विषय में कुछ नहीं कर सकते, तुम उनके रुकने का प्रबंध करो। दुर्योधन ने पांडवों को जलाकर मार देने के लिए षड्यंत्र रचा। उसने पांडवों के रुकने के लिए एक विशेष प्रकार का गृह बनवाया जिससे लाख, सूखी घास, मूंज आदि ज्वलनशील पदार्थों से बनाया गया था। संजोग से दुर्योधन के इस षड्यंत्र का पता विदुर को चल गया, विदुर ने पांडवों को आकर सारी बात बताई। आत्मरक्षा के लिए पांडवों ने महल के अंदर से ही एक गुप्त रास्ता ढूंढ निकाला। और आग लगने के पूर्व ही पांडव उस गुप्त मार्ग से बाहर निकल गए।

          इस मिथक को तार्किकता की कसौटी पर परखने पर सभी बातें हवा-हवाई साबित होती है।  पांडव जिस सुरंग से लाक्षागृह से बाहर निकले थे उसे वर्तमान में उस गांव से थोड़ी ही दूर पर बाहर निकलने वाले मुख्य मार्ग के बाईं और देखा जा सकता है। वापसी में हम लोग भी उस गुफा के पास आकर रुके और थोड़ी दूर गुफा के अंदर भी गए।


वहां पर दो साधु पहले से मौजूद थे। उनमें से एक के हाथ में टॉर्च था। हमने उनसे पूछा - क्या गुफा के अंदर भी जा सकते हैं? टॉर्च वाले साधु ने सिर हिलाते हुए हां का इशारा किया। मेरे साथ-साथ वह भी चल दिया। गुफा में प्रवेश करने के साथ ही 20 से 25 फीट अंदर तक श्रद्धालुओं के आने-जाने के लिए एक पक्का रास्ता बना हुआ था। इसके बाद वह रास्ता संकरा होता हुआ बंद हो जाता था। मैंने पुजारी से पूछा कि यह रास्ता तो आगे बंद हो गया है पुजारी का जवाब था इसी रास्ते होते हुए पांचो पांडव लाख गृह से बाहर निकले थे। साथ ही इसका सबूत मिटाने के लिए उन्होंने इस मार्ग को बंद कर दिया। उस साधु की बातों पर मुझे जरा भी विश्वास नहीं था। 10 मिनट तक मैं उस गुफा में रहा, हर तरफ से निहारता रहा, उस साधु से टॉर्च लेकर सकरी गुफा की तरफ देखता, निरीक्षण करता रहा। टॉर्च की रोशनी में थोड़ी दूर पर मुझे उस गुफा से पानी का रिसाव दिखा। मैंने उस साधु से पूछा यह पानी का रिसाव कहां से हो रहा है’? साधु का जवाब था कि इस पहाड़ी के ऊपर पानी जमा हो जाता है। बारिश के दिनों में इस मार्ग से पानी का अत्यधिक रिसाव होने लगता है, सर्दी के दिनों तक यह रिसाव बंद हो जाता है इतना सुनते ही मैं वहां से तुरंत निकल आया। उस साधु ने कुछ दान मांगा। वैसे तो मैं दान देने में विश्वास नहीं करता लेकिन उसने मुझे बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी दी इसलिए बिना कुछ सोचे-समझे जेब में हाथ डाला तो 20 रुपए का नोट मिला मैंने उसे दे दिया। वहां से निकलने के साथ ही पिताजी ने मुझे पूछा- 'बहुत गौर से देख रहे थे उस गुफा को? पुजारी से भी बात किए तो क्या जानकारी मिला इस क्षेत्र के बारे में'? मैंने कहा कि सुनने में थोड़ा बुरा लग लग सकता है आपलोग को लेकिन ये लोग दुनिया को मूर्ख बना कर उनकी अंधआस्था का फायदा उठाकर उन्हें ठग रहे हैं।  इस क्षेत्र का महाभारत काल से कोई लेना देना नहीं है। न पांडव यहां कभी आए, न शिवलिंग को स्थापित कर उसका उपासना किए, न ही यहां कोई लाखगृह था, न ही पांडव इस गुफा से निकले? मां-पिताजी मेरी बात को सुनकर गुस्से में लाल हो गए, ड्राइवर को भी मेरी बात बहुत अटपटी लगी। ड्राइवर ने मुझे तुरंत रोका कि देवस्थान के बारे में ऐसा नहीं कहते। ड्राइवर के ऐसा बोलने पर मां-पिताजी भी मेरा साथ छोड़कर ड्राइवर की बात का साथ देते हुए मुझे डांट फटकार कर समझाने लगे।

मैंने ड्राइवर से कहा मैं यह बात हवा में नहीं कर रहा हूं मैं इसे साबित भी कर सकता हूं अब ड्राइवर को भी उत्सुकता होने लगी। अपनी बात को साबित करने के लिए मैंने मोबाइल से गूगल मैप खोला। और ड्राइवर और पिताजी से 2 प्रश्न पूछे – (1) कौरव-पांडव की राजधानी कहां थी? (2) महाभारत की लड़ाई कहां हुई? ड्राइवर की तरफ से कोई जवाब नहीं आया शायद उनको पता नहीं हो। पिताजी ने उत्तर दिया - पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर में थी, और यह लड़ाई कुरुक्षेत्र में हुई। मैंने तुरंत एक और प्रश्न पूछा - वर्तमान समय में यह कुरुक्षेत्र कहां पड़ता है? इस प्रश्न पर कोई उत्तर नहीं आया।


इसके पश्चात मैंने गूगल मैप से वर्तमान में दिल्ली और लाखामंडल के बीच की दूरी को दिखाया। 357 किलोमीटर थे। इसके पश्चात मैंने उनसे एक और सवाल किया कि क्या आपको लगता है कि दुर्योधन अपनी राजधानी से 350 किलोमीटर दूर एक वीरान जंगल पहाड़ में यह लाख गिरी बनवाया होगा। अभी जब इतना वीरान है यह क्षेत्र तो उस समय कल्पना कीजिए कितने घने जंगल रहे होंगे इस क्षेत्र में? वर्तमान में पूरे भारत में इतनी घनी जनसंख्या है तब जाकर इन पहाड़ों वाले क्षेत्र में पांच 5 किलोमीटर दूरी पर एक एक गांव स्थित है। तो आज से लगभग 3000 वर्ष पहले इस क्षेत्र में कितने लोग रहते होंगे?

मेरी इन बातों से पिताजी सहमत नहीं थे लेकिन ड्राइवर कुछ हद तक सहमत हुआ था। इसके पश्चात उसने मुझसे एक सवाल पूछा कि यदि ऐसा नहीं है तो फिर इस क्षेत्र के साथ महाभारत काल का संबंध क्यों जोड़ा जाता है’? इस सवाल के जवाब में मैंने एक ऐतिहासिक तथ्य रखा। मैंने उनसे पूछा, आपको पता है कि कैलाश पर्वत से रावण जब शिवलिंग उठाकर लंका की ओर चला तो उसने उस शिवलिंग को कहां रखा’? पिताजी ने तुरंत उत्तर दिया, ‘देवघर (झारखंड)। मैंने तुरंत उनसे पूछा क्या आपको पता है कि यह कहानी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित गोला गोकरण नाथ धाम के साथ जोड़ा जाता है मैंने वहां के पुजारी से इस बारे में बातचीत की तो उन्होंने देवघर वाली मान्यता को खारिज कर दिया। और रावण और शिवलिंग की यही कहानी हिमाचल प्रदेश के एक और मंदिर के लिए भी प्रयुक्त की जाती है। अब आप बताइए रावण के द्वारा कैलाश से लाया हुआ वास्तविक शिवलिंग कौन सा है? सारे लोग कंफ्यूज हो गए कि किसे सत्य माने? पिताजी से एक और सवाल पूछा, क्या आप यह मानते हैं कि देवघर का शिवलिंग रावण द्वारा स्थापित शिवलिंग है? थोड़ी देर सोच विचार करने के पश्चात पिताजी ने मना कर दिया क्योंकि कुछ दिन पहले ही मैंने उनको श्यामनन्द प्रसाद सिंह द्वारा लिखित एक पुस्तक 'जमुई का इतिहास और पुरातत्व' पढ़वाया जिसमें ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट लिखा था कि इस मंदिर का निर्माण गिद्धौर के चंदेल राजा महाराजा रावणेश्वर प्रसाद सिंह ने करवाया।

कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे देश में ऐसा गोरखधंधा चलता है कि अपने क्षेत्र के किसी मंदिर को प्रसिद्धि दिलाना हो तो उसे रामायण या महाभारत के मिथकीय चरित्रों के साथ जोड़ दो। हमारे देश की जनता इतनी धर्मांध है कि वह कभी सोचेगी ही नहीं कि क्या सत्य है और क्या गलत? रही बात इस पांडव गुफा की तो यह कोई गुप्त रास्ता नहीं है बल्कि पहाड़ के ऊपर स्थित जलाशय या पहाड़ द्वारा अवशोषित वर्षा जल के इस स्थान से रिसने के कारण इस संकरी होती गुफा का निर्माण हुआ है। हिमालय क्षेत्र में ऐसी आपको बहुतायत गुफाएँ मिलेंगे। भौगोलिक ज्ञान की कमी के कारण ये साधु लोग आपको बेवकूफ बनाकर दान के नामपर पैसे ऐंठते हैं।

इसी तरह इस मौके पर विचार विमर्श करते हम लोग यमुनोत्री की ओर बढ़ते चले गए।

शिव मंदिर, लाखामंडल 




Thursday, 1 October 2020

महात्मा गांधी का पत्रकारिता जीवन

मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें भारतवासी महात्मा गांधी के नाम से संबोधित करती हैन केवल एक लोकप्रिय राजनेतासमाज सुधारकदार्शनिक थेबल्कि एक मंझे हुए पत्रकार भी थे। पहली बार वे पत्रकारिता के संपर्क में तब आए जब 1888 ई. में कानून की पढ़ाई की क्रम में वे लंदन गए थे। लंदन में वे अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के संपर्क में आए जो उस समय लंदन से ‘इंडिया’ पत्रिका निकालते थे। 1890 में इस पत्रिका से जुड़कर उन्होंने संवाददाता का काम किया। इसके अतिरिक्त 'लंदन वेजिटेरियन सोसाइटीके संपर्क में आकर शाकाहारभारतीय रीति रिवाजत्योहार पर आधारित कई आलेख लिखे।[i] 7 फरवरी 1891 ई. को गांधीजी का पहला आलेख ' इंडियन वेजीटेरियनशीर्षक से प्रकाशित हुई।[ii] इसी के साथ ही गांधी जी के स्वतंत्र पत्रकारिता जीवन की शुरुआत होती है।

          40 वर्षों तक लगातार पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए गांधी जी ने समाचार सामग्री का प्रूफ रीडिंगसंवाददाता से लेकर संपादक के रूप में योगदान दिया। सम्पूर्ण पत्रकारिता जीवन में वे छह पत्र-पत्रिकाओं जैसे 'इंडियन ओपिनियन' 'यंग इंडिया' 'नवजीवनतथा ' हरिजन(अंग्रेजी)' 'हरिजन सेवक (हिंदी)' 'हरिजन बंधु (गुजराती)के संपादन तथा लेखन से जुड़े रहे। वे तीन अंग्रेजी भाषी साप्ताहिक पत्र 'इंडियन ओपिनियन (1903-1915) 'यंग इंडिया (1919-1931) तथा हरिजन (1933-1942 तथा पुनः 1946- जनवरी 1948) के संपादन से जुड़े रहे। इसके अतिरिक्त अनेक समाचार पत्रों जैसे 'प्रजाबंधु' 'अमृतबाजार पत्रिका' 'द हिंदू' ‘द बॉम्बे क्रॉनिकल’ ‘काठियावाड़ टाइम्स’ 'द सर्च लाइट' 'बिहार समाचारआदि पत्रिकाओं को दिये साक्षात्कार के माध्यम से अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचाया।

          इंडियन ओपिनियन के प्रथम अंक से पता चलता है कि गांधीजी पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य 'सेवामानते थे।[iii] 1915 ई. में जब वे दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो 1918 से ‘इंडियन ओपिनियन’ के प्रकाशन की ज़िम्मेदारी संभाल रहे अपने द्वितीय पुत्र मणिलाल को समय-समय पर पत्र के माध्यम से पत्रकारिता के गुर सिखाते रहते थे। अपने पुत्र को निर्देश देते हुए वे कहते हैं कि ‘कभी भी क्रोध में आकर किसी के खिलाफ तीक्ष्णचुभने वाली भाषा में कुछ भी गलत नहीं लिखना चाहिए। यदि ऐसी गलती हो जाए तो अपनी गलती स्वीकार कर लेना चाहिए[iv]  

          गांधीजी पत्रकारिता को जन सामान्य लोगों को समकालीन इतिहास से परिचित कराने तथा साक्षर बनाने का सर्वप्रमुख माध्यम मानते थे। यही कारण है कि दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति तक उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राजनीतिकसामाजिकआर्थिकसांस्कृतिक तथा धार्मिक विषयों पर लगातार लेखन करते हुए जनता को जागृत किया। उनकी पत्रकारिता के उद्देश्यों में शामिल था - विभिन्न धर्मसंप्रदायजाति के लोगों के बीच आपसी भाईचारा विकसित करनाजातिगत भेदभाव सहित अस्पृश्यता का निवारण करनागरीबी उन्मूलनरूढ़ीवादी परंपराओं से स्त्रियों को मुक्त करनाब्रिटिश सरकार के दमनकारी शासन से मुक्ति दिलाना आदि। इन मुद्दों के प्रति उनकी सक्रियता ने उन्हें समस्त धर्मावलंबियोंगरीब जनतास्त्रियोंकामगारोंअस्पृश्य सहित समस्त देशवासियों के बीच लोकप्रिय बनाया।[v] पत्रकारिता ने उनके अनेक उद्देश्योंआंदोलनों जैसे स्वदेशी आंदोलनसत्याग्रहहरिजन उद्धार आदि को गति प्रदान की।

          प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात जब ब्रिटिश सरकार होमरूल देने के वादे से मुकर कर भारतीयों पर रौलट एक्ट लगा दिया तो गुस्से में आकर गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार की खिलाफत करने के लिए 7 अप्रैल 1919 से एक गैर पंजीकृत साप्ताहिक पत्र 'सत्याग्रह' का प्रकाशन प्रारंभ किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने इसका प्रकाशन बंद कर छोटे-छोटे पम्पलेट निकालना शुरू किया। इसी बीच कुछ गुजराती नौजवानों ने अंग्रेजी भाषी साप्ताहिक पत्र 'यंग इंडिया' निकालना शुरू किया तथा गांधीजी को इसके संपादन के लिए तैयार कर लिया। दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के पश्चात यहां से भारत में उनके पत्रकारिता जीवन की शुरुआत होती है जिसके बदौलत उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यगरीबीअस्पृश्यता से लड़ने मेंसुषुप्त देशवासियों को जगानेउनमें राष्ट्रीयता की भावना भरने जैसे कार्यों में योगदान दिया।

          गांधीजी के आलेख के पाठक मुख्यतः किसान तथा बुनकर या अन्य कारीगर होते थे जो अधिक पढ़े लिखे नहीं होते थे। इसे ध्यान में रखते हुए अपने लेखन की भाषा को उन्होंने सरल बनाया ताकि आम जनों द्वारा उसके अर्थ को आसानी से समझा जा सके। वैकल्पिक पत्रकारिता के पक्षधर होने के साथ-साथ वे समाचारपत्र से धन उगाही करने के सख्त खिलाफ थे। वे प्रेस की स्वतंत्रता के हिमायती थे तथा इस पर किसी भी प्रकार का सरकारी नियंत्रण नहीं होने देना चाहते थे।

          आजादी के 7 दसक बाद आज जिस तरह पत्रकारिता टीआरपी के माध्यम से न केवल धन उगाही का माध्यम बनता जा रहा हैसरकारी दखल से पत्रकार सरकारी प्रवक्ता बनते जा रहे हैं। इनके माध्यम से समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोला जा रहा है। ऐसे विषम परिस्थिति में वर्तमान पत्रकारिता जगत को आवश्यकता है गांधीजी के पत्रकारिता संबंधी विचारों से प्रेरणा लेने की। इन्हें अपनाने की। अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि जिस पत्रकारिता को गांधी जी देशवासियों को जगाने का एक सशक्त माध्यम मानते थे वह देशवासियों की बर्बादी का कारण बन जाएगा।



[i] Bhattacharya S.N., ‘Mahatma Gandhi The Journalist’ Asia Publishing House, New Delhi, 1965, Page No. 5

[ii] Ibid. Page No. 2

[iii] Gandhi M.K., ‘An Autobiography of the story of my experiments with truth’ Penguin Books, London, page no. 221

[iv] https://www.thehindu.com/todays-paper/tp-miscellaneous/tp-others/mahatma-gandhi-as-journalist/article27939749.ece

[v] K. Dr. Puttaraju, ‘Mahatma Gandhi as a writer, editor and Journalist’ International Journal of Acadamic Research, October-December 2014, ISSN: 2348-7666, Page No. 44-45 

मूलतः 18 अक्टूबर 2020 के educational news दैनिक समाचारपत्र में प्रकाशित 


Tuesday, 29 September 2020

भारत में स्त्री प्रश्न के जनक : दरभंगा महाराजा माधव सिंह

आधुनिक भारत में स्त्री प्रश्नों का उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं थी बल्कि साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने इसकी नींव तैयार करने का कार्य किया। अपनी पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति को हिंदुओं की सभ्यता-संस्कृति से श्रेष्ठ दिखाने के लिए साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने जब तत्कालीन हिंदू समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति पर सवाल उठाए तो प्रतिक्रिया स्वरूप पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा स्त्रियों की स्थिति का अवलोकन करने तथा उनकी स्थिति में सुधार लाने की दिशा में प्रयास शुरू हुआ। साम्राज्यवादी इतिहासकारों की बातों का खंडन भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने प्राच्यवादी इतिहासकारों द्वारा लिखित साहित्य के साथ-साथ प्राचीन संस्कृत साहित्य का अध्ययन कर साबित किया कि हिंदू समाज में स्त्रियों की स्थिति ऐसी नहीं थी जैसा वर्तमान में है। इसी क्रम में राजा राममोहन राय ने संस्कृत साहित्यों का अध्ययन कर सती प्रथा को शास्त्र संवत नहीं मानते हुए इसका विरोध किया। यही कारण है कि राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण या समाजसुधार आंदोलन का अग्रदूत कहा जाता है।

          यहां सवाल उठता है कि क्या राजा राममोहन राय प्रथम भारतीय/हिन्दुस्तानी थे जिन्होंने स्त्री प्रश्न उठाने का कार्य किया? क्या इससे पहले हिंदुस्तानियों में बौद्धिक चेतना का विकास नहीं हुआ था? क्या सामाजिक कुप्रथाओं को वे आलोचनात्मक नज़र से नहीं देखते थे? स्कूली पाठ्यपुस्तकों से लेकर अधिकांश साहित्य का फिलहाल तो यही मानना है। जबकि वास्तविकता यह है कि राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि से भी पूर्व स्त्रियों की चिंताजनक स्थिति पर विचार करने का कार्य दरभंगा महाराजा माधव सिंह (1775-1807 ई.) ने किया। जिस प्रकार राजा राम मोहन राय को सती प्रथा के अंत के लिए जाना जाता है उसी प्रकार दरभंगा महाराजा माधव सिंह को वैवाहिक सुधार, मिथिला क्षेत्र में कुलीन घरानों में प्रचलित बहुविवाह प्रथा को खत्म करने के लिए जाना जाता है जो मुख्यतः ‘बिकउवा’ ब्राह्मणों में प्रचलित थी। इस दिशा में राजा माधव सिंह के योगदानों को देखते हुए स्वयं राजा राममोहन राय अपने एक आलेख में लिखते हैं –

द हॉरर ऑफ दिस प्रैक्टिस (पॉलीगेमी) इज सो पैनफूल टू द नैचुरल फीलिंग्स ऑफ मेन देट ईवन माधव सिंह द लेट राजा ऑफ तिरहुत (दाऊ अ ब्राह्मण हिमसेल्फ), थ्रू कंपाइसन, टूक अपॉन हिमसेल्फ (आई एम टोल्ड) विदीन द लास्ट सेंचुरी टू लिमिट द ब्राह्मन्स ऑफ हिज स्टेट टू फोर वाइफ़ ओन्ली। (सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ राजा राममोहन राय, नई दिल्ली, 1977, पृष्ठ सं.171)

 

          राजा राम मोहन राय की तरह ही राजा माधव सिंह ने इस कुप्रथा को काफी नजदीक से महसूस किया। जटाशंकर झा की पुस्तक ‘बायोग्राफी ऑफ एन इंडियन पेट्रीओट महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ऑफ दरभंगा’ के अनुसार अपने पूर्ववर्ती राजा प्रताप सिंह (1760-1775 ई.) के एक कृत्य ने उन्हें इस प्रथा की खिलाफत के लिए मजबूर किया। अल्सर से गंभीर रूप से पीड़ित राजा प्रताप सिंह अपनी मृत्यु के 3 महीने पूर्व ही एक कम उम्र की कन्या के साथ विवाह किया था। एक कम उम्र की कन्या का तीन महीने में ही विधवा जीवन जीते देखकर उन्हें अच्छा नहीं लगा था।

आखिर क्या थी ‘बिकउवा’ प्रथा?

बंगाल के कुलीन प्रथा की तरह मिथिला में भी इसी प्रकार की एक ‘बिकउवा’ प्रथा यहाँ के राजा, उनके सामंतों सहित धनी लोगों के वंशावली में प्रचलित थी। मध्यकाल में मिथिला के ब्राह्मणों के बीच वंशावली बनाने की प्रथा विकसित हुई ताकि वैवाहिक संबंधों के साथ-साथ जातिगत शुद्धता बनी रहे। इसके परिणामस्वरूप ब्राह्मणों में एक नया समूह विकसित हुआ जिसे ‘बिकउवा’ ब्राह्मण कहा जाता था। इस नवीन प्रथा के सृजन के परिणामस्वरूप मिथिला क्षेत्र के ब्राह्मण दो उपजातियों में विभक्त हो गए – पंजीकृत (बिकउवा) तथा गृहस्थ ब्राह्मण। ये पंजीकृत ब्राह्मण ही ‘बिकउवा’ ब्राह्मण कहे जाते थे तथा खुद को ब्राह्मणों की सर्वोच्च उपजाति मानते थे। गृहस्थ ब्राह्मण अपनी सामाजिक स्थिति को उन्नत करने के लिए ‘बिकउवा’ ब्राह्मणों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने से उनकी निम्न स्थिति उच्च हो जाती है। यही कारण है कि ‘गृहस्थ ब्राह्मण’ बिकउवा ब्राह्मण से वैवाहिक संबंध बनाने के लिए लालायित रहते थे। ‘बिकउवा’ ब्राह्मण द्वारा ‘गृहस्थ’ ब्राह्मण की बेटी से विवाह कर उसे विधवा के रूप में छोड़ दिया जाता था। उसे पुनर्विवाह करने की इजाजत नहीं होती थी। हैरत की बात यह थी कि ‘बिकउवा’ ब्राह्मण के लिए उम्र की कोई बाध्यता नहीं होती थी, वह दूध पीता बच्चा से लेकर मरणासन्न वृद्ध तक हो सकता था। अपने सम्पूर्ण जीवन काल में वह जितनी चाहे उतनी शादी कर सकता था। यह संख्या 10, 20, होते हुए 50, 60 तक चली जाती थी। इस ‘बिकउवा’ प्रथा ने मिथिला क्षेत्र में न केवल ब्राह्मणों की सामाजिक स्थिति को प्रभावित किया बल्कि इससे उत्पन्न परिस्थिति ने समाज में बाल विवाह, बेमेल विवाह को बढ़ावा देते हुए स्त्रियों की स्थिति को और भी बदतर करने का कार्य किया।

          इस ‘बिकउवा’ प्रथा की विभीषिका को इस आधार पर समझा जा सकता है कि 1795 ईस्वी में राजा माधव सिंह ने तिरहुत दीवानी न्यायालय में इस प्रथा के खिलाफ याचिका दायर करते हुए लिखा था ‘‘बिकउवा ब्राह्मण’ व्यक्तिगत रूप से 50 से 60 स्त्रियों से विवाह कर उसे उसके मायके छोड़ आते हैं। अपने पति से नजरअंदाज हो कर स्त्रियां तनावग्रस्त महसूस करती हैं। लेकिन अपने सम्मान की रक्षा के लिए अदालत नहीं जा पाती। इसलिए अदालत को उनपर जुर्माना या सजा देने का प्रावधान लागू करना चाहिए'(झा, जटाशंकर, एन अर्ली अटेम्प्ट एट मैरेज रिफॉर्म इन मिथिला (संपा.) (1981)‘ पृष्ठ सं. 536) तिरहुत के दीवानी न्यायालय ने मामले को संगीन मानते हुए यह निर्णय दिया कि कोई भी ब्राह्मण 4 से अधिक विवाह नहीं कर सकता।

          हालांकि 1876 ई. के एक सर्वे से यह पता चलता है कि कानून बनने के बाद भी यह प्रथा खत्म नहीं हुई। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार कुल 54 ‘बिकउवा’ ब्राह्मण के मरने से 665 जवान तथा कुछ कम उम्र की स्त्रियाँ विधवा हो गई थी। एक सदी बाद दरभंगा राज्य के ही महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के प्रयास से इस प्रथा का अंत हुआ। (झा, जटाशंकर ‘बायोग्राफी ऑफ एन इंडियन पेट्रीओट महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ऑफ दरभंगा’ पृष्ठ 138)

          इस आधार पर कहा जा सकता है कि स्त्रियों की समस्याओं के खिलाफ सोचने का कार्य राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर से भी पूर्व दरभंगा महाराजा माधव सिंह ने किया। 

(मूलतः 30 सितंबर 2020 के Educational News में प्रकाशित)