Sunday, 2 August 2020

प्रेमचंद्र के रचनाओं की वर्तमान में प्रासंगिकता


अपने छात्र जीवन में हम कुछ ऐसे यादगार पात्रों के बारे में पढ़े होते हैं जो कभी भुलाए नहीं जाते। यदि थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएँ तो इन पात्रों की चर्चा होते ही पूरी कहानी हमारी आँखों के सामने आ जाती है। इन पात्रों में कुछ के नाम लिए जा सकते हैं। जैसे हमीद (ईदगाह), हल्कू (पूस की रात), हीरा मोती बैल (दो बैलों की कहानी) आदि। तब हमें पता नहीं था कि इन रोचक कहानियों के लेखक प्रेमचंद्र कौन हैं? लेकिन आज जब हमें इनके लेखक के बारे में जान कर बहुत ही खुशी हो रही है कि इन कहानियों के लेखक की गणना हमारे देश के सबसे महान लोकप्रिय साहित्यकारों में की जाती है। 31 जुलाई 1880 ईस्वी को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद की साहित्य की कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण आदि विधाओं में उनकी विशेष रूचि थी। यही कारण है कि हिंदी साहित्य जगत में उन्हें उपन्यास सम्राट के उपनाम से जाना जाता है। इन्होंने अपने लेखन की शुरुआत जमाना पत्रिका से की। इस क्रम को जारी रखते हुए, कागज को अपनी कर्मभूमि बनाते हुए अपने छोटे से जीवन में उर्दू व हिंदी भाषा में कुल 15 उपन्यास, व 300 से भी अधिक कहानियां लिखी। निर्मला, गबन, कफन, गोदान, रंगभूमि आदि प्रेमचंद की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाएं हैं। उनके बेटे द्वारा लिखित पुस्तक 'कलम का सिपाही' उनकी पत्नी द्वारा लिखित पुस्तक 'प्रेमचंद्र घर में' आदि पुस्तकों की सहायता से हम उनके जीवन संघर्ष को समझ सकते हैं।
प्रेमचंद्र की लेखनशैली
          प्रेमचंद्र का साहित्य को देखने की दृष्टि बिल्कुल अलग थी। वह इस बात को स्वीकार नहीं करते थे कि जो कुछ भी लिख दिया जाए वह सब का सब साहित्य है। 9-10 अप्रैल 1936 को प्रगतिशील लेखक मंच के प्रथम अधिवेशन में सभापति के रूप में विचार व्यक्त करते हुए वे कहते हैं, साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो, इसमें जीवन की सच्चाइयाँ व्यक्त की गई हो। जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण होउपरोक्त कथित सभी तत्वों को उनके उपन्यास, कहानियों में देखा जा सकता है। प्रेमचंद्र के पूर्व के कहानीकारों की कहानी का स्वरूप मुख्यतः धार्मिक तथा काल्पनिक होती थी, जिनका मुख्य उद्देश्य पाठकों का मनोरंजन, मन-बहलाव करना होता था। प्रेमचंद्र ने इस धारा को परिवर्तित करते हुए तिलिश्म, स्त्री-पुरुष प्रेम – वियोग, भूत-प्रेत पर आधारित अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले काल्पनिक कहानियों की जगह वास्तविक पात्र, वास्तविक जीवन-समस्याओं (सवा सेर गेंहू) पर आधारित कहानियों को लिखने की शुरुआत किया। उन्होंने अपने आसपास की दुनिया, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन को अपने साहित्य में स्थान दिया। फलस्वरूप साहित्य में न केवल तत्कालीन सामाजिक जीवन से संबंधित समस्याओं, मुद्दों का स्वतः ही समावेश हुआ, बल्कि पाठक वर्ग इन समस्याओं, कुरीतियों के बारे में सोचने, इसका समाधान करने, इनपर विजय प्राप्त करने हेतु उपाय खोजने को प्रेरित हुए।  
          प्रेमचंद्र की रचनाओं में गरीबी, अन्याय, भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव आदि बुराइयों का समावेश देखने को मिलता है। कहानी सवा सेर गेंहू में शोषण संबंधी सवाल, पूस की रात गरीबी की समस्या, कहानी सद्गति में जातिगत भेदभाव को दिखाया गया है। ये कहानियाँ आम जनमानस में एक गहरी छाप छोड़ती है क्योंकि पाठक खुद को इन कहानियों के पात्रों (विशेष रूप से शोषित पात्र) से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। ये कहानियां पाठकों को सामाजिक चिंतन, विमर्श की ओर ले जाती है। यही कारण है कि किशोरों में सामाजिक चिंतन की समझ संबंधी कौशल विकसित करने के लिए प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक शालाओं के भाषा पाठ्यक्रम में इन कहानियों को सरकार द्वारा शामिल किया गया है। इन कहानियों के माध्यम से हम अपने बच्चों का सामाजिकरण इस प्रकार कर सकते हैं कि वह आगे चलकर एक ऐसे नागरिक बन सकें जिसकी अपेक्षा भारतीय संविधान करता है।
          ऐसे ही उनकी एक रचना है 'पूस की रात' संक्षेप में वाचन करते हैं, तत्पश्चात इसका विश्लेषण करेंगे किन-किन समस्याओं के प्रति इस कहानी में बात की गई है।
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा - सहना आया है। लाओ जो रुपए रखे हैं उसे दे दूं। किसी तरह गला तो छूटे। उसकी पत्नी जो झाड़ू लगा रही थी पीछे फिर कर बोली 3 रुपए ही तो हैं। दे दोगे तो कंबल कहां से आएगा माघ पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उसे कह दो फसल पर दे देंगे। अभी नहीं है।
हल्कू एक क्षण के लिए अनिश्चित दशा में खड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कंबल के बिना हार में रात को वह किसी तरह तो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमाएगा, गालियां देगा। बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी। यह सोचता हुआ स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला दे दे गला तो छूटे। कंबल के लिए कोई और उपाय सोचुँगा।
.....

कहानी सुनने के बाद कुछ पहलुओं पर बात करना आवश्यक है ताकि प्रेमचंद्र के रचनाओं की खूबसूरती को समझा जा सके। यदि पूछा जाए कि
·       इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद किस सामाजिक समस्या को दिखाने का प्रयास किया है? आपके संभावित उत्तर होंगे - समाज में व्याप्त गरीबी को,  किसानों की समस्या को, साहूकारों के घृणित व्यवहार को।
·       आपको यह कहानी काल्पनिक लगी या वास्तविक? तो आपके संभावित उत्तर दोनों हो सकते हैं। ज्यादा संभावना होगी कि उत्तर वास्तविक के पक्ष में आएँ।  
·       क्या आप खुद को हल्कू की जगह महसूस कर पा रहे थे? उत्तर स्वाभाविक रूप से हाँ ही होगी।
उपरोक्त प्रश्नों के आपके उत्तर यदि बिल्कुल ऐसे ही हैं जैसा विकल्प में कहा गया है, तो इसका अर्थ है कि आपने भी इस कहानी को खुद के ऊपर ले कर जिया है। प्रेमचंद की रचनाओं की यही खूबसूरती है कि वे जनसाधारण की उन समस्याओं पर कहानियों के माध्यम से बातचीत करते हैं जिनसे वे पीड़ित हैं। हम खुद को उन संदर्भों/ समस्याओं से जोड़ पाते हैं जिसकी चर्चा प्रेमचंद अपनी रचनाओं में करते हैं। यही जुड़ाव आप तक भी महसूस करेंगे जब आप उनकी सद्गति, ठाकुर का कुआं कहानी को पढ़ेंगे। इन दो कहानियों के माध्यम से वे समाज में व्याप्त घृणित जातिगत भेदभाव की समस्या को उजागर करते हैं। ऐसे ही जब हम ' सवा सेर गेहूं' कहानी पढ़ते हैं तो इसके माध्यम से एक गरीब किसान जो बाद में मजदूर बन जाता है, का दर्द, बंटवारे के दर्द, महाजनों के स्वार्थी प्रवृत्ति, गुलाम बनने के कारणों को महसूस कर सकते हैं। यह भी महसूस कर सकते हैं कि उच्च कुल/जाति में जन्म लेने वालों के लिए स्वर्ग और नरक के क्या मायने हैं? सद्गति कहानी के माध्यम से नज़राना प्रथा, जातिगत भेदभाव के दर्द का पता चलता है।  
प्रेमचंद्र की कहानियों की वर्तमान में प्रासंगिकता  
यहां सवाल उठता है कि प्रेमचंद्र की मृत्यु के आठ दसक (84 वर्ष) बाद प्रेमचंद्र और उनकी रचनाओं को याद करने की क्या जरूरत है? प्रेमचंद की कहानियां उपन्यास आदि के अवलोकन करने के बाद हम कह सकते हैं कि प्रेमचंद्र अपने साहित्य में अनेक प्रकार के सामाजिक बुराइयों को मुख्य रूप से उठाने का प्रयास किया है। अपनी कहानियों, उपन्यासों के माध्यम से वे जिन समस्याओं से हमें अवगत कराते हैं वर्तमान समाज में यह आज भी जीवित हैं। चाहे वह भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव, दहेज प्रथा या सामंती प्रवृत्ति हो? उदाहरण के लिए यदि हम बात पंच परमेश्वर की बात करें तो यह कहानी स्वार्थी प्रवृत्ति त्यागने का संदेश देते हुए न्याय व्यवस्था की वकालत करती है। आज के समय में देखा जाए तो हम इस तरह के सोच से जी रहे होते हैं कि यह हमारे मित्र हैं या अपने हैं तो इनको लाभ पहुंचाना है चाहे वह कितनी भी गलत हों। यह कहानी हमें यह सोचने को मजबूर करती है कि हमारे आपसी संबंध भले ही अच्छे हो या बुरे हो, सभी के साथ न्याय होना चाहिए। जो जैसा करे उसे वैसा फल प्राप्त हो।
          एक श्रेष्ठ, जिम्मेदार नागरिक बनने की सीख देने वाली प्रेमचंद्र की रचनाएं केवल पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने का काम ना करें बल्कि हमें उन समस्याओं पर चिंतन मनन करने की प्रेरणा प्रदान करे, इस उद्देश्य से प्रेमचंद्र जयंती के अवसर पर उनके साहित्य पर चर्चा करना आवश्यक है।

Wednesday, 29 July 2020

स्त्रियों के प्रति हमारे समाज की संकीर्ण सोच


प्राचीन, मध्य होते हुए हम आधुनिक काल में प्रवेश कर गए हैं जहां हम खुद को अपने पूर्वजों से सभ्य व बुद्धिमान होने का दावा करते हैं लेकिन स्त्रियों के प्रति हमारी सोच वही प्राचीनकाल वाली ही है, आधुनिक नहीं हो पाई है। इस संकीर्ण सोच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हम इनको नीचा दिखाने के लिए सैकड़ों निम्न दर्जे के लोकोक्तियाँ, मुहावरे प्रयुक्त करने से नहीं चूकते। इनमें से एक है – “दो स्त्रियां कभी आपस में चुप नहीं बैठ सकती”। अर्थात किसी भी स्थान पर यदि दो स्त्रियां मिल जाएं तो वे कुछ न कुछ बात निकाल ही लेती हैं अपना टाइम पास करने के लिए। हद तो इस बात की है कि उनकी बातचीत को बातचीत नहीं, बल्कि चुगली करने के रूप में देखा जाता है। इस बातचीत को समाज की तरह यदि आप भी स्वस्थ संवाद न मानकर चुगली मानते हैं तो आप भी समाज की तरह मानसिक रूप से विकृत हैं। क्योंकि चुगली करने पर किसी खास जेंडर का एकाधिकार नहीं होता है। दो बातचीत पसंद पुरुष यदि एक जगह मिल जाएँ और राजनैतिक या सामाजिक मुद्दों पर बातचीत करते हुए किसी पार्टी, विचारधारा की आलोचना करें तो उसे चुगली नहीं माना जाता। यदि इसे चुगली ही माना जाए तो स्त्रियाँ इस मामले में भी दूसरे नंबर पर होगी। अव्वल स्थान पर वे पुरुष वर्ग होंगे जो चौक-चौराहों पर कैमरे की तरह हमेशा यह ताकते रहते हैं कि किसकी बहू-बेटी कहां आ-जा रही है? क्या पहन रही है? कोई दिखी नहीं कि अपने साथियों से कानाफूसी शुरू।  
          यदि दो स्त्रियाँ लंबे समय तक बात भी करती है तो इसमें गलत क्या है? पितृसत्तात्मक समाज ने जब निजी क्षेत्र या गृह कार्य स्त्रियों के, और पुरुषों को बाहरी दुनिया का ठेका दे दिया। ऐसे में लगातार झाड़ू-पोछा, बर्तन, दो से तीन टाइम खाना बनाने, बच्चों की देखभाल करने आदि कार्य से निवृत्त होकर दो स्त्रियाँ यदि आपस में मिलकर अपने निजी क्षेत्र संबंधी कुछ बात कर ही लेती हैं तो इसमें गलत क्या है? कोई दावा के साथ कह भी नहीं कर सकता कि दोनों मिलकर किसी की बुराई ही करती हैं। एक समय था, जब आप उसे पढ़ाई-लिखाई, सामाजिक कार्य, राजनीति से दूर रखते थे, उस दौरान इस बात की थोड़ी-बहुत संभावना रहती होगी। लेकिन आज वह समय नहीं बल्कि कुछ और है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार से लेकर अनेक प्रकार के अधिकार का उपयोग कर आज वे सार्वजनिक क्षेत्रों में भी पुरुषों को टक्कर दे रही हैं। इस स्तर की यदि दो स्त्रियां आपस में मिलती हैं तो आप की तरह ही वह भी सामाजिक बदलाव, राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर अन्य कई प्रकार के सार्थक बातचीत करती हैं। अतः जरूरत है हम आप को स्त्रियों को देखने के अपने नजरिए में परिवर्तन लाने की। इस संकीर्ण सोच से खुद को उबारने की।
(मूलतः पटना से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'एजुकेशनल न्यूज़' के 4 अगस्त 2020 के अंक में प्रकाशित)  

Sunday, 19 July 2020

मूर्त वस्तुओं द्वारा गणितीय अवधारणा की समझ।


गणित रटने नहीं, बल्कि समझने का विषय है आरंभिक कक्षा में अध्ययन के दौरान गुरुजी के इस प्रवचन ने मेरे जैसे रट्टू तोतों को भूगोल, इतिहास विषय की तरह गणित को रटने नहीं दिया। परिणामस्वरूप गणित में 40 से ज्यादा अंक कभी नहीं ला पाए। एक बार कक्षा 3 की मासिक परीक्षा में तो 100 में 4 नंबर लाकर पूरे स्कूल में इतिहास रच दिये। जोड़, घटाव, गुणा, भाग सभी अवधारणाओं को गुरुजी उस अध्याय में प्रयुक्त मानक विधि के आधार पर सवाल हल करना बताया। इस मानक विधि को हम मन-ही-मन तबतक दुहराते थे जब तक कि ये विधि हमें याद न हो जाए। इसी तरह पढ़ते हुए पास होने योग्य नंबर लाते हुए जैसे तैसे गणित से पीछा छुड़ाया। गणित सीखने के क्रम में जो महत्वपूर्ण चीज छूटता गया वह था इस मानक विधि के पीछे का तर्क। यह तर्क यदि उस दौरान समझ पाता तो शायद कुछ अंक और लाते हुए गुरुजी के साथ-साथ घरवालों के प्रकोप से बच पाता।
          आज एक शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए एहसास होता है कि आरंभिक स्तर पर गुरुजी ने हमें गणित समझ कर नहीं बल्कि रट्टा मार तकनीक से ही पढ़ाया। अर्थात उन्होंने हमें जोड़ना, घटाना, गुणा, भाग करना सिर्फ मानक विधि को रटा कर सिखाया। इस मानक विधि के पीछे के तर्क को नहीं बताया। दरअसल गणित एक ऐसा विषय है जिसमें हम बच्चों को जोड़, घटाव, गुणा, भाग जैसे अमूर्त विषयवस्तु या अवधारणाओं को मूर्त वस्तुओं की सहायता से सिखाते हैं। बच्चों को मूर्त वस्तुओं से (समझाने हेतु ठोस वस्तुओं का उपयोग) अर्द्ध मूर्त (चित्रों से समझाना) तत्पश्चात अमूर्त (गणितीय प्रतीक चिन्ह) तक लाते हैं। लेकिन इस दौरान अधिकांश शिक्षक मूर्त व अर्द्धमूर्त को छोडकर अमूर्त रूप में ही सिखाने लगते हैं। परिणामस्वरूप 125 x 2 = 150 होता है, यह जान तो जाते हैं लेकिन इसके पीछे का तर्क पता नहीं होता। आपका बच्चा भी परीक्षा में यदि 100 में 90-100 नंबर ले आ रहा है लेकिन संख्या की अवधारणा की समझ यदि नहीं है, अर्थात वे समझ नहीं पा रहे कि 125 वस्तुओं के समूह में कितने इकाई, दहाई व सैकड़ा वस्तुओं के समूह हैं, तो समझ जाइए कि वे भी गणित को समझकर नहीं बल्कि रट्टा मारकर ही पढ़ रहे हैं।  
          विद्यालयों में आज भी काफी संख्या में ऐसे बच्चे मिल जाएंगे जो संख्या 37 को 73 या 73 को 37 लिख देते हैं। इनमें सुधार करने के लिए अक्सर हम शिक्षक एक विधि अपनाते हैं। इन दोनों संख्याओं को स्लेट या कॉपी पर बच्चे से इतना लिखवाते हैं कि वह इसे याद कर लेता है कि 37 या 73 को ऐसे ही लिखा जाता है। हम यह नहीं समझ पाते कि यदि वह बच्चा ऐसी गलती कर रहा है तो इसका तात्पर्य है कि वह संख्या 37 या 73 की अवधारणा को समझ नहीं पा रहा है। ऐसे में उस संख्या का पैटर्न रटाने की जगह यदि हम प्रत्येक संख्या को मूर्त वस्तुओं की सहायता से संख्या, संख्यानाम तथा प्रतीक के अंतरसंबंध को समझाएँ तो वह संख्या 37 के साथ-साथ 1 से 100 तक की संख्या के मायने को आसानी से समझ सकेगा। इसी तरह 1 से 100 तक की संख्या को एक एक मूर्त वस्तुओं की संगत कराते हुए बच्चों को गिनना सिखाते हैं तो शायद ही वह गिनती करने में गलती करेगा। ये मूर्त वस्तु कुछ भी हो सकते है जैसे बच्चों के खेलने वाले कंचे, स्कूली परिवेश में पाए जाने वाले कंकड़-पत्थर, बीज, बटन, कोल्डड्रिंक पीने वाले स्ट्रॉ, आदि।
          अतः हम शिक्षकों को चाहिए कि किसी भी गणितीय अवधारणा पर कार्य मूर्त वस्तुओं की सहायता से करें। इनका प्रयोग करने के साथ-साथ उन अवधारनाओं को सरल तरीके से समझाएँ। अर्थात बच्चों को बताएं कि जोड़ने का तात्पर्य है किसी एक समूह की वस्तु को गिनने के बाद दूसरे समूह के वस्तु को आगे की ओर गिनना। अर्थात दो वस्तुओं की संख्या को एकत्र कर कुल संख्या बताना। घटाने से तात्पर्य है किसी समूह से कुछ वस्तुएँ निकाल कर शेष बचे वस्तु की संख्या बताना । गुणा का तात्पर्य है किसी वस्तु को बार-बार जोड़ना (2 x 3 = 2 + 2 + 2) इसी तरह भाग का तात्पर्य है किसी वस्तु को बराबर भागों में बांटना या समूहीकरण करना। इतना सिखाने के बाद मानक विधि पर आना चाहिए।
                                                साकेत बिहारी, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
(मूलतः पटना से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'एजुकेशनल न्यूज़' के 21 जुलाई 2020 के अंक में प्रकाशित) 

Friday, 3 July 2020

भारत की ऋतुएँ


संस्कृत ग्रंथ ऋग्वेद तथा रामायण में भारत की ऋतुओं का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में 5 तथा रामायण में 6 ऋतुओं का उल्लेख मिलता है।
1.     वसंत (Spring)March-April
2.     ग्रीष्म (Summer) – May - June
3.     वर्षा (Rainy Season) – July - August
4.     शरद (Autumn) – September- October
5.     हेमंत (Winter) – November - December
6.     शिशिर (Severe Winter) – January - February

Saturday, 20 June 2020

संस्कृत ग्रंथों में वर्णित 10 दिशाएँ (Ten Directions) एवं उसके स्वामी


ऋग्वेद में 4 दिशाओं पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण का वर्णन मिलता है, जबकि इनके बाद रचित पौराणिक ग्रंथों में 10 दिशाओं तथा उनके स्वामी का उल्लेख मिलता है जो निम्न हैं -
पूरब – इंद्र
पश्चिम – वरुण (जल का स्वामी)
उत्तर – कुबेर (धन का स्वामी)
दक्षिण – यम
आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) – अग्नि
नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) – नीरित
वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) – मारुत (वायु/पवन देव)
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) – ईशा
आकाश – ब्रह्मा
पाताल – शेषनाग

Thursday, 11 June 2020

अलेक्ज़ेंडर महान ‘सिकंदर’ की विश्व की बाह्य सीमा निर्धारण नीति

इतिहास के छात्र से लेकर इतिहास को बोझिल मानने वाले सभी सिकंदर के नाम से विश्वप्रसिद्ध अलेक्ज़ेंडर महानसे परिचित होंगे ही। वही सिकंदर जिसपर इतिहास को बोझिल विषय मानने वाले छात्रों के लिए एक गाना बना था जो आपलोगों ने भी सुना ही होगा –

सिकंदर ने पोरस ...

से की थी लड़ाई...

जो की थी लड़ाई...

तो मैं क्या करूँ ?

जी हाँ, ये वही सिकंदर है जिसके बारे में हम बचपन में नादानी से कहा करते थे कि न ये सिकंदर हमारे देश आता न ये ई. सन रटने वाला बोझिल विषय हमें पढ़ना पड़ता। सिकंदर के संबंध में हमें बहुत ही सीमित जानकारी मिलती है कि विश्वविजय के क्रम में सिकंदर हिंदुस्तान (भारत) के पश्चिमी प्रांत पंजाब तक पहुँच गया था जहां के शासक पोरस से उसकी लड़ाई हुई। पोरस पराजित हुआ और सिकंदर ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। उसके प्रदेशों को वह वापस कर विश्वविजय के लिए आगे बढ़ गया। हालांकि वह रावी नदी से आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। एक सामाजिक विज्ञान शिक्षक/छात्र होने के नाते हमारा यह कार्य है कि सिकंदर के बारे में हम कुछ और भी जानें ताकि न सिर्फ बच्चों की जिज्ञासा को शांत कर सकें बल्कि उनके साथ-साथ खुद के ज्ञान को भी और समृद्ध कर सकें।

          शुरुआत करते हैं इस बात से कि प्राचीन दौर के एक महान व्यक्ति के रूप में याद किये जाने वाले सिकंदर के विश्वविजेता बनने के पीछे निहित उद्देश्य क्या थे? सिर्फ अपने साम्राज्य का विस्तार या कुछ और? उत्तर है कि सिकंदर के विश्वविजेता बनने के पीछे एक उद्देश्य तो अपने साम्राज्य का विस्तार करना तो था ही, एक दूसरा उद्देश्य भी था विश्व की बाहरी सीमा का पता लगाना।[1] क्योंकि एक शासक होने के साथ-साथ वह एक भूगोलविद भी था। वह यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू के अनेक शिष्यों में से एक था। उसके विश्वविजय अभियान के पीछे उसके गुरु अरस्तू की शिक्षा का भी पर्याप्त योगदान था, जो अपने अपने शिष्यों में किसी भी सिद्धान्त को प्रत्यक्ष अवलोकन करने की एक प्रबल इच्छा जागृत की। अरस्तू अपने शिष्यों को यह सिखाया करते थे कि जाओ और देखो और स्वतः निर्णय करो कि क्या कोई सिद्धांत स्वीकार योग्य है या अस्वीकार योग्य?[2] भूगोलविद माजिद हुसैन के अनुसार अरस्तू के इस शिक्षा का उनके सबसे उत्साही शिष्य एलेक्जेंडर (सिकंदर) पर गहरा प्रभाव हुआ जो तत्कालीन मकदूनिया के शासक फिलिप द्वितीय का पुत्र था। सिकंदर के पिता फिलिप द्वितीय ने अपने दम पर अपने राज्य मकदूनिया की सेना को एक ऐसे प्रभावशाली उच्च प्रशिक्षित सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया जिसने सिकंदर को तत्कालीन सर्वाधिक शक्तिशाली फारस साम्राज्य को पराजित करने में अद्भुत प्रतिभा दिखाई।

          सिकंदर की सौतेली बहन की शादी में उनके पिता फिलिप द्वितीय की हत्या उनके ही एक गार्ड द्वारा कर दिए जाने के पश्चात नए राजा बनने के लिए संघर्ष की शुरुआत हो गई थी। इस संघर्ष में सिकंदर ने अपने एक सौतेले भाई फिलिप एरिडाइस को छोड़कर सभी उत्तराधिकार पद के दावेदारों व अन्य विरोधियों का क्रूरता से सफाया कर 20 साल की उम्र में राजा बने। अपने 12 वर्ष के शासनकाल के दौरान अपने सैनिकों के साथ 12000 मील की विजय यात्रा (पश्चिम में यूनान से लेकर पूर्व में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, मिस्र तक) करते हुए खुद को एक प्रभावशाली सैनिक कमांडर के रूप में किया। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ विश्व की बाहरी सीमा निर्धारित करने के उद्देश्य से एक प्रशिक्षित सेना लेकर दक्षिण व पूर्व दिशा की ओर बढ़ा। वह जानना चाहता था कि फारस साम्राज्य के उस पार दूर के क्षेत्रों में वस्तुतः है क्या जहां के विषय में अनेक कहानियाँ तथा किंवदंतियाँ प्रचलित थी। 330 – 323 ई. की अवधि के दौरान वह देश विदेश की सूचनाओं को प्राप्त करने व उन्हें रिकॉर्ड करने विशेषज्ञों को लेकर फारस से भारत तक आया और एक सच्चे खोजी की तरह दूसरे रास्ते से लौटा।[3]

          अपने विद्यार्थी जीवन में तीन वर्षों तक सिकंदर (343-340 ई. पू.) अरस्तू के पास अध्ययन किए। मकदूनिया का शासक बनने के पश्चात सिकंदर ने यूनानी साम्राज्य का विस्तार पूरे विश्व में करने की योजना बनाई। इस क्रम में दक्षिणी क्षेत्र (मिश्र) को विजित करने के पश्चात वह पूर्व दिशा की ओर बढ़ा। 327 ई. पू. में हिंदुकुश पर्वत पार करते हुए खैबर दर्रे के रास्ते सिंधु नदी (पंजाब) क्षेत्र में प्रवेश किया। उसे यह विश्वास था कि अब वह पूर्व की ओर आवासित जगत की सीमा से कुछ ही दूर है। वह आगे बढ़ कर उस सीमा तक जाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्यवश उसके सैनिकों ने उसका साथ नहीं दिया। सिकंदर ने उनमें उत्साह जगाने की पूरी कोशिश की लेकिन बुरी तरह थक चुके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। कुछ ने तो विद्रोह तक कर दिया।

          वापसी के दौरान सिकंदर ने अपनी सेना को दो भागों में विभाजित किया। एक टुकड़ी को नियरकस के सेनापतित्व में सिंधु नदी, सिंधु नदी मुहाने, अरब सागर, फारस की खाड़ी होते हुए भेजा, दूसरी टुकड़ी को खुद थलमार्ग होते हुए मकरान, बलूचिस्तान, ईरान के रास्ते मेसोपोटामिया के लिए बढ़ी। थल मार्ग से बढ़ते हुए 323 ई. पू. रास्ते में बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु हो गई। इस तरह विश्व की बाहरी सीमा निर्धारण को निकले सिकंदर का कार्य पूर्ण तो नहीं हो पाया लेकिन अपने इस विश्वविजयी अभियान के माध्यम से उसने यूनानियों को उन प्रदेशों का ज्ञान कराया जो उनके ज्ञान के दायरे से बाहर के थे। यूनानियों को फारस, मध्य एशिया, अफगानिस्तान, हिंदुस्तान तथा ईरान के तटीय क्षेत्रों की भौतिक स्थिति, इन क्षेत्रों के जन-जातियों, पेड़ पौधों का ज्ञान हो पाया।



[1] हुसैन माजिद, भौगोलिक चिंतन का इतिहास पंचम संस्करण, रावत प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृष्ठ सं. 18 

[2] वही, पृष्ठ सं. 18 

[3] हुसैन माजिद, भौगोलिक चिंतन का इतिहास पंचम संस्करण, रावत प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृष्ठ सं. 102 

Sunday, 7 June 2020

कोरोना के दौर में आरंभिक भाषा शिक्षण एवं अभिभावक


कोरोना दौर जारी है, बाज़ार, फैक्ट्री से लेकर शिक्षण संस्थाएं सभी बंद पड़ने के बाद धीरे-धीरे खुलने शुरू हो गए हैं। निजी व शासकीय प्राथमिक शालाओं के फिलहाल खुलने पर थोड़ा संशय बना हुआ है क्योंकि बात बच्चों की है। वैसे हम सभी इजरायल, फ्रांस आदि देशों में इस दौरान स्कूल खुलने से बच्चों के कोरोना संक्रमित होने की घटना से हम सभी वाकिफ हैं। यदि हमारे देश में भी ऐसी परिस्थितियाँ बनती है तो अन्य देशों की तरह हमारे देश के स्कूल भी अनिश्चित काल के लिए बंद हो जाने की संभावना बनती है। यदि पूरी सावधानी रखते हुए विद्यालय खुल भी जाएँ तो इस बात की भी पूरी संभावना हो सकती है कि शिक्षक या स्कूल से पर्याप्त सहयोग न मिल पाए जैसा इससे पूर्व मिलता आया है जिससे आपके बच्चे का भाषाई कौशल विकास अवरुद्ध हो सकता है। परिणामस्वरूप आत्मविश्वासी, तेज़ तर्राक, चालाक की जगह आपका बच्चा दब्बू, बुद्धिहीन भी हो सकता है। ऐसा कहने का आधार प्रसिद्ध भाषाविद, दार्शनिक नॉम चोम्सकी का भाषा विकास के सिद्धान्त है, जिसके अनुसार भाषा का विकास मनुष्य की एक संपत्ति है जो स्वतंत्र रूप से बुद्धि का कार्य करता है। इसलिए जैसे हमारी ताकत का आधार इस बात पर सर्वाधिक निर्भर करता है कि हमारा सुबह का नाश्ता पौष्टिक तत्वों से कितना समृद्ध है। वैसे ही अपने बच्चे इस दृष्टिकोण से बच्चे के भाषाई विकास में जरा सा भी लापरवाही करना आपको महंगा पड़ सकता है। यहाँ सवाल उठता है कि आखिर आरंभिक भाषा शिक्षण है क्या? तो आरंभिक भाषा शिक्षण से तात्पर्य है कि कक्षा पहली से पाँचवीं तक बच्चों को भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू आदि सहित अन्य भाषा) विषय के माध्यम से वांछित कौशल का विकास कराया जाना। इन कौशल विकास का अधिकांश दायित्व भाषा विषय तथा भाषा शिक्षक के कंधे पर होता है। इन कौशलों का सही तरीके से विकास होगा तभी अन्य विषयों के अध्ययन से खुद को ये पूरी रुचि के साथ जोड़ पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि तर्क लगाने के कौशल का विकास नहीं हो पाता है तो उसे गणित, विज्ञान विषय रुचिकर नहीं लगेगा। यदि सुनने, समझने का कौशल विकसित नहीं होता है तो कोई विषय रुचिकर नहीं लगेगा आपके बच्चे को।       
          जिन कौशलों के विकास की बात उपरोक्त पंक्तियों में की गई है, वह हैं – किसी भी कविता, कहानी को सुनकर उसके अर्थ को आत्मसाथ कर पाने का कौशल, उन कविता-कहानियों को हाव भाव के साथ कहने का कौशल, उस कविता को पढ़ने का कौशल, कविता-कहानी में आए पात्रों से परिचित होने के साथ-साथ उनसे संबंधित सवाल पूछने एवं उससे संबंधित सवालों के उत्तर देने का कौशल, संबंधित भाषा विषय के ध्वनि, अक्षर, मात्राओं को समझने का कौशल, इन अक्षर व मात्राओं के संयोग से निर्मित शब्द बनाने व समझने का कौशल, शब्द भंडार बढ़ाने का कौशल,  मौलिक चिंतन-लेखन करने, तर्क करने, कल्पना करने, विश्लेषण करने का कौशल, पूछे गए प्रश्न के जवाब देते हुए नए-नए शब्दों का चयन करने का कौशल, संक्षेप या विस्तार में कहने-लिखने का कौशल, लिंग, वचन के भेद को समझने का कौशल, कविता-कहानी को संवाद के उतार-चढ़ाव के साथ पढ़ने व सुनाने का कौशल, शब्द, वाक्य व अनुच्छेद के बीच के अंतर समझ पाने का कौशल, चित्र या अभिनय के माध्यम से कविता या कहानी को समझाने का कौशल, स्वतंत्र रूप से कविता या कहानी बुनने का कौशल आदि। ताकि बच्चा रट्टा मार कर नहीं बल्कि स्वयं से कुछ कर उस अवधारणा के संबंध में अपनी समझ बना सके।
          जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि बच्चों में इन कौशलों को विकसित करने की ज़िम्मेदारी मुख्यतः स्कूल शिक्षक पर होती थी। लेकिन कोरोना महामारी के इस दौर में जिस तरह बच्चे का शिक्षक और स्कूल से दूरी सी बनती जा रही है, ऐसे में बेहतर होगा कि अपने बच्चों के बेहतर विकास के लिए अभिभावक खुद ही भाषा शिक्षक की भूमिका का निर्वाह करें। सीखने हेतु भय-मुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से यह एक अच्छा कदम होगा क्योंकि घरेलू परिवेश में बच्चा भयमुक्त होकर सीखता है। घरेलू परिवेश में ही कक्षा जैसा अनुभव देकर आप अपने बच्चे को मौखिक रूप से मुखर बना सकते हैं। हालांकि यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठता है कि बिना शिक्षकीय प्रशिक्षण के अभिभावक घर पर कैसे शिक्षक की भूमिका निभाएँ? आप यह काम अच्छे से कर सकते हैं इसमें कोई दो राय नहीं। क्योंकि यदि आप अपने बच्चे को स्कूल भेजने से पूर्व भाषाई रूप से वयस्क (नोम चोम्सकी के भाषा विकास सिद्धांत के अनुसार) कर सकते हैं तो अपनी क्षत्र-छाया में रखकर उनमें उपरोक्त कौशलों को विकसित भी कर सकते हैं। स्कूल जाने से पूर्व ही बच्चों के भाषाई रूप से वयस्क हो जाने की बात आपको आश्चर्यचकित कर सकता है लेकिन यह सत्य है। विडम्बना यह है कि इस बात की जानकारी अभिभावक को भी नहीं होती, वे इस तथ्य से अनजान होते हैं। अपने बच्चे के भाषाई कौशल के विकास में आप निम्न रूप से योगदान दे सकते हैं -
·       सीखने के प्रतिफल जानने-समझने का प्रयास करें –
राष्ट्रीय शिक्षा एवं अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा 2016-17 से प्राथमिक से लेकर माध्यमिक कक्षा स्तर पर पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों जैसे भाषा, गणित, सामाजिक अध्ययन, विज्ञान के पाठ्यपुस्तकों के शुरुआत में सीखने के प्रतिफल खंड शामिल किया गया है, जिसका उद्देश्य है शिक्षकों, अभिभावकों को इस बात से अवगत कराना कि अलग-अलग दर्जे में बच्चों में कौन-कौन से कौशल विकसित किया जाना चाहिए। यह सीखने का एक मापदंड है जिसके आधार पर बच्चे का आकलन किया जाता है। एनसीईआरटी के अतिरिक्त एससीईआरटी ने अपने-अपने राज्यों के शासकीय शालाओं के पाठ्यपुस्तकों में इसे शामिल किया है। आपके बच्चे का नामांकन यदि किसी निजी विद्यालय में है तो उनके पाठ्यपुस्तक में यह संभवतः नहीं भी हो सकता है। ऐसे में आप इसे एनसीईआरटी या एससीईआरटी के वैबसाइट से डाउनलोड कर सकते हैं। अभिभावक को भी यदि यह पता हो कि उनका बच्चा यदि पहली कक्षा में है और इस दौरान उनमें कौन-कौन से कौशल विकसित होना चाहिए तो वह भी वैसे ही योगदान दे सकते हैं जैसे अपने बच्चे को पूर्व में शिक्षक के लिए निर्धारित कार्य गिनती, अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू या अन्य भाषाओं के ध्वनि, वर्णमाला का ज्ञान करा देते हैं।
·       कविता-कहानी में आए संदर्भों पर बात करें –
प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के भाषाई कौशल के विकास हेतु साहित्य की दो विधाएँ - कविता एवं कहानी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कोई दो राय नहीं कि स्कूल भेजने से पूर्व अभिभावक अपने बच्चे को 4 से 8 लाइन की कम-से-कम दर्जनों कविता-कहानियाँ याद करा ही देते हैं। आरंभिक कक्षा की कविता कहानियाँ चाहे वह किसी भी भाषा (हिंदी, अंग्रेजी, या अन्य क्षेत्रीय भाषा) की हो, काफी मनोरंजक या गुदगुदाने वाली होती है। जिसे बच्चे पूरे आनंद लेते हुए सुनते, बोलते, पढ़ते, लिखते हैं। इन कविता-कहानियों में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो सीधे उनके परिवेश से जुड़े होते हैं जैसे जानवर या पशु-पक्षियों में कबूतर, खरगोश, गाय, तोता, फल-सब्जियों में आलू, बैगन, टमाटर, गाजर, सेब, केला। इन परिचित वस्तुओं के साथ-साथ कई ऐसे शब्द या अवधारणा आते हैं जो उनके परिवेश से संबंधित नहीं होने के कारण उनके नाम वे पहली बार सुन रहे होते हैं जैसे – जेब्रा, दरियाई घोड़ा, गैंडा, डाइनाशोर आदि। एक भाषा शिक्षक का यह काम होता है कि उस कविता-कहानी में आए नए शब्द, अवधारणा को रोचक तरीके से बताना, ताकि उनके शब्दभंडार संदर्भ के साथ बढ़ाया जा सके। ऐसे में यह कदम अब अभिभावक स्वयं उठाते हुए उन कविता-कहानियों को न सिर्फ बच्चों को सुनाएँ, बल्कि उसमें आए अवधारणा पर खुलकर बात करें। कोशिश करें बच्चे से ही कल्पना करवाने, अनुमान लगवाने का कि कविता/कहानी में यदि ऐसा होता तो क्या होता?
·       घर को बनाएँ प्रिंट-रिच
बच्चे के भाषाई कौशल विकास के लिए प्रिंटरिच वातावरण एक महत्वपूर्ण उपकरण होता है। स्कूली कक्षा में बच्चों को यह वातावरण तो मिलता ही है, घर पर भी ऐसे माहौल विकसित किए जाने चाहिए। वर्तमान में बच्चे जब स्कूल से दूर होते जा रहे हैं, हमारा प्रयास हो घर के किसी कमरे या पूरे घर को ही प्रिंटरिच बनाने की। आपका बच्चा जिस कक्षा में है उस कक्षा के पाठ्यपुस्तक के प्रकृति अनुसार अनेक तरह की कविताएं, कहानियाँ एक रीडिंग कोर्नर में संकलित कर सकते/सकती हैं। यहाँ सवाल हो सकता है कि आखिर प्रिंटरिच वातावरण का निर्माण कैसे करें? जवाब है बिलकुल वैसे ही जैसे चिड़ियाँ अपना घोसला बुनती है। पहली व दूसरी कक्षा की बात करें तो उन्हें ध्वनि, वर्णमाला से परिचित करवाने के उद्देश्य से उनके परिवेश से जुडते विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन, जिनसे वे परिचित हों, जैसे जो भी टॉफी, बिस्कुट, चिप्स, आइसक्रीम आदि आपके बच्चे खाते हों उसके रैपर, विज्ञापन, प्रिंटरिच सामग्री हो सकती है। इनके साथ काम करते हुए उन्हें उस रैपर में छपे प्रिंट के अर्थ से अवगत कराएं। इस दौरान इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके बच्चे यदि इनसे परिचित हो गए हैं तो इसे बदलकर उन सामग्रियों को प्राथमिकता दें जो उनके पाठ्यपुस्तक से जुड़ते हों। बच्चे के कक्षानुसार पाठ्यपुस्तकों की मांग के आधार पर इन सभी प्रिंटरिच सामग्री को बदलते भी रहें। ये प्रिंटरिच सामग्री बच्चों को बाल साहित्य की तरफ ले जाने में सहायक होगा। इसके पश्चात उनके लिए एक छोटा सा पुस्तकालय स्थापित कर उन्हें पढ़ने-लिखने के मौके देकर उन्हें भाषाई रूप में समृद्ध कर सकते हैं।
·       अपने बच्चों को सवालीराम बनाएँ –
अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि बच्चे को स्कूल में सवाल पूछना सिखाया ही नहीं जाता, जिसका परिणाम यह होता है कि किसी शब्द या अवधारणा को समझने में यदि उसे समस्या आ रही है तो वह उसे पूछ नहीं पाता? यदि यह हमारे व्यक्तित्व में घर कर जाए तो पूरी ज़िंदगी वह इससे उबर नहीं पाता है। वह एक पढ़ा-लिखा नागरिक तो बन जाएगा लेकिन जागरूक नागरिक नहीं। इसलिए अपने बच्चे को प्रश्न पूछने के भरपूर मौके दें। अक्सर हम (शिक्षक/अभिभावक) बच्चों के किसी प्रकार के प्रश्न पूछने पर डांटकर उसे चुप करा देते हैं, ऐसा हम तब करते हैं जब हमारे पास उनके प्रश्न का जवाब नहीं होता। शर्मिंदा होने से बचने के लिए हम उनको ऐसा डरा देते हैं कि दुबारा वह प्रश्न पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता। मेरा मानना है कि हमें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं। हमें ये ज्ञान होना चाहिए कि हर कोई किसी विषय का विशेषज्ञ नहीं होता जो उसे सब कुछ आएगा ही। कोई मुझसे गणित में कुछ पूछ ले तो मैं खुद तारे गिनने लग सकता हूँ। ऐसा में होना ये चाहिए कि हम अलग-अलग स्त्रोत से जानकारी प्राप्त कर बच्चे की जिज्ञासा शांत करें दमन नहीं। क्योंकि बच्चे किसी भी चीज को तब तक गहराई से नहीं सीख पाएंगे जब तक कि उसके अनेक पहलुओं को सवालों के माध्यम से जानेंगे या समझेंगे नहीं। ऐसे में उन्हें सवालीराम बनने के मौके दें।
·       प्रतिदिन कौशल विकास का आकलन करें -
अभिभावक स्वयं से प्रतिदिन उनके कौशल विकास का आकलन करें। आकलन के दौरान यह समझने का प्रयास करें कि आपके बच्चे में कक्षानुसार सीखने के प्रतिफल के अनुरूप कौशल विकसित हो पा रहा है या नहीं। यदि कहीं कोई समस्या आ रही है तो पहले के तरीके की जगह आप अलग-अलग रोचक तरीके अपना सकते हैं। कोशिश यह रहना चाहिए कि बच्चे को पता न चल पाएँ कि उनका आकलन किया जा रहा है। अक्सर आकलन के संबंध में जानकारी मिलते ही बच्चे किसी अवधारणा को समझना छोड़कर उसके संबंध में रट्टा मारकर उसे आत्मसाथ कर लेते हैं जो दीर्घकालिक नहीं होते। कोशिश करें कि इसे खेल-खेल में करने की। बच्चे में यदि वह कौशल विकसित नहीं हो पा रहा है तो उस तरीके में बदलाव करते हुए अलग गतिविधि अपना सकते हैं।
          अब सवाल उठता है कि अभिभावक इसके लिए अपने व्यस्त दैनिक जीवन से समय कब और कैसे निकालें ? ये निकालना तो पड़ेगा ही अपने बच्चे के भविष्य को सँवारने हेतु। कभी माँ को तो कभी पिता को। कोई आवश्यकता नहीं है स्कूल के पाठ्यक्रम को पूरा कराने की। आप अपने स्तर से अलग-अलग गतिविधि कराकर अपने बच्चे में इन सीखने के प्रतिफलों को समाहित करवा सकते हैं। यदि ऐसा करवा पाए तो पाठ्यपुस्तक के सवालों को हल करना आपके बच्चे के लिए चुटकी का काम होगा। और यदि ऐसा संभव हो पाता है तो वह दिन दूर नहीं जब असर-2019 की रिपोर्ट कि ‘8वीं तक के बच्चे 2सरी कक्षा की पुस्तक पढ़ नहीं पाते हैं” झूठी साबित होगी।
                                                          साकेत बिहारी, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन, बेमेतरा (छ.ग.)


(मूलतः दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र women express के 8 जून 2020 अंक के संपादकीय में प्रकाशित)