Monday, 3 September 2018

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को 'अर्बन नक्सली' कहना कितना उचित?

जून 2018 में भीमा-कोरेगांव से जुड़े मामले में पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं सुधीर धवाले, महेश राऊत, सोमा सेन, रोमा विल्सन, मानवाधिकार अधिवक्ता सुरेन्द्र गाडलिंग को दिल्ली, मुंबई, नागपुर आदि विभिन्न स्थानों से गिरफ्तार किया था। इनसे संबंध होने के शक के आधार पर पुनः 29 अगस्त 2018 को पुणे पुलिस ने 5 अन्य सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ताओं कवि वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वेरनोन गोन्जाल्विस और अरुण परेरा को गिरफ्तार किया। हैरत की बात यह है कि भीमा-कोरेगांव में दलितों के शौर्य प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन करनेवाले लोगों की पहचान कर गिरफ्तार किया जा रहा है लेकिन इस कार्यक्रम पर हमले कर हिंसा फैलाने का आरोपी संभाजी भिड़े, मिलिंद एकबोटे आदि सत्ता संरक्षण का फायदा उठाते हुए खुलेआम घूम रहे हैं। मामले को संगीन बनाने के लिए इनके पास से प्रधानमंत्री की हत्या करनेसंबंधी एक पत्र भी बरामद होने की बात के आधार पर इस शौर्य प्रदर्शन को माओवादियों से जोड़ा जा रहा है। जबकि इन सभी कार्यकर्ताओं की पृष्ठभूमि यदि खंघालें तो सभी अत्यधिक पढ़े-लिखे, तार्किक-वैचारिक, मृदुल स्वभावी, समाज विज्ञानी, समानता के पोषक, मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो कभी भी नक्सली हिंसा का समर्थन करते हैं। बावजूद इसके सामाजिक न्याय का संदेश देने वाले इन कार्यकर्ताओं को सरकार वामपंथी रुझान रखने वाले मानती है। यदि ये सामाजिक न्याय की बात करते भी हैं तो ये संवैधानिक ही है। फिर सरकार को आखिर इनसे समस्या क्या है?
          इनकी गिरफ्तारी के बाद एक नया शब्द अर्बन नक्सलवादआजकल विमर्श का मुद्दा बना हुआ है। आखिर क्या है यह अर्बन नक्सलवाद’? सुरक्षा एजेंसियां इसे इस रूप में व्याख्यायित करती है कि यह माओवादियों की एक तरह की रणनीति है, जिसमें शहरों में नक्सल गतिविधि व नेतृत्व तलाशने हेतु मध्यवर्गीय कर्मचारियों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों व धार्मिक अल्पसंख्यकों को जोड़ते हुए उन्हें नक्सल बनने का प्रशिक्षण देने का काम किया जाता है। सरकार मानती है कि अर्बन नक्सलवादसंबंधी इस योजना की जानकारी उन्हें 2007 में बिहार के जमुई जिले में हुई नक्सलियों के नौवें कांग्रेस से प्राप्त दस्तावेजों के माध्यम से मिली। सरकार मानती है कि ये अर्बन नक्सली राज्य की शासन व्यवस्था को कमजोर करने का काम करती है, जंगलों में रहनेवाले नक्सलियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराती है। सरकार के खिलाफ माहौल बनाकर उन्हें भड़काती है।
          इस संबंध में मेरा मानना है कि 2007 में सुरक्षा एजेंसियों के हाथ लगे ये अर्बन नक्सलीसंबंधी दस्तावेज़ भी जून 2018 में गिरफ्तार अर्बन नक्सलियों के पास से प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले दस्तावेज़ की तरह ही फर्जी हो सकते हैं। इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सत्ता अपने विरोधियों के आवाज़ दबाने, उन्हें कुचलने के लिए माध्यम के रूप में प्रयुक्त करती रही है। यहाँ सवाल उठता है कि शोसितों के लिए आवाज़ उठाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को नक्सलवादियों के फ्रेम में डालना कितना उचित है? उत्तरस्वरूप कुछ बातों को समझना आवश्यक है-
          यह लड़ाई दो विचारधाराओं की है। जिसमें एक तरफ है कट्टर हिंदुवादी वर्ग जिन्हें सामाजिक समानता से कोई विशेष मतलब नहीं है तो दूसरी तरफ हैं सामाजिक न्याय व समानता की बात करने वाले तार्किक बुद्धिजीवी वर्ग। सत्ताधारी हिंदू विचारधारा वाले एक रणनीति के तहत उनके विचारों से मेल नहीं रखनेवालों को ऐसे ही किसी न किसी संगीन मामलों में फाँसती रही है। इस कारण मुस्लिम-ईसाई व वामपंथी विचारधारा वालों से इनकी झड़प हमेशा चलती रहती है। साथ ही सत्तानसीं होने का इन्हें पर्याप्त लाभ भी मिलता है। इसे इस उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है कि आज यदि कोई मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति किसी संदिग्ध गतिविधियों में हथियार के साथ गिरफ्तार होता है तो हिंदू धार्मिक-वैचारिक कट्टरता का लबादा ओढ़े मीडिया, लोग न्यायालय के फैसले के पूर्व ही उसके नाम के साथ आतंकी शब्द जोड़ सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय को आतंकी, देशद्रोही घोषित कर देते हैं। देश-समाज में उनके प्रति इतनी नफरत फैला देते हैं कि निर्दोषों में भी बाकी जनता को आतंकी नज़र आने लगता है। लेकिन ऐसे ही मामलों में गिरफ्तार हिंदू युवकों के लिए न आतंकी शब्द प्रयुक्त नहीं किया जाता न ही सम्पूर्ण हिंदू समुदाय को आतंकी घोषित कर दिया जाता है। चाहे वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करने में राजस्थान से गिरफ्तार हिंदू व्यवसायी हो, अमृतसर से गिरफ्तार रवि, बीजेपी आईटी सेल में काम करने वाला ध्रुव सक्सेना के साथ हो या हाल ही में महाराष्ट्र एटीएस द्वारा विस्फोटक सामग्रियों के साथ गिरफ्तार सनातन संस्था के 5 हिंदू युवक हों। ये सारे मामले एक से दो दिन में ज़मींदोज़ कर दिये जाते हैं। 
          इन कट्टर हिंदुवादी विचारधारा के लोगों को सबसे ज्यादा समस्या पढ़े-लिखे तार्किक लोगों से है। क्योंकि उनके समक्ष इनकी आस्था, अंधविश्वास ध्वस्त हो जाती है। निरुत्तरता की स्थिति में ये उनके प्रति हिंसात्मक हो जाते हैं, जिसका शिकार नरेंद्र दाभोलकर, एस. एम. कलिबुर्गी, गोविंद पनसारे, गौरी लंकेश आदि हुए। इन्हें समस्या ऐसे लोगों से भी है जो उनकी भेदभाव आधारित जाति व्यवस्था, प्रजातीय श्रेष्ठता की आलोचना कर दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के लिए सामाजिक न्याय की बात करते हैं। ऐसे बुद्धिजीवी लोगों को ये वामपंथी विचारधारा के फ्रेम में रखते हैं। आज कट्टर हिंदुवादी विचारधारा की पहुँच समाज, मीडिया से लेकर औद्योगिक घरानों तक है। सत्ताधारियों से मिलकर उनके विशेषाधिकारों का गलत प्रयोग कर इस विचारधारा के उद्योगपति, पूंजीपति मानवाधिकार हनन की परवाह किए अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। इन कृत्यों से आहात शोषित जनता को मजबूरन क्षेत्र के बुद्धिजीवियों से संपर्क कर न्यायालय के शरण में जाना मजबूरी हो जाती है। ऐसे में एक पढ़े-लिखे, स्वतंत्र सोच के व्यक्ति यदि अपने स्वाभाविक गुण के कारण शक्ति संपन्न वर्ग द्वारा सामाजिक या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति, समुदाय पर होने वाले अन्याय बर्दास्त नहीं कर पाता है। उनके व्यक्तित्व में मौजूद मानवीय मूल्य उन्हें कमजोर या शोषितों के पक्ष में खड़ा होने को मजबूर कर देता है।
          ऐसी स्थिति में यदि कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता उन दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, संसाधन विहीन जनता को कानूनी सलाह देने के साथ-साथ उन्हें अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक कराता है तो वह केवल अपने कर्तव्य का निर्वाहन करता है न कि उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काता है। न ही ये किसी हिंसात्मक कार्रवाई का सहारा लेने का निर्देश देते हैं। बावजूद इसके पूँजीपतियों, निजी कंपनियों द्वारा उन्हें विद्रोह भड़काने वाले एक शत्रु के रूप में देखा जाता है। परिणामस्वरूप पूँजीपतियों के इशारों पर इन्हें रास्ते से हटाने के लिए इनपर अर्बन नक्सलीका ठप्पा लगाकर सरकार द्वारा उन्हें नज़रबंद करवा दिया जाता है। न्यायप्रियता की यह भावना माक्र्स, लेनिन, माओत्से, गांधी, अम्बेडकर, फुले के विचारों को पढ़कर भी कोई भी जाति-धर्म से ऊपर उठकर शोषित दलित-आदिवासियों को न्याय दिलाने की भावना दिल में विकसित कर सकते हैं।
          पूँजीपतियों के साथ-साथ सत्तारूढ़ सरकार की आँखों में ये समाजसेवी चुभते हैं क्योंकि ये सत्ता के पीछे नहीं बल्कि उनके समानान्तर चलने, गलत नीतियों की आलोचना करने में विश्वास करते हैं। एक तरह ऐसा अतः सरकार को इन सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सलीकहना, उनपर हिंसा भड़काने का आरोप लगाना बेबुनियाद है। सरकार को चाहिए कि वह पूँजीपतियों नहीं बल्कि जनता के सेवार्थ काम करते हुए एक स्वस्थ लोकतंत्र स्थापित करे।             
(मूलतः नई दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक समाचार पत्र वीक ब्लास्ट’ 01-15 सितंबर 2018 अंक में प्रकाशित) 

    

Saturday, 25 August 2018

वर्धा (महाराष्ट्र) का ऐतिहासिक लक्ष्मी नारायण मंदिर जहां अस्पृश्यों को सबसे पहले मिला प्रवेश (Laxmi Narayan Temple Of Wardha (Maharashtra) where Untouchables firstly got Permission to Worship)

जमना लाल बजाज की नगरी वर्धा से गांधी जी के सेवाग्राम आश्रम जाने के मार्ग पर बस स्टैंड के नजदीक दुर्गा टॉकीज के सामने स्थित है ऐतिहासिक लक्ष्मी नारायण मंदिर। अपनी दादी सदीबाई की इच्छा पर प्रसिद्ध उद्योगपति जमनालाल बजाज जी ने 1905 ई. में इस मंदिर का निर्माण करवाया। 22 महीने की मेहनत के बाद 1907 में लक्ष्मी तथा विष्णु की प्रतिमा स्थापित होने के साथ ही इस मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। 113 वर्ष प्राचीन यह ऐतिहासिक मंदिर हमारे देश का पहला ऐसा मंदिर है जो आज के समय में अप्रासंगिक हिंदू सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने का गवाह बना। जमना लाल बजाज के प्रयास से 19 जुलाई 1928 ई. में इस मंदिर को अस्पृश्यों के लिए खोल दिया गया। विनोवा भावे के नेतृत्व में अस्पृश्यों के एक समूह ने मंदिर में प्रवेश कर पूजा किया।[1] वह भी ऐसे समय में जब डॉ. भीमराव अम्बेडकर नाशिक स्थित काला राम मंदिर में 2 मार्च 1930 को प्रवेश के लिए संघर्ष कर रहे थे। भारत छोड़ो आंदोलन शुरू करने के लिए मुंबई जाने से पूर्व गांधी जी भी यहाँ आए थे। गर्भगृह में स्थापित लक्ष्मी नारायण की मूर्ति कभी गहनों-आभूषणों से लदे होते थे। लेकिन 1944 ई. में ये आभूषण चोरी हो जाने के बाद गांधीजी की सलाह पर इन्हें आभूषण मुक्त कर दिया गया।[2] 
वर्तमान समय में यह मंदिर जमनालाल बजाज फ़ाउंडेशन द्वारा संचालित किया जाता है।




[1] http://www.jamnalalbajajfoundation.org/wardha/laxminarayan-mandir
[2] https://www.bhaskarhindi.com/news/wardhas-lakshmi-narayan-temple-know-history-7014




Sunday, 19 August 2018

केरल बाढ़ पीड़ितों के सहायतार्थ


कई दिनों से लगातार बारिश ने दक्षिण भारतीय राज्य केरल में जल प्रलय की स्थिति उत्पन्न कर दी। स्वतंत्रता दिवस, अटल बिहारी बाजपेयी के निधन से पूरे देश के साथ-साथ मेरा ध्यान भी इस जल प्रलय की ओर नहीं गया। आज दिनांक 19/08/2018 को मीडिया में जिस तरह की तस्वीरें दिखी उसे देखकर मैं विचलित हो गया। तुरंत विचार आया शारीरिक रूप से न सही, आर्थिक रूप से उनको मदद तो कर ही सकता हूँ। इसी दौरान एक न्यूज़ मिली की एक स्नातक छात्रा ने मछ्ली बेचकर अपनी पढ़ाई के लिए जमा किए रुपयों में से 1.5 लाख रुपए केरल के बाढ़ राहत कोष में दान दिये। इस घटना से inspire होकर मैंने भी तुरंत अपनी क्षमतानुसार 500 रुपए केरल के मुख्यमंत्री बाढ़ राहत कोष में paytm के माध्यम से transaction कर दिया
उनकी मदद कर काफी प्रसन्नता हुई क्योंकि यह मेरे लाइफ का पहला donation था। 


इसके 2 दिनों बाद ही विश्वविद्यालय के शोधार्थी मित्रों व 10 संस्थाओं के साथ सहयोग देते हुए वर्धा के पंजाब राव कॉलोनी, गजानन नगर, आर्वी नाका क्षेत्र, बजाज चौक, बस स्टैंड, सब्जी मंडी आदि स्थान पर घर-दुकान जाकर लगभग 82 हज़ार रुपए इकट्ठा कर केरल भेजा। 


वर्धा के लोगों के दरियादिली की जितनी तारीफ की जाय बहुत ही कम होगी। कहने में जरा भी संकोच नहीं कि ऐसा अभियान यदि हम अपने नॉर्थ इंडिया में चलाते तो इतनी आसानी से इतना अधिक फ़ंड इकट्ठा नहीं हो पाता। दिल से Salute वर्धा वासियों। 

Tuesday, 7 August 2018

घर की इज्जत


 किसी के घर की इज्जतबताकर हम बेटियों को
हमारी इज्जतखुद ही लूटते आए
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
रिश्तों का मर्मसमझाकर हमें
खुद ही रिश्तों को शर्मसार करते आए
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
चाल-चलन-सोच तुम्हारे गंदे रहे
फिर भी कुल्टा, बदचलन के आरोप
हमपर लगाते रहे
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
हमारी यौनिकता पर पहरे लगाकर भी
वेश्याओं के पास भटकते रहे
तुम, तुम्हारा ये समाज ।
तुम्हारे हर जुल्म, अन्याय बर्दास्त किए हमने
खुद को घर की इज्जतजानकर ।
बस
बहुत कष्ट दिये हमें
इस घर की इज्जतके मिथक ने
अब हमें इस मिथक को तोड़ना है,
और
जिस दिन हम इसे तोड़ने में सफल हो गए
तुम, तुम्हारे समाज के
मंत्री, संतरी, मठाधीश, धर्मरक्षक
कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे ।


 (मूलतः पाक्षिक समाचार पत्र 'वीक ब्लास्ट' 1-15 अगस्त 2018 में प्रकाशित)  



Tuesday, 3 July 2018

हिंदी/हिंदी पत्रकारिता के विकास में सरस्वती पत्रिका का योगदान

एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी भी भाषा को समृद्ध करने में उस भाषा की साहित्यिक विधाएँ अर्थात उस भाषा में लिखित कविता, कहानी, निबंध, यात्रा संस्मरण आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्राचीन काल से लेकर बीसवीं सदी तक इन विधाओं ने संस्कृत, फारसी भाषी साहित्य को समृद्ध करने का कार्य किया। पत्रकारिता क्षेत्र के दिनों दिन बढ़ती लोकप्रियता, या यूं कहें कि दिन-प्रतिदिन की खबरों को अपनी भाषा में जानने की लोगों की उत्सुकता ने अनेक क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध करने का कार्य किया। हिंदी को भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक लाने में पत्रकारिता व उसके प्रमुख स्तंभों की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ब्रिटिश काल से शुरू हुई पत्रकारिता के साथ-साथ हिंदी भाषा को राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में 'सरस्वती पत्रिका' का विशेष योगदान रहा है। सरस्वती पत्रिका के योगदान पर नज़र डालने से पूर्व एक संक्षिप्त नज़र औपनिवेशिक काल में पत्रकारिता एवं हिंदी पत्रकारिता के उद्भव, विकास व स्थिति पर डालना आवश्यक है ताकि इसके योगदान का थोड़ा तुलनात्मक अध्ययन भी किया जा सके।

पत्रकारिता का एक संक्षिप्त इतिहास

          वैश्विक जगत में पत्रकारिता की शुरुआत 131 ई. पूर्व रोम से मानी जाती है। वैश्विक जगत में पत्रकारिता की शुरुआत 131 ई. पूर्व रोम से मानी जाती है। इस दैनिक समाचार पत्र का नाम था - Acta Dieurna. इसका हिंदी अर्थ है - दिन की घटनाएं। वास्तव में यह पत्थर या धातु की पट्टी होता था जिस पर प्रतिदिन के समाचार अंकित किए जाते थे। ये पट्टियाँ रोम के प्रमुख स्थानों पर रखी जाती थी, इनमें वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णय, लड़ाइयों के निर्णय मुख्यतः अंकित किए जाते थे।[i] मध्यकाल में भी यूरोप के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में पत्रकारिता उद्देश्यों की पूर्ति के लिए 'सूचना पत्र' निकाले जाने का उल्लेख मिलता है। सूचना पत्र में कारोबार, क्रय-विक्रय, मुद्रा के उतार-चढ़ाव संबंधी सूचनाएं हाथ से लिखे जाते थे।

          इसी क्रम में 16 वीं शताब्दी के अंत में यूरोप के शहर स्ट्रॉसबर्ग के एक व्यापारी ने धनवान ग्राहकों के लिए सूचना पत्र हाथ से लिखवा कर प्रकाशित करने का काम शुरू किया। चूंकि हाथ से लिखने का काम काफी महंगा और धीमा होता था, ऐसे में 1605 ईसवी में उसने छापे की मशीन खरीद कर (इसका आविष्कार 15 वीं शताब्दी के मध्य में योहन गुटनबर्ग द्वारा किया जा चुका था) समाचार पत्र छापने लगा। इस समाचार पत्र का उसने नाम दिया - रिलेशन। इसे विश्व का सबसे पहला मुद्रित अखबार माना जाता है। इस छापे की मशीन के अविष्कार ने पत्रकारिता को मोड़ देने का कार्य किया। भारत में भी इसका प्रभाव दिखा। भारत का पहला अखबार 1776 ईस्वी में प्रकाशित हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी का भूतपूर्व अधिकारी विलियम बोल्ट के पास इसके प्रकाशन का जिम्मा था। ईस्ट इंडिया कंपनी एवं सरकार से संबंधित समाचार को यह समाचार पत्र प्रसारित करता था। जेम्स ऑगस्टस हिक्की के समय से पत्रकारिता का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। जेम्स हिकी के काल से समाचार पत्र में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का समावेश देखने को मिलता है। इससे पूर्व यह सरकार की गतिविधियों की सूचना देने भर तक सीमित था। या यों कहें कि सत्तारूढ़ सरकार के मुखपत्र होते थे।

          ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी गेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 ईस्वी में 'बंगाल गजट' नाम से अखबार प्रकाशन शुरू किया। इसके प्रकाशन के साथ ही भारत में पत्रकारिता की शुरुआत होती है।

हिंदी पत्रकारिता का संक्षिप्त इतिहास  

हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 30 मई 1826 ई. से होती है जब युगल किशोर शुक्ल, जो हिंदी भाषी क्षेत्र कानपुर के रहने वाले थे और वकालत करने कलकत्ता (वर्त-;मान कोलकाता) में रहते थे, के सम्पादन में कोलकाता से हिंदी का प्रथम समाचार-पत्र उदन्त मार्तंड का प्रकाशन शुरू हुआ।[ii] यह एक साप्ताहिक अखबार था जिसमें विभिन्न नगरों की सरकारी गतिविधियों के साथ-साथ वैज्ञानिक खोजों से संबंधित समाचार प्रकाशित होते थे। चूंकि यह एक गैर हिंदी प्रदेश से प्रकाशित होता था, जहां इसके पाठक कम संख्या में होते थे। अधिकांश पाठक हिंदी भाषी क्षेत्र के होते थे। उन तक भेजने के लिए डाक संचार एक प्रमुख साधन था, जो काफी खर्चीला था। तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार से डाक खर्च में मदद नहीं मिलने के कारण आर्थिक आभाव में डेढ़ वर्ष के दौरान कुल 79 अंक निकलने के पश्चात 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया।[iii] इसी समाचार पत्र प्रकाशन के लिए प्रत्येक वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उदन्त मार्तंड के पश्चात अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ जैसे बंगदूत, बनारस अखबार, सुधाकर, बुद्धि प्रकाश, समाचार सुधावर्षण, पयामे आजादी, बाल बोधिनी, हरिश्चंद्र मैगजीन, हिंदोस्तान आदि निकाली गई। 1867 ई. में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने प्रारंभ में मासिक, तथा बाद में साप्ताहिक प्रकृति की पत्रिका ‘कवि वचनसुधा’ निकाला जो प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का प्रकाशन करती थी। इसके प्रकाशन के साथ ही हिंदी पत्रकारिता के नए युग का आरंभ माना जाता है। इसके कुछ वर्ष पश्चात 1873 ई. में भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने ही हिंदी की मासिक पत्रिका ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ निकाला जिसमें पुरातत्व, उपन्यास, कविता, आलोचना, ऐतिहासिक, राजनीतिक, साहित्यिक, दार्शनिक लेख-कहानियाँ तथा व्यंग्य प्रकाशित होते थे। तत्पश्चात 1874 ई. में उन्होंने (भारतेन्दु हरिश्चंद्र) महिलाओं के लिए मासिक पत्रिका ‘बाल-बोधिनी’ पत्रिका निकाला,  1877 ई. को बालकृष्ण भट्ट के संपादकत्व में प्रयाग से ‘हिंदी प्रदीप’ मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान की। इसमें नाटक, साहित्य, इतिहास, दर्शन से संबन्धित खबरें रहती थी जो राष्ट्रीयता, निर्भीकता तथा तेजस्विता के स्वर से लैश होती थी। यही कारण है कि ब्रिटिश सरकार इसपर कड़ी नज़र रखती थी। कोलकाता से भारत मित्र (1878) हिंदी का पहला पत्र था जो हजारों की संख्या में छपता था। इनके अतिरिक्त सार सुधा निधि (1879), सज्जन किर्ति सुधाकर (1879), उचित वक्ता (1880), भारतीय जीवन (1884) आदि औपनिवेशिक काल में प्रकाशित होने वाली प्रमुख हिंदी भाषी पत्र पत्रिकाएँ थी।

          इसी क्रम में मदन मोहन मालवीय जी ने अपने सम्पादन में हिंदोस्तान (1885) निकला, जो हिंदी क्षेत्र से प्रकाशित होने वाला प्रथम सम्पूर्ण हिंदी दैनिक पत्र था। इसी क्रम में शुभचिंतक (1887), हिंदी बंगवासी(1896), साहित्य सुधानिधि(1893), नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1896) प्रकाशित हुई। इन सभी पत्रिका का मुख्य उद्देश्य सामाजिक व जातीय उन्नयन के साथ-साथ अंग्रेजी के खिलाफ हिंदी भाषा का प्रचार करना था। क्योंकि 1867 ई. तक विदेशी (अंग्रेजी) शिक्षा के कारण परंपरागत विचारधारा लुप्त होती जा रही थी। इस तरह 1868 ई. से शुरू हुआ हिंदी पत्रकारिता का युग 1900 ई. तक अपने उद्देश्य प्राप्ति में लगा रहा। हिंदी पत्रकारिता का यह युग हिंदी गद्य निर्माण का युग माना जाता है। इस युग के पत्रों में राजनीति साहित्य, व्यंग्य, ललित निबंधों की संख्या अधिक रहती थी। इस युग को भारतेन्दु युग कहा जाता है।

हिंदी पत्रकारिता की इसी कड़ी में 1900 ई. में सरस्वती नामक हिन्दी पत्रिका का इलाहाबाद से प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में इसका नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। क्योंकि अपने प्रकाशन प्रारंभ होने से लेकर 1980 में बंद होने के 80 वर्षों के दौरान हिंदी भाषा को विस्तार देने में इस पत्रिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह अपने समय की सबसे युगांतकारी हिन्दी पत्रिका थी जो अपनी छपाई, सफाई, कागज तथा चित्रों के कारण शीघ्र ही काफी लोकप्रिय हुई। इलाहाबाद से प्रकाशित इस पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ में चिंतामणी घोष ने किया। प्रारंभ में इस पत्रिका को ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का अनुमोदन प्राप्त था जो बाद में समाप्त हो गया। इसके संपादक मण्डल में बाबू राधाकृष्ण दास, बाबू कर्तिका प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरिदास गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुंदर दास थे। 1903 ई. में इसके सम्पादन का कार्यभार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के जिम्मे आ गया। 1920 ई. तक वे इस पत्रिका के संपादक रहे। इस दौरान इलाहाबाद के अतिरिक्त झाँसी तथा कानपुर से भी इसका प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका को प्रकाशित करने का मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषी क्षेत्र में राष्ट्रीय व सांस्कृतिक जागरण करने के साथ-साथ हिंदी रसिकों के मनोरंजन व उनके हिंदी भाषा के सरस्वती भंडार की वृद्धि करना था। इसके पद्य, गद्य, नाटक, पत्र, हास्य, परिहास, कौतुक, पुरावृत्त, विज्ञान, शिल्पकला, सभी संपादक के व्यक्तित्व की घोषणा करते हैं। इस पत्र में साहित्य, पुरातत्व, चरित्र चर्चा, विज्ञान, आलोचना, विवेचन और प्रकीर्ण ये सात शीर्षक होते थे। पत्रिका की भाषा त्रुटिरहित तथा व्याकरणसम्मत होने के कारण इसे विशेषरूप से प्रसिद्धि मिली। जून 1980 ई. में निसीथ राय के सम्पादन के दौर में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

          इस प्रकार 19वीं सदी में हिंदी पत्रकारिता का उद्भव व विकास विषम परिस्थितियों में हुआ। इस समय जो भी पत्र पत्रिकाएँ निकलती थी उनके सामने अनेक बाधाएँ आती। कुछ इस बाधा को पार कर जाती तो कुछ बंद हो जाती।

          18वीं शताब्दी में अपने शुरुआत से लेकर भारत की आजादी के पूर्व तक जहां हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने वाले गिने-चुने पत्र-पत्रिकाएँ हुआ करते थे, आजादी के बाद इनकी संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई। यही कारण है कि 1956 में इनकी संख्या बढ़कर लगभग 1000, तथा 1982-83 में 5000 हो गई। इन पत्रिकाओं के लगातार योगदान से ही आज हिंदी पत्रकारिता संस्था हिंदी भाषी राज्यों के अतिरिक्त लगभग प्रत्येक गैर हिंदी-भाषी राज्यों में सक्रिय है।

Sunday, 1 July 2018

बलात्कार विरोध की आड़ में सांप्रदायिक राजनीति का खेल


बलात्कार जैसे अपराध को कोई भी धर्म का पुरुष अंजाम दे सकता है, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान । मंदसौर रेप कांड में 7 वर्षीय पीड़िता के प्रति सहानुभूति और आरोपी इरफान के प्रति गुस्सा मुझे भी है । घटना के बाद से ही आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है, लड़की चुकी नाबालिग है इसलिए आरोपी को Pocso act के तहत फांसी तो होगी ही लेकिन सोसल मीडिया पर उसका नाम लेकर फांसी देने की मांग की आड़ में सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाने वाली घिनौनी राजनीति का खेल चल पड़ा है । फेसबुक पर यह खेल विभिन्न समूहों के माध्यम से काफी तेजी से चल रहा है । जानबूझकर इस घटना की तुलना कठुआ और उन्नाव रेप कांड से करते हुए उस समय पीड़िता के पक्ष में इंसाफ मांगने वालों को निशाना बनाया जा रहा है, सिर्फ इसलिए कि उन दोनों कांडों पर बोलनेवालों को हिंदू विरोधी और इस कांड पर चुप रहने वाले को मुसलमानों का हितैषी बताकर हिंदू मुसलमान के मुद्दे जागृत किया जा सके और आने वाले चुनाव में इसका लाभ उठाया जा सके ।
          पूरा देश जानता है कि कठुआ रेप कांड हो या उन्नाव रेप कांड दोनों को मीडिया कवरेज के साथ-साथ सेलिब्रिटी से लेकर आम जनता का जनाक्रोश सिर्फ इसलिए जागृत हुआ था कि दोनों कांड में रेप विक्टिम को इंसाफ देने की जगह आरोपी को बचाने की कोशिश की जा रही थी । न्याय दिलाने वाले वकील सहित उनके अपने आरोपियों के पक्ष में रैली निकाल रहे थे । जबकि मंदसौर कांड का आरोपी जो मुस्लिम धर्म का है, पुलिस गिरफ्त में है, लेकिन उसे बचाने के लिए न कोई मुस्लिम संगठन न अन्य कोई सामने आ रहा । बल्कि एक मुस्लिम संगठन ने तो आरोपी पर गुस्सा दिखाते हुए उसे कब्रिस्तान में भी जगह न देने की घोषणा की है । बहुत से मुस्लिम उसे फांसी देने की मांग करते प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं । अर्थात आरोपी को कोई बचा नहीं रहा । pocso act के तहत उस पर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी ही । वह फांसी की सजा से बच नहीं सकता।
          बावजूद इसके इस मुद्दे को सांप्रदायिक रूप देकर हिन्दू-मुसलमान के बीच तनाव बढ़ाने की सोची समझी साजिश चल रही है । सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए ।

Tuesday, 19 June 2018

किन्नर की आरज़ू




स्त्री शरीर में कैद पुरुष या पुरुष शरीर में कैद स्त्री गुण
वैश्विक समाज में बस यही मेरी पहचान है ।
कहने को तो, औरों की तरह इस धरती की ही संतान हैं हम
लेकिन धरावासियों के लिए तो जैसे बिन बुलाए मेहमान हैं हम ।
कैसे बयां करें अपनी बदकिस्मती, अपनी पीड़ा को,
आशीर्वचनों से हम जिस समाज को
लंबी उम्र, खूब तरक्की करने की दुवाएँ देते हैं ।
वही समाज हमें ...
जनाने-मर्दाने से इतर
किन्नर, छक्का, हिजड़ा कहकर हमारा उपहास उड़ाते हैं ।
कैसे बताएं कि प्रकृति प्रदत्त इस नासूर को हम
नियति मान कैसे जीवन भर ढोते हैं ?
नाच-गान से समाज को गुदगुदा कर
भिक्षाटन कर चंद सिक्के कमाते हैं ।
जीते जी नौकरी-रोजगार की जगह
लैंगिक गालियां-झिड़कियाँ ही पाते हैं
इस नरक से छुटकारा मिलने के बाद भी  
ढाई गज जमीन भी नसीब नहीं होती ।
क्यों ?
समाज निर्मित सौन्दर्य के पैमाने में
हम थोड़े अलग-थलग हैं तो क्या हुआ ?
24 कैरेट मर्दानगी नहीं, माँ बनने की क्षमता नहीं,
तो क्या हम इंसान नहीं ?
बहुत जी लिए इस नाच-गान, दुवाएँ देने, तालियाँ पीट-पीट,
भिक्षाटन कर जीवन जीने की परंपरा को,
अब इज्जत-सम्मान भरी ज़िंदगी जीना चाहते हैं हम ।
चाँद-मंगल-दूसरी दुनिया तक जाने की हमारी भी है आरज़ू
अपने अनगिनत सपने को हकीकत में बदलना चाहते हैं हम ।
अपनी इस अभिशप्त ज़िंदगी से मुक्ति चाहते हैं हम ।
अब इज्जत-सम्मान भरी ज़िंदगी चाहते हैं हम । 

{मूल रूप से अलवर (राजस्थान) से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका भर्तृहरि टाइम्स (13 मई - 18 जून 2018) संयुक्तांक में प्रकाशित}