Monday, 19 August 2019

प्राचीन काल में हमारे देश में समय गणना कैसे की जाती थी ? (Time Measurement in Ancient India)

वर्तमान समय में मंदिरों में प्रयुक्त की जाने वाली घंटी कभी (मध्यकाल में) समय बताने के लिए प्रयुक्त किया जाता था। आर्यभट्ट लिखित ग्रंथ से पता चलता है कि प्राचीन काल (मौर्य काल) में प्रत्येक घड़ी/पहर की गणना एक जलघड़ी से की जाती थी। (जो वर्तमान के रेत घड़ी की तर्ज़ पर काम करता था।) प्रत्येक पहर की जानकारी उतनी संख्या में ढोल या शंख बजाकर दी जाती थी। मध्यकाल में शंख व ढोल का स्थान घंटे ने ले लिया। फिरोजशाह तुगलक के काल से समय की जानकारी घंटा बजाकर दी जाने लगी। मुगल बादशाह बाबर की आत्मकथा से पता चलता है कि उसके आगमन काल में समय/घड़ी/पहर बताने वाले इस यंत्र को घड़ियाल नाम से संबोधित किया जाता था तथा इसे बजाने के लिए नियुक्त अधिकारी को घड़ियाली नाम से जाना जाता था। 

संदर्भ ग्रंथ


  • Sharma S R (1994) : Indian Astronomical and time measuring instruments : A Catalogue in Preparation, Indian Journal of History of Science 29(4)

Sunday, 11 August 2019

प्राचीन संस्कृत साहित्य में वर्णित 64 कलाएं (64 Art Forms mentioned in Ancient Sanskrit Texts)


प्राचीन संस्कृत ग्रंथ शुक्र नीति में 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है। यह 64 कलाएं हैं –
1.     गीत
2.     वाद्य
3.     नृत्य
4.     आलेख्य
5.     विशेषकच्छेद्य (मस्तक पर तिलक लगाने के लिए कागज पत्ती आदि काटकर आकार या सांचा बनाना
6.      तंडूलकुसुमवलिविकार (देव पूजन आदि के अवसर पर तरह-तरह के रंगे हुए चावल, जौ आदि वस्तुओं को तथा रंग बिरंगी फूलों को विविध प्रकार से सजाना),
7.     पुष्पास्तरण
8.     दसनवसनांगराग (दांत, वस्त्र, शरीर के अवयवों को रंगना)
9.     मणिभूमिका कर्म (घर के फर्श के कुछ भागों को मोती, मणि आदि रत्नों से जड़ना)
10.                        शयनरचन (पलंग लगाना)
11.                        उदकवाद्य (जलतरंग)
12.                        उदकाघात (दूसरों पर हाथों या पिचकारी से जल की चोट मारना)
13.                        चित्राश्व योगा (जड़ी बूटियों के योग से विविध चीजें ऐसे तैयार करना या ऐसी औषधि तैयार करना अथवा ऐसे मंत्रों का प्रयोग करना जिनसे शत्रु निर्बल हो यह उसकी हानि हो)
14.                        माल्यग्रथनविकल्प (माला गूथना)
15.                        शेखरकापीड़ योजन (स्त्रियों की चोटी पर पहनने के विविध अलंकारों के रूप में पुष्पों को गूथना)
16.                        नेपथ्यप्रयोग (शरीर को वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि से सुसज्जित करना)
17.                        कर्णपत्रभंग (शंख, हाथी दांत आदि के अनेक तरह के कान के आभूषण बनाना)
18.                        गंधयुक्ति (सुगंधित धूप बनाना)
19.                        भूषणयोजन
20.                        इंद्रजाल (जादू के खेल)
21.                        कौचुमार योग (बल या वीर्य बढ़ाने वाली औषधियां बनाना)
22.                        हस्तलाघव (हाथों के काम करने में फुर्ती और सफाई)
23.                        विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकार क्रिया (तरह-तरह के शाक, कढ़ी, रस, मिठाई आदि बनाने की क्रिया)
24.                        पानकरसरागासव योजन (विविध प्रकार के शरबत, आसव आदि बनाना)
25.                        सूचीवानकर्म (सुई का काम, जैसे - सीना, रफ्फू करना, कसीदा काढ़ना, मौजे, गंजी का बुनना)
26.                        सूत्रकीड़ा (धागे या डोरियों से खेलना, जैसे कठपुतली का खेल)
27.                        वीणाडमरुकवाद्य
28.                        प्रहेलिका (पहेलियां जानना)
29.                        प्रतिमाला (श्लोक आदि कविता पढ़ने की मनोरंजक रीति, अंताक्षरी)
30.                        दुर्वाचक योग (ऐसे श्लोक आदि पढ़ना जिनका अर्थ तथा उच्चारण दोनों कठिन हो)
31.                        पुस्तक वाचन
32.                        नाटकाख्यायिका दर्शन
33.                        काव्यसमस्या-पूरण
34.                        पट्टिकावेत्रवानविकल्प (पीढ़ा, आसन, कुर्सी, पलंग, मोढ़ा आदि चीजें बेंत वगैरे वस्तुओं से बनाना)
35.                        तक्षकर्म (लकड़ी, धातु आदि वस्तुओं को अभीष्ट विभिन्न आकारों में काटना)
36.                        तक्षण (बढ़ई का काम)
37.                        वास्तु विद्या
38.                        रूप्य रत्न परीक्षा (सिक्के, रत्न आदि को परीक्षित करना)
39.                        धातुवाद (पीतल आदि धातुओं को मिलाना, शुद्ध करना आदि)
40.                        मणिरागाकर ज्ञान (मणि आदि का रंगना, खान आदि के विषय का ज्ञान)
41.                        वृक्षायुर्वेदयोग
42.                        मेषकुक्कुटलावकयुद्ध विधि (मेंढ़े, मुर्गे, तीतर आदि को लड़ाना)
43.                        शुक सारिकाप्रलापन (तोते मैना आदि को बोली सिखाना)
44.                        उत्सादनसंवहन- केशमर्दन- कौशल (हाथ पैरों से शरीर दाबना, केशो का मिलना, उनका मैल दूर करना)
45.                        अक्षरमुष्टिका कथन (अक्षरों को ऐसी युक्ति से कहना कि उस संकेत का जानने वाला ही उनका अर्थ समझे, दूसरा नहीं)
46.                        म्लेच्छितविकल्प (ऐसे संकेत से लिखना जिसे उस संकेत को जानने वाला ही समझे)
47.                        देश भाषा विज्ञान
48.                        पुष्पशकटीका
49.                        निमित्तज्ञान (शकुन जानना)
50.                        यंत्रमातृका (विविध प्रकार के मशीन, कल-पुर्जे आदि बनाना)
51.                        धारणमातृका (सुनी हुई बातों का स्मरण रखना)
52.                        संपाद्य
53.                        मानसी काव्य क्रिया (किसी श्लोक में छोड़े हुए पद को मन से पूरा करना)
54.                        अभिधान कोष
55.                        छंदोंज्ञान
56.                        क्रियाकल्प (काव्यालंकारों का ज्ञान)
57.                        छलितक योग (रूप और बोली छिपाना)
58.                        वस्त्रगोपन (शरीर के अंगों को छोटे या बड़े वस्त्रों से यथा योग्य ढकना)
59.                        द्युतविशेष
60.                        आकर्षक्रीड़ा (पासों से खेलना)
61.                        बालकृड़नक
62.                        वैनयिकी विद्या (अपने और पराए से विनय पूर्वक शिष्टाचार करना)
63.                        वैजयिकीविद्या (विजय प्राप्त करने की विद्या अर्थात शस्त्र विद्या) तथा
64.                        व्यायाम विद्या।




संदर्भ ग्रंथ – 
उपाध्याय, आचार्य बलवीर (1953) : आर्य संस्कृति, शारदा मंदिर प्रकाशन, बनारस, पृष्ठ सं. 115-117

Tuesday, 6 August 2019

खुशी की आड़ में स्त्रियों की इज्जत पर हमले क्यों?


जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेश बनने की खुशी में एक गोबर्बुद्धि चहक चहक कर बोल रहा था
"अब तो कश्मीर में अपना भी ससुराल होगा।"
मैंने पूछा - "क्या बात कर रहे हो? यानि अब कश्मीरी युवक तुम्हारे बहनोई बन सकेंगे"???
ऐसे मुझे घूर कर देखा कि क्या बताऊँ ...
गाली देना तो चाहा लेकिन कुछ बोला नहीं पाया, क्योंकि उसकी अक्ल ठिकाने आ चुकी थी।
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दरअसल उमंग का ठिकाना नहीं होता जब हम किसी को जबरन अपना शत्रु मान उसकी बहु/बेटियों की इज्जत को इज्जत नहीं बल्कि हलवा समझ लेते हैं। लेकिन जब बात खुद के बहु, बेटी की आती है तो खून खौल उठता है। दूसरे की बहु, बेटियों को मौज की चीज समझनेवालों कभी खुद को उस बहु/बेटी के भाई, पिता की जगह रख कर देखिये औकात पता चल जाएगा।
जिस स्त्री की इज्जत को आप, हम और हमारा समाज अपने इज्जत के साथ जोड़कर देखता है उसकी इज्जत कीजिये। कुछ भी बोलने से पहले थोड़ा दिमाग लगाया कीजिये कि आप क्या बोल रहे हैं? जश्न में अपनी खुशी का इजहार कीजिये किसी की इज्जत मत उछालिए।

Monday, 17 June 2019

हिंदू धर्म में भी है शौच से शुद्धि के कड़े विधान

शौच को सामान्यतः विश्व के सभी धर्मों में व्यक्ति को कुछ क्षणों के लिए अपवित्र करने का कारक माना गया है। कुछ धर्म संप्रदाय इसे प्रतिदिन की लगातार कुछ समय अंतराल पर चलने के क्रिया मानते हुए इससे शुद्ध होने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं बनाया बल्कि समान्यतः पानी और मिट्टी का प्रयोग कर हाथ धोकर या स्नान कर किसी धार्मिक कार्य के लिए पुनः शुद्ध हुआ जा सकता है। लेकिन कुछ ऐसे धर्म-संप्रदाय हैं जो शौच के बाद शुद्धता को लेकर काफी जटिल नियम रखते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम इस्लामिक धर्मावलंबियों को यदि देखें तो शौच अशुद्धता का काफी ख्याल रखते हुए उन्हें देखा जा सकता है। जैसे खड़े होकर पेशाब नहीं करना (ताकि पेशाब के छींटे पहने हुए कपड़े पर न पड़े)। पेशाब करने के बाद पानी या मिट्टी से हाथ, लिंग धोना। हालांकि कितनी मुस्लिम जनसंख्या इस नियम का पालन करती है? क्या अशराफ़ के साथ-साथ अजलाफ़ या पस्मान्दा मुस्लिमों के बीच यही नियम प्रचलित है या श्रेणी अनुसार कुछ कम ज्यादा है? यह शोध का विषय हो सकता है। 
          यहाँ मामला यह है कि इस्लामिक धर्मावलंबियों के शौच संबंधी इन कड़े नियमों को मानने की परंपरा पर हम (हिंदू सहित अन्य धर्मावलंबी) अप्रत्यक्ष रूप से कितना हंसते हैं? हिंदुत्व के अज्ञानी मूढ़ ठेकेदारों को अक्सर इस बात के लिए मज़ाक बनाते देखा जा सकता है। जाहिल से लेकर और क्या-क्या नहीं बोलते। (ऐसा समझना एक मानवीय प्रक्रिया है जो स्वाभाविक है। हो सकता है मुस्लिम धर्मावलंबियों को किसी हिंदू परंपरा पर भी हंसी आती होगी)
          जबकि इसके समान ही या कहें कि इससे भी कठोर शौच विधि हमारे हिंदू धर्म में भी है। लेकिन कितनों को पता है? पौराणिक ग्रन्थों में इन कठोर नियमों का उल्लेख मिलता है। अग्नि पुराण के अध्याय 156, श्लोक संख्या 14 के अनुसार एक गृहस्थ को शौच के बाद 5 बार अपने गुदा में, 10 बार बाएं हाथ मेंफिर 7 बार दोनों हाथ मेंएक बार लिंग मेंतथा पुनः दो तीन बार हाथों में मिट्टी लगा कर धोना चाहिए। ब्रह्मचारीवानप्रस्थी सन्यासियों के लिए यह शौच का विधान सीधे 4 गुना रखा गया है। 
            दोनों धर्मावलम्बियों के शौच नियमों में अंतर बस इतना है कि उन्हें कुरान या अन्यत्र वर्णित इन सभी विधि विधान को देखने पढ़ने का मौका मिलाइसलिए उनके बीच यह रिवाज आज भी प्रचलन में है। इसके विपरीत शायद ही कुछ हिंदू धर्मावलंबी लोग होंगे जो अग्नि पुराण पढ़ा होअधिकांश तो इनके नाम से भी वाकिफ नहीं होंगे। कुछ हिंदू धर्म गुरुओं को भी शायद शौच संबंधी ये नियम पता हों तो भी वे इसका पालन नहीं कर पाते होंगे। यदि पढ़े होते तो यकीनन उनके इस रिवाज का मज़ाक बनाने की हिम्मत नहीं कर पाते।
          खैर जहां तक मैं मानता हूँ आज के समय में कोई जरूरत नहीं इन ढकोसलों को मानने की। छोटे वाले शौच के बाद पानी, बड़े वाले शौच के बाद मिट्टी/राख़/डेटोल प्रयोग कीजिये और अपने काम में लगे रहिए।      

Sunday, 16 June 2019

क्या छठ पूजा गलत तिथि को मनाया जाता रहा है?


पौराणिक ग्रंथ अग्नि पुराण के 33वें अध्याय के अनुसार किसी मांग की द्वितीय तिथि लक्ष्मी की उपासना के लिए पवित्र दिन होता है। इसी प्रकार गौरी उपासना के लिए तृतीया, गणेश के लिए चतुर्थी, सरस्वती तथा नाग देवताओं के लिए पंचमी, स्वामी कार्तिकेय के लिए षष्ठी, सूर्य के लिए सप्तमी, मातृदेवियों के लिए अष्टमी, दुर्गा के लिए नवमी, नाग या यमराज के लिए दसमी, विष्णु के लिए एकादशी, श्रीहरि के लिए द्वादशी, कामदेव के लिए त्रयोदशी, शिव के लिए चतुर्दशी, ब्रह्मा की उपासना के लिए पूर्णिमा तथा अमावस्या पवित्र तिथि हैं।[i]

          इस आधार पर यदि बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में कार्तिक मास में षष्ठी व्रत या पूजा, जैसे सूर्य उपासना के 4 दिवसीय त्योहार के रूप में मनाया जाता है को देखें तो या तो ऐसा प्रतीत होता है कि षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाला यह त्योहार इस तिथि को मनाना गलत है, क्योंकि नियमानुसार सूर्य उपासना की तिथि सप्तमी है, जबकि षष्ठी तिथि का संबंध कार्तिकेय की उपासना से है।
           यदि इस त्यौहार को सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है तो इसे षष्ठी नहीं बल्कि सप्तमी तिथि को मनाया जाना चाहिए।


[i] अग्नि पुराण, अध्याय 33, श्लोक सं. 1-3 


Saturday, 11 May 2019

पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan)



सामान्य परिचय
पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) जिसे राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता है, मध्यकाल (12वीं शताब्दी) में दिल्ली तथा अजमेर क्षेत्र में शासन करने वाला अंतिम हिंदू राजा के रूप में जाना जाता है। उसके राज्य का विस्तार वर्तमान भारत के राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के कुछ भाग, हिमाचल प्रदेश तथा पंजाब तक था। पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1168 ई. में हुआ था। एक युद्ध में अपने पिता सोमेश्वर चौहान की मृत्यु के बाद 1179 ई. में वह अजमेर का राजा बना। राजा बनते ही उसने अपने पिता के हत्यारे भीमदेव सोलंकी, जो गुजरात क्षेत्र का शासक था, पर आक्रमण कर उसे मार डाला। उसकी बहादुरी से खुश होकर उसके नाना टापरा वंश के अनंगपाल तृतीय जो दिल्ली (तत्कालीन ढिल्लिका) के शासक थे, ने पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी बनाया क्योंकि उनके कोई पुत्र नहीं थे।  
व्यक्तिगत जीवन तथा राजा जयचंद से शत्रुता
कन्नौज के गहड़वाल राजपूत राजा जयचंद की पृथ्वीराज चौहान से दुश्मनी थी। ऐसा माना जाता है कि दोनों राजाओं के बीच या दुश्मनी किसी राज्य या क्षेत्र को लेकर नहीं, बल्कि लोकप्रियता को लेकर थी। तराइन के प्रथम युद्ध में विजय के बाद जिस तरह से पृथ्वीराज चौहान की जय जयकार हुई, जयचंद के मन में पृथ्वीराज चौहान के प्रति ईर्ष्या की भावना आ गई। यही कारण है कि जयचंद ने जब अपनी पुत्री संयोगिता/संयुक्ता के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था तो अलग-अलग राज्यों से सभी राजकुमारों को निमंत्रित किया, पृथ्वीराज चौहान को छोड़कर। पृथ्वीराज चौहान से उसकी इतनी दुश्मनी थी कि उसने उसे बेज्जत करने के लिए उसकी मूर्ति बनाकर स्वयंवर स्थल के बाहर चौकीदार के रूप में खड़ा कर दिया था। पृथ्वीराज रासो के अनुसार संयोगिता को पृथ्वीराज चौहान की बहादुरी पर मोहित होकर उसी से विवाह करने की इच्छा रखती थी। इसलिए संयोगिता ने सभी राजकुमारों को छोड़कर पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में माला डाल दी। तत्पश्चात मूर्ति के पीछे छिपे पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को उठाकर दिल्ली ले आया। पृथ्वीराज चौहान की कुल 11 पत्नियां थी। इनमें से संयोगिता सबसे छोटी थी। इन 11 पत्नियों से 21 संतानों के होने का उल्लेख मिलता है। इनमें से संयोगिता के पुत्र को छोड़कर बाकी दसों रानियों से 20 पुत्रियां थी। पृथ्वीराज चौहान के संतानों के नाम ज्ञात होते हैं – गोविन्दराज, अक्षय, रेंसी आदि।
मुहम्मद गौरी से संघर्ष  
          वर्तमान अफगानिस्तान स्थित गौर के शासक मुहम्मद (मुहम्मद गौरी) अपने राज्य का विस्तार करते हुए पृथ्वीराज चौहान के राज्य के बिलकुल नजदीक भटिंडा तक आ गया था। अपने राज्य के लिए संभावित खतरे को देखते हुए पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी पर आक्रमण कर दिया। 1191 ई. में तरायन नामक स्थान पर दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ जिसमें मुहम्मद गौरी पराजित हुआ। वह पृथ्वीराज चौहान द्वारा कैद कर लिया गया गया। चुकी पृथ्वीराज चौहान की छवि एक बहादुर लेकिन उदार राजा की थी। यही कारण है कि तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित मोहम्मद गौरी को उसने अपने दरबारियों के मना करने के बावजूद माफ कर छोड़ दिया। यह उदारता पृथ्वीराज चौहान के लिए घातक सिद्ध हुई। इसके 1 वर्ष के अंदर ही मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना का पुनर्गठन कर पृथ्वीराज चौहान के राज्य पर पुनः आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों के बीच यह लड़ाई पुनः 1192 ई. में तरायन के मैदान में हुई। धोखे के दम पर लड़े गए इस युद्ध में मुहम्मद गौरी विजयी हुआ तथा पृथ्वीराज चौहान को उसके दरबारी कवि चंदबरदाई के साथ सिरोही नामक स्थान पर युद्धबंदी बनाकर गौर ले जाया गया। ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान को जब गौरी के सामने लाया गया तो गुस्से से वह उसे लगातार घूरे जा रहा था। मुहम्मद गौरी द्वारा नज़रें नीचे करने के आदेश पर भी जब वह उसे घूरता रहा तो उसने पृथ्वीराज चौहान को अंधा करवा दिया। पृथ्वीराज चौहान तीरंदाजी का माहिर खिलाड़ी था। किसी व्यक्ति को बिना देखे उसके आवाज की दिशा भांपकर लक्ष्य भेद सकता था। चंदबरदाई ने बदला लेने के लिए उसके इस कौशल का प्रयोग किया। चंदबरदाई ने एक दोहे के माध्यम से पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी की स्थिति बताई। पृथ्वीराज ने तीर चलाया जो गौरी के गले में जाकर लगा। गौरी की तत्काल मृत्यु हो गई। यातनाओं से बचने के लिए पृथ्वीराज तथा चंदबरदाई ने एक दूसरे की हत्या कर दी।
          इस तरह दिल्ली के अंतिम हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु हो गई। इसके पश्चात अगले 700 वर्षों (1857 ई.) तक मुस्लिम शासन तथा 1947 तक ब्रिटिश सरकार के अधीन रहा। पृथ्वीराज चौहान की वीरता भरे जीवन को 2 पुस्तकों के माध्यम से जाना जा सकता है – चंदबरदाई लिखित पृथ्वीराज रासो तथा जयानक लिखित पृथ्वीराज विजय
पृथ्वीराज चौहान का दरबार
पृथ्वीराज चौहान का दरबार वीर सामंतों से भरा था। इनमें से नौ के नाम प्राप्त होते हैं- कन्ह, चामुंडराय, हरि सिंह, वीर सिंह, गुरुराम, सनकनी, कनक राय, राम राय, कैमास।[1] इनमें से तीन पृथ्वीराज चौहान के विशेष विश्वासपात्र थे- कन्ह, गुरुराम तथा कैमास। पृथ्वीराज की अनुपस्थिति में राज्य के शासन कार्य की जिम्मेदारी कैमास के कंधों पर ही होती थी।
पृथ्वीराज चौहान कालीन सामाजिक – धार्मिक स्थिति  
प्राचीन काल की तरह मध्यकालीन सामाजिक व्यवस्था भी वर्ण पर आधारित थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। इनके अतिरिक्त भी एक अन्य श्रेणी थी जिसे चांडाल, मलेच्छ, आदि उपनामों से जाना जाता था। चांडाल यहीं के मूल निवासियों को, जबकि मलेच्छ यवनों (तुर्की-फारस, शक-कुषाण लोगों) या विदेशी आक्रमणकारियों को कहा जाता था। अल्बेरूनी, इब्न बतूता, चंदबरदाई, कर्नल टाड, आदि विदेशी यात्रियों, इतिहासकारों के यात्रा वृतांत/लेखन में तत्कालीन सामाजिक स्थिति का वर्णन मिलता है। पृथ्वीराज चौहान कालीन सामाजिक – धार्मिक स्थिति को तेजपाल सिंह धामा की एक पुस्तक पृथ्वीराज चौहान एक पराजित विजेता से जानी जा सकती है। इसमें पृथ्वीराज चौहान के नाना दिल्ली के राजा अनंगपाल तथा फारस के एक शासक मोहम्मद कुतुबुद्दीन के ज्येष्ठ पुत्र कयामत खान (जो अनंगपाल के पास अपनी पत्नी शाह बानो व पुत्री शबाना के साथ शरणार्थी के रूप में आता है) के बीच एक बातचीत का वर्णन है। अनंगपाल जब कयामत खान से शुद्धिकरण कर मुसलमान से हिंदू बन जाने की बात करते हैं तो कयामत खान के जवाब में तत्कालीन सामाजिक स्थिति की झलक मिलती है। कयामत खान के अनुसार,
“क्षमा करें महाराज ! मैं परिवार समेत इस्लाम त्यागकर हिंदू धर्म अपना तो लूँगा लेकिन हिंदू बनने के बाद मेरी पुत्री से कोई भी हिंदू युवक उससे विवाह नहीं करेगा, बल्कि उसे मुसलमानी कहकर जीवनभर अपमानित किया जाएगा। हिंदुओं में जाति प्रथा एक सामाजिक बुराई का रूप ले चुकी है, जाति प्रथा के दुष्परिणाम हम स्वयं भुगत चुके हैं। जहां मैं पैदा हुआ उस देश का नाम फारस है। हमारे देश में 50 वर्ष पूर्व सभी हिंदू ही थे लेकिन शूद्र वर्ण के लोगों की संख्या अधिक थी, ब्राह्मण लोग उसे अछूत समझकर प्रताड़ित करते रहते थे। शूद्रों ने अपमान की अग्नि में जलते हुए इस्लाम कबूल कर लिया। ब्राह्मण लोग जाटों को अश्लील शब्दों से अपमानित करते थे इस कारण क्षत्रिय जाटों ने इस्लाम कबूलकर सारे ब्राह्मणों को मौत के घाट उतार दिया। हमें जाटवंशी होने पर गर्व है लेकिन कभी हमारे पूर्वज जातिप्रथा मानने वाले हिंदू थे। ऐसा विचारने पर हमें शर्म आती है। चमार, भंगी आदि तो हिंदू धर्म के अभिन्न अंग और रक्षक हैं, लेकिन उच्च वर्ण के हिंदू उनसे अत्यंत घृणा करते हैं। हम यवनों को तो हिंदू मलेच्छ कहकर पुकारते हैं और शूद्रों से भी निकृष्ट समझते हैं। इन सब बातों को देखते हुए हिंदू धर्म अपनाकर हमें क्या गौरव हासिल होगा?”[2]
उपरोक्त बातों से पता चलता है पृथ्वी राज चौहान के समकालीन समाज व्यवस्था जातिगत भेदभावपूर्ण थी। पश्चिमोत्तर सीमा प्रदेशों के जाट, भंगी, चमार आदि जातियाँ इससे बुरी तरह प्रताड़ित थी। इस क्षेत्र में इस्लाम धर्म के आगमन (जो सैद्धान्तिक रूप से भाईचारे के सिद्धान्त पर आधारित माना जाता है) से उन्हें एक सहारा मिला। इससे पता चलता है कि तत्कालीन तथाकथित हिंदुओं का इस्लाम धर्मांतरण जबरन नहीं बल्कि स्वेच्छिक था। जैसे पहले जाट जाति से संबंधित रहे कयामत खान के पूर्वजों ने हिंदू से इस्लाम धर्मांतरण किया।
          पृथ्वीराज चौहान कालीन धार्मिक व्यवस्था की यदि हम बात करें तो तत्कालीन समाज हिंदू धर्म प्रधान था। मोहम्मद गौरी के आगमन के साथ ही अनेक सूफी संतों का भी आगमन हुआ जिसने इस्लाम के प्रचार प्रसार में काफी योगदान दिया। तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ ही उसकी 11 पत्नियां मोहम्मद गौरी के कब्जे में आ गए, पृथ्वीराज चौहान के कट्टर समर्थकों का मानना है कि युद्ध में मिली पराजय के साथ ही उसकी रानियों ने जौहर कर लिया। जबकि पृथ्वीराज चौहान तथा तराइन के युद्ध पर अध्ययन करने वाले एक शोधार्थी करण वर्मा तत्कालीन लिखित ग्रंथ प्रबंध कोष के आधार पर कहते हैं कि पराजय के पश्चात मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान की सभी रानियों के साथ ना केवल बलात्कार किया बल्कि अनेक रानियों को तत्कालीन सूफी संत ख्वाजा गरीब नवाज़ की सेवा में भी लगाया। ख्वाजा गरीब नवाज़ ने पृथ्वीराज चौहान की सबसे सुंदर पत्नी मेनल से ना केवल विवाह किया बल्कि उसकी दो पुत्रियों को इस्लाम में दीक्षित करते हुए अपनी शिष्या के रूप में रखा। ख्वाजा गरीब नवाज मोहम्मद गौरी का सलाहकार था जो 1191 ईस्वी में ही गुप्तचर के रूप में अजमेर आ गया था। 

पृथ्वीराज चौहान संबंधी आम अवधारणाएँ  एवं वास्तविकता –
भारतीय इतिहास में पृथ्वीराज चौहान को एक ऐसे हिंदू राजा के रूप में याद किया जाता है जिसने विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों का विरोध किया। यही कारण है कि वर्तमान समय में सांप्रदायिक राजनीति करने वाले कट्टरपंथी हिंदुत्व विचारधारा के लोगों द्वारा पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप आदि के अपने राज्य की रक्षा हेतु उठाए गए कदम में नमक मिर्च लगा कर चटपटा बनाने, काफी बढ़ा चढ़ाकर पेश करने की परंपरा बन गई है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि एक ऐतिहासिक चरित्र धीरे-धीरे उस क्षेत्र, राज्य के लोगों द्वारा देवता समान बना दिया जाता है जिसकी आप बुराई तो दूर, समालोचना भी नहीं कर सकते। ऐसा पृथ्वीराज चौहान के साथ भी किया जा रहा है। यहां हम पृथ्वीराज चौहान के संबंध में स्थापित की जा रही आम अवधारणाओं की पड़ताल करेंगे।
आम अवधारणा -
1.   मध्यकालीन भारत में शासन करनेवाला अंतिम हिंदू राजा था। हिंदुओं व राजपूतों से वह काफी स्नेह रखता था।
वास्तविकता -
{गुजरात का राजा भीमदेव सोलंकी का धर्म हिंदू था, जाति राजपूत थी। पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर चौहान की जाति भी राजपूत थी, धर्म भी हिंदू था। बावजूद इसके पृथ्वीराज चौहान के पिता की हत्या भीमदेव सोलंकी ने कर दी थी। बदले की भावना में पृथ्वीराज चौहान (हिंदू तथा राजपूत) ने भीमदेव सोलंकी की हत्या कर दी।} राज्य विस्तार के क्रम में पृथ्वीराज चौहान ने अन्य चंदेल राजपूतों के राज्य खजुराहो व महोबा पर भी आक्रमण कर उसे लूट लिया। यह उदाहरण साबित करता है कि राज्य विस्तार में पृथ्वीराज चौहान पूर्व के राजाओं की तरह अपने निजी हितों, व्यक्तिगत स्वार्थ को देखता था, एक दूसरे के जाति, धर्म या संबंधी होने को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। यदि होता तो आपस में इतने तीक्ष्ण युद्ध नहीं होते। पृथ्वीराज चौहान द्वारा खजुराहो व महोबा की लूटपाट इस मिथक को तोड़ते हैं कि लूटपाट का काम केवल विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी शासक ही करते थे। तराइन के प्रथम युद्ध में मोहम्मद गौरी के खिलाफ पृथ्वीराज चौहान ने अपने पड़ोसी राज्य कन्नौज से सहायता मांगा। लेकिन न कन्नौज और न ही कोई अन्य राजपूत राजाओं ने पृथ्वीराज चौहान को मदद देना उचित नहीं समझा। इस आधार पर कहा जा सकता है कि पृथ्वीराज चौहान के बगल के पड़ोसी देशों से संबंध अच्छे नहीं थे।
आम अवधारणा
2.   एक दयालु शासक था जिसने तरायन के प्रथम युद्ध में पराजित मुहम्मद गौरी को माफ कर दिया।  
वास्तविकता
          लोगों की एक आम अवधारणा है कि पृथ्वीराज चौहान एक बहुत ही उदार राजा था जिसने तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित मोहम्मद गौरी को क्षमा कर दिया और उसे जाने दिया। इसके विपरीत पृथ्वीराज चौहान के दरबार का ही एक ऐसा उदाहरण है जो इस अवधारणा को झूठा साबित करता है। यह उदाहरण है उसके अत्यंत ही विश्वास पात्र सेनापति कैमास की हत्या का। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि पृथ्वीराज चौहान के अनुपस्थिति में कैमास पर राज्य के प्रशासन की जिम्मेदारी होती थी। पृथ्वीराज चौहान जब संयोगिता की यादों में खोए, इस विरह को भुलाने के लिए आखेट पर था तो राज्य प्रबंधन की जिम्मेदारी कैमास के पास था। इन्हीं दिनों करनाट देश की एक राज कुमारी जिसे वह कर्नाट देश से जीतकर लाया था तथा एक महल में दासी के रूप में रखा था, से उसे प्रेम हो गया। इस प्रेम प्रसंग की जानकारी जब पृथ्वीराज चौहान की बड़ी रानी द्वारा पृथ्वीराज चौहान को मिली तो बिना कुछ जाने, सोचे गुस्से में आकर अपने योग्य सामंत कैमास की हत्या कर दी। उसके दरबारी कवि चंदबरदाई ने भी पृथ्वीराज के इस कृत्य की निंदा करते हैं। इतनी छोटी सी बात पर बिना कुछ सोचे समझे अपने राज्य के एक योग्य सामंत की हत्या कर देना साबित करता है कि वह कोई उदार या दयालु राजा नहीं था। राज्य पर आक्रमण कर उस देश के संसाधनों को नष्ट करने वाले मोहम्मद गौरी को माफ कर देना, जबकि अपने सर्वाधिक योग्य सेनापति के छोटी सी गलती करने पर मौत के घाट उतार देना, ये एक दयालु राजा की पहचान नहीं कही जा सकती।

आम अवधारणा
3.   पृथ्वीराज चौहान अपने जीवन काल में मुहम्मद गौरी के अतिरिक्त कभी पराजित नहीं हुआ।
वास्तविकता
वास्तविकता यह है कि पृथ्वीराज चौहान एक महान वीर हिंदू राजा था जो अपने पराक्रम के बल पर अपने राज्य का विस्तार किया। लेकिन प्रत्येक युद्ध में वह विजित ही हुआ ऐसा नहीं है बल्कि 1182 ईस्वी में जब उसने गुजरात के चौलुक्यों पर आक्रमण किया तो चौलुक्य शासक भीमा द्वितीय द्वारा पराजय झेलना पड़ा।
4.   मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान को इस्लाम स्वीकार करवाने के लिए अनेक प्रकार से यातनाएं दी। इस्लाम स्वीकार नहीं करने पर उसे दीवार से बांधकर उसके सामने उसकी सबसे छोटी पत्नी संयोगिता के साथ लगातार बलात्कार किया गया, चौहान ने इस्लाम के साथ साथ उसके धार्मिक ग्रंथ कुरान पर थूक दिया। गुस्से में आकर मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान का कत्ल कर दिया।
वास्तविकता
ऐसे कथन कट्टरपंथियों द्वारा गढ़े जाते हैं मुसलमानों के प्रति नफरत भड़काने के लिए। वास्तविकता यह है कि सिरोही के पास पकड़े जाने के बाद उस के दरबारी कवि चंदबरदाई जो पृथ्वीराज चौहान का सामंत भी था, के साथ युद्ध बंदी के रूप में अपने राज्य गौर ले गया। शब्दभेदी बाण प्रकरण के दौरान मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज चौहान तथा चंदबरदाई ने आत्माओं से बचने के लिए एक दूसरे को मार डाला।

संदर्भ ग्रंथ
धामा तेजपाल सिंह (2006) : पृथ्वीराज चौहान : एक पराजित विजेता, हिंदी साहित्य सदन प्रकाशन
शर्मा, डॉ. श्रीनिवास : कयमास वध, परिचय एवं प्रतिपाद्य
हांडा, सुशील, पृथ्वीराज चौहान