| महात्मा गांधी |
चित्रकार -
हेमलता यादव, कक्षा – 5वीं
शासकीय प्राथमिक शाला, नगपुरा, विकासखंड
– बेमेतरा, जिला – बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
आदरणीय ...
आज 15 अगस्त 2023 को हम
अपने देश के आजादी की 77वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। ज्ञात हो कि आज से 77 वर्ष
पूर्व आज के दिन यानी 15 अगस्त 1947 को हमारा देश ब्रिटिश प्रभुत्व से आजाद हुआ।
आज ही के दिन विश्व के मानचित्र पर हमारे देश का उदय एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में
हुआ। इससे पूर्व हमारे देश पर यूरोपीय देश इंग्लैंड का शासन था। इंग्लैंड के
निवासी जिन्हें अंग्रेज का आ जाता था, हमारे देश में
व्यापारी के रूप में दाखिल हुए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी के रूप में
व्यापार करते हुए यहां के स्थानीय छोटे-छोटे राज्यों से अधिक से अधिक सुविधाएं
पाने के लिए उनके संपर्क में रहते हुए, उनके आपसी फूट के
कारण यहां के राजनीतिक क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करने लगे और 1757 से 1857 तक एक
शक्ति के रूप में संपूर्ण भारत पर अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया। 1857
से लेकर 1947 तक हमारे देश के समस्त संसाधनों का अंग्रेजों ने दोहन किया। यहां के
संसाधनों को लूट कर केवल अपने देश का विकास किया। लूटने के साथ-साथ हमारे देश के
लोगों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार करते थे। हमारे देश के लोगों ने उनकी इस लूट
एवं अपमानजनक व्यवहार का विरोध किया। और उन्होंने यह महसूस किया कि जब तक इस देश
पर हमारा शासन स्थापित नहीं हो जाता तब तक इस लूट एवं अपमान से आजादी नहीं मिल
सकती। खुदीराम बोस, बाल गंगाधर तिलक, लाला
लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, महात्मा
गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सुखदेव-भगत
सिंह- राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, जवाहरलाल
नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल आदि देशभक्त क्रांतिकारियों के
सम्मिलित प्रयास से 15 अगस्त 1947 को इस लूट एवं अपमानजनक व्यवहार से देशवासियों
को आजादी मिली। ब्रिटिश शासन के स्थान पर हमारे देश के लोगों अर्थात भारतीयों द्वारा
शासन की शुरुआत हुई। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ
लिया।
ब्रिटिश शासन से भारतीयों को जो सत्ता
मिली वह कोई क्षणिक क्रांति का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके
लिए हमारे देश के क्रांतिकारियों, शहीदों, राजनेताओं ने 50 वर्षों तक अथक प्रयास किया। अंग्रेजी शासन के विरोध में
कई आंदोलन किए, जेल गए, काला पानी की
सजा भोगी, हंसते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए, आंदोलन करते हुए अपनी जान का बलिदान दिया, अंग्रेजों
से लड़ने के लिए सेना का गठन किया। इनके योगदान कभी भुलाए नहीं जा सकते। इनके
योगदान के लिए ही कवि प्रदीप ने यह गीत लिखी है ... ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी,
जरा याद करो कुर्बानी। आज 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आइए
हम भी 2 मिनट का मौन रखकर उन क्रांतिकारियों, शहीदों के
योगदान को सम्मान दें...
साजा विकासखंड के उच्च
प्राथमिक शालाओं में
सामाजिक अध्ययन विषय का अध्यापन कराने वाले शिक्षकों का 3 दिवसीय कार्यशाला
दिनांक 5, 6 एवं 8 जुलाई 2023
को दो बैच में संपन्न हुआ। इस कार्यशाला में उन्हें सामाजिक अध्ययन विषय अंतर्गत ग्राम
पंचायत,
जीवन में आए बदलाव, संसाधन आदि अध्याय संबंधी अवधारणाओं
के शिक्षण का उदाहरण लेते हुए बच्चों में भाषाई एवं गणितीय दक्षता सुनिश्चित कराने
वाले गतिविधियों को समाहित करते हुए पाठ योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन संबंधी
चर्चा की गई। साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सभी शालाओं को आवंटित संभावना एवं
नवा-अंजोर कार्यपत्रक के प्रयोग, बाल शोध मेला जैसे रोचक शिक्षण विधियों के माध्यम से बच्चों में सामाजिक अध्ययन विषय के
प्रति रुचि जगाने संबंधी विस्तृत चर्चा की गई। कार्यशाला में उपस्थित शिक्षकों ने
फीडबैक सत्र के दौरान अपने विचार साझा करते हुए बताया कि तर्क करने, तुलना करने, विश्लेषण करने, समझ
के साथ पठन, मौखिक एवं लिखित अभिव्यक्ति कौशल आदि के अभाव
में बच्चे सही तरीके से सामाजिक विज्ञान संबंधी अवधारणाओं को समझ नहीं पाते,
इसके लिए उन्हें भाषाई एवं गणितीय कौशलों में दक्ष करना आवश्यक है। साथ
ही शिक्षकों एवं बच्चों की इस विषय में रुचि भी एक प्रमुख चुनौती है, ऐसे में इस कार्यशाला के माध्यम से उन्हें सामाजिक अध्ययन की अवधारणाओं
के साथ-साथ भाषाई एवं गणितीय दक्षता पर समुचित रूप से कार्य करने की अंतर्दृष्टि
मिली।
इस कार्यशाला में साजा विकासखंड के
उच्च प्राथमिक शालाओं में सामाजिक अध्ययन विषय का शिक्षण कराने वाले कुल 75 शिक्षक
शामिल हुए। प्रतिभागियों की संख्या को देखते हुए कार्यशाला को 2 बैच में विभाजित
करते हुए संपन्न कराया गया। एक बैच माध्यमिक शाला परसबोड़ एवं दूसरा बैच साजा स्थित
अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के शिक्षक अधिगम केंद्र में आयोजित की गई। इस दौरान मास्टर
ट्रेनर के रूप में राजेंद्र रात्रे, विजय बहादुर
सिंह राजपूत, शंकर राम साहू, राजाराम
साहू, संतोष सिंह राजपूत, केदारनाथ
साहू तीनों दिन शिक्षकों को प्रशिक्षित किया।
अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, बेमेतरा से श्रेष्ठा मिश्रा एवं साकेत बिहारी सत्र संचालक एवं सूत्रधार
की भूमिका में उपस्थित रहे। एपीसी बेमेतरा श्री कमल नारायण शर्मा एवं बीआरसी साजा
श्री बी. डी. बघेल ने भी अलग-अलग दिन उपस्थित होकर प्रतिभागी शिक्षकों से भाषाई
एवं गणिती दक्षता में पिछड़ रहे बच्चों के क्षमता वर्धन हेतु पूरी तन्मयता के साथ
कार्य करने का आह्वान किया।
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| बैच 2 |
यायावरी साहित्यकार के नाम
से प्रसिद्ध महापंडित राहुल सांकृत्यायन की गणना ऐसे महान विद्वानों के साथ किया
जाता है जिन्होंने कहानीकार, संस्मरणकार, इतिहासकार के रूप में हिंदी भाषा साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। साहित्य
की शायद ही कोई विधा उनसे अछूती रही हो। अपनी लेखनी से जहां इन्होंने हिंदी भाषा
साहित्य को समृद्ध किया वहीं यायावरी जीवन के माध्यम से बौद्ध साहित्यों के
संरक्षण के लिए इन्हें पूरी दुनिया सम्मानित नज़र से देखती है। इस योगदान के लिए प्रेमचंद
मई 1933 में उनकी प्रशंसा करते हुए में लिखते हैं, ‘राहुल जी कदाचित वह पहले बौद्ध सन्यासी हैं,
जिन्होंने तीन वर्ष तिब्बत में रहकर पालि का ज्ञान प्राप्त किया और वहाँ से बौद्ध
साहित्य की लगभग 10 हज़ार प्राचीन पुस्तकें लेकर भारत लौटे’।[1] ज्ञात हो कि बौद्ध धर्म पर शोध
के दौरान उन्होंने भारत, तिब्बत, नेपाल,
श्रीलंका, चीन, जापान,
ईरान, रूस, इंग्लैंड आदि
देशों की यात्रा किया, वहां के इतिहास,
भूगोल, संस्कृति को जाना समझा, वहाँ के
साहित्यों को भारत लाया, इसका अध्ययन किया एवं इसके संबंध
में अपने यात्रा वृतांत में लेखबद्ध किया। इन साहित्यों को भारत लाने के लिए
उन्होंने तिब्बत व अन्य देशों के उन दुर्गम स्थानों की भी यात्रा की जहां पैर रखने
का कोई भी साहस नहीं कर सका था, जहां जाने में लोग भय खाते
थे।[2] अलग-अलग देशों से लाए इन
साहित्यों को पटना संग्रहालय में देखा जा सकता है। 9 अप्रैल 1893
ई. को पंदहा गाँव आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे राहुल सांकृत्यायन जी को बचपन में
केदारनाथ पांडे के नाम से जाना जाता था। यायावर जीवन जीते हुए 1930 में श्रीलंका
यात्रा के दौरान उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तब उनका नाम 'राहुल' हो गया। साथ ही संकृति गोत्र से संबंधित होने
के कारण अपने नाम के अंत में 'सांकृत्यायन’ उपनाम लगाते थे। इससे पूर्व कुछ दिनों तक बाबा रामउदार के नाम से परसा (बिहार)
स्थित एक मठ के उत्तराधिकारी के रूप में भी कार्य किया। अपने 70 वर्षों के जीवन
में उन्होंने 140 प्रकाशित रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक विशिष्ट मुकाम दिया।
इसके उप्लक्ष्य में 1958 ई. में उन्हें साहित्य जगत के शिखर पुरस्कार ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से एवं 1963 ई. में भारत
सरकार द्वारा प्रतिष्ठित ‘पद्म भूषण’
पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
राहुल
सांकृत्यायन की गिनती साहित्यकार, इतिहासकार के साथ-साथ अपने
समय के एक प्रसिद्ध तर्कशास्त्री के रूप में की जाती है। अपने वैज्ञानिक चिंतन एवं
तार्किक कौशल का उपयोग करते हुए उन्होंने समाज से अंधविश्वास उन्मूलन के लिए
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। 1914- 15 ई. के दौरान वे आर्य समाज के
संपर्क में रहे जिसके पश्चात समाज में प्रचलित धर्म संबंधी मिथ्या धारणाओं के खंडन
करने की प्रवृति उनमें जागृत हुई। वे ईसाई, इस्लाम, यहूदी, बौद्ध के साथ-साथ हिंदू धर्म के अनेक संप्रदायों
को झूठा धर्म, वेद एवं विज्ञान के प्रकाश में शीघ्र ही लुप्त
हो जाने वाला धर्म समझते थे। वे उपयुक्त तर्क एवं दलील द्वारा प्रतिद्वंदी को अपने
रास्ते पर लाने के पक्षपाती थे।[3] अपने कालपी प्रवास के दौरान
राहुल सांकृत्यायन द्वारा एक आर्यसमाजी विचारक के रूप में ईसाई पादरियों, एवं सनातन धर्म के विद्वानों से शास्त्रार्थ में भाग लिए जाने का उल्लेख जगदीश
प्रसाद बरनवाल राहुल सांकृत्यायन पर लिखे जीवनी में करते हैं।
एक आर्यसमाजी
के रूप में राहुल सांकृत्यायन ने हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी काफी गहराई
के साथ समझा। बौद्ध धर्म के संपर्क में वे पहली बार तब आए जब उनके राजनीतिक जीवन
की शुरुआत हुई। 29 अक्टूबर 1922 को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री चुने जाने
के पश्चात प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की गया में हुई बैठक में 16 दिसंबर 1922 को
शामिल होते हुए यह प्रस्ताव रखा थी बोधगया का महाबोधि मंदिर बौद्धों का है उन्हें
वापस मिलना चाहिए। इस घटना के पश्चात उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति एक
सहानुभूति पैदा हुई। इसके कुछ दिन पश्चात ही जनवरी 1923 ई. में जिला कांग्रेस
कमेटी के मंत्री पद से इस्तीफा देने के पश्चात नेपाल की यात्रा पर वे निकल गए। इस
यात्रा के दौरान वे वहां के अनेक बौद्ध स्थल, बौद्ध धर्म
गुरु के संपर्क में आए। यात्रा से वापस आने के पश्चात पुनः वे राजनीतिक जीवन में सक्रिय
हुए। इसी क्रम में 1925 ई. में उनका परिचय बौद्ध भिक्षु भदंत आनंद कौशल्यायन से
हुआ।
बौद्ध
धर्म संबंधित अध्ययन के उद्देश्य से तिब्बत
यात्रा के दौरान न केवल वहां के बौद्ध सांस्कृतिक-एतिहासिक विरासतों को काफी गहराई
से समझने का प्रयास किया बल्कि वहाँ बौद्ध धर्म में व्याप्त झूठी धारणाओं, मान्यताओं जो तार्किकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, पर भी प्रहार किया। 5 अगस्त 1934 को तिब्बत यात्रा के दौरान लिखे एक पत्र
में उन्होंने तिब्बत के साथ-साथ अपने देश भारत में भी बौद्ध धर्म में मौजूद झूठे
मान्यताओं पर कटाक्ष किया है। अपने यात्रा वृतांत को इस पत्र में लिखते हुए वे
कहते हैं 'सभी धर्म स्थान झूठ के अड्डे हैं। शायद उतनी
झूठी कथाएं और जगह नहीं मिलेंगे, जितनी धर्म के दरबार में।
धर्म वस्तुतः झूठ की आयु को लंबा करने में बड़ा सहायक होता है'। तिब्बत के एक स्थान (रे- दिङ लामा से संबंधित)
का उल्लेख करते हुए राहुल सांकृत्यायन वहां प्रचलित एक दंतकथा का उल्लेख करते हैं।
वह कहते हैं कि ‘रे- दिङ लामा (जिनकी आयु उस दौरान 22
वर्ष की थी) के पैर का एक काले पत्थर पर निशान कांच के भीतर रखा हुआ है। श्रद्धालु
भक्तों से कहा जाता है कि बचपन में लामा रिंपो छे ने पैर को महज स्वभाव से पत्थर
पर रख दिया था और उस पर यह निशान उतर आया। यदि समंतकूट और नर्मदा नदी की पहाड़ी पर
बुद्ध के बड़े-बड़े पद चिन्ह उतर सकते हैं, तो यहां एक
अवतारी लामा के छोटे से पद चिन्ह के उतरने में कौन सी असंभव बात हो सकती है’?[4]
राहुल
सांकृत्यायन 25 नवंबर 1904 को अपने लिखे एक अन्य पत्र में तिब्बती लामा (ग्य-गर
लामा) द्वारा उनके मेजबान रहे एक स्थानीय बूढ़े-बूढ़ी की कांच की मालाओं में जप को
और पुण्यदायी बनाने के उद्देश्य से फूँक मारने के प्रकरण पर सवाल उठाते हैं।[5]
[1]
बरनवाल
जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती
प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 9
[2]
वही, पृष्ठ सं. 9
[3]
बरनवाल
जगदीश प्रसाद (2019) राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएं नहीं रोक सकी, लोकभारती
प्रकाशन, प्रयागराज, प्रथम संस्करण, पृष्ठ सं. 16
[4] सांकृत्यायन
पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती
प्रकाशन (चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 23
[5] सांकृत्यायन
पंडित राहुल (2022) मेरी तिब्बत यात्रा, लोक भारती प्रकाशन
(चतुर्थ संस्करण) नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 39
जिला शिक्षा अधिकारी श्री अरविंद मिश्रा जी की जिले के शिक्षकों से स्वेच्छिक रूप से बच्चों के लिए ‘समर कैंप’ आयोजित करने की अपील रंग ला रही है। वार्षिक परीक्षा खत्म होने के साथ ही जिले के शिक्षक अपने-अपने शालाओं में बच्चों के लिए 5 से 10 दिन की योजना बनाकर स्वेच्छिक रूप से सुबह 08: 00 से 10: 30 बजे तक समर कैंप का आयोजन कर रहे हैं। जिले में कुछ स्कूल इसे पूर्ण कर चुके हैं तो बहुत से स्कूल इसे अभी संचालित कर रहे हैं या संचालित करने हेतु योजना निर्माण पर कार्य कर रहे हैं। इस समर कैंप के माध्यम से शिक्षक बच्चों में कल्पनाशीलता, आत्मविश्वास, तार्किक सोच, सृजनशीलता, अभिव्यक्ति जैसे कौशल बालगीत, मौखिक भाषा विकास व एकाग्रता विकसित करने वाले खेल, चित्रकारी, कागज व मिट्टी के खिलौने निर्माण, कहानी निर्माण, रचनात्मक लेखन, जैसे रोचक गतिविधियों के माध्यम से समृद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। बच्चे भी पूरे उमंग व उत्साह के साथ इसे ‘आनंद उत्सव’ के रूप में मनाते हुए अपने भाषाई, गणितीय व अन्य कौशल को समृद्ध कर रहे हैं। इन-इन गतिविधियों में बच्चे ले रहे रुचि –
· दर्जनों
बालगीत (हिंदी एवं अंग्रेजी भाषी) को हाव-भाव के साथ गाना (एक बुढ़िया ने बोया दाना,
पहाड़ी पर पेड़ था, चूहों ! म्याऊँ सो रही है, हमने
तीन चीजें देखी, श्यामा की गुड़िया के हाथ नहीं, आहा
टमाटर बड़े मजेदार, मम्मी ओपेन द
डोर, फाइव लिटिल मंकी... मेरे नौ बतख थे, पानी
में तैर रहे थे आदि)
·
ओरिगेमि
पेपर से तितली बनाना।
·
न्यूज़
पेपर से टोपी बनाना।
·
स्वेच्छा
से ड्रौइंग-पेंटिंग बनाना एवं उसके संदर्भ में अपने अनुभव 5 से 10 वाक्य में लिखना
·
कहानी
बनाना सिखाना एवं इसकी निरंतरता में बच्चों से एक अलग कहानी बनाना।
·
भाषा
एवं गणित के रोचक खेल जैसे - नंबर गेम,
नंबर जंप, आलू खाओ पंखा खाओ, शब्द
जाल
·
मिट्टी
के खिलौने बनाना, उसे रंगना एवं उसकी लेबलिंग करना।
बेमेतरा
विकासखंड अंतर्गत शा. प्रा. शाला बसनी (7 दिवसीय), शा.
प्रा. शाला निनवा (10 दिवसीय), शा. प्रा. एवं उच्च प्रा. शाला
कठौतिया (5 दिवसीय) के शिक्षक ‘समर
कैंप’ आयोजन को पूर्ण कर चुके हैं। जबकि शा. प्रा. शाला
गुनरबोड़, शा. प्रा. शाला मटका, शा.
प्रा. शाला हथमुड़ी, शा. प्रा. शाला नरी (सभी बेमेतरा विकासखंड) शा. प्रा.
शाला तेंदुभाठा, शा. प्रा. शाला अतरझोला, शा.
प्रा. शाला बीजागोंड (सभी साजा विकासखंड) शा. प्रा. शाला जामगाँव, शा.
प्रा. शाला तबलघोर, शा. प्रा. शाला तिवरईया (सभी बेरला विकासखंड) शा. प्रा.
शाला तिलकापारा (नवागढ़ विकासखंड) के शिक्षक स्वेच्छिक रूप से चारों विकासखंड में
मौजूद अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के सदस्यों के सहयोग से आयोजित कर रहे हैं।
संकुल समन्वयक सहित जिला/विकासखंड स्तर के
शिक्षा विभाग के अधिकारी, डाइट व्याख्याता आदि आयोजित हो रहे इन समर कैंप में भी
सहभागिता कर शिक्षक व बच्चों के कार्यों की सराहना कर रहे हैं। उन्हें उत्साहित करने
के साथ-साथ इस आयोजन में अधिक-से-अधिक संख्या में स्वेच्छिक रूप से शामिल होने की शिक्षकों
से अपील कर रहे हैं।
ऋग्वैदिक काल से लेकर आज तक हिंदू धर्म व्यवस्था में गर्भस्थ स्त्री के भ्रूण को बालक भ्रूण (बालिका नहीं) के रूप में परिवर्तित करने के लिए गर्भावस्था के तीसरे माह के दौरान पुंसवन संस्कार कराया जाता रहा है। इसके बावजूद भी केवल बालक का जन्म न होकर बालिका का भी जन्म होना इस बात को प्रमाणित करता है कि वर्तमान में भी इस परंपरा को ढोया जाना व्यर्थ ही है। प्राचीन काल या मध्यकाल में हमारे विचार इतने उन्नत नहीं थे, या हम इतने जागरूक नहीं थे कि इन परंपराओं के तह तक जाकर क्या सही है और क्या गलत सोच सकें, इसलिए हम इससे पूर्व कभी भी इस बात की सत्यता तक नहीं पहुंच सके। लेकिन अब हम प्राचीन या मध्यकाल में नहीं बल्कि आधुनिक काल में जी रहे हैं। यूरोप में जहां यह आधुनिक सोच 14वीं - 15 वीं शताब्दी में शुरू होती है। वही हमारे देश में इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी से मानी जाती है। आज 200 साल बाद भी यदि हम प्राचीन या मध्यकाल में जी रहे हैं तो यह हमारे लिए बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है।
इस आधुनिक काल में भी हमारे ही समाज के
लोग इस अनचाहे मेहमान का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि इसे सहने या सह देने का
मतलब है हमारे सभ्य होने पर प्रश्न चिन्ह लगना। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो
पुंसवन संस्कार के बाजजुद भी बालक के स्थान पर यदि बालिका का जन्म हो जाता है तो
उस नवजात के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है ।
ये कोई काल्पनिक बातें नहीं बल्कि आज भी हमारे समाज के कुछेक उच्च वर्गों/जातियों
में यह विद्यमान है। यदि याज्ञिक कर्मकांड से लिंग परिवर्तन संभव है तो आसमान
लिंगानुपात पर भारत सरकार को हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है? हिंदू धर्मज्ञों से कहा जाए कि ऐसे ही कोई संस्कार ईज़ाद करें जिससे बालक
भ्रूण को बालिका के भ्रूण में परिवर्तित किया जा सके। आसमान लिंगानुपात की कोई
समस्या ही नहीं रह जाएगी।
सिर्फ यही एक उदाहरण नहीं है। हिंदू
व्यवस्था ही नहीं अन्य धर्मों में भी ऐसे असीमित अनर्गल प्रथाएँ विद्यमान हैं। आखिर
कब तक इन फर्जी रीति-रिवाजों को हम ढोते रहेंगे? अपने
विवेक, दिमाग से काम लेते हुए आज हमें अंधविश्वासों के
मकड़जाल से आजाद होने की आवश्यकता है।