Sunday, 12 February 2023

कोई फायदा नहीं बच्चों के ऐसे आकलन का।

कोविड महामारी के कारण बच्चों में हुए लर्निंग लॉस से पूरा देश वाकिफ है। देशभर के लगभग सभी राज्य शिक्षा के क्षेत्र में हुए इस नुकसान की भरपाई अपने-अपने तरीके से करने के लिए प्रयासरत हैं। इसी क्रम में शाला खुलने के साथ ही छत्तीसगढ़ समग्र शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश के उच्च प्राथमिक शालाओं में अक्टूबर 2022 में कक्षा छठवीं से आठवीं के बच्चों के लिए बेसलाइन आकलन कराया गया। इस आकलन में शाला में दर्ज़ समस्त छात्र-छात्राओं की उपस्थिति अनिवार्य थी। इस आकलन का प्रत्यक्ष उद्देश्य था यह पता करना कि

·       कक्षा के कितने बच्चों के साथ बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान पर कार्य करने की आवश्यकता है?

·       कितने बच्चे पिछली कक्षा की दक्षता प्राप्त कर लेने के स्तर पर हैं?

·       कितने बच्चे वर्तमान कक्षा स्तर पर हैं? जिनके साथ उस कक्षा स्तर के अनुरूप कार्य किया जा सके।

आकलन में गुणवत्ता के लिए कुछ जरूरी कदम भी उठाए गए थे जैसे- बच्चों की उत्तर पुस्तिकाओं का आकलन दूसरे संकुल के शिक्षक निष्पक्ष रूप से करेंगे।

          बेसलाइन आकलन के 3 महीने पश्चात दिनांक 9 एवं 10 फरवरी 2023 को एंडलाइन आकलन की प्रक्रिया चल रही है। छात्र छात्राओं ने उत्तर पुस्तिका को अपने अर्जित ज्ञान के अनुरूप भर दिया है। उन उत्तर पुस्तिकाओं को मूल्यांकन/ आकलन के लिए दूसरे संकुल भेजा जा रहा है। इस आलेख को लिखे जाने तक संभवतः कुछ उत्तर पुस्तिकाएं आकलित भी की जा चुकी होंगी। सभी लोग एंडलाइन आकलन के परिणाम का इंतजार भी कर रहे होंगे। परिणाम क्या होगा इसकी भविष्यवाणी किया जा सकता है। परिणाम आते ही समाचार पत्रों में यह इस तरह छपे होंगे- 'शिक्षकों की मेहनत रंग लाई, 50% बच्चे कक्षा स्तर पर, 40% बच्चे कक्षा पूर्व स्तर एवं 10% बच्चे शुरुआती स्तर पर हैं।' उम्मीद है इससे भी आकर्षक होगी, जिसके बिना पर हम सभी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोग शायद फूले न समाए। लेकिन यह परिणाम बच्चों की वास्तविकता नहीं बल्कि एक छलावा होगा। इस परिणाम के बिना पर हम उन्हें उनकी वास्तविक स्थिति पर ही छोड़कर आगे बढ़ रहे होंगे।

          इस भविष्यवाणी का आधार कोई दिव्य दृष्टि नहीं बल्कि प्रत्यक्ष अवलोकन है। शाला भ्रमण के क्रम में उच्च प्राथमिक शाला, रमपुरा (काल्पनिक नाम) में Endline Assessment को देखने का मौका मिला। विद्यालय के 2 शिक्षक कक्षा छठवीं, सातवीं, तथा आठवीं के 110 बच्चों के साथ एंड लाइन आकलन की प्रक्रिया में शामिल हो रहे थे। 3 कक्षा पर दो ही शिक्षक होने से थोड़े परेशान दिखे। फिर भी व्यवस्थित देखरेख का प्रयास कर रहे थे। शाला पहुंचने पर बहुत ही कम समय लेते हुए वस्तुस्थिति से अवगत हुआ और एंड लाइन आकलन की प्रक्रिया को समझने के उद्देश्य से कक्षा में समय बिताने की अनुमति प्रधान पाठक से लेते हुए तीनों कक्षाओं में आधे-आधे घंटे समय व्यतीत किया। तीनों ही कक्षाओं के प्रश्नों की प्रकृति ऐसी थी जो बच्चों को संबंधित विषय के समझ के आधार पर लिखने को प्रेरित करते थे। कुछ सवाल स्मरण से भी संबंधित थे। शाला के बच्चे चूंकि मुझसे पहले से परिचित थे, क्योंकि कक्षा में उन लोगों के साथ कई बार कार्य किए हुए थे, को, मेरी उपस्थिति से कोई विशेष समस्या होती नहीं दिखी। कक्षा कक्ष कदाचार मुक्त नहीं था। एक ही कक्षा में अगल-बगल बैठे बच्चे एक दूसरे की उत्तर पुस्तिका को आसानी से देख कर लिख रहे थे। उन्हें समझाने का कई बार प्रयास किया कि एक दूसरे का देख कर न लिखें, जिनको जितना आता है, अपने मन से उतना ही लिखें। इन निर्देशों का कुछ बच्चों पर असर दिखा, अधिकांश पर बिल्कुल नहीं। एन-केन प्रकार से तय समय तक सभी बच्चे एक दूसरे की मदद से उत्तर पुस्तिका भर चुके थे।

          भोजन अवकाश के दौरान प्रधान पाठक सर से जब इस संदर्भ में बात हुई कि, इस तरह के आकलन, जिसमें बच्चे एक दूसरे की उत्तर पुस्तिका देखकर लिख ले रहे हैं, इससे तो शायद ही निकल कर आ पाए कि कौन से बच्चे सीखने के किस स्तर पर हैं? किन के साथ बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान पर कार्य करेंगे, कौन बच्चे कक्षा स्तर के हैं?

          उपरोक्त बातों को लेकर कि बेसलाइन आकलन का शिक्षक, स्कूल या बच्चों को कितना फायदा हुआ? हमने उच्च प्राथमिक शाला के अन्य शिक्षक एवं संकुल समन्वयक से भी बातचीत की। बैहरसरी संकुल के पूर्व समन्वयक एवं वर्तमान में उच्च प्राथमिक शाला सिरवाबांदा में पदस्थापित शिक्षक श्री नरेंद्र कुमार निषाद सर का कहना था कि बेसलाइन आकलन के रिजल्ट के संदर्भ में शिक्षक या स्कूल को कुछ बताया ही नहीं गया है। उनके बच्चों की शैक्षणिक स्थिति कैसी है यदि यह पता होता तो उनके स्तर की पहचान कर उसके अनुरूप हम उनके साथ कार्य करने का प्रयास कर रहे होते। इसी संदर्भ में पिकरी संकुल समन्वयक श्री सुखनंदन आदिल सर से जब बात हुई तो उनका कहना था कि बेसलाइन आकलन के परिणाम सरकार द्वारा जारी कर दिए गए हैं। बेसलाइन से प्राप्त स्थिति के अनुसार हमने बच्चों के साथ काम किया और उनके शैक्षणिक स्तर में बदलाव देखने को मिल रहा है। उनसे जब यह पूछा कि बेसलाइन आकलन एवं इंडलाइन आकलन की प्रक्रिया क्या थी? तो उन्होंने भी बिल्कुल वही प्रक्रिया बताई जो उच्च प्राथमिक शाला, नगपुरा के प्रधान पाठक ने बताए थे। इस संदर्भ में दोनों शिक्षकों से जब बात हुई कि इस इस प्रक्रिया से बच्चों के वास्तविक स्थिति का पता कैसे लगाया जा सकता है जब वे अपने साथी के कॉपी को देखकर लिख ले रहे हैं? संकुल समन्वयक के साथ-साथ शिक्षक नरेंद्र निषाद सर के पास भी इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था।

तीन शिक्षकों से हुई इस आकलन प्रक्रिया संबंधी बातचीत के पश्चात सभी शिक्षक इस बात पर तो सहमत दिखे कि ऐसे प्रक्रिया से बच्चों की वास्तविक स्थिति तो निकलने से रही

          उपरोक्त परिणाम संबंधी भविष्यवाणी हमने एक शाला के एंडलाइन आकलन की प्रक्रिया के प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर निकाला है। हो सकता है कि अन्य शाला के शिक्षक खुद के विवेक से आकलन प्रक्रिया को बेहतर बनाया हो। वहाँ एक साथ बैठाने के बावजूद सभी बच्चे निगरानी में प्रश्नों के उत्तर अपनी समझ के अनुसार दे रहे हों। बावजूद इसके प्रश्नों की प्रकृति को देखकर कहा जा सकता है कि यह समझ बनाना बहुत ही मुश्किल है कि बच्चा समझ के साथ पढ़ पा रहा है या नहीं। प्रश्नों की प्रकृति मुख्यतः लिखने की दक्षता जांच करने से थी। छठी कक्षा के हिंदी के आकलन पत्र को देखें तो उसमें ऐसा कोई प्रश्न नहीं दिखा जिसमें बच्चों को कोई प्रसंग पढ़वा कर यह देखा जा रहा है कि बच्चा उसे पढ़कर अपनी समझ बना पा रहा है या नहीं, या समझ के साथ पढ़ पा रहा है या नहीं।

          यहां एक बात तो साफ है कि आकलन की इस प्रक्रिया से बच्चों की वास्तविक स्थिति का पता नहीं लगाया जा सकता है? यह शिक्षा विभाग के आर्थिक संसाधन की बर्बादी मात्र है। ऐसा कहने का यह तात्पर्य नहीं है कि आकलन किस प्रक्रिया को बंद कर दिया जाए। लेकिन हमें इस ओर भी सोचने की आवश्यकता है कि जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कोई कार्यक्रम शुरू किया गया है, उसकी पूर्ति हो रही है या नहीं। यदि नहीं हो रही है, तो उसके लिए कमी कहां रह जा रही है? यहां कमी सिर्फ शिक्षक या प्रधान पाठक की नहीं है बल्कि उन्हें इस कार्य के लिए दिशा-निर्देश देने वाली समग्र शिक्षा का भी कहा जा सकता है।  


Sunday, 29 January 2023

दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान गांधीजी द्वारा सत्याग्रह एवं अहिंसा का प्रयोग

 

गांधीजी ने 1890 के दशक में दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान पहली बार सत्याग्रह को खोजा, समझा, खुद को प्रशिक्षित कर उसका प्रयोग किया। 1896 के जनवरी महीने में 6 महीने की भारत यात्रा के बाद गांधी जी सपरिवार दक्षिण अफ्रीका लौटे। भारत में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में सबको बताया। इस बारे में उन्होंने जो लेख लिखे उसे नटाल (दक्षिण अफ्रीका) के अखबारों ने काफी तोड़ मरोड़कर छापा। इसे पढ़ने के बाद दक्षिण अफ्रीकी ब्रिटिश अधिकारी काफी भड़क गए। वहां के अखबारों ने यह झूठी खबर छाप दी कि गांधीजी अपने साथ 500 भारतीयों को दो जहाजों में भरकर दक्षिण अफ्रीका ला रहे हैं ताकि दक्षिण अफ्रीका के गोरों का मुकाबला किया जा सके। वेद दक्षिण अफ्रीका को भारतीयों से भर देना चाहते हैं। इस खबर ने ब्रिटिश लोगों को गांधीजी के खिलाफ भड़काने में आग में घी का काम किया। इसकी प्रतिक्रिया में दक्षिण अफ्रीका में कई ऐसे संगठन उभर कर आए जिनका एकमात्र उद्देश्य भारतीयों के इस संभावित हमले का सामना करना था। 18 दिसंबर 1896 ईसवी को गांधीजी का जहाज नटाल (दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित एक ब्रिटिश उपनिवेश) के डरबन बंदरगाह पर पहुंचा। नटाल के तत्कालीन कार्यकारी प्रधानमंत्री अटॉर्नी जनरल हैरी एस्कोम्ब, जो भारतीयों के विरोधी थे, ने अफवाह फैलाने वालों की मदद की। भारतीय यात्रियों की वजह से शहर में प्लेग रोग फैल जाएगा, यह भय दिखाकर उन्होंने यात्रियों को तीन सप्ताह तक जहाज से उतरने की इजाजत नहीं दी। यह भी धमकी दी गई कि हम यात्रियों को वापस भारत या फिर कहीं और पहुंचा देंगे। लेकिन सच तो यह था कि जहाज में सवार ज्यादातर लोग दक्षिण अफ्रीका के ही वैध नागरिक थे, जो अपने घरों को लौट रहे थे।

            एस्कोम्ब ने स्थानीय ब्रिटिश नागरिकों से यह कह रखा था कि जहाज से उतरने वाले भारतीयों के साथ वे जो करना चाहे करें पुलिस उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी। इससे डरबन बंदरगाह पर उग्र ब्रिटिश नागरिकों की भीड़ जमा हो गई। उस भीड़ के डर से सभी भारतीय जहाज में ही बैठे रहे, इस दौरान गांधीजी सारे वक्त उनका मनोबल बढ़ाते रहे। ऐसे में ही क्रिसमस आया। जहाज के कप्तान ने गांधी जी और उनके परिवार के सम्मान में जहाज पर ही रात्रि भोज का आयोजन किया। इस अवसर पर गांधी जी ने जहाज के भारतीयों को संबोधित किया और कहा, 'आज की परिस्थिति की जिम्मेवार पश्चिम की संस्कृति है, जो हमारी पूर्व की संस्कृति से अलग पशु बल पर आधारित है'। जहाज के कप्तान ने गांधीजी को चुनौती दी और कहा कि जब आप इस जहाज से उतरेंगे और बंदरगाह पर खड़े गोरे आप पर हमला कर देंगे तो आप अपने अहिंसा के सिद्धांत पर किस तरह डटे रहेंगे? गांधीजी ने जवाब दिया, ' मेरा विश्वास है कि ईश्वर मुझे भीड़ के सामने खड़े रहने की हिम्मत देंगे, और मैं कानून का सहारा लिए बिना उन्हें माफ कर सकूंगा। मैं जानता हूं कि यह भीड़ अफवाह फैलाकर जुटाई गई है और झूठी बातों से उत्तेजित की गई है। यह लोग ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि वे जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं। अज्ञानवश उत्तेजित लोगों से मेरे नाराज होने की कोई वजह नहीं है'

            अंततः 13 जनवरी 1897 को 26 दिनों की प्रतीक्षा के बाद यात्रियों को जहाज से उतरने की इजाजत मिली। अब तक जनरल एस्कोम्ब को लग गया था कि बात बिगड़ रही है और हाथ से बाहर जा सकती है। इसलिए वे भीड़ से मिले और आश्वस्त किया कि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान देगी और भारतीयों के दक्षिण अफ्रीका आने पर कानूनी पाबंदी लगाएगी। इस तरह एस्कॉम्ब ने भीड़ को डरबन बंदरगाह से हटाया। एस्कोम्ब ने गांधीजी को संदेश भिजवाया कि वे अंधेरा होने पर ही जहां से निकलें और हम उन्हें पुलिस के संरक्षण में घर पहुंचा देंगे। गांधीजी ने इस तरह चोरी-छिपे शहर में जाने से मना कर दिया। वे दोपहर बाद जहाज से निडरता से निकले। भीड़ ने गांधीजी को पहचान लिया, वह उन पर तथा उनके साथियों पर पत्थर बरसाने लगे। इस झड़प में गांधीजी से उनके साथी बिछड़ गए, लोगों ने गांधी जी को घूसों तथा लातों से इतना पीटा कि वे बेहोश हो गए। उन्होंने जिंदा घर लौटने की उम्मीद छोड़ दी। यह उनके जीवन का पहला मौका था जेबी उन्होंने मृत्यु को इतने करीब से देखा था। इस संबंध में गांधीजी लिखते हैं कि ' उस वक्त भी मेरे हृदय में मारने वालों के प्रति कोई द्वेष नहीं था'। धर्म के पुलिस सुपरिटेंडेंट की पत्नी श्रीमती जैन एलेग्जेंडर, जो गांधीजी को पहले से जानती थी, उस समय वहाँ से गुजर रही थी। उन्होंने अपनी गाड़ी से उतरकर, मारने वालों को रोका और पुलिसवालों को गांधीजी को अपने घेरे में लेने को कहा। पुलिस ने वैसा ही किया और गांधीजी को थाने ले आई। भीड़ ने यहां तक उनका पीछा नहीं छोड़ा। अंधेरा होते होते 5000 लोग थाने के पास इकट्ठा हो गए थे। सब चिल्ला रहे थे कि गांधी जी को हमारे हवाले करो नहीं तो हम थाने में आग लगा देंगे। पुलिस अधिकारी ने गांधी जी को उनके मित्रों, परिवार की जान का वास्ता दिया तब कहीं जाकर वह चोरी-छिपे वहां से निकलने को तैयार हुए।

            एक समय था कि डरबन का पुलिस सुपरीटेंडेंट एलेग्जेंडर गांधी जी का और भारतीयों का घोर विरोधी था। उसके लिए ज्यादातर भारतीय हिंसक कुली के समान थे लेकिन गांधीजी से जैसे-जैसे उनका वास्ता पड़ा, भारतीयों के प्रति नजरिया बदलता गया, धीरे-धीरे वह गांधीजी से सहानुभूति भी रखने लगा। उनका समर्थक भी बना। यही कारण था कि संकट के समय उसकी पत्नी जैन एलेग्जेंडर ने उनकी जान बचाई।

इस घटना की जानकारी ब्रिटेन पहुंची। ब्रिटिश जानते थे कि भारत उनके उपदेशों का एक अहम देश है और गांधीजी उसके एक जाने-माने नेता हैं। वे भारतीयों को नाराज नहीं करना चाहते थे। उनका दबाव पड़ा और बहुत ही बेमन से नेपाल के कार्यकारी प्रधानमंत्री एस्कोम्ब ने अपराधियों की शिनाख्त के लिए गांधी जी को पुलिस थाने बुलाया। गांधीजी ने जवाब दिया, " मैं इस मामले को आगे नहीं बढ़ाऊंगा। मैं मानता हूं कि जिन पर उपद्रव का आरोप है, गलती उन लोगों की नहीं थी। उन्हें तो नटाल के नेताओं ने और यहां की यूरोपियन सरकार ने गलत जानकारी देकर भड़काया था। गांधीजी का इशारा किधर है यह एस्कोम्ब समझ रहे थे लेकिन वे यह भी समझ रहे थे कि अपनी तरफ से कोई कार्रवाई ना करके गांधीजी उठने वाले तूफान से उन्हें बचा भी रहे थे। वह भी एक ऐसे तूफान से जिसे एस्कोम्ब ने खुद ही खड़ा किया था! इस पूरे घटनाक्रम का अवलोकन करते हुए गांधी जी ने बाद में लिखा, ' ईश्वर मुझे सत्याग्रह के लिए तैयार कर रहा था'

            इसी संघर्ष के दौरान गांधी जी द्वारा सत्याग्रह शब्द की खोज की गई थी। हालांकि इस दौरान सरकार से ऐसा कोई मांग तो नहीं किया गया लेकिन अपनी इस अहिंसक सत्याग्रह से डरबन के पुलिस सुपरिटेंडेंट एलेग्जेंडर, नटाल के कार्यकारी प्रधानमंत्री एस्कोम्ब को भारतीयों के प्रति या खुद के प्रति अपने विचार बदलने को मजबूर कर दिया। वे चाहते तो उग्र भीड़ द्वारा इतने हिंसक आक्रमण के विरोध में किसी एक को भी घायल कर सकते थे, एस्कोम्ब को उसके उड़ंदता की सज़ा दिला सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसे अहिंसात्मक सत्याग्रह का शुरुआत कहा जा सकता है, इसका व्यापक रूप दक्षिण अफ्रीका सहित हिंदुस्तान के अन्य आंदोलनों में देखने को मिलता है।

            ऐसी ही एक अन्य घटना 1907 ईस्वी में दक्षिण अफ्रीका में ही घटित हुई। इस बार उन पर हमला उनके ही एक स्वदेशी साथी ने की। दक्षिण अफ्रीका की ट्रांसवाल सरकार ने एशियाइयों के पंजीकरण का एक कानून बनाया था इसका भारतीय विरोध कर रहे थे। इस कानून के तहत सभी एशियाइयों को अपनी उंगलियों के निशान देना जरूरी था और अपने साथ हर वक्त एक पहचान पत्र रखना अनिवार्य था। इसके विरोध में गांधीजी के आह्वान पर ट्रांसवाल में रहने वाले 13000 भारतीयों ने अपना पंजीकरण कराने से इंकार कर दिया। जवाब में जनरल स्मट्स सरकार ने गांधीजी को दो महीने के लिए जेल में डाल दिया। यह गांधीजी की पहली जेल यात्रा थी।

            जनरल स्मट्स जानते थे कि भारतीयों का बहुमत गांधी जी के साथ है। जेल गए गांधी जी को दो सप्ताह ही हुए थे कि जनरल स्मट्स ने समझौता करने के इरादे से गांधी जी को जेल से निकलवाया और अपने ऑफिस में मिलने के लिए बुलाया। जनरल स्मट्स ने गांधीजी को भरोसा दिलाया कि यदि सारे भारतीय स्वेच्छा से अपना पंजीयन कराएंगे तो कुछ दिनों बाद सरकार स्वयं ही इस कानून को रद्द कर देगी। सत्याग्रह का यह शील गांधीजी के मन में तब तक बन चुका था कि अपने विरोधी पर पूरा भरोसा करो! वही उन्होंने किया। जेल से रिहा होकर गांधीजी जोहांसबर्ग पहुंचे। आधी रात को ही उन्होंने अपने साथियों को बुलाया और जनरल से हुए समझौते का पूरा विवरण उन्हें बताया। उनके साथियों ने शंका जाहिर की, ' क्या होगा अगर बाद में जनरल स्मट्स अपनी बातों से मुकर जाएं? यदि हमने पंजीकरण करवा लिया तो हमारे हाथ में कुछ बचेगा ही नहीं। गांधीजी ने उनकी आशंका को वाजिब माना लेकिन अपने साथियों को यह भी समझाया कि एक सत्याग्रही को अपने विरोधी पर भरोसा करके ही चलना चाहिए। सत्याग्रह कभी डरता नहीं है और इसलिए वह अपने दुश्मन पर भी भरोसा कर सकता है। धोखा खाने के बाद भी एक सच्चा सत्याग्रही फिर भरोसा करेगा, क्योंकि मनुष्य में छुपी अच्छाई पर उसका अडिग विश्वास होता है। गांधीजी अपने साथियों को अपनी बात समझा तो पाए लेकिन आने वाले तूफान से भी अनजान थे। यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई कि उनका नेता कोई संदेहात्मक समझौता करके आया है। गांधी जी से सवाल जवाब करने के लिए लगभग 1000 लोग उन्हें घेर कर खड़े थे। मीर आलम नामक एक व्यक्ति ने गांधी जी से सवाल किया, ' क्यों असहयोग की लड़ाई में यह अचानक ही सहयोग की बात आ गई? साथ ही यह भी आरोप लगाया कि 15000 पोंड की घुस के एवज में गांधीजी सरकार के हाथों बिक गए हैं। मीर आलम ने यह भी धमकी दे डाली कि जो भी पंजीकरण कराने जाएगा उसे वह जान से मार देगा। गांधीजी सबको अपनी बात समझाते हुए अंतिम में बोले, ' यह समझौता मैंने किया है इसलिए मेरा यह नैतिक फर्ज है कि सबसे पहले हाथों के निशान देने और पंजीकरण कराने मैं खुद जाऊंगा। मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि वह मुझे यह काम पूरा करने दें। मरना तो सभी को एक दिन है, लेकिन अपने भाई के हाथों मरना किसी भी बीमारी से मरने से कहीं बेहतर है'। 10 फरवरी 1908 का दिन पंजीकरण के लिए निर्धारित था। गांधीजी अपने साथियों के साथ पंजीकरण करवाने के लिए निकले। मीर आलम गुस्से से आंखें लाल किए कुछ लोगों के साथ वहां पहले से खड़ा था। उसने गांधीजी के सिर पर एक जोर का डंडा दे मारा। वह गिर पड़े और बेहोश हो गए। अमीर आलम और उसके आदमी गांधीजी को डंडो, लातों तथा घूसों से मारते रहे। वी गांधी जी को मार डालने की इरादे से ही आए थे।

            गांधीजी के जिन साथियों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, उन सबकी भी खूब पिटाई हुई। जब मारने वालों को लगा कि गांधीजी मर गए हैं तब वे वहाँ से भाग निकले। बेहोश गांधी जी को जब होश आया तो उन्होंने साथियों से पहले बात यह कही मैं ठीक हूं, दांत और पसली में दर्द है। फिर पूछा, ' लेकिन मीर आलम कहां है?" उन्हें बताया गया कि उन सब को गिरफ्तार कर लिया गया है, तो वे तुरंत बोले, ' यह तो ठीक नहीं हुआ! उन सबको छुड़ाना होगा। एक तरफ उनकी मरहम पट्टी की जा रही थी, तो दूसरी तरफ उनकी जिद थी कि पहले पंजीकरण हो जिसका उन्होंने वचन दिया है। मीर आलम तथा उनके साथियों पर किसी तरह का आरोप लगाने से गांधीजी ने इंकार कर दिया। हमला सार्वजनिक हुआ था, गुनहगारों को सजा तो हुई लेकिन जख्मों के कारण बोल नहीं पा रहे गांधी जी ने सरकार को लिखकर दिया कि मीर आलम वही कर रहे थे जो उन्हें सच लग रहा था।

            इस घटना के बाद जनरल स्मट्स ना केवल अपने वचन से मुकर गए, बल्कि उल्टे एशियायियों के खिलाफ वे एक और कड़ा कानून लेकर आ गए। अब गांधी जी ने आंदोलन का दूसरा रास्ता निकाला। 16 अगस्त 1908 को कुल 3000 भारतीय अपना पहचान पत्र जलाने के लिए इकट्ठा हुए। सरकार को पहले ही आगाह कर दिया गया था कि जब तक सरकार कानून वापस नहीं लेती है तब तक यह आंदोलन रुकेगा नहीं। अगस्त 1908 तक मीर आलम अपनी सजा काट कर जेल से बाहर आ चुका था। उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। अब तक वह गांधीजी की लड़ाई का पक्का सिपाही बन गया था।

            उपरोक्त घटनाओं के दौरान अहिंसा एवं सत्याग्रह के प्रति गांधीजी की धारणा और मजबूत होती गई। वे कहते हैं कि यदि सभी लोग, हिंदू-मुसलमान, सत्य के लिए अपनी जान पर खेल जाने का साहस पैदा करते हैं, तो बंदूकें, बम तथा जेल उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। दक्षिण अफ्रीका से लेकर हिंदुस्तान तक ब्रिटिश सरकार निर्भयता की इस ताकत के प्रभाव को रोकने की लगातार नाकाम कोशिश करती रही। क्योंकि यह ऐसी ताकत थी जो दुनिया को बदलने की क्षमता रखती थी।

संदर्भ –

गांधी मार्ग – मई-जून 2019, गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली



Wednesday, 22 June 2022

टीएलएम (TLM) के साथ कक्षा-कक्ष शिक्षण

टीएलएम (Teaching-Learning Material) से तात्पर्य ऐसे मूर्त सामग्री से है जिसका उपयोग शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को बेहतर व प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है। शिक्षक के साथ-साथ बच्चों के लिए यह समान रूप से उपयोगी है। कक्षा-कक्ष में बच्चों को किसी अपरिचित व अमूर्त अवधारणा से परिचित कराने हेतु ये सामग्री न केवल उपयुक्त वातावरण का निर्माण करते हैं बल्कि बच्चों को सक्रिय रखते हुए ज्ञान निर्माण (सीखने-सिखाने की प्रक्रिया) को और भी प्रगाढ़ बनाने का कार्य करते हैं। ये सामग्री मानचित्र, ग्लोब, किसी भी वस्तु के मॉडल, चार्ट पेपर पर कुछ लिखित आंकड़े आदि हो सकते हैं। कक्षा-कक्ष में शिक्षण हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले वस्तुएँ जैसे चॉक, श्यामपट्ट, पुस्तक आदि भी शिक्षण सहायक सामग्री (टीएलएम) के अंतर्गत आते हैं।  

        हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि जब तक शिक्षण प्रक्रिया रोचक न हो, बच्चों को पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया से जोड़ना बहुत ही मुश्किल है। ऐसे में उपरोक्त संबंधित सामग्री शिक्षण प्रक्रिया को काफी हद तक रोचक बनाने का काम करते हैं। क्योंकि ज्ञान निर्माण यदि केवल श्रव्य माध्यम से हो तो इसके लंबे समय तक स्थायी रहने की संभावना काफी कम होती है। उस ज्ञान के अनुकरण में यदि आँख तथा हाथ की भी संलिप्तता हो जाए तो स्वयं के अनुभव से प्राप्त यह ज्ञान काफी लंबे समय तक हमारे मन मस्तिष्क में बना रहता है। अर्थात इसके स्थायी होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए एक शिक्षक के रूप में हमारा प्रयास होना चाहिए कि बच्चों की अधिगम प्रक्रिया में गुणवत्ता लाने के लिए हमारे पास कक्षा, विषय एवं अवधारणा अनुरूप शिक्षण सहायक सामाग्री (टीएलएम) की उपलब्धता हो। कक्षा-कक्ष जितना टीएलएम समृद्ध होगा बच्चों को सीखने का वातावरण उतना ही गुणवत्ता मिल रहा होगा। प्राथमिक व उच्च प्राथमिक कक्षा में शिक्षण हेतु कुछ आवश्यक टीएलएम (संभावित) इस प्रकार से हो सकते हैं -     

भाषा (हिंदी) विषय संबंधी टीएलएम –

शब्द-खिड़की, शब्दों की सांप सीढ़ी, मात्रा चकरी, चकरी घुमाओ वाक्य बनाओ, शब्द पहेली,

भाषा (अंग्रेजी) विषय संबंधी टीएलएम –

Placard, Word building flip, Anchor Chart, Sentence & Words strip, Onset & Rime card, Rhymes Chart

गणित विषय संबंधी टीएलएम –

संख्या खिड़की, संख्या कार्ड, पॉकेट बोर्ड (जोड़ने-घटाने की संक्रिया पर कार्य हेतु), 

पर्यावरण अध्ययन संबंधी टीएलएम –

यातायात बत्ती, स्टेथोस्कोप, सौर ऊर्जा,

विज्ञान विषय संबंधी टीएलएम –

आवर्त सारणी, पृथ्वी की आंतरिक संरचना, वर्षा जल संरक्षण मॉडल, सजीव-निर्जीव वर्गीकरण चार्ट

सामाजिक विज्ञान विषय संबंधी टीएलएम –

मानचित्र (राजनीतिक, भौतिक), ग्लोब, सौर मण्डल, सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण मॉडल, पृथ्वी के आंतरिक एवं बाह्य परत, बच्चों के संवैधानिक अधिकार दिखाते चार्ट आदि।



Tuesday, 31 May 2022

समर कैंप के दौरान ईंट-भट्ठे श्रमिकों के बच्चों से रूबरू हुए एपीसी बेमेतरा

गुनरबोड़ गाँव के ईंट-भट्ठा पर कार्य करने वाले श्रमिकों के बच्चों के लिए आयोजित किए जा रहे समर कैंप के पांचवें दिन का जायजा लेने एपीसी, बेमेतरा श्री कमल नारायण शर्मा सम्मिलित हुए। इस दौरान वे चित्रकला पर कार्य कर रहे बच्चों तथा शासकीय प्राथमिक शाला, कोबिया की शिक्षिका श्रीमती गंगा एवं अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा के सदस्यों से रूबरू हुए।

          बताते चलें कि गुनरबोड़ गाँव स्थित ईंट-भट्टा पर कार्य करने वाले बालोदा बाज़ार व बेमेतरा जिले से प्रवासित श्रमिकों के शाला त्यागी बच्चों में मौखिक भाषा विकास के साथ-साथ बुनियादी पढ़ने-लिखने एवं गणितीय कौशल विकसित करने के लिए रोचक गतिविधियों जैसे चित्र पठन, हाव भाव द्वारा कविता पठन, नंबर गेम, नंबर जंप, कागज की टोपी व तितली निर्माण आदि के माध्यम से किया जा रहा है।

          एपीसी कमल नारायण शर्मा तीसरी तथा चौथी कक्षा के कुछ बच्चों से उनके द्वारा बनाए चित्र, उनके उपयोग पर बातचीत भी किए। बच्चों ने अपने बनाए चित्र पर खुलकर विचार रखे। उपस्थित शिक्षिका श्रीमती गंगा ने समर कैंप के दौरान अबतक बच्चों के साथ की गई भाषा एवं गणित के रोचक गतिविधियों को साझा किया। शिक्षण के इन तरीकों की सराहना करते हुए एपीसी ने इसे जिले के चारों विकासखंड में आयोजित करवाने की इच्छा जाहीर किया।

एपीसी बेमेतरा कमल नारायण शर्मा, शिक्षिका श्रीमती गंगा एवं अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन सदस्य साकेत बिहारी से चर्चा करते हुए


Thursday, 26 May 2022

तीन दिवसीय ग्रीष्मकालीन कार्यशाला में शिक्षण सहायक सामग्री बनाने व उससे पढ़ाने के तरीके बताए गए

 बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का वातावरण बनाने के लिए बेमेतरा विकासखंड के शिक्षकों के लिए भाषा (हिंदी, अंग्रेजी) एवं गणित विषय से संबंधित तीन दिवसीय टीएलएम (शिक्षण सहायक सामग्री) निर्माण कार्यशाला दिनांक 19 से 21 मई 2022 तक अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा के टीएलसी (शिक्षक अधिगम केंद्र) में आयोजित की गई। निर्माण के साथ-साथ इन शिक्षण सहायक सामग्री के कक्षा शिक्षण में उपयोग पर विस्तृत चर्चा की गई। 

          इस कार्यशाला में भाषा (हिंदी तथा अंग्रेजी) शिक्षण में सहायक टीएलएम मात्रा चक्र, चकरी घुमाओ वाक्य बनाओ, शब्दचकरी, वर्ड बिल्डिंग फ्लिप, ऑनसेट एवं राइम कार्ड, वर्ड पजल, राइम्स चार्ट आदि के साथ-साथ गणित शिक्षण में सहायक टीएलएम – जिगसॉ संख्या कार्ड, एक अंकीय संख्या समझ और स्थानीयमान को लेकर गतिविधि कार्ड, पॉकेट बोर्ड, भिन्न को लेकर गतिविधि कार्ड, जोड़ने और घटाने को लेकर टीएलएम का निर्माण किया गया।

          शासकीय शाला के शिक्षकों के लिए आयोजित इस स्वेच्छिक कार्यशाला में बेमेतरा विकासखंड से कुल 13 शिक्षक राजेशवरी साहू (प्राथमिक शाला, जेवरा) सरिता साहू (माध्यमिक शाला, ढारा) भावना टंडन (प्राथमिक शाला, जोंग), जगन्नाथ ध्रुव( प्राथमिक शाला, खुरमुड़ी) रवि शंकर सोनी (माध्यमिक शाला, धनगांव) अब्दुल इमरान खान (प्राथमिक शाला, गांगपुर) अनीश दास मानिकपुरी (प्राथमिक शाला, सिंघनपुरी), रंजीता वर्मा (प्राथमिक शाला, तिवरैया), राजू शर्मा (प्राथमिक शाला, सिरवाबाँधा), ब्रजेश कुमार शर्मा (प्राथमिक शाला, भोइनाभाठा) मनोज पाटिल (प्राथमिक शाला, गांगपुर) अशोक वर्मा (प्राथमिक शाला, गांगपुर) नीलिमा साहू (प्राथमिक शाला, बावामोहतरा) सम्मिलित हुए।

          इस दौरान विकासखंड स्त्रोत समन्वयक, बेमेतरा, एपीसी, बेमेतरा का भी सहयोग प्राप्त हुआ। टीएलसी में सफल आयोजन के पश्चात अब इस टीएलएम निर्माण कार्यशाला को बीआरसी कार्यालय के सहयोग से विकासखंड स्तर के साथ-साथ संकुल स्तर पर भी संबंधित संकुल समन्वयक एवं शिक्षक साथियों की इच्छा से आयोजित करने की योजना है। अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा के सदस्य इसके आयोजन में सहयोग कर रहे होंगे।



ईंट-भट्ठे श्रमिकों के बच्चे रोचक गतिविधियों द्वारा पढ़ना-लिखना सीख रहे।

अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा के सदस्यों द्वारा बेमेतरा नगरपालिका क्षेत्र अंतर्गत गुनरबोड़ गाँव के ईंट-भट्ठा पर कार्य करने वाले श्रमिकों के 25-30 बच्चों के लिए समर कैंपआयोजित किया जा रहा है। बेमेतरा जिले के अलग-अलग ग्राम से आजीविका कमाने के लिए प्रवास की मजबूरी के कारण इन श्रमिकों के बच्चे पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया से दूर हो जाते हैं। उन्हें अपने ग्राम स्थित शाला को छोड़कर जाना पड़ता है जिससे उनमें कक्षा अनुरूप वांछित कौशल विकसित नहीं हो पाते हैं। ऐसे में इन बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने व कोविड 19 महामारी के दौरान पढ़ने-लिखने संबंधी हुए नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से रोचक गतिविधियों द्वारा प्रयास किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में शासकीय प्राथमिक शाला, कोबिया के 4 शिक्षक साथी भी दिवसवार सहयोग कर रहे हैं।   

          अगले 7 दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में खेल व रोचक गतिविधियों जैसे चित्र पठन, चित्रकला, कहानी लेखन, हाव भाव द्वारा कविता पठन, नंबर गेम, नंबर जंप, गणित के पहेलियाँ, टोपी, मुखौटा निर्माण आदि के माध्यम से इन बच्चों में आत्मविश्वास जगाने, मौखिक भाषा विकास के साथ-साथ बुनियादी पढ़ने-लिखने एवं गणितीय कौशल विकसित करने पर कार्य करने की योजना है।

          अभी तक तीन दिनों का कार्य हुआ है। योजना अनुरूप कार्य करते हुए पहले दिन बच्चों से घुलने-मिलने के उद्देश्य से दो तरह की बहुत ही आनंददायी गतिविधि नंबर गेमऔर नंबर जंपकारवाई गई। 
'नंबर जंप' गतिविधि द्वारा संख्या पहचान, संख्यांक, एक अंक के जोड़ सीखने पर कार्य  

दोनों ही गतिविधि बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास, मौखिक भाषा विकास, संख्या नाम एवं उसके निर्धारित संकेत को समझने, गणित के एक अंक के जोड़-घटाव संक्रिया सीखने से संबंधित थे। दूसरे दिन बालगीत - एक बुढ़िया ने बोया दानाको हाव-भाव के साथ गाते हुए बच्चे इसके एक-एक शब्दों पर काफी विस्तृत बात करते हुए लोटपोट हो गए। तीसरे दिन बच्चों की ही फरमाइश पर नंबर जंपफिर से खेला गया। इस दौरान उन्हें दो अंकों वाली संख्या पहचान और जोड़ पर कार्य किया गया। एक अन्य गतिविधि डंडे का खेलने उनको खूब गुदगुदाया। 


Monday, 9 May 2022

Action Words Game

बच्चों की हिंदी या अंग्रेजी भाषा शब्दावली को समृद्ध कराने के लिए सुविधादाता इस गतिविधि को करा सकते हैं। इसे आप कक्षा में या कक्षा के बाहर खुले मैदान में करा सकते हैं। इस गतिविधि के माध्यम से बच्चे न केवल खेल-खेल में पूरा आनंद लेते हुए नए-नए शब्द अनुभव के साथ सीख रहे होंगे, बल्कि उनका शारीरिक विकास भी हो रहा होगा।

प्रक्रिया

बच्चों को कक्षा में या खुले मैदान में एक दूसरे का हाथ पकड़ते हुए एक बड़ा सा गोला (Circle) बनाकर खड़े होने को कहें। जेंडर गैप को पाटते हुए एक लड़का एक लड़की को खड़ा करें तो और भी बेहतर होगा। इससे पूर्व कुछ एक्शन वर्ड शॉर्टलिस्ट कर लें जो बच्चों के कक्षा स्तर के अनुरूप हो। यदि आप प्राथमिक कक्षा के बच्चों के साथ इस गतिविधि को हिंदी भाषा शिक्षण के उद्देश्य से कर रहे हैं तो उदाहरणस्वरूप कुछ इस तरह के 'क्रिया' शब्द ले सकते हैं- उछलना/ कूदना, हंसना, रोना, सोना, खाना, पीना, गाना, नाचना, चिल्लाना, पढ़ना, लिखना आदि। अंग्रेजी भाषा के संदर्भ में इन्हीं शब्दों के अंग्रेजी शब्दावली लिए जा सकते हैं। जैसे – Jump, Laugh, Weep, sleep, eat, Drink, Sing, Dance, Cry, read, write etc. शब्दावली Shortlist करने के पश्चात बच्चों को गोले में खड़ा कर इस गतिविधि के नियम बता दें। नियम बहुत ही साधारण है। सुविधादाता की तरफ से कमांड मिलते ही बच्चे उस शब्द को समझते हुए उस शब्द के मायने को एक्शन/हाव-भाव के साथ बता रहे होंगे। जैसे laugh शब्द के command पर बच्चे हंसने की acting कर रहे होंगे। यदि वह शब्दावली बच्चे के संदर्भ से बाहर की है तो सुविधादाता उसे पहले बच्चों को बताएंगे।

कुछ जरूरी नियम

गतिविधि को रोचक बनाने के लिए उसमें दो नियम भी जोड़ें -

1.     शब्द के अनुरूप जिसका एक्शन मैच नहीं होगा वह खेल से बाहर हो जाएगा।

2.     एक्शन करने में जो देर करेंगे वह भी खेल से बाहर हो जाएंगे।

3.     खेल के अंतिम तक जो गलती नहीं करेंगे वह इस खेल के विजेता होंगे।