Tuesday, 9 May 2023

महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा बौद्ध धर्म में प्रचलित झूठी मान्यताओं पर कटाक्ष

यायावरी साहित्यकार के नाम से प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन की गणना ऐसे महान विद्वानों के साथ किया जाता है जिन्होंने कहानीकार, संस्मरणकार, इतिहासकार के रूप में हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। साहित्य की शायद ही कोई विधा उनसे अछूती रही हो। अपनी लेखनी से जहां इन्होंने हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध किया वहीं यायावरी जीवन के माध्यम से बौद्ध साहित्यों के संरक्षण के लिए इन्हें पूरी दुनिया सम्मानित नज़र से देखती है। इस योगदान के लिए प्रेमचंद मई 1933 में उनकी प्रशंसा करते हुए में लिखते हैं, राहुल जी कदाचित वह पहले बौद्ध सन्यासी हैं, जिन्होंने तीन वर्ष तिब्बत में रहकर पालि का ज्ञान प्राप्त किया और वहाँ से बौद्ध साहित्य की लगभग 10 हज़ार प्राचीन पुस्तकें लेकर भारत लौटे[1] ज्ञात हो कि बौद्ध धर्म पर शोध के दौरान उन्होंने भारत, तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका, चीन, जापान, ईरान, रूस, इंग्लैंड आदि देशों की यात्रा किया, वहां के इतिहास, भूगोल, संस्कृति को जाना समझा, वहाँ के साहित्यों को भारत लाया, इसका अध्ययन किया एवं इसके संबंध में अपने यात्रा वृतांत में लेखबद्ध किया। इन साहित्यों को भारत लाने के लिए उन्होंने तिब्बत व अन्य देशों के उन दुर्गम स्थानों की भी यात्रा की जहां पैर रखने का कोई भी साहस नहीं कर सका था, जहां जाने में लोग भय खाते थे।[2] अलग-अलग देशों से लाए इन साहित्यों को पटना संग्रहालय में देखा जा सकता है। 9 अप्रैल 1893 ई. को पंदहा गाँव आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे राहुल सांकृत्यायन जी को बचपन में केदारनाथ पांडे के नाम से जाना जाता था। यायावर जीवन जीते हुए 1930 में श्रीलंका यात्रा के दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तब उनका नाम 'राहुल' हो गया। साथ ही संकृति गोत्र से संबंधित होने के कारण अपने नाम के अंत में 'सांकृत्यायन उपनाम लगाते थे। इससे पूर्व कुछ दिनों तक बाबा रामउदार के नाम से परसा (बिहार) स्थित एक मठ के उत्तराधिकारी के रूप में भी कार्य किया। अपने 70 वर्षों के जीवन में उन्होंने 140 प्रकाशित रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक विशिष्ट मुकाम दिया। इसके उप्लक्ष्य में 1958 ई. में उन्हें साहित्य जगत के शिखर पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार से एवं 1963 ई. में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

          राहुल सांकृत्यायन की गिनती साहित्यकार, इतिहासकार के साथ-साथ अपने समय के एक प्रसिद्ध तर्कशास्त्री के रूप में की जाती है। अपने वैज्ञानिक चिंतन एवं तार्किक कौशल का उपयोग करते हुए उन्होंने समाज से अंधविश्वास उन्मूलन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। 1914- 15 ई. के दौरान वे आर्य समाज के संपर्क में रहे जिसके पश्चात समाज में प्रचलित धर्म संबंधी मिथ्या धारणाओं के खंडन करने की प्रवृति उनमें जागृत हुई। वे ईसाई, इस्लाम, यहूदी, बौद्ध के साथ-साथ हिंदू धर्म के अनेक संप्रदायों को झूठा धर्म, वेद एवं विज्ञान के प्रकाश में शीघ्र ही लुप्त हो जाने वाला धर्म समझते थे। वे उपयुक्त तर्क एवं दलील द्वारा प्रतिद्वंदी को अपने रास्ते पर लाने के पक्षपाती थे।[3] अपने कालपी प्रवास के दौरान राहुल सांकृत्यायन द्वारा एक आर्यसमाजी विचारक के रूप में ईसाई पादरियों, एवं सनातन धर्म के विद्वानों से शास्त्रार्थ में भाग लिए जाने का उल्लेख जगदीश प्रसाद बरनवाल राहुल सांकृत्यायन पर लिखे जीवनी में करते हैं।

एक आर्यसमाजी के रूप में राहुल सांकृत्यायन ने हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी काफी गहराई के साथ समझा। बौद्ध धर्म के संपर्क में वे पहली बार तब आए जब उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। 29 अक्टूबर 1922 को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री चुने जाने के पश्चात प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की गया में हुई बैठक में 16 दिसंबर 1922 को शामिल होते हुए यह प्रस्ताव रखा थी बोधगया का महाबोधि मंदिर बौद्धों का है उन्हें वापस मिलना चाहिए। इस घटना के पश्चात उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति एक सहानुभूति पैदा हुई। इसके कुछ दिन पश्चात ही जनवरी 1923 ई. में जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री पद से इस्तीफा देने के पश्चात नेपाल की यात्रा पर वे निकल गए। इस यात्रा के दौरान वे वहां के अनेक बौद्ध स्थल, बौद्ध धर्म गुरु के संपर्क में आए। यात्रा से वापस आने के पश्चात पुनः वे राजनीतिक जीवन में सक्रिय हुए। इसी क्रम में 1925 ई. में उनका परिचय बौद्ध भिक्षु भदंत आनंद कौशल्यायन से हुआ।

बौद्ध धर्म संबंधित अध्ययन के उद्देश्य से तिब्बत यात्रा के दौरान न केवल वहां के बौद्ध सांस्कृतिक-एतिहासिक विरासतों को काफी गहराई से समझने का प्रयास किया बल्कि वहाँ बौद्ध धर्म में व्याप्त झूठी धारणाओं, मान्यताओं जो तार्किकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, पर भी प्रहार किया। 5 अगस्त 1934 को तिब्बत यात्रा के दौरान लिखे एक पत्र में उन्होंने तिब्बत के साथ-साथ अपने देश भारत में भी बौद्ध धर्म में मौजूद झूठे मान्यताओं पर कटाक्ष किया है। अपने यात्रा वृतांत को इस पत्र में लिखते हुए वे कहते हैं 'सभी धर्म स्थान झूठ के अड्डे हैं। शायद उतनी झूठी कथाएं और जगह नहीं मिलेंगे, जितनी धर्म के दरबार में। धर्म वस्तुतः झूठ की आयु को लंबा करने में बड़ा सहायक होता है' तिब्बत के एक स्थान (रे- दिङ लामा से संबंधित) का उल्लेख करते हुए राहुल सांकृत्यायन वहां प्रचलित एक दंतकथा का उल्लेख करते हैं। वह कहते हैं कि रे- दिङ लामा (जिनकी आयु उस दौरान 22 वर्ष की थी) के पैर का एक काले पत्थर पर निशान कांच के भीतर रखा हुआ है। श्रद्धालु भक्तों से कहा जाता है कि बचपन में लामा रिंपो छे ने पैर को महज स्वभाव से पत्थर पर रख दिया था और उस पर यह निशान उतर आया। यदि समंतकूट और नर्मदा नदी की पहाड़ी पर बुद्ध के बड़े-बड़े पद चिन्ह उतर सकते हैं, तो यहां एक अवतारी लामा के छोटे से पद चिन्ह के उतरने में कौन सी असंभव बात हो सकती है’?[4]

राहुल सांकृत्यायन 25 नवंबर 1904 को अपने लिखे एक अन्य पत्र में तिब्बती लामा (ग्य-गर लामा) द्वारा उनके मेजबान रहे एक स्थानीय बूढ़े-बूढ़ी की कांच की मालाओं में जप को और पुण्यदायी बनाने के उद्देश्य से फूँक मारने के प्रकरण पर सवाल उठाते हैं।[5]



[1] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 9  

[2] वही, पृष्ठ सं. 9

[3] बरनवाल जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 16

[4] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 23

[5] सांकृत्यायन पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 39

 

Friday, 5 May 2023

जिला शिक्षा अधिकारी की अपील पर शिक्षक आयोजित कर रहे हैं बच्चों के लिए ‘समर कैंप’

 जिला शिक्षा अधिकारी श्री अरविंद मिश्रा जी की जिले के शिक्षकों से स्वेच्छिक रूप से बच्चों के लिए समर कैंप आयोजित करने की अपील रंग ला रही है। वार्षिक परीक्षा खत्म होने के साथ ही जिले के शिक्षक अपने-अपने शालाओं में बच्चों के लिए 5 से 10 दिन की योजना बनाकर स्वेच्छिक रूप से सुबह 08: 00 से 10: 30 बजे तक समर कैंप का आयोजन कर रहे हैं। जिले में कुछ स्कूल इसे पूर्ण कर चुके हैं तो बहुत से स्कूल इसे अभी संचालित कर रहे हैं या संचालित करने हेतु योजना निर्माण पर कार्य कर रहे हैं। इस समर कैंप के माध्यम से शिक्षक बच्चों में कल्पनाशीलता, आत्मविश्वास, तार्किक सोच, सृजनशीलता, अभिव्यक्ति जैसे कौशल बालगीत, मौखिक भाषा विकास व एकाग्रता विकसित करने वाले खेल, चित्रकारी, कागज व मिट्टी के खिलौने निर्माण, कहानी निर्माण, रचनात्मक लेखन, जैसे रोचक गतिविधियों के माध्यम से समृद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। बच्चे भी पूरे उमंग व उत्साह के साथ इसे आनंद उत्सव के रूप में मनाते हुए अपने भाषाई, गणितीय व अन्य कौशल को समृद्ध कर रहे हैं। इन-इन गतिविधियों में बच्चे ले रहे रुचि –

·    दर्जनों बालगीत (हिंदी एवं अंग्रेजी भाषी) को हाव-भाव के साथ गाना (एक बुढ़िया ने बोया दाना, पहाड़ी पर पेड़ था, चूहों ! म्याऊँ सो रही है, हमने तीन चीजें देखी, श्यामा की गुड़िया के हाथ नहीं, आहा टमाटर बड़े मजेदार,  मम्मी ओपेन द डोर, फाइव लिटिल मंकी... मेरे नौ बतख थे, पानी में तैर रहे थे आदि)  

·       ओरिगेमि पेपर से तितली बनाना। 

·       न्यूज़ पेपर से टोपी बनाना।

·       स्वेच्छा से ड्रौइंग-पेंटिंग बनाना एवं उसके संदर्भ में अपने अनुभव 5 से 10 वाक्य में लिखना

·        कहानी बनाना सिखाना एवं इसकी निरंतरता में बच्चों से एक अलग कहानी बनाना।

·       भाषा एवं गणित के रोचक खेल जैसे - नंबर गेम, नंबर जंप, आलू खाओ पंखा खाओ, शब्द जाल

·       मिट्टी के खिलौने बनाना, उसे रंगना एवं उसकी लेबलिंग करना।  

बेमेतरा विकासखंड अंतर्गत शा. प्रा. शाला बसनी (7 दिवसीय), शा. प्रा. शाला निनवा (10 दिवसीय), शा. प्रा. एवं उच्च प्रा. शाला कठौतिया (5 दिवसीय) के शिक्षक समर कैंपआयोजन को पूर्ण कर चुके हैं। जबकि शा. प्रा. शाला गुनरबोड़, शा. प्रा. शाला मटका, शा. प्रा. शाला हथमुड़ी, शा. प्रा. शाला नरी (सभी बेमेतरा विकासखंड) शा. प्रा. शाला तेंदुभाठा, शा. प्रा. शाला अतरझोला, शा. प्रा. शाला बीजागोंड (सभी साजा विकासखंड) शा. प्रा. शाला जामगाँव, शा. प्रा. शाला तबलघोर, शा. प्रा. शाला तिवरईया (सभी बेरला विकासखंड) शा. प्रा. शाला तिलकापारा (नवागढ़ विकासखंड) के शिक्षक स्वेच्छिक रूप से चारों विकासखंड में मौजूद अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों के सहयोग से आयोजित कर रहे हैं।

          संकुल समन्वयक सहित जिला/विकासखंड स्तर के शिक्षा विभाग के अधिकारी, डाइट व्याख्याता आदि आयोजित हो रहे इन समर कैंप में भी सहभागिता कर शिक्षक व बच्चों के कार्यों की सराहना कर रहे हैं। उन्हें उत्साहित करने के साथ-साथ इस आयोजन में अधिक-से-अधिक संख्या में स्वेच्छिक रूप से शामिल होने की शिक्षकों से अपील कर रहे हैं।   



Saturday, 15 April 2023

अंधविश्वास के मकड़जाल से मुक्त होने का समय

 ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।

          इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी।  

          सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है। 

Friday, 24 March 2023

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा द्वारा कार्यक्रम का आयोजन।

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, जिला शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, जिला पुलिस विभाग, विधिक सेवा विभाग, एवं अजीम प्रेमजी फाउंडेशन बेमेतरा के संयुक्त तत्वावधान में आज दिनांक 24 मार्च 2023 को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बेमेतरा के सभागार में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर संगोष्ठी एवं पुस्तक प्रदर्शनी आयोजित किया गया। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बेमेतरा के छात्र-छात्राध्यापक, विकासखंड के शासकीय शालाओं के शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छात्राएं सहित 130 लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इन सभी के क्षमतावर्द्धन के लिए अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा के सदस्यों की ओर से सभागार में ही भाषा, गणित, ईसीई कॉर्नर के साथ-साथ पढ़ने लिखने की संस्कृति विकसित करने के लिए पुस्तक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत में सभी दर्शकों ने इन कॉर्नर की गतिविधियों का अवलोकन किया, भाषा व गणित कॉर्नर में प्रदर्शित पहेलियों को सुलझाने का सफल प्रयास किया। असफल होने के दुख का भी खुशी पूर्वक आनंद लिया।

          तत्पश्चात आमंत्रित वक्ताओं ने अपने वक्तव्य रखा। अधिवक्ता सुश्री रजनी पांडे ने स्त्रियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार, हिंसा आदि की रोकथाम के लिए भारतीय दंड संहिता में उल्लेखित कानूनी प्रावधान के साथ-साथ पोक्सो एक्ट पर संक्षेप में चर्चा की। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के व्याख्याता श्री हेमंत कुमार भुवाल ने कुछ संस्कृत श्लोक आदि के माध्यम से हमारे समाज में स्त्रियों को दिए गए दर्जे के विपरीत उनकी वास्तविक स्थिति को समझाने का प्रयास किया। प्रधान महिला आरक्षक, बेमेतरा पुलिस श्रीमती वर्षा चौबे ने एक महिला आरक्षक के रूप में अपने जीवन संघर्ष के साथ-साथ दिन प्रतिदिन के चुनौतियों से श्रोताओं को रूबरू करवाया। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, बेमेतरा की प्रधान पाठक श्रीमती सुषमा शुक्ला शर्मा ने अफगानिस्तान, ईरान आदि कई देशों में स्त्रियों की पराधीनता के उदाहरण देते हुए, उनकी स्थिति से रूबरू कराते हुए सभागार में उपस्थित समस्त महिलाओं को सशक्त बनने के लिए प्रेरित किया। साथ ही कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय बेमेतरा में कार्यरत रहते हुए अपने कार्य अनुभव को साझा किया। विद्यालय में पढ़ने वाले कई बच्चों की माताओं, बेमेतरा में ऑटो चलाने वाली महिलाओं का उदाहरण देते हुए उपस्थित दर्शकों को सशक्त होने का संदेश दिया।

          अतिथि के रूप में आमंत्रित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बेमेतरा के प्राचार्य, श्री जे. के.  घृतलहरे, विकासखंड शिक्षा अधिकारी, बेमेतरा श्री अरुण कुमार खरे आदि ने भी अपने वक्तव्य रखे। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन बेमेतरा की ओर से डॉ. प्रीतिमाला सिंह ने कुछ लघु वीडियो क्लिप को दिखाते हुए हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति, समाज द्वारा उनके साथ होने वाले व्यवहार, आदि पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम का संचालन अजीम प्रेमजी फाउंडेशन बेमेतरा के जयप्रकाश धन्यवाद ज्ञापन जौबन भोई ने किया।



Tuesday, 21 March 2023

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया? उसी दिन या इस दो महीने के बीच की किसी अन्य तिथि क्यों नहीं?

शालायी बच्चों को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से परिचय कराने, उन मूल्यों के साथ जीने के कौशल विकसित करने के क्रम में बेमेतरा जिले के एक शासकीय उच्च प्राथमिक शाला जाना हुआ। कक्षा छठवीं-आठवीं के बच्चों के साथ होने वाली इस बातचीत के दो चरण थे। पहले चरण में बच्चों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना एवं उनमें उल्लेखित संवैधानिक अवधारणाओं एवं मूल्यों से संबंधित प्रदर्शित कैलेंडर का अवलोकन, अध्ययन करना था, तत्पश्चात मन में उपजे सवालों को एक कागज में लिखना भी था, ताकि दूसरे चरण में कक्षा में बैठकर उनपर बातचीत किया जा सके। बच्चों की ओर से कई प्रकार के सवाल आए। इसी क्रम में एक ऐसा भी सवाल आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। सवाल था – हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 तक बनकर तैयार हो गया था। ऐसे में इसे 26 जनवरी 1950 की तिथि को ही लागू क्यों किया गया”? उस पर्ची पर सवाल पूछने वाले का नाम नहीं लिखा हुआ था, बाद में बच्चों से पूछा भी कि यह सवाल किसकी जिज्ञासा है? लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सवाल की प्रकृति को देखकर ऐसा लगा कि शायद उसी शाला के किसी शिक्षक की ओर से ये सवाल आया हो? यह सोचकर कि इस विषय पर मेरी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, मैंने उस सवाल पर फिर कभी किसी दिन बातचीत करने की बच्चों और शाला के शिक्षकों से सहमति ली। कई प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि नवनिर्मित भारतीय संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक विशिष्ट बात छिपी थी।

          आजाद हिंदुस्तान (भारत) के संचालन हेतु संविधान निर्माण के लिए 9 दिसंबर 1946 ई. में ही भारतीय प्रतिनिधियों से निर्मित कमेटी गठित कर ली गई थी। इस कमेटी ने 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन तक 114 बैठकों में लगातार चर्चा, विमर्श करने के पश्चात इस नवनिर्मित विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंतिम रूप 26 नवंबर 1949 को दिया था। लेकिन कमेटी ने इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तिथि निर्धारित की। इसके पीछे कारण था इस तिथि (26 जनवरी) की विशिष्टता। इस विशिष्टता को समझने के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष पूर्व अर्थात 1929-30 ई. के कुछ घटनाक्रम को समझना पड़ेगा। दिसंबर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन रावी नदी के किनारे लाहौर में हुआ, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। हालांकि प्रारंभ में गांधीजी को इस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जवाहरलाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया।[i] 1908 ई. से लेकर इस अधिवेशन तक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग कर रही थी। इस अधिवेशन के दौरान ही जनवरी 1930 ई. के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि इसी महीने के आखिरी रविवार (26 जनवरी की तिथि) तक ब्रिटिश सरकार यदि भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती है तो भारत खुद को पूरी तरह स्वतंत्र (पूर्ण स्वराज) घोषित कर देगा। अर्थात इस अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी ने अपना लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज से पूर्ण स्वराज घोषित किया। ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि तक जब इस मांग को नहीं माना तो भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी। इस तिथि को पहली बार देश के अनेक भागों में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।[ii] साथ ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हिंदुस्तान के अलग-अलग भागों के नागरिकों ने शांतिपूर्वक तथा पूर्णनिष्ठा के साथ गांधीजी द्वारा तैयार किए गए पूर्ण स्वराज के शपथ को दुहराते हुए आजादी हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया। 1930 ई. के पश्चात 1947 ई. तक सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन निर्धारित किया। हालांकि उनके द्वारा भी इस कार्य के लिए 15 अगस्त की तिथि चुने जाने के पीछे एक रोचक कारण था। दरअसल 15 अगस्त अंग्रेजों के लिए एक यादगार दिन था। 2 वर्ष पूर्व अर्थात 1945 ई. में 15 अगस्त की तिथि को ही द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के गुट, जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था, के समक्ष जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह एक विशिष्ट दिन था। चूंकि मामला देश की आजादी का था इसलिए भारतीय राजनेताओं को 15 अगस्त 1947 की प्रस्तावित तिथि को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 जनवरी की तिथि थोड़ी धूमिल पड़ती जा रही थी, क्योंकि इसका स्थान 15 अगस्त की तिथि ने ले लिया था। इस तिथि की महत्ता बरकरार रहे यह सोचकर संविधान निर्माण समिति द्वारा 26 जनवरी 1950 ई. की तिथि को भारतीय संविधान लागू करने की तिथि घोषित की गई।

          यहाँ एक रोचक बात और यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से 1908 ई. से ही जिस डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशिक साम्राज्य) की मांग की थी एवं 1929-30 ई. में जिस पूर्ण स्वराज की बात की थी, दोनों एक साथ पूरी हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि 15 अगस्त 1947 ई. की तिथि को भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से स्वतंत्रता मिली। सर्वोच्च पद वायसराय खत्म हुआ लेकिन एक नए पद गवर्नर जनरल का सृजन हुआ। यह पद ब्रिटिश क्राउन के अधीन होता था। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। वे 1947-48 ई. तक इस पद पर बने रहे। तत्पश्चात चक्रवर्ती राज गोपालाचारी पहले एवं अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। ऐसा इसलिए हुआ कि स्वतंत्रता के समय भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी। इसलिए इसके लागू होने के पूर्व अर्थात 25 जनवरी 1950 ई. तक गवर्नर जनरल का पद ही सर्वोच्च पद बना रहा। 26 जनवरी 1950 से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ ही डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ। डोमिनियन स्टेटस से तात्पर्य था - आंतरिक प्रशासन जैसे विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, सैनिक, विदेशी मामले भारतीयों के द्वारा संचालित किए जाएंगे, लेकिन राजा ब्रिटिश साम्राज्य का होगा। इस तरह 26 जनवरी 1950 ई. से राष्ट्रपति पद प्रभावी होने के साथ भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चूंकि इससे पूर्व हमारे देश में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी जिसमें राजा का पद वंशानुगत होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि यही व्यवस्था रहती तो विविध जाति, धर्म, संप्रदाय के मेल से निर्मित नवीन भारत के लोगों के साथ न्याय नहीं होता। अतः इस व्यवस्था के स्थान पर प्राचीन भारत की ही एक अन्य व्यवस्था गणतन्त्र को चुना गया। राजतंत्र के विपरीत इस व्यवस्था में राजा का पद वंशानुगत न होकर जनता के बीच से चुने जाते थे। इस व्यवस्था में राजा के पद को राष्ट्रपति के नाम से संबोधित किया गया। यही कारण है कि इस तिथि को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को चुना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च संवैधानिक पद था। इससे पूर्व डोमिनियन स्टेटस में गवर्नर जनरल का पद सर्वोच्च होता था।

          26 जनवरी 1950 से इस पद के अस्तित्व में आते ही हमारे देश में गणतंत्रात्मक व्यवस्था लागू हुआ, ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन स्टेटस खत्म हुआ।



[ii] https://zeenews.india.com/hindi/india/up-uttarakhand/trending-news/our-constitution-implemented-on-26-january-know-everything-pcup/834996

 

अध्ययन हेतु प्रयुक्त अन्य स्त्रोत

गुहा रामचंद्र (2012) भारत गांधी के बाद: दुनिया के विशालतम लोकतंत्र का इतिहासपेंग्विन बुक्स, गुरूग्राम

 


Friday, 10 March 2023

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर साजा में आयोजित कार्यक्रम में जेंडर संवेदनशील समाज निर्माण का आह्वान किया गया।

जनपद पंचायत, शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, विधिक कार्य विभाग एवं अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, साजा के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 10 मार्च 2023 को साजा नगर पंचायत सामुदायिक भवन में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में विचार गोष्ठी, फिल्म शो के माध्यम से स्त्रियों के सशक्तीकरण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया। इस समारोह में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शालाओं के 40 शिक्षक सहित 150 लोग शामिल हुए।  

          कार्यक्रम की शुरुआत अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों द्वारा स्वागत व्यक्तव्य के साथ किया गया। तत्पश्चात उपस्थित अतिथि साजा बीईओ श्री नीलेश कुमार चंद्रवंशी ने अपने उद्बोधन में शिक्षा के माध्यम से स्त्री सशक्तिकरण की बात कही। बेमेतरा सिविल कोर्ट की अधिवक्ता सलमा शरीफ, रजनी पांडे एवं साजा की सिविल न्यायाधीश अंकिता मुदलियार ने संयुक्त रूप से भारतीय संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार की चर्चा करते हुए स्त्रियों के साथ होने वाले शोषण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता में उल्लेखित दंड के प्रावधानों से परिचित कराया। इस क्रम में गुड टच और बैड टच से संबंधित विडियो दिखाते हुए इसपर विस्तृत चर्चा भी की गई।

          बाल विकास परियोजना अधिकारी, साजा साधना मौर्य जी ने स्त्री सशक्तिकरण के लिए बेटियों को आगे आने की बात कही। शासकीय प्राथमिक शाला, सैगोना की शिक्षिका हेमकल्याणी सिन्हा जी ने अपने स्कूली जीवन यात्रा-संघर्ष को साझा किया। साजा की महिला आरक्षक सरला भारती जी ने सामाजिक सुरक्षा में महिलाओं की भूमिकाविषय पर अपने विचार रखे।  

          इस अवसर पर शिक्षकों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मनोरंजन सह क्षमतावर्द्धन के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, भाषा, गणित आदि विषय के कोर्नर भी अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों द्वारा लगाए गए थे। इसमें शामिल गतिविधियों ने उपस्थित अतिथियों व दर्शकों को गुदगुदाया। साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास में इन गतिविधियों की महत्ता से भी परिचित हुए।

          इस दौरान बीईओ साजा श्री नीलेश कुमार चंद्रवंशी, बीआरसी साजा बी. डी. बघेल, सिविल न्यायाधीश साजा श्रीमती अंकिता मुदलियार, सीईओ, जनपद पंचायत, साजा उपस्थित रहे। उद्घोषक की भूमिका में जय प्रकाश थे। धन्यवाद ज्ञापन अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के बेमेतरा जिला समन्वयक गुलशन यादव ने किया। कार्यक्रम के सफल संचालन में अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, साजा की विकासखंड समन्वयक हुमा नाज़ सिद्दीकी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।