Saturday, 12 May 2018

मेरी माँ ने बनाया मुझे जेंडर संवेदनशील


बात उन दिनों की है जब मेरी माँ साइटिका बीमारी से पीड़ित होने के कारण ज्यादा चल फिर नहीं पाती थी । 4 सदस्यों वाला हमारा छोटा सा परिवार था । जिसमें हम दो भाई माँ और पिताजी थे । बड़े भैया दिल्ली में रहते हुए स्नातक में अध्ययनरत थे । ऐसे समय में पिताजी और मैं पूरे तन-मन से माँ की सेवा करने, खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई का काम संभालते थे । पिताजी सरकारी स्कूल शिक्षक थे । निश्चित समय पर उनको स्कूल जाना पड़ता था । उनके ड्यूटि जाने के बाद घर में मैं अकेला बचता, इसलिए माँ को खिलना-पिलाना, स्नान कराना, कपड़े बदलवाना, उन्हें पकड़ कर सैर करवाना, घर आए मेहमानों को चाय-नाश्ता कराने की ज़िम्मेदारी मेरी ही होती थी । इसके साथ ही कॉलेज-कोचिंग जाना, पढ़ाई करते-करते पूरा दिन कैसे निकल जाता पता ही नहीं चलता था । एक गृहस्थ स्त्री प्रतिदिन जितना काम करती है उतना या थोड़ा कम मैं भी करता था । इतना काम करने के बाद थकावट इस तरह हावी हो जाती थी कि अगले दिन कोई काम करने की इच्छा ही नहीं होती थी । फिर भी ... । अंततः एक दिन माँ से पूछ ही लिया कि कैसे बिना थके इतना काम प्रतिदिन कर लेती हैं ? प्रश्न सुनकर वह काफी हैरान हो गयी और भावुक होकर समझाई कि एक स्त्री का यह प्रतिदिन का निर्धारित काम है । इतना करने के बाद भी सोचो एक स्त्री के लिए यह सुनना कितना कष्टकारी होता है कि “पूरे दिन घर पर ही रहती हो फिर भी यह काम समय से नहीं हो पाता, आखिर करती क्या हो ?
          उन दिनों ही मुझे ये अनुभव हुआ कि एक पुरुष जितना कार्य घर से बाहर रहकर करता है, उतना ही या उससे ज्यादा सामान्य दिनों में एक स्त्री घर के चहारदीवारी में रहकर करती है । घर में बुजुर्ग व एक-दो बच्चे हों तो काम का बोझ दोगुना-तीनगुना हो जाना स्वाभाविक है । ऐसे में एक पुरुष को तंख्वाह के रूप में उसके श्रम का मूल्य तो प्राप्त हो जाता है लेकिन सुबह से लेकर रात्री विश्राम तक घर के सारे कार्य करते हुए बच्चों, बुजुर्गों की लालन पालन करनेवाली स्त्री के श्रम का कोई मूल्य नहीं दिया जाता । जितना काम प्रतिदिन वह घर पर करती है यदि उसका मूल्य निकाला जाय तो पति के तंख्वाह की दुगनी तंख्वाह की हकदार होगी । नियमतः अपने पति को ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार करने, पूरे दिन उसके घर-परिवार-रिश्तेदार की रखवाली करने वाली स्त्री भी है, और उसे ये हक मिलना चाहिए ।
          खैर हमारे पितृसत्तात्मक विचारधारा प्रधान समाज में फिलहाल तो ऐसा होने से रहा, बावजूद इसके हम समाज के पुरुष उनके प्रति अपना नज़रिया बदल, उनके श्रम को महत्व देते हुए, समाज की स्थापित इस धारणा को खत्म कर सकते हैं कि एक स्त्री घर पर बैठी कोई विशेष काम नहीं करती । या सार्वजनिक क्षेत्र की अपेक्षा निजी क्षेत्र के कार्य आसान होते हैं
          इस अनुभव ने स्त्रियों के प्रति मेरी सोच को बदलने का कार्य किया । जिसके फलस्वरूप आज मैं आलेखों, सभाओं के माध्यम से स्त्रियों के श्रम का महत्व बताने, स्त्री-पुरुष के बीच की खाई खत्म कर समाज को जेंडर संवेदनशील बनाने, पुरुषों के समान अधिकार दिलाने, उनके समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवर्तन लाने आदि उद्देश्यों के साथ आज भी खड़ा हूँ । इस सोच की प्रेरणा स्त्रोत मैं अपनी माँ को मानता हूँ । यही प्रेरणा मुझे स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा खींच लाई जहां प्रतिष्ठित पीएच. डी. पाठ्यक्रम में पंजीकृत हूँ । हमारे परिवार में पिछले 2 पीढ़ियों से पुत्री रत्न पाने का सौभाग्य ही नहीं प्राप्त हुआ था । लेकिन आज भी गर्व गर्व से फूला न समाता हूँ जब मेरी माँ मुझे बेटा की जगह “बेटी” कहकर बुलाती हुए कहती है कि “अब तो लगता ही नहीं कि हमारे घर में बेटी की कमी है” । 

 (वुमेन एक्सप्रेस 12/05/2018 में प्रकाशित)



Tuesday, 24 April 2018

दलित (Dalit)

जब जब भी उनको लगेगा कि
दलित हमसे दूर हो रहे हैं
मंदिर का चढ़ावा कम हो रहा है ।
तब दान पाने के लिए, उन्हें लुभाने के लिए
कुछ न कुछ ऐसा करेंगे
कि आप दलित ही रह जाएं
और उनकी खोखली वर्ण व्यवस्था भी
बनी रह जाय ।
आपको कंधे पर बिठाकर मंदिर प्रवेश कराकर
2000
वर्ष पुरानी प्रथा
ध्वस्त करने का नाटक करेंगे ।
आपके समुदाय से एकाध
मंदिर के पुजारी या महामंडलेश्वर बनाएंगे ।
लेकिन मौका मिलने पर
एहसास दिलाने का मौका कभी नहीं चूकेंगे
कि आप "दलित" हैं ।
आपके वोटों के लिए
आपके ही घर बैठकर
चमचमाते नए थाली में खाकर
आपके हितैषी होने का दिखावा करेंगे ।
मतलब सध जाते ही
फिर से वही जाति सूचक गालियां ।
अपनी स्थिति से असंतुष्ट होकर
आप धर्मांतरण भी कर के देख लीजिये 
मुसलमान या ईसाई बन गए
तो अपने तंत्र मंत्र से आपको
पुनः हिन्दू व दलित बनाने के लिए उसी दलदल में लाने के लिए 
तरह-तरह के कर्मकांड करेंगे ।
'
हिंदुत्व खतरे में है' का आलाप कर
धर्मांतरण करने वाले का मर्दन करेंगे ।
सिवाय एक चीज के
दलितों का उपनयन संस्कार कर
तथाकथित अस्पृश्य से तथाकथित द्विज
बना सकने के ।
क्योंकि इससे उनकी वर्णव्यवस्था, उनका हिन्दुत्व 
खतरे में पड़ जाएगा ।

(मूल रूप से दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र "वीक ब्लास्ट" के 01-15 मई 2018 के अंक में प्रकाशित)


Wednesday, 11 April 2018

इस ‘रामराज्य’ में बलात्कारियों की मौज है ।


'द वायर' की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री तथा जौनपुर से सांसद रहे चिन्म्यानन्द सरस्वती के ऊपर 7 वर्ष से चल रहे बलात्कार (धारा 376) का केस वापस लेने का निर्णय लिए हैं । आखिर ये न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ क्यों ? यदि आरोपी बेगुनाह है तो आप न्यायपालिका पर दबाव डालकर जल्द-से-जल्द फैसला करवाइए । केस वापस लेकर तो आप यही साबित कर रहे हैं कि चिन्म्यानन्द दोषी हैं और उनके राजनीतिक कैरियर को बचाने के लिए आप अपनी शक्ति का गलत प्रयोग कर रहे हैं ।
            आप अपने राज्य में रामराज्य लाने की बात करते हैं । ये कैसा राम राज्य है कि आपके ही राज्य की एक स्त्री जो अब आपकी प्रजा भी है, ने चिन्म्यानन्द सरस्वती के खिलाफ 30 नवंबर 2011 को बलात्कार और धमकाने का केस दर्ज़ कराया था । आज 7 वर्ष बाद भी वह न्याय की प्रतीक्षा में है, लेकिन चिन्म्यानन्द सरस्वती से आपके मधुर संबंध होने के कारण आप एक जघन्य अपराध के आरोपी के अपराध को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं । ये तो आप अपनी एक पीड़ित प्रजा को न्याय नहीं बल्कि सज़ा दिलाने का काम कर रहे हैं । इस तरह तो आगे चलकर वर्तमान में आपकी पार्टी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, जिसपर एक लड़की ने बलात्कार का आरोप लगा है और उसका भाई अतुल सिंह सेंगर जिसपर उस युवती के पिता की हत्या का आरोप है कुछ दिन बाद आप उसका भी केस वापस कर लेंगे ।
            क्यों बदनाम कर रहे हैं रामराज्य के नाम को योगी आदित्यनाथ जी ? आपके ऊपर जो केस चल रहे थे उसे वापस लेकर अपनी जगहँसाई तो पहले ही करवा चुके हैं । अब तो इन हरकतों से बाज आइये ।

Saturday, 7 April 2018

धर्म क्या है ?


धर्म हमारे शरीर पर ढका अदृश्य लबादा है जो हमें जीवन जीने की कला सिखाता है । भौगोलिक स्थितियों के अनुसार इसके नियम-कानून, रीति-रिवाज में भिन्नता होती है । समाज में अशांति फैलाने के लिए जिम्मेदार हमारा धर्म नहीं बल्कि किसी भी धर्म (हिन्दु, मुसलमान सहित समस्त धर्म) के वे कट्टर, मूर्ख या स्वार्थी लोग हैं जो मैं/हम बड़ा/श्रेष्ठ, मैं/हम या हमारे धर्म/रीति-रिवाज अच्छा ... जैसे फर्जी विमर्श फैलाकर धर्म के नाम पर रायता फैलाने का काम करते हैं । कहने को तो ये लोग अपने-अपने धर्म के प्रचारक/संरक्षक हैं लेकिन इस प्रयोजन हेतु हिंसा को स्थान देकर उस धर्म को सबसे अधिक बदनाम यही लोग करते हैं ।

Tuesday, 6 February 2018

क्या हमारा धर्म स्त्रीद्वेषी है ?

बचपन से ही हमें पढ़ाया जाता रहा है कि स्त्री और पुरुष हमारे समाज रुपी गाड़ी के दो पहिये हैं । एक भी पहिया कमजोर हुआ तो समाज व्यवस्थित रूप से नहीं चल सकता । यदि हम दोनों पहिये के वास्तविक जीवन में झांक कर देखें तो वास्तविकता कुछ यूं नज़र आती है कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज (ऐसा समाज जिसमें समाज की सम्पूर्ण व्यवस्था, निर्णय लेने की स्वतंत्रता पुरुषों के हाथों में स्थित हो) में समाज के साथ-साथ परिवार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद, स्त्री की अपेक्षा पुरुष को ज्यादा वरीयता दिया जाता है । भारतीय संविधान द्वारा लैंगिक आधार पर समानता व स्वतन्त्रता का अधिकार दिये जाने के बावजूद इनकी स्थिति आज भी शोषितों जैसी ही बनी है । हालाँकि 1974 ई. के बाद स्त्रियों की स्थिति में सुधार की दिशा में कार्य करते हुए भारत सरकार ने गंभीरता पूर्वक अनेक कानून बनाये । इसके बावजूद आजादी के 65 वर्ष बाद भी इनकी स्थिति संतोषजनक कही नहीं जा सकती । अनेक क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां आजादी की रोशनी इन्हें देखने को भी नहीं मिलती ।  महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर स्थित शनि धाम के चबूतरे पर महिला प्रवेश निषेध के बाद महिलाओं के एक समूह द्वारा इस परंपरा को तोड़े जाने के लिए आंदोलन के मूड में है । इस घटना ने एक विमर्श को जन्म दिया है कि क्या हमारा धर्म स्त्री द्वेषी है?
उत्तर स्वरूप कहा जा सकता है कि हमारा वर्तमान भारतीय समाज हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी इत्यादि धर्म-संप्रदायों के अनुयायियों से आबाद एक पितृसत्तात्मक मिश्र समाज है । घर से बाहर तो हम संवैधानिक विचारधारा पर चलने को मजबूर हैं लेकिन घर प्रवेश करने के साथ ही पुनः धर्मग्रंथों के सिद्धांतों की जकड़न में कैद हो जाते हैं । इस कारण सभी समाज में स्त्रियों की दशा लगभग एक जैसी ही है और हो भी क्यों नहीं ! हमारे समाज के 90 प्रतिशत से भी अधिक लोग धर्मं पर आधारित नियमों, रीति रिवाजों का ही पालन करते हैं और जब धर्मं ही स्त्री द्वेषी हो तो इस बात की तो पूरी गारंटी है कि समाज भी स्त्री द्वेषी ही होगा ।
 जहाँ तक हिन्दू धर्म के स्त्रियों की बात है इस धर्म के अनुयायी आपको मनुस्मृति के उस श्लोक की दुहाई देते मिल जाएंगे जिसमें कहा गया है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताअर्थात जहां स्त्रियों की पूजा या सम्मान होती है वहाँ देवताओं का वास होता है । लेकिन वास्तविकता कुछ और है । सदियों से धर्म को कंधे पर ढोने के बावजूद जन्म से लेकर अंत्येष्ठी संस्कार तक इन्हें इस भावना से देखा जाता है कि जैसे ये इस समाज के प्राणी ही नहीं हों । राजस्थान की स्त्रियाँ तो जन्म से मृत्यु तक घूंघट में ही दम तोड़ देती है । परिवार में गर्भ धारण की हुई महिला को बड़े बुजुर्ग आपको हमेशा यही आशीर्वाद देते मिल जायेंगे पुत्रवती भवकोई भी पुत्री की कामना नही करता या पुत्रीवती भवका आशीर्वाद नहीं देता क्योंकि मनु के अनुसार परिवार में पुत्र का जन्म ही पिता को मुक्ति दिलाता है । ये जानते हुए भी कि मानव प्रजाति को बढ़ने के लिए यह अनिवार्य है की लड़कियां जन्म ले, बिना इनके पीढ़ी आगे बढ़ ही नहीं सकती । फिर भी ये ही अपेक्षा की जाती है कि इनकी संख्या लड़कों की संख्या से ज्यादा नहीं होने पाए । भले ही वह उच्च वर्ण या जाति वाले परिवार से सम्बंधित क्यों न हो, पुत्री का जन्म लेना दुर्भाग्य का कारण माना जाता है । यही कारण है कि गर्भस्थ माता एवं परिवार द्वारा गर्भ में मौजूद शिशु को पुत्र में बदलने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, कर्मकांड, टोटके, पुंसवन संस्कार किये/कराये जाते हैं । यदि एक लड़की अपने भाई की मृत्यु के बाद जन्म लेती है या उसके जन्म लेने के तुरंत बाद परिवार में कोई लड़का मर जाता है तो दोनों ही स्थिति में वह लड़की ही परिवार एवं पड़ोसियों द्वारा लड़के की मृत्यु के कारण के रूप में देखी जाती है और तब तक वह कोसी जाती है जब तक कि वह उस समाज का एक हिस्सा होती है । कभी कभी तो उसपर गुस्सा उतारते हुए यहां तक कह दिया जाता है कि अरे दुष्ट लड़की तू उसकी जगह पर क्यूँ नही मर गयी। ऐसा सुनने के बाद शायद ही कोई लड़की अगले जन्म में एक लड़की के रूप में जन्म लेना चाहेगी । जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि जैसे वह एक अनिमंत्रित मेहमान है । माहवारी के दौरान उन्हें एक अपवित्र प्राणी के सदृश व्यवहार किया जाता है । मंदिर जाने या पूजा करने के अनुमति नहीं होती । जैसे उसके छूने से उनके देवता अपवित्र हो जाएंगे । अनचाहे रूप से जन्म लेने की स्थिति में उस नवजात बच्ची के मुंह में एक मुट्ठी नमक डालकर उसकी लीला जन्मवाले दिन ही खत्म कर दी जाती है । ऐसे कुकर्म करते वही पकड़े जाते हैं जो खुद को कट्टर हिंदू कहलाना पसंद करते हैं । यह स्त्री द्वेष नही तो क्या है !
          विद्वानों का मानना है कि किसी भी धर्मं की नींव उस धर्मं के धार्मिक पुस्तकों पर निर्भर करती है ।  हिन्दू धर्मं के धार्मिक पुस्तकों का हमारे ही धार्मिक विद्वानों द्वारा निष्कर्ष निकाला जाता है कि रामायण और महाभारत दोनों ही युद्ध एक स्त्री के कारण हुआ जबकि द्रौपदी को दांव पर लगाने वाले, उसकी अश्मिता लूटने का प्रयास करनेवाले, इस नग्न नृत्य का बैठे-बैठे तमाशा देखने वाले पुरुष थे । रामायण की बात करें तो इसमें भी इस युद्ध के लिए सीता और शूर्पनखा पर दोषारोपण किया जाता है जबकि राम-लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा के नाक कान काट लिया जाना रावण जैसे भाई के लिए बिलकुल अपमानजनक बात थी । दूसरा खुद रावण जिसने अपमान का बदला लेने के लिए सीता का धोखे से अपहरण कर लिया । दोनों ही उदाहरण में एक पुरुष वर्ग दोषी है । लेकिन धर्म का वाचन करने वालों द्वारा इनकी जगह एक स्त्री पर दोष लगा दिया जाता है । भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पत्नी यदि भूल से या जान बूझकर कुछ गलत कर दे तो पति उसके साथ कुछ भी कर सकता है क्योंकि वह उसके अधीन होती है । पति द्वारा जुल्म करने की स्थिति में भी उससे पति के खिलाफ विरोध नहीं करने की अपेक्षा की जाती है क्योंकि हिन्दू धर्म में एक स्त्री द्वारा अपने पति को पलटकर जवाब देना अच्छा नहीं माना जाता है । ये स्त्री द्वेष नही तो क्या है !
 इस्लाम की बात करें तो सैद्धान्तिक रूप से तो इस्लाम में स्त्री पुरुष को समान दर्जा दिया गया है लेकिन व्यावहारिक रूप में स्त्री-पुरुष में भेद किया जाता है । इस्लाम के उदय का एक अन्य कारण यह भी था कि इस्लाम के उदय के पूर्व अरब समाज में अनेक कुप्रथाएँ थी जिससे स्त्रियों का जीवन नरक समान हो गया था । पिता के मरने पर पिता के पत्नियों का बंटवारा भी पुत्रों में हो जाता था । इतना ही नहीं जहां बेटे पिता की पत्नी को रखैल बना लेते थे वहीं बाप भी इस कुकर्म में पीछे नहीं रहता । इस्लाम महिलाओं को मस्जिद में जाकर नमाज़ पढने का अधिकार नही होता जबकि कुरआन में ऐसा कहीं भी देखने को नही मिलता, जबकि मुहम्मद साहब की मृत्यु के काल तक स्त्रियों को मस्जिद में जाकर नमाज पढने का अधिकार था लेकिन जब इस्लाम में खलीफा राज की शुरुवात हुई और उमर पहले खलीफा बने तो उसी समय एक पढ़ी लिखी स्त्री से इनकी कुरआन सम्बन्धी किसी नियम पर बहस हो गयी । उमर को ये बहस, बहस कम अपमान ज्यादा लगा । इसके पश्चात उन्होंने स्त्रियों के मस्जिद में कुरआन पढ़ने पर रोक लगा दिया । काफी दिनों के पश्चात उनको केवल घर पर कुरआन पढ़ने का अधिकार मिला । कुरआन में कहीं भी ये नहीं लिखा है कि स्त्रियों को बुर्का पहनना चाहिए । इसके बावजूद इनपर बुर्का लाद दिया गया । हिन्दू के साथ साथ इस्लाम में भी स्त्री के जन्म को अभिशाप माना जाता है । जन्म लेने के पश्चात इनको कभी दूध में डुबाकर, कभी उसके मुंह में अफीम डालकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाती है । ये स्त्री द्वेष नही तो क्या है ?
इसाई धर्म में भी बाइबिल का पुराना संस्करण (ओल्ड टेस्टामेंट) जिसका स्वरुप मातृसत्तात्मक था, 15वीं शताब्दी में नया संस्करण (न्यू टेस्टामेंट) लाकर इसका स्वरूप पितृसत्तात्मक  कर दिया गया । ये स्त्री द्वेष नही तो क्या है ?
अतः कहा जा सकता है कि हमारा धर्म/समाज प्राचीन काल से ही स्त्री द्वेषी रहा है । समस्त धर्मों/संप्रदायों में इसके साक्ष्य भरे पड़े हैं । हालांकि राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, सावित्री बाई फुले, पंडिता रमा बाई सरस्वती, डॉ कर्वे आदि ने स्त्रियों की स्थिति सुधारने में उल्लेखनीय योगदान दिया । यही कारण है कि आज स्त्रियाँ जागरूक होकर देश समाज से अपनी स्थिति में परिवर्तन लाने को प्रयत्नशील हैं । शनि शिंगनापुर के शनि धाम के चबूतरे पर प्रवेश हेतु संघर्ष इसी परिवर्तन लाने की एक कड़ी है ।        

(वुमेन एक्सप्रेस दैनिक समाचार पत्र के 01/02/2016 के संपादकीय में प्रकाशित)

Wednesday, 3 January 2018

राष्ट्रीयता की राह के पत्थर: शौर्य दिवस

विभिन्न धर्मों, जातियों, मानव प्रजातियों का अनुपम संग्रहालय हमारा देश पिछले दो-तीन दसकों से कभी धार्मिक, कभी जातीय उन्माद, वर्चस्व की राजनीति के कारण रणभूमि बन चुका है । नौकरी हेतु आवेदन के क्रम में कितना भी गर्व से हम खुद की राष्ट्रीयता भारतीय लिख दें लेकिन समय आने पर अपनी वास्तविकता दिखाने से नहीं चूकते कि हम भारतीय बाद में हैं, हिंदू, मुसलमान, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, हरिजन, दलित, आदिवासी पहले हैं । उदाहरण के रूप में प्रति वर्ष महिषासुर विजय के रूप में मनाया जाने वाला शौर्य त्योहार विजया दशमी, 6 दिसंबर की बाबरी विध्वंश की वार्षिकी पर शौर्य प्रदर्शन या 1 जनवरी को कोरेगांव भीमा का शौर्य प्रदर्शन, देखे जा सकते हैं । इस तरह के शौर्य प्रदर्शन में एक तरफ प्रचंड आत्मविश्वास, ऊर्जा से परिपूर्ण विजेता पक्ष होता है तो दूसरा अपमानित महसूस करने के बावजूद खून के घूंट पीकर रह जानेवाला पीड़ित समुदाय होता है । ऐसे में यदि शौर्य दिवस आयोजकों को सत्ता पक्ष का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से साथ मिल जाए तो 6 दिसंबर को होनेवाले शौर्य प्रदर्शन शांतिपूर्ण होता है । लेकिन जब सत्ता पक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शौर्य दिवस विरोधियों के साथ हो तो कोरेगांव जैसी हिंसक घटनाएँ जन्म लेती है ।
          शौर्य प्रदर्शन जैसी घटनाएँ क्षणिक रूप से किसी समुदाय विशेष के लिए गौरव का क्षण हो सकता है लेकिन इससे उत्पन्न वैमनस्यता का सबसे बड़ा नुकसान हमारे देश को है । इस वैमनस्यता से हमारी वह राष्ट्रीयता की भावना प्रभावित होती है जिसे जागृत कराने के लिए सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए स्कूल-कॉलेज स्तर पर भारतीय इतिहास के हमारे अध्ययन-अध्यापन पर खर्च करती है । बाबरी विध्वंश का शौर्य दिवस हो, विजया दशमी का शौर्य दिवस हो या कोरेगांव भीमा के महारों का पेशवाओं पर विजय का शौर्य दिवस, सभी धार्मिक व जातिगत वैमनस्यता को बढ़ावा देते हुए हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-आदिवासी, सवर्ण-दलित के बीच अलगाववाद को बढ़ावा देते हैं । यदि ऐसे शौर्य दिवस मनाने की प्रवृत्तियों जिससे एक दूसरे की भावनाओं को आघात पहुंचे, पर सरकार द्वारा अंकुश नहीं लगाया गया तो जिस तरह आज धर्मनिरपेक्ष स्वरूप वाले हमारे देश में हिंदू राष्ट्र बनाने, संविधान को बदलने के सुर सुनाई पड़ते हैं, आगे चलकर जाति-धर्म के नाम पर पृथक राष्ट्र बनाने की मांग चारों तरफ से सुनाई पड़ेंगी । और देश को स्वतन्त्रता पूर्व की राजनीतिक स्थिति में पहुँचते देर नहीं लगेगी जब सम्पूर्ण भारत सैकड़ों रियासतों से आबाद एक भौगोलिक क्षेत्र था ।
साकेत बिहारी
शोधार्थी – पीएच.डी.

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
(Women Express 04/01/2018 अंक में प्रकाशित) 

Wednesday, 27 December 2017

‘वन्दे मातरम’ विमर्श की आवश्यकता क्यों?

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय लिखित उपन्यास आनंदमठ के गीत वन्दे मातरम के गायन को लेकर पिछले 3 वर्षों से हमारे देश के समाचार चैनल अखाड़ा बने हुए हैं। यह विवाद कोई नया नहीं है बल्कि इसकी जड़ स्वतन्त्रतापूर्व की रही है। स्वतंत्रता पूर्व इस बोल से घृणा करने की वजह थी कि जिस उपन्यास आनंद मठ से यह गीत लिया गया है उसमें मुसलमान शासकों को शोषक के रूप में दिखाते हुए, मुसलमानों के लिए ओछे शब्दों को प्रयुक्त कर उनके प्रति घृणा दिखाया गया है, जो प्रारम्भ में अंग्रेजों के लिए किया गया था। बाद में अंग्रेजों की जगह न केवल मुसलमानों को डाल दिया गया, बल्कि अंग्रेजों की जय-जयकार भी की गयी। इस गीत में हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बहुलता होने के कारण ही  इसे राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है, जबकि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय में यह जनमानस में रवीद्रनाथ टैगोर की जन-गण-मन से भी अधिक लोकप्रिय था।
          23 दिसंबर 2017 को ‘सिर्डी साईं बाबा’ संस्थान द्वारा आयोजित ग्लोबल साईं मंदिर ट्रस्ट सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू द्वारा मुसलमानों द्वारा वंदे मातरम गाने की समस्या को लेकर उठाए गए सवाल के बाद यह विमर्श एवं विवाद का मुद्दा बन गया है। इस विमर्श में एक तरफ तथाकथित देशभक्त’(हिंदू सहित अन्य धर्मावलम्बी) हैं तो दूसरी तरफ तथाकथित अदेशभक्त (पारंपरिक इस्लामी धर्मावलम्बी) वर्ग। अदेशभक्त इस संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है कि तथाकथित देशभक्त वर्ग द्वारा वन्दे मातरम कहने को देशभक्ति का पैमाना बताया जा रहा है। गहराई से विचार किया जाए तो इस वन्दे मातरम विमर्श को बढ़ावा देने का उद्देश्य बाहर से दिखाने के कुछ और और अंदर से कुछ और ही प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है कि वर्तमान में इस विवाद/विमर्श के बहाने सरकार इस्लामी समुदाय को देशभक्ति के सर्टिफिकेट देने की आड़ में उनकी कट्टर धार्मिक मान्यताओं की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उन्हें अदेशभक्त घोषित कर केवल हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है।
          इस्लामी धर्मावलम्बियों द्वारा राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम का उच्चारण या गायन नहीं करना वर्तमान में कोई राष्ट्रवाद का नहीं बल्कि धार्मिकता का मामला है। यदि राष्ट्रीयता का मामला होता तो वे राष्ट्रगान जन गण मन गायन से भी परहेज करते। ऐसी स्थिति में बहुदेववाद सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले हिंदू धर्मावलम्बी निःसंकोच वन्दे मातरम बोलकर देशभक्त का तमगा तो पा जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ एकेश्वरवाद में विश्वास करने वाले कट्टर इस्लामिक धर्मावलम्बी इसके उच्चारण को लेकर थोड़े असहज हो जाते हैं, क्योंकि इस्लामी धार्मिक मान्यतानुसार एक इस्लामी धर्मावलम्बी को केवल अल्लाह की इबादत करना ही सुन्नत माना गया है। इनके अतिरिक्त अन्य किसी की इबादत के उद्देश्य से सजदा करने को इस्लामी परंपरा के खिलाफ माना जाता है। ऐसे में वे भारत को ईश्वरीय माता के रूप में मानते हुए उसकी इबादत में वंदना करना इस्लामिक धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ मानते हैं। ऐसी स्थिति में कट्टर इस्लामिक धर्मावलम्बी देशभक्ति के प्रमाणपत्र से वंचित हो जा रहे हैं। भले ही उनके दिल में कितना भी देश के लिए समर्पण की भावना क्यों न हो।
          हालांकि इस्लाम का दूसरा पक्ष सूफिवाद ऐसे सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता है, क्योंकि सूफी परंपरा में पीरी, मुरीदी (गुरु शिष्य) परंपरा में कदमबोशी व सजदा जैसे कर्मकांड अभी भी प्रचलन में हैं। प्रगतिशील सोच के इस्लामी धर्मावलम्बी भी इसके उच्चारण को लेकर असहज नहीं होते हैं। धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठ चुके आज के हजारों मुस्लिम युवा इसे न गाने को एक दक़ियानूसी सोच बताते हैं। जिनका मानना है कि यदि इसके उच्चारण से किसी का धर्म भ्रष्ट होता है तो न्यूज़ चैनलों पर वंदे मातरम विमर्श करने वाले मौलवी-मौलाना तो वाद विवाद में दर्जनों बार इसका उच्चारण करते हैं तो क्या इससे उनका धर्म भ्रष्ट नहीं होता है।
          इस्लामी धर्मावलम्बियों के इस कट्टर धार्मिकता पर उग्र हिन्दुत्व के लोग खुद को प्रगतिशील सोच/विचारधारा युक्त दिखाने के लिए इन पर आक्षेप लगाते देखे जा सकते हैं कि इतना भी धर्मांध होना ठीक नहीं। धर्म, राष्ट्र से सर्वोपरि नहीं होना चाहिए। ऐसे छद्म प्रगतिशील लोगों को यदि कहें कि विविध खान-पान की संस्कृतियों वाले हमारे इस धर्मनिरपेक्ष भारत देश में ईसाई, इस्लामी, हिंदू धर्म के अंतर्गत कुछ अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लोग गौमांस का बहुत ही चाव से सेवन करते हैं, इसलिए गौमांस पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए और हो सके तो आपको भी इसका सेवन करना चाहिए, तो इनकी प्रगतिशील सोच की खाल ओढ़े धार्मिक कट्टरता को बेनकाब होने में जरा भी समय नहीं लगेगा। तुरंत यह गर्जना कानों को छेद देगी कि मैं हिंदू हूँ ... हमारे धर्म मे ...।
          इस संदर्भ में दोनों की धर्मांधता को समझा जा सकता है। जैसे हिंदू धर्मावलम्बी चिकन, बकरे का मांस तो खा सकते हैं लेकिन बीफ नहीं, क्योंकि उनका धर्म गौमांस सेवन की इजाजत नहीं देता। वह काम जैसे आपके धर्म में पाप समझा जाता है उसे आप नहीं कर सकते हैं, वैसे ही कट्टर इस्लामिक लोगों को उनका धर्म अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत/वंदना करना सुन्नत नहीं माना जाता। इसलिए वे धार्मिक प्रतीकों से युक्त इस राष्ट्रगीत (वन्दे मातरम) के गायन से हिचकते हैं। अन्य राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान जन गण मन बोलने/गायन से तो कभी कोई समस्या देखने सुनने को तो नहीं मिलती। अतः उनसे ऐसा जबरन बोलने के लिए मजबूर करना, किसी हिन्दू को जबरन गौ मांस खाने के लिए मजबूर करने जैसा ही है। दोनों धर्मावलंबियों की अपनी अपनी धार्मिक मान्यताएं हैं जिनका हर किसी को सम्मान करना चाहिए। सरकार को भी अपनी अखंडता बनाए रखने के लिए राष्ट्र, राष्ट्रगान व राष्ट्रगीतों को दैवीय रूप प्रदान करने से बचना चाहिए । संभव हो सके तो मुसलमानों के लिए अन्य राष्ट्रगीत गाने की छूट दे, क्योंकि राष्ट्रगीत का गायन ही राष्ट्रभक्ति का पैमाना है तो अनेकों राष्ट्रगीतों में से एक उनके लिए भी हो जिनमें धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग न हो।
          हालांकि मेरे विचार से आज के समय में दोनों ही विचार प्रासंगिक नहीं हैं। दोनों धर्मावलंबियों को इन पारंपरिक मान्यताओं को छोड़कर वर्तमान में समय की मांग के अनुसार आचरण करना चाहिए। ये विचार राजतंत्रीय शासन प्रणाली में एक पुरातन समय में प्रासंगिक होंगे जब राजा का धर्म ही प्रजा के लिए मान्य होता था। आज गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में हमें अपने विचार परिवर्तन करते हुए भारतीय संविधान के अनुसार आचरण करने की आवश्यकता है ।
                                                साकेत बिहारी
शोधार्थी – पीएचडी

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
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