Tuesday, 23 May 2017

देश की एकता के लिए खतरा है धर्म-जाति के नाम पर सेना का गठन

राजतंत्र से लेकर लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में राज्य की सर्वप्रमुख ज़िम्मेदारी होती है अपने नागरिकों की सुरक्षा करना । काबिलाई शासन व्यवस्था से लेकर राजतंत्रात्मक व्यवस्था में जनपद या राज्य द्वारा कुछ मामूली कर के बदले अपने नागरिकों को सुरक्षा देने की शुरुआत हुई । आज गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में भी सुरक्षा के नाम पर हर वर्ष हम सरकार को कर या टैक्स देते हैं जिससे सरकार हमारे लिए शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था देने के साथ-साथ, पुलिस तथा सेना गठित कर हमें सुरक्षा प्रदान करती है । बावजूद इसके धर्म, जाति, समुदाय रक्षा के नाम पर पिछले 70 वर्षों से अलग-अलग सेना, दल का निर्माण लगातार होता रहा है । इन सेनाओं, दलों के अपने अलग-अलग स्वार्थ होते है । हैरत की बात तो यह है कि छोटे-छोटे बच्चों, किशोर-किशोरियों को टारगेट कर उन्हें इस सेना में शामिल किया जाता है । तत्पश्चात अपनी सभ्यता-संस्कृति की जानकारी देने से अधिक दूसरे धर्मों, दूसरे जातियों पर कीचड़ उछालने, उनकी बुराई करने, उनसे नफरत करने की सीख देने के साथ-साथ उनसे लड़ने के लिए अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है । जिस स्त्री को वे शिक्षा के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र चलाने की विधा सीखने से हजारों वर्षों तक दूर रखे थे, आजकल उन्हें सबसे सॉफ्ट टारगेट माना जाता है । इन किशोर-किशोरियों का ऐसा ब्रेनवॉश किया जाता है कि इनकी कोई स्वतंत्र सोच नहीं रह जाती । जो इन्हें बताया जाता है उससे इतर वे सोच नहीं पाते हैं । स्वार्थ के आगे मानवता भी इन्हें बौनी लगती है । जिस की पूर्ति हेतु ये इतने कट्टर हो जाते हैं कि पुलिस तंत्र भी इनके तांडव के सामने बेबस नज़र आती है । ऐसे में लोकतंत्र को बचाने हेतु सरकार का ये कर्तव्य होना चाहिए कि धर्म जाति के नाम पर उग आए समस्त अवांछित निजी सेनाओं, दलों को गैर कानूनी घोषित कर उनपर प्रतिबंध लगाकर नागरिक पुलिस को सुदृढ़, सुव्यवस्थित करे । सरकार द्वारा यदि इनके महत्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण करने हेतु कारगर कदम उठाया नहीं किया गया तो देश में गृहयुद्ध तो तय है ही । बल्कि इसका फायदा उन पड़ोसी मुल्कों को हो सकता है जो लगातार हमपर गिद्ध नज़र गड़ाए रहते हैं । इतिहास गवाह है गृहयुद्ध या अंतर्देशीय युद्ध के घातक परिणामों का । इसलिए ऐसे युद्धानुकूल परिस्थितियों को दूर करने में ही बुद्धिमानी होगी । अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पूरा देश गृह युद्ध की आग में झुलशता नज़र आएगा । 

(वुमेन एक्सप्रेस संपादकीय 25 मई 2017 में प्रकाशित) 




Tuesday, 16 May 2017

शहीद की गरीबी का मज़ाक उड़ाते नेता व नौकरशाह

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी कश्मीर के पुंछ sector में आतंकियों से लड़ते हुए शहादत को प्राप्त हुए फौजी प्रेम सागर जी के परिजनों से मिलने 12 मई को देवरिया गए । वह भी अपने मन से नहीं बल्कि शहीद के परिवारवालों की जिद्द थी कि जबतक मुख्यमंत्री नहीं आते वी अंतिम संस्कार नहीं करेंगे । अंततः मुख्यमंत्री द्वारा मिलने का आश्वासन मिलने के बाद शहीद का अंतिम संस्कार किया गया । मुख्यमंत्री के इस मुलाक़ात की सबसे अजीब बात ये थी कि यात्रा के दो दिन पूर्व ही स्थानीय प्रशासन ने संसाधन विहीन, बिना प्लास्टर, मिट्टी के खुरदरी फर्श वाली घर में रंगरोगन कर, सोफा, टेबल, कालीन बिछाकर, अलग से एसी लगाकर तैयार कर दिया । मुश्किल से आधे घंटे रुके होंगे मुख्यमंत्री जी । जाने के साथ ही तुरंत ये सभी सामान हटा ली गयी ।
            मेरे कहने का ये अर्थ नहीं कि सरकारी खर्चे से जुटाए गए इन सामानों को प्रशासन को शहीद के घर ही छोड़ देना चाहिए । वैसे यदि छोड़ भी दिया जाय तो इसमें कोई बुराई नहीं । कोई अनर्थ नहीं हो जाता । लेकिन अफसोस इस बात की है कि ऐसा कर इन्होनें शहीद प्रेम सागर जी के साथ-साथ उनके परिवार की गरीबी का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । आखिर एक मुख्यमंत्री को एक शहीद के बिना plaster बिना रंगरोगन के मिट्टी के फर्श वाले घर में बिना कालीन बिछाए, बिना AC के मिलने में उनके कपड़े में कितना मिट्टी लग जाता, कितना पसीना आ जाता ? आखिर क्या जरूरत थी इस दिखावे की ? वह भी सादगी की मिशाल दिये जानेवाले, सांसारिक सुखों को त्यागे एक योगी को !!!
            थोड़ी देर के लिए यदि यह भी मान लिया जाय कि यह व्यवस्था संबन्धित क्षेत्र के नौकरशाहों ने किया... मुख्यमंत्री को तो शहीद के परिवार के आर्थिक स्थिति के जानकारी भी नहीं होगी । इस बात तो इसके लिए भी जिम्मेदार एक नेता ही होता है । वह नेता या उसके चेले अपनी शान में कोई कमी नहीं होने देने के लिए नौकरशाहों को जैसे आदेश देते हैं । अधिकारी उस अनुसार मजबूर होकर काम करते हैं । नहीं तो transfer, demotion झेलने के लिए तैयार ही रहे । वीआईपी culture की तरह गरीबी का मज़ाक उड़ानेवाले ऐसे कार्यों पर भी आवाज़ उठाने, रोक लगाने की आवश्यकता है ।

Monday, 15 May 2017

संभावना - सृजनशील चेतना की वाहक


पत्रिका का नाम - संभावना 
संपादक - रामवचन यादव 
हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय 
वाराणसी से प्रकाशित 









परामर्श मंडल 

आभ्यंतर - लोक, भाषा, विश्व साहित्य और समकालीन वैचारिकी को मंच



पत्रिका का नाम - आभ्यंतर 
ISSN - 2348-7771 
संपादक - कुमार विश्वमंगल पांडेय 
दिल्ली से प्रकाशित 








परामर्श मंडल 


पदचिन्ह मासिक - जनवरी 2014 : वर्ष 4 : अंक 1



पत्रिका का नाम - पदचिन्ह 
ISSN - 2231-1351 
मासिक पत्रिका 
संपादक - अजय परमार 
वाराणसी से प्रकाशित 







दस्तावेज़ 146 / जनवरी-मार्च /2015


पत्रिका का नाम - दस्तावेज़ 146
साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका 
संपादक - विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी 
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के सहयोग से प्रकाशित  

Friday, 12 May 2017

नीचता की हद पार करते स्वामी ओम

बिग बॉस contestant रहे स्वामी ओम बड़ा सा ॐ की माला पहनकर एक विदेशी महिला के साथ कई अश्लील विडियो शूट कराकर खुद facebook, tweeter सहित अन्य सोसल मीडिया पर viral कराकर नीचता की सारी हद पार कर रहे हैं । खुद को Astrology से Ph.D कहने वाले इस बाबा का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है । इसका प्रमाण बिग बॉस शो के दौरान दे ही चुके हैं । न अपने इज्जत-सम्मान की कोई परवाह है इन्हें न महिलाओं की । ऐसे मानसिक रोगियों को बीच चौराहे पर खड़ा कर सड़े बदबूदार अंडे, टमाटर, जूते, चप्पल, सैंडल से treatment किया जाना चाहिए । लगातार viral हो रहा यह विडियो हिंदू धर्म पर कीचड़ उछालने वालों को सुनहरा मौका दे रहा है । आशाराम ने पहले ही अपने कुकर्मों से हिंदू धर्म की इज्जत को धूमिल कर चुके हैं । अब ऐसा कर आखिर ये मूर्ख, ढोंगी साबित क्या करना चाहता है ? समझ से परे है । इसे यथाशीघ्र पागलखाने में भर्ती कर electric shock देने की जरूरत है । शायद बिग बॉस से निकाले जाने का frustration झेल नहीं पा रहा है यह मूर्ख ।  
आप सभी से अपील है कि इस video को share न कर यथाशीघ्र इसे दफन करने में मदद करें ।