Friday, 5 May 2023

जिला शिक्षा अधिकारी की अपील पर शिक्षक आयोजित कर रहे हैं बच्चों के लिए ‘समर कैंप’

 जिला शिक्षा अधिकारी श्री अरविंद मिश्रा जी की जिले के शिक्षकों से स्वेच्छिक रूप से बच्चों के लिए समर कैंप आयोजित करने की अपील रंग ला रही है। वार्षिक परीक्षा खत्म होने के साथ ही जिले के शिक्षक अपने-अपने शालाओं में बच्चों के लिए 5 से 10 दिन की योजना बनाकर स्वेच्छिक रूप से सुबह 08: 00 से 10: 30 बजे तक समर कैंप का आयोजन कर रहे हैं। जिले में कुछ स्कूल इसे पूर्ण कर चुके हैं तो बहुत से स्कूल इसे अभी संचालित कर रहे हैं या संचालित करने हेतु योजना निर्माण पर कार्य कर रहे हैं। इस समर कैंप के माध्यम से शिक्षक बच्चों में कल्पनाशीलता, आत्मविश्वास, तार्किक सोच, सृजनशीलता, अभिव्यक्ति जैसे कौशल बालगीत, मौखिक भाषा विकास व एकाग्रता विकसित करने वाले खेल, चित्रकारी, कागज व मिट्टी के खिलौने निर्माण, कहानी निर्माण, रचनात्मक लेखन, जैसे रोचक गतिविधियों के माध्यम से समृद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। बच्चे भी पूरे उमंग व उत्साह के साथ इसे आनंद उत्सव के रूप में मनाते हुए अपने भाषाई, गणितीय व अन्य कौशल को समृद्ध कर रहे हैं। इन-इन गतिविधियों में बच्चे ले रहे रुचि –

·    दर्जनों बालगीत (हिंदी एवं अंग्रेजी भाषी) को हाव-भाव के साथ गाना (एक बुढ़िया ने बोया दाना, पहाड़ी पर पेड़ था, चूहों ! म्याऊँ सो रही है, हमने तीन चीजें देखी, श्यामा की गुड़िया के हाथ नहीं, आहा टमाटर बड़े मजेदार,  मम्मी ओपेन द डोर, फाइव लिटिल मंकी... मेरे नौ बतख थे, पानी में तैर रहे थे आदि)  

·       ओरिगेमि पेपर से तितली बनाना। 

·       न्यूज़ पेपर से टोपी बनाना।

·       स्वेच्छा से ड्रौइंग-पेंटिंग बनाना एवं उसके संदर्भ में अपने अनुभव 5 से 10 वाक्य में लिखना

·        कहानी बनाना सिखाना एवं इसकी निरंतरता में बच्चों से एक अलग कहानी बनाना।

·       भाषा एवं गणित के रोचक खेल जैसे - नंबर गेम, नंबर जंप, आलू खाओ पंखा खाओ, शब्द जाल

·       मिट्टी के खिलौने बनाना, उसे रंगना एवं उसकी लेबलिंग करना।  

बेमेतरा विकासखंड अंतर्गत शा. प्रा. शाला बसनी (7 दिवसीय), शा. प्रा. शाला निनवा (10 दिवसीय), शा. प्रा. एवं उच्च प्रा. शाला कठौतिया (5 दिवसीय) के शिक्षक समर कैंपआयोजन को पूर्ण कर चुके हैं। जबकि शा. प्रा. शाला गुनरबोड़, शा. प्रा. शाला मटका, शा. प्रा. शाला हथमुड़ी, शा. प्रा. शाला नरी (सभी बेमेतरा विकासखंड) शा. प्रा. शाला तेंदुभाठा, शा. प्रा. शाला अतरझोला, शा. प्रा. शाला बीजागोंड (सभी साजा विकासखंड) शा. प्रा. शाला जामगाँव, शा. प्रा. शाला तबलघोर, शा. प्रा. शाला तिवरईया (सभी बेरला विकासखंड) शा. प्रा. शाला तिलकापारा (नवागढ़ विकासखंड) के शिक्षक स्वेच्छिक रूप से चारों विकासखंड में मौजूद अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों के सहयोग से आयोजित कर रहे हैं।

          संकुल समन्वयक सहित जिला/विकासखंड स्तर के शिक्षा विभाग के अधिकारी, डाइट व्याख्याता आदि आयोजित हो रहे इन समर कैंप में भी सहभागिता कर शिक्षक व बच्चों के कार्यों की सराहना कर रहे हैं। उन्हें उत्साहित करने के साथ-साथ इस आयोजन में अधिक-से-अधिक संख्या में स्वेच्छिक रूप से शामिल होने की शिक्षकों से अपील कर रहे हैं।   



Saturday, 15 April 2023

अंधविश्वास के मकड़जाल से मुक्त होने का समय

 ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।

          इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी।  

          सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है। 

Friday, 24 March 2023

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा द्वारा कार्यक्रम का आयोजन।

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, जिला शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, जिला पुलिस विभाग, विधिक सेवा विभाग, एवं अजीम प्रेमजी फाउंडेशन बेमेतरा के संयुक्त तत्वावधान में आज दिनांक 24 मार्च 2023 को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बेमेतरा के सभागार में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर संगोष्ठी एवं पुस्तक प्रदर्शनी आयोजित किया गया। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बेमेतरा के छात्र-छात्राध्यापक, विकासखंड के शासकीय शालाओं के शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छात्राएं सहित 130 लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इन सभी के क्षमतावर्द्धन के लिए अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा के सदस्यों की ओर से सभागार में ही भाषा, गणित, ईसीई कॉर्नर के साथ-साथ पढ़ने लिखने की संस्कृति विकसित करने के लिए पुस्तक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत में सभी दर्शकों ने इन कॉर्नर की गतिविधियों का अवलोकन किया, भाषा व गणित कॉर्नर में प्रदर्शित पहेलियों को सुलझाने का सफल प्रयास किया। असफल होने के दुख का भी खुशी पूर्वक आनंद लिया।

          तत्पश्चात आमंत्रित वक्ताओं ने अपने वक्तव्य रखा। अधिवक्ता सुश्री रजनी पांडे ने स्त्रियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार, हिंसा आदि की रोकथाम के लिए भारतीय दंड संहिता में उल्लेखित कानूनी प्रावधान के साथ-साथ पोक्सो एक्ट पर संक्षेप में चर्चा की। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के व्याख्याता श्री हेमंत कुमार भुवाल ने कुछ संस्कृत श्लोक आदि के माध्यम से हमारे समाज में स्त्रियों को दिए गए दर्जे के विपरीत उनकी वास्तविक स्थिति को समझाने का प्रयास किया। प्रधान महिला आरक्षक, बेमेतरा पुलिस श्रीमती वर्षा चौबे ने एक महिला आरक्षक के रूप में अपने जीवन संघर्ष के साथ-साथ दिन प्रतिदिन के चुनौतियों से श्रोताओं को रूबरू करवाया। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, बेमेतरा की प्रधान पाठक श्रीमती सुषमा शुक्ला शर्मा ने अफगानिस्तान, ईरान आदि कई देशों में स्त्रियों की पराधीनता के उदाहरण देते हुए, उनकी स्थिति से रूबरू कराते हुए सभागार में उपस्थित समस्त महिलाओं को सशक्त बनने के लिए प्रेरित किया। साथ ही कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय बेमेतरा में कार्यरत रहते हुए अपने कार्य अनुभव को साझा किया। विद्यालय में पढ़ने वाले कई बच्चों की माताओं, बेमेतरा में ऑटो चलाने वाली महिलाओं का उदाहरण देते हुए उपस्थित दर्शकों को सशक्त होने का संदेश दिया।

          अतिथि के रूप में आमंत्रित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बेमेतरा के प्राचार्य, श्री जे. के.  घृतलहरे, विकासखंड शिक्षा अधिकारी, बेमेतरा श्री अरुण कुमार खरे आदि ने भी अपने वक्तव्य रखे। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन बेमेतरा की ओर से डॉ. प्रीतिमाला सिंह ने कुछ लघु वीडियो क्लिप को दिखाते हुए हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति, समाज द्वारा उनके साथ होने वाले व्यवहार, आदि पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम का संचालन अजीम प्रेमजी फाउंडेशन बेमेतरा के जयप्रकाश धन्यवाद ज्ञापन जौबन भोई ने किया।



Tuesday, 21 March 2023

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया? उसी दिन या इस दो महीने के बीच की किसी अन्य तिथि क्यों नहीं?

शालायी बच्चों को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से परिचय कराने, उन मूल्यों के साथ जीने के कौशल विकसित करने के क्रम में बेमेतरा जिले के एक शासकीय उच्च प्राथमिक शाला जाना हुआ। कक्षा छठवीं-आठवीं के बच्चों के साथ होने वाली इस बातचीत के दो चरण थे। पहले चरण में बच्चों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना एवं उनमें उल्लेखित संवैधानिक अवधारणाओं एवं मूल्यों से संबंधित प्रदर्शित कैलेंडर का अवलोकन, अध्ययन करना था, तत्पश्चात मन में उपजे सवालों को एक कागज में लिखना भी था, ताकि दूसरे चरण में कक्षा में बैठकर उनपर बातचीत किया जा सके। बच्चों की ओर से कई प्रकार के सवाल आए। इसी क्रम में एक ऐसा भी सवाल आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सवाल था – हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया”? उस पर्ची पर सवाल पूछने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था, बाद में बच्चों से पूछा भी कि यह सवाल किसकी जिज्ञासा है? लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सवाल की प्रकृति को देखकर ऐसा लगा कि शायद उसी शाला के किसी शिक्षक की ओर से ये सवाल आया हो? यह सोचकर कि इस विषय पर मेरी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, मैंने उस सवाल पर फिर कभी किसी दिन बातचीत करने की बच्चों और शाला के शिक्षकों से सहमति ली। कई प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि नवनिर्मित भारतीय संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक विशिष्ट बात छिपी थी।

          आजाद हिंदुस्तान (भारत) के संचालन हेतु संविधान निर्माण के लिए 9 दिसंबर 1946 ई. में ही भारतीय प्रतिनिधियों से निर्मित कमेटी गठित कर ली गई थी। इस कमेटी ने 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन तक 114 बैठकों में लगातार चर्चा, विमर्श करने के पश्चात इस नवनिर्मित विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंतिम रूप 26 नवंबर 1949 को दिया था। लेकिन कमेटी ने इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि निर्धारित की। इसके पीछे कारण था इस तिथि (26 जनवरी) की विशिष्टता। इस विशिष्टता को समझने के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष पूर्व अर्थात 1929-30 ई. के कुछ घटनाक्रम को समझना पड़ेगा। दिसंबर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन रावी नदी के किनारे लाहौर में हुआ, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। हालांकि प्रारंभ में गांधीजी को इस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया।[i] 1908 ई. से लेकर इस अधिवेशन तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग कर रही थी। इस अधिवेशन के दौरान ही जनवरी 1930 ई. के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि इसी महीने के आखिरी रविवार (26 जनवरी की तिथि) तक ब्रिटिश सरकार यदि भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती है तो भारत खुद को पूरी तरह स्वतंत्र (पूर्ण स्वराज) घोषित कर देगा। अर्थात इस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ने अपना लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज से पूर्ण स्वराज घोषित किया। ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि तक जब इस मांग को नहीं माना तो भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी। इस तिथि को पहली बार देश के अनेक भागों में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।[ii] साथ ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हिंदुस्तान के अलग-अलग भागों के नागरिकों ने शांतिपूर्वक तथा पूर्णनिष्ठा के साथ गांधीजी द्वारा तैयार किए गए पूर्ण स्वराज के शपथ को दुहराते हुए आजादी हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया। 1930 ई. के पश्चात 1947 ई. तक सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन निर्धारित किया। हालांकि उनके द्वारा भी इस कार्य के लिए 15 अगस्त की तिथि चुने जाने के पीछे एक रोचक कारण था। दरअसल 15 अगस्त अंग्रेजों के लिए एक यादगार दिन था। 2 वर्ष पूर्व अर्थात 1945 ई. में 15 अगस्त की तिथि को ही द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के गुट, जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था, के समक्ष जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह एक विशिष्ट दिन था। चूंकि मामला देश की आजादी का था इसलिए भारतीय राजनेताओं को 15 अगस्त 1947 की प्रस्तावित तिथि को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी की तिथि थोड़ी धूमिल पड़ती जा रही थी, क्योंकि इसका स्थान 15 अगस्त की तिथि ने ले लिया था। इस तिथि की महत्ता बरकरार रहे यह सोचकर संविधान निर्माण समिति द्वारा 26 जनवरी 1950 ई. की तिथि को भारतीय संविधान लागू करने की तिथि घोषित की गई।

          यहाँ एक रोचक बात और यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से 1908 ई. से ही जिस डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशिक साम्राज्य) की मांग की थी एवं 1929-30 ई. में जिस पूर्ण स्वराज की बात की थी, दोनों एक साथ पूरी हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि 15 अगस्त 1947 ई. की तिथि को भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से स्वतंत्रता मिली। सर्वोच्च पद वायसराय खत्म हुआ लेकिन एक नए पद गवर्नर जनरल का सृजन हुआ। यह पद ब्रिटिश क्राउन के अधीन होता था। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। वे 1947-48 ई. तक इस पद पर बने रहे। तत्पश्चात चक्रवर्ती राज गोपालाचारी पहले एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। ऐसा इसलिए हुआ कि स्वतंत्रता के समय भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। इसलिए इसके लागू होने के पूर्व अर्थात 25 जनवरी 1950 ई. तक गवर्नर जनरल का पद ही सर्वोच्च पद बना रहा। 26 जनवरी 1950 से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ ही डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ। डोमिनियन स्टेटस से तात्पर्य था - आंतरिक प्रशासन जैसे विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, सैनिक, विदेशी मामले भारतीयों के द्वारा संचालित किए जाएंगे, लेकिन राजा ब्रिटिश साम्राज्य का होगा। इस तरह 26 जनवरी 1950 ई. से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चूंकि इससे पूर्व हमारे देश में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी जिसमें राजा का पद वंशानुगत होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि यही व्यवस्था रहती तो विविध जाति, धर्म, संप्रदाय के मेल से निर्मित नवीन भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं होता। अतः इस व्यवस्था के स्थान पर प्राचीन भारत की ही एक अन्य व्यवस्था गणतन्त्र को चुना गया। राजतंत्र के विपरीत इस व्यवस्था में राजा का पद वंशानुगत न होकर जनता के बीच से चुने जाते थे। इस व्यवस्था में राजा के पद को राष्ट्रपति के नाम से संबोधित किया गया। यही कारण है कि इस तिथि को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को चुना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च संवैधानिक पद था। इससे पूर्व डोमिनियन स्टेटस में गवर्नर जनरल का पद सर्वोच्च होता था।

          26 जनवरी 1950 से इस पद के अस्तित्व में आते ही हमारे देश में गणतंत्रात्मक व्यवस्था लागू हुआ, ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ।



[ii] https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/our-constitution-implemented-on-26-january-know-everything-pcup/834996

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त अन्य स्त्रोत

गुहा रामचंद्र (2012) भारत गांधी के बाद: दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का इतिहासपेंग्विन बुक्स, गुरूग्राम

 


Friday, 10 March 2023

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर साजा में आयोजित कार्यक्रम में जेंडर संवेदनशील समाज निर्माण का आह्वान किया गया।

जनपद पंचायत, शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, विधिक कार्य विभाग एवं अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, साजा के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 10 मार्च 2023 को साजा नगर पंचायत सामुदायिक भवन में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में विचार गोष्ठी, फिल्म शो के माध्यम से स्त्रियों के सशक्तीकरण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया। इस समारोह में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शालाओं के 40 शिक्षक सहित 150 लोग शामिल हुए।  

          कार्यक्रम की शुरुआत अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों द्वारा स्वागत व्यक्तव्य के साथ किया गया। तत्पश्चात उपस्थित अतिथि साजा बीईओ श्री नीलेश कुमार चंद्रवंशी ने अपने उद्बोधन में शिक्षा के माध्यम से स्त्री सशक्तिकरण की बात कही। बेमेतरा सिविल कोर्ट की अधिवक्ता सलमा शरीफ, रजनी पांडे एवं साजा की सिविल न्यायाधीश अंकिता मुदलियार ने संयुक्त रूप से भारतीय संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार की चर्चा करते हुए स्त्रियों के साथ होने वाले शोषण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता में उल्लेखित दंड के प्रावधानों से परिचित कराया। इस क्रम में गुड टच और बैड टच से संबंधित विडियो दिखाते हुए इसपर विस्तृत चर्चा भी की गई।

          बाल विकास परियोजना अधिकारी, साजा साधना मौर्य जी ने स्त्री सशक्तिकरण के लिए बेटियों को आगे आने की बात कही। शासकीय प्राथमिक शाला, सैगोना की शिक्षिका हेमकल्याणी सिन्हा जी ने अपने स्कूली जीवन यात्रा-संघर्ष को साझा किया। साजा की महिला आरक्षक सरला भारती जी ने सामाजिक सुरक्षा में महिलाओं की भूमिकाविषय पर अपने विचार रखे।  

          इस अवसर पर शिक्षकों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मनोरंजन सह क्षमतावर्द्धन के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, भाषा, गणित आदि विषय के कोर्नर भी अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों द्वारा लगाए गए थे। इसमें शामिल गतिविधियों ने उपस्थित अतिथियों व दर्शकों को गुदगुदाया। साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास में इन गतिविधियों की महत्ता से भी परिचित हुए।

          इस दौरान बीईओ साजा श्री नीलेश कुमार चंद्रवंशी, बीआरसी साजा बी. डी. बघेल, सिविल न्यायाधीश साजा श्रीमती अंकिता मुदलियार, सीईओ, जनपद पंचायत, साजा उपस्थित रहे। उद्घोषक की भूमिका में जय प्रकाश थे। धन्यवाद ज्ञापन अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के बेमेतरा जिला समन्वयक गुलशन यादव ने किया। कार्यक्रम के सफल संचालन में अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, साजा की विकासखंड समन्वयक हुमा नाज़ सिद्दीकी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।   



Sunday, 12 February 2023

कोई फायदा नहीं बच्चों के ऐसे आकलन का।

कोविड महामारी के कारण बच्चों में हुए लर्निंग लॉस से पूरा देश वाकिफ है। देशभर के लगभग सभी राज्य शिक्षा के क्षेत्र में हुए इस नुकसान की भरपाई अपने-अपने तरीके से करने के लिए प्रयासरत हैं। इसी क्रम में शाला खुलने के साथ ही छत्तीसगढ़ समग्र शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश के उच्च प्राथमिक शालाओं में अक्टूबर 2022 में कक्षा छठवीं से आठवीं के बच्चों के लिए बेसलाइन आकलन कराया गया। इस आकलन में शाला में दर्ज़ समस्त छात्र-छात्राओं की उपस्थिति अनिवार्य थी। इस आकलन का प्रत्यक्ष उद्देश्य था यह पता करना कि

·       कक्षा के कितने बच्चों के साथ बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान पर कार्य करने की आवश्यकता है?

·       कितने बच्चे पिछली कक्षा की दक्षता प्राप्त कर लेने के स्तर पर हैं?

·       कितने बच्चे वर्तमान कक्षा स्तर पर हैं? जिनके साथ उस कक्षा स्तर के अनुरूप कार्य किया जा सके।

आकलन में गुणवत्ता के लिए कुछ जरूरी कदम भी उठाए गए थे जैसे- बच्चों की उत्तर पुस्तिकाओं का आकलन दूसरे संकुल के शिक्षक निष्पक्ष रूप से करेंगे।

          बेसलाइन आकलन के 3 महीने पश्चात दिनांक 9 एवं 10 फरवरी 2023 को एंडलाइन आकलन की प्रक्रिया चल रही है। छात्र छात्राओं ने उत्तर पुस्तिका को अपने अर्जित ज्ञान के अनुरूप भर दिया है। उन उत्तर पुस्तिकाओं को मूल्यांकन/ आकलन के लिए दूसरे संकुल भेजा जा रहा है। इस आलेख को लिखे जाने तक संभवतः कुछ उत्तर पुस्तिकाएं आकलित भी की जा चुकी होंगी। सभी लोग एंडलाइन आकलन के परिणाम का इंतजार भी कर रहे होंगे। परिणाम क्या होगा इसकी भविष्यवाणी किया जा सकता है। परिणाम आते ही समाचार पत्रों में यह इस तरह छपे होंगे- 'शिक्षकों की मेहनत रंग लाई, 50% बच्चे कक्षा स्तर पर, 40% बच्चे कक्षा पूर्व स्तर एवं 10% बच्चे शुरुआती स्तर पर हैं।' उम्मीद है इससे भी आकर्षक होगी, जिसके बिना पर हम सभी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोग शायद फूले न समाए। लेकिन यह परिणाम बच्चों की वास्तविकता नहीं बल्कि एक छलावा होगा। इस परिणाम के बिना पर हम उन्हें उनकी वास्तविक स्थिति पर ही छोड़कर आगे बढ़ रहे होंगे।

          इस भविष्यवाणी का आधार कोई दिव्य दृष्टि नहीं बल्कि प्रत्यक्ष अवलोकन है। शाला भ्रमण के क्रम में उच्च प्राथमिक शाला, रमपुरा (काल्पनिक नाम) में Endline Assessment को देखने का मौका मिला। विद्यालय के 2 शिक्षक कक्षा छठवीं, सातवीं, तथा आठवीं के 110 बच्चों के साथ एंड लाइन आकलन की प्रक्रिया में शामिल हो रहे थे। 3 कक्षा पर दो ही शिक्षक होने से थोड़े परेशान दिखे। फिर भी व्यवस्थित देखरेख का प्रयास कर रहे थे। शाला पहुंचने पर बहुत ही कम समय लेते हुए वस्तुस्थिति से अवगत हुआ और एंड लाइन आकलन की प्रक्रिया को समझने के उद्देश्य से कक्षा में समय बिताने की अनुमति प्रधान पाठक से लेते हुए तीनों कक्षाओं में आधे-आधे घंटे समय व्यतीत किया। तीनों ही कक्षाओं के प्रश्नों की प्रकृति ऐसी थी जो बच्चों को संबंधित विषय के समझ के आधार पर लिखने को प्रेरित करते थे। कुछ सवाल स्मरण से भी संबंधित थे। शाला के बच्चे चूंकि मुझसे पहले से परिचित थे, क्योंकि कक्षा में उन लोगों के साथ कई बार कार्य किए हुए थे, को, मेरी उपस्थिति से कोई विशेष समस्या होती नहीं दिखी। कक्षा कक्ष कदाचार मुक्त नहीं था। एक ही कक्षा में अगल-बगल बैठे बच्चे एक दूसरे की उत्तर पुस्तिका को आसानी से देख कर लिख रहे थे। उन्हें समझाने का कई बार प्रयास किया कि एक दूसरे का देख कर न लिखें, जिनको जितना आता है, अपने मन से उतना ही लिखें। इन निर्देशों का कुछ बच्चों पर असर दिखा, अधिकांश पर बिल्कुल नहीं। एन-केन प्रकार से तय समय तक सभी बच्चे एक दूसरे की मदद से उत्तर पुस्तिका भर चुके थे।

          भोजन अवकाश के दौरान प्रधान पाठक सर से जब इस संदर्भ में बात हुई कि, इस तरह के आकलन, जिसमें बच्चे एक दूसरे की उत्तर पुस्तिका देखकर लिख ले रहे हैं, इससे तो शायद ही निकल कर आ पाए कि कौन से बच्चे सीखने के किस स्तर पर हैं? किन के साथ बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान पर कार्य करेंगे, कौन बच्चे कक्षा स्तर के हैं?

          उपरोक्त बातों को लेकर कि बेसलाइन आकलन का शिक्षक, स्कूल या बच्चों को कितना फायदा हुआ? हमने उच्च प्राथमिक शाला के अन्य शिक्षक एवं संकुल समन्वयक से भी बातचीत की। बैहरसरी संकुल के पूर्व समन्वयक एवं वर्तमान में उच्च प्राथमिक शाला सिरवाबांदा में पदस्थापित शिक्षक श्री नरेंद्र कुमार निषाद सर का कहना था कि बेसलाइन आकलन के रिजल्ट के संदर्भ में शिक्षक या स्कूल को कुछ बताया ही नहीं गया है। उनके बच्चों की शैक्षणिक स्थिति कैसी है यदि यह पता होता तो उनके स्तर की पहचान कर उसके अनुरूप हम उनके साथ कार्य करने का प्रयास कर रहे होते। इसी संदर्भ में पिकरी संकुल समन्वयक श्री सुखनंदन आदिल सर से जब बात हुई तो उनका कहना था कि बेसलाइन आकलन के परिणाम सरकार द्वारा जारी कर दिए गए हैं। बेसलाइन से प्राप्त स्थिति के अनुसार हमने बच्चों के साथ काम किया और उनके शैक्षणिक स्तर में बदलाव देखने को मिल रहा है। उनसे जब यह पूछा कि बेसलाइन आकलन एवं इंडलाइन आकलन की प्रक्रिया क्या थी? तो उन्होंने भी बिल्कुल वही प्रक्रिया बताई जो उच्च प्राथमिक शाला, नगपुरा के प्रधान पाठक ने बताए थे। इस संदर्भ में दोनों शिक्षकों से जब बात हुई कि इस इस प्रक्रिया से बच्चों के वास्तविक स्थिति का पता कैसे लगाया जा सकता है जब वे अपने साथी के कॉपी को देखकर लिख ले रहे हैं? संकुल समन्वयक के साथ-साथ शिक्षक नरेंद्र निषाद सर के पास भी इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था।

तीन शिक्षकों से हुई इस आकलन प्रक्रिया संबंधी बातचीत के पश्चात सभी शिक्षक इस बात पर तो सहमत दिखे कि ऐसे प्रक्रिया से बच्चों की वास्तविक स्थिति तो निकलने से रही

          उपरोक्त परिणाम संबंधी भविष्यवाणी हमने एक शाला के एंडलाइन आकलन की प्रक्रिया के प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर निकाला है। हो सकता है कि अन्य शाला के शिक्षक खुद के विवेक से आकलन प्रक्रिया को बेहतर बनाया हो। वहाँ एक साथ बैठाने के बावजूद सभी बच्चे निगरानी में प्रश्नों के उत्तर अपनी समझ के अनुसार दे रहे हों। बावजूद इसके प्रश्नों की प्रकृति को देखकर कहा जा सकता है कि यह समझ बनाना बहुत ही मुश्किल है कि बच्चा समझ के साथ पढ़ पा रहा है या नहीं। प्रश्नों की प्रकृति मुख्यतः लिखने की दक्षता जांच करने से थी। छठी कक्षा के हिंदी के आकलन पत्र को देखें तो उसमें ऐसा कोई प्रश्न नहीं दिखा जिसमें बच्चों को कोई प्रसंग पढ़वा कर यह देखा जा रहा है कि बच्चा उसे पढ़कर अपनी समझ बना पा रहा है या नहीं, या समझ के साथ पढ़ पा रहा है या नहीं।

          यहां एक बात तो साफ है कि आकलन की इस प्रक्रिया से बच्चों की वास्तविक स्थिति का पता नहीं लगाया जा सकता है? यह शिक्षा विभाग के आर्थिक संसाधन की बर्बादी मात्र है। ऐसा कहने का यह तात्पर्य नहीं है कि आकलन किस प्रक्रिया को बंद कर दिया जाए। लेकिन हमें इस ओर भी सोचने की आवश्यकता है कि जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कोई कार्यक्रम शुरू किया गया है, उसकी पूर्ति हो रही है या नहीं। यदि नहीं हो रही है, तो उसके लिए कमी कहां रह जा रही है? यहां कमी सिर्फ शिक्षक या प्रधान पाठक की नहीं है बल्कि उन्हें इस कार्य के लिए दिशा-निर्देश देने वाली समग्र शिक्षा का भी कहा जा सकता है।  


Sunday, 29 January 2023

दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान गांधीजी द्वारा सत्याग्रह एवं अहिंसा का प्रयोग

 

गांधीजी ने 1890 के दशक में दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान पहली बार सत्याग्रह को खोजा, समझा, खुद को प्रशिक्षित कर उसका प्रयोग किया। 1896 के जनवरी महीने में 6 महीने की भारत यात्रा के बाद गांधी जी सपरिवार दक्षिण अफ्रीका लौटे। भारत में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में सबको बताया। इस बारे में उन्होंने जो लेख लिखे उसे नटाल (दक्षिण अफ्रीका) के अखबारों ने काफी तोड़ मरोड़कर छापा। इसे पढ़ने के बाद दक्षिण अफ्रीकी ब्रिटिश अधिकारी काफी भड़क गए। वहां के अखबारों ने यह झूठी खबर छाप दी कि गांधीजी अपने साथ 500 भारतीयों को दो जहाजों में भरकर दक्षिण अफ्रीका ला रहे हैं ताकि दक्षिण अफ्रीका के गोरों का मुकाबला किया जा सके। वेद दक्षिण अफ्रीका को भारतीयों से भर देना चाहते हैं। इस खबर ने ब्रिटिश लोगों को गांधीजी के खिलाफ भड़काने में आग में घी का काम किया। इसकी प्रतिक्रिया में दक्षिण अफ्रीका में कई ऐसे संगठन उभर कर आए जिनका एकमात्र उद्देश्य भारतीयों के इस संभावित हमले का सामना करना था। 18 दिसंबर 1896 ईसवी को गांधीजी का जहाज नटाल (दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित एक ब्रिटिश उपनिवेश) के डरबन बंदरगाह पर पहुंचा। नटाल के तत्कालीन कार्यकारी प्रधानमंत्री अटॉर्नी जनरल हैरी एस्कोम्ब, जो भारतीयों के विरोधी थे, ने अफवाह फैलाने वालों की मदद की। भारतीय यात्रियों की वजह से शहर में प्लेग रोग फैल जाएगा, यह भय दिखाकर उन्होंने यात्रियों को तीन सप्ताह तक जहाज से उतरने की इजाजत नहीं दी। यह भी धमकी दी गई कि हम यात्रियों को वापस भारत या फिर कहीं और पहुंचा देंगे। लेकिन सच तो यह था कि जहाज में सवार ज्यादातर लोग दक्षिण अफ्रीका के ही वैध नागरिक थे, जो अपने घरों को लौट रहे थे।

            एस्कोम्ब ने स्थानीय ब्रिटिश नागरिकों से यह कह रखा था कि जहाज से उतरने वाले भारतीयों के साथ वे जो करना चाहे करें पुलिस उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी। इससे डरबन बंदरगाह पर उग्र ब्रिटिश नागरिकों की भीड़ जमा हो गई। उस भीड़ के डर से सभी भारतीय जहाज में ही बैठे रहे, इस दौरान गांधीजी सारे वक्त उनका मनोबल बढ़ाते रहे। ऐसे में ही क्रिसमस आया। जहाज के कप्तान ने गांधी जी और उनके परिवार के सम्मान में जहाज पर ही रात्रि भोज का आयोजन किया। इस अवसर पर गांधी जी ने जहाज के भारतीयों को संबोधित किया और कहा, 'आज की परिस्थिति की जिम्मेवार पश्चिम की संस्कृति है, जो हमारी पूर्व की संस्कृति से अलग पशु बल पर आधारित है'। जहाज के कप्तान ने गांधीजी को चुनौती दी और कहा कि जब आप इस जहाज से उतरेंगे और बंदरगाह पर खड़े गोरे आप पर हमला कर देंगे तो आप अपने अहिंसा के सिद्धांत पर किस तरह डटे रहेंगे? गांधीजी ने जवाब दिया, ' मेरा विश्वास है कि ईश्वर मुझे भीड़ के सामने खड़े रहने की हिम्मत देंगे, और मैं कानून का सहारा लिए बिना उन्हें माफ कर सकूंगा। मैं जानता हूं कि यह भीड़ अफवाह फैलाकर जुटाई गई है और झूठी बातों से उत्तेजित की गई है। यह लोग ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि वे जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं। अज्ञानवश उत्तेजित लोगों से मेरे नाराज होने की कोई वजह नहीं है'

            अंततः 13 जनवरी 1897 को 26 दिनों की प्रतीक्षा के बाद यात्रियों को जहाज से उतरने की इजाजत मिली। अब तक जनरल एस्कोम्ब को लग गया था कि बात बिगड़ रही है और हाथ से बाहर जा सकती है। इसलिए वे भीड़ से मिले और आश्वस्त किया कि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान देगी और भारतीयों के दक्षिण अफ्रीका आने पर कानूनी पाबंदी लगाएगी। इस तरह एस्कॉम्ब ने भीड़ को डरबन बंदरगाह से हटाया। एस्कोम्ब ने गांधीजी को संदेश भिजवाया कि वे अंधेरा होने पर ही जहां से निकलें और हम उन्हें पुलिस के संरक्षण में घर पहुंचा देंगे। गांधीजी ने इस तरह चोरी-छिपे शहर में जाने से मना कर दिया। वे दोपहर बाद जहाज से निडरता से निकले। भीड़ ने गांधीजी को पहचान लिया, वह उन पर तथा उनके साथियों पर पत्थर बरसाने लगे। इस झड़प में गांधीजी से उनके साथी बिछड़ गए, लोगों ने गांधी जी को घूसों तथा लातों से इतना पीटा कि वे बेहोश हो गए। उन्होंने जिंदा घर लौटने की उम्मीद छोड़ दी। यह उनके जीवन का पहला मौका था जेबी उन्होंने मृत्यु को इतने करीब से देखा था। इस संबंध में गांधीजी लिखते हैं कि ' उस वक्त भी मेरे हृदय में मारने वालों के प्रति कोई द्वेष नहीं था'। धर्म के पुलिस सुपरिटेंडेंट की पत्नी श्रीमती जैन एलेग्जेंडर, जो गांधीजी को पहले से जानती थी, उस समय वहाँ से गुजर रही थी। उन्होंने अपनी गाड़ी से उतरकर, मारने वालों को रोका और पुलिसवालों को गांधीजी को अपने घेरे में लेने को कहा। पुलिस ने वैसा ही किया और गांधीजी को थाने ले आई। भीड़ ने यहां तक उनका पीछा नहीं छोड़ा। अंधेरा होते होते 5000 लोग थाने के पास इकट्ठा हो गए थे। सब चिल्ला रहे थे कि गांधी जी को हमारे हवाले करो नहीं तो हम थाने में आग लगा देंगे। पुलिस अधिकारी ने गांधी जी को उनके मित्रों, परिवार की जान का वास्ता दिया तब कहीं जाकर वह चोरी-छिपे वहां से निकलने को तैयार हुए।

            एक समय था कि डरबन का पुलिस सुपरीटेंडेंट एलेग्जेंडर गांधी जी का और भारतीयों का घोर विरोधी था। उसके लिए ज्यादातर भारतीय हिंसक कुली के समान थे लेकिन गांधीजी से जैसे-जैसे उनका वास्ता पड़ा, भारतीयों के प्रति नजरिया बदलता गया, धीरे-धीरे वह गांधीजी से सहानुभूति भी रखने लगा। उनका समर्थक भी बना। यही कारण था कि संकट के समय उसकी पत्नी जैन एलेग्जेंडर ने उनकी जान बचाई।

इस घटना की जानकारी ब्रिटेन पहुंची। ब्रिटिश जानते थे कि भारत उनके उपदेशों का एक अहम देश है और गांधीजी उसके एक जाने-माने नेता हैं। वे भारतीयों को नाराज नहीं करना चाहते थे। उनका दबाव पड़ा और बहुत ही बेमन से नेपाल के कार्यकारी प्रधानमंत्री एस्कोम्ब ने अपराधियों की शिनाख्त के लिए गांधी जी को पुलिस थाने बुलाया। गांधीजी ने जवाब दिया, " मैं इस मामले को आगे नहीं बढ़ाऊंगा। मैं मानता हूं कि जिन पर उपद्रव का आरोप है, गलती उन लोगों की नहीं थी। उन्हें तो नटाल के नेताओं ने और यहां की यूरोपियन सरकार ने गलत जानकारी देकर भड़काया था। गांधीजी का इशारा किधर है यह एस्कोम्ब समझ रहे थे लेकिन वे यह भी समझ रहे थे कि अपनी तरफ से कोई कार्रवाई ना करके गांधीजी उठने वाले तूफान से उन्हें बचा भी रहे थे। वह भी एक ऐसे तूफान से जिसे एस्कोम्ब ने खुद ही खड़ा किया था! इस पूरे घटनाक्रम का अवलोकन करते हुए गांधी जी ने बाद में लिखा, ' ईश्वर मुझे सत्याग्रह के लिए तैयार कर रहा था'

            इसी संघर्ष के दौरान गांधी जी द्वारा सत्याग्रह शब्द की खोज की गई थी। हालांकि इस दौरान सरकार से ऐसा कोई मांग तो नहीं किया गया लेकिन अपनी इस अहिंसक सत्याग्रह से डरबन के पुलिस सुपरिटेंडेंट एलेग्जेंडर, नटाल के कार्यकारी प्रधानमंत्री एस्कोम्ब को भारतीयों के प्रति या खुद के प्रति अपने विचार बदलने को मजबूर कर दिया। वे चाहते तो उग्र भीड़ द्वारा इतने हिंसक आक्रमण के विरोध में किसी एक को भी घायल कर सकते थे, एस्कोम्ब को उसके उड़ंदता की सज़ा दिला सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसे अहिंसात्मक सत्याग्रह का शुरुआत कहा जा सकता है, इसका व्यापक रूप दक्षिण अफ्रीका सहित हिंदुस्तान के अन्य आंदोलनों में देखने को मिलता है।

            ऐसी ही एक अन्य घटना 1907 ईस्वी में दक्षिण अफ्रीका में ही घटित हुई। इस बार उन पर हमला उनके ही एक स्वदेशी साथी ने की। दक्षिण अफ्रीका की ट्रांसवाल सरकार ने एशियाइयों के पंजीकरण का एक कानून बनाया था इसका भारतीय विरोध कर रहे थे। इस कानून के तहत सभी एशियाइयों को अपनी उंगलियों के निशान देना जरूरी था और अपने साथ हर वक्त एक पहचान पत्र रखना अनिवार्य था। इसके विरोध में गांधीजी के आह्वान पर ट्रांसवाल में रहने वाले 13000 भारतीयों ने अपना पंजीकरण कराने से इंकार कर दिया। जवाब में जनरल स्मट्स सरकार ने गांधीजी को दो महीने के लिए जेल में डाल दिया। यह गांधीजी की पहली जेल यात्रा थी।

            जनरल स्मट्स जानते थे कि भारतीयों का बहुमत गांधी जी के साथ है। जेल गए गांधी जी को दो सप्ताह ही हुए थे कि जनरल स्मट्स ने समझौता करने के इरादे से गांधी जी को जेल से निकलवाया और अपने ऑफिस में मिलने के लिए बुलाया। जनरल स्मट्स ने गांधीजी को भरोसा दिलाया कि यदि सारे भारतीय स्वेच्छा से अपना पंजीयन कराएंगे तो कुछ दिनों बाद सरकार स्वयं ही इस कानून को रद्द कर देगी। सत्याग्रह का यह शील गांधीजी के मन में तब तक बन चुका था कि अपने विरोधी पर पूरा भरोसा करो! वही उन्होंने किया। जेल से रिहा होकर गांधीजी जोहांसबर्ग पहुंचे। आधी रात को ही उन्होंने अपने साथियों को बुलाया और जनरल से हुए समझौते का पूरा विवरण उन्हें बताया। उनके साथियों ने शंका जाहिर की, ' क्या होगा अगर बाद में जनरल स्मट्स अपनी बातों से मुकर जाएं? यदि हमने पंजीकरण करवा लिया तो हमारे हाथ में कुछ बचेगा ही नहीं। गांधीजी ने उनकी आशंका को वाजिब माना लेकिन अपने साथियों को यह भी समझाया कि एक सत्याग्रही को अपने विरोधी पर भरोसा करके ही चलना चाहिए। सत्याग्रह कभी डरता नहीं है और इसलिए वह अपने दुश्मन पर भी भरोसा कर सकता है। धोखा खाने के बाद भी एक सच्चा सत्याग्रही फिर भरोसा करेगा, क्योंकि मनुष्य में छुपी अच्छाई पर उसका अडिग विश्वास होता है। गांधीजी अपने साथियों को अपनी बात समझा तो पाए लेकिन आने वाले तूफान से भी अनजान थे। यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई कि उनका नेता कोई संदेहात्मक समझौता करके आया है। गांधी जी से सवाल जवाब करने के लिए लगभग 1000 लोग उन्हें घेर कर खड़े थे। मीर आलम नामक एक व्यक्ति ने गांधी जी से सवाल किया, ' क्यों असहयोग की लड़ाई में यह अचानक ही सहयोग की बात आ गई? साथ ही यह भी आरोप लगाया कि 15000 पोंड की घुस के एवज में गांधीजी सरकार के हाथों बिक गए हैं। मीर आलम ने यह भी धमकी दे डाली कि जो भी पंजीकरण कराने जाएगा उसे वह जान से मार देगा। गांधीजी सबको अपनी बात समझाते हुए अंतिम में बोले, ' यह समझौता मैंने किया है इसलिए मेरा यह नैतिक फर्ज है कि सबसे पहले हाथों के निशान देने और पंजीकरण कराने मैं खुद जाऊंगा। मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि वह मुझे यह काम पूरा करने दें। मरना तो सभी को एक दिन है, लेकिन अपने भाई के हाथों मरना किसी भी बीमारी से मरने से कहीं बेहतर है'। 10 फरवरी 1908 का दिन पंजीकरण के लिए निर्धारित था। गांधीजी अपने साथियों के साथ पंजीकरण करवाने के लिए निकले। मीर आलम गुस्से से आंखें लाल किए कुछ लोगों के साथ वहां पहले से खड़ा था। उसने गांधीजी के सिर पर एक जोर का डंडा दे मारा। वह गिर पड़े और बेहोश हो गए। अमीर आलम और उसके आदमी गांधीजी को डंडो, लातों तथा घूसों से मारते रहे। वी गांधी जी को मार डालने की इरादे से ही आए थे।

            गांधीजी के जिन साथियों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, उन सबकी भी खूब पिटाई हुई। जब मारने वालों को लगा कि गांधीजी मर गए हैं तब वे वहाँ से भाग निकले। बेहोश गांधी जी को जब होश आया तो उन्होंने साथियों से पहले बात यह कही मैं ठीक हूं, दांत और पसली में दर्द है। फिर पूछा, ' लेकिन मीर आलम कहां है?" उन्हें बताया गया कि उन सब को गिरफ्तार कर लिया गया है, तो वे तुरंत बोले, ' यह तो ठीक नहीं हुआ! उन सबको छुड़ाना होगा। एक तरफ उनकी मरहम पट्टी की जा रही थी, तो दूसरी तरफ उनकी जिद थी कि पहले पंजीकरण हो जिसका उन्होंने वचन दिया है। मीर आलम तथा उनके साथियों पर किसी तरह का आरोप लगाने से गांधीजी ने इंकार कर दिया। हमला सार्वजनिक हुआ था, गुनहगारों को सजा तो हुई लेकिन जख्मों के कारण बोल नहीं पा रहे गांधी जी ने सरकार को लिखकर दिया कि मीर आलम वही कर रहे थे जो उन्हें सच लग रहा था।

            इस घटना के बाद जनरल स्मट्स ना केवल अपने वचन से मुकर गए, बल्कि उल्टे एशियायियों के खिलाफ वे एक और कड़ा कानून लेकर आ गए। अब गांधी जी ने आंदोलन का दूसरा रास्ता निकाला। 16 अगस्त 1908 को कुल 3000 भारतीय अपना पहचान पत्र जलाने के लिए इकट्ठा हुए। सरकार को पहले ही आगाह कर दिया गया था कि जब तक सरकार कानून वापस नहीं लेती है तब तक यह आंदोलन रुकेगा नहीं। अगस्त 1908 तक मीर आलम अपनी सजा काट कर जेल से बाहर आ चुका था। उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। अब तक वह गांधीजी की लड़ाई का पक्का सिपाही बन गया था।

            उपरोक्त घटनाओं के दौरान अहिंसा एवं सत्याग्रह के प्रति गांधीजी की धारणा और मजबूत होती गई। वे कहते हैं कि यदि सभी लोग, हिंदू-मुसलमान, सत्य के लिए अपनी जान पर खेल जाने का साहस पैदा करते हैं, तो बंदूकें, बम तथा जेल उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। दक्षिण अफ्रीका से लेकर हिंदुस्तान तक ब्रिटिश सरकार निर्भयता की इस ताकत के प्रभाव को रोकने की लगातार नाकाम कोशिश करती रही। क्योंकि यह ऐसी ताकत थी जो दुनिया को बदलने की क्षमता रखती थी।

संदर्भ –

गांधी मार्ग – मई-जून 2019, गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली