मैं अनुच्छेद 35A की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का समर्थन करता हूं। 1947
में विभाजन के बाद कश्मीर क्षेत्र में बसे लाखों लोग, जो शरणार्थियों की चौथी और पांचवी पीढ़ी हैं, आज भी
शरणार्थी के रूप में भारतीय संविधान द्वारा प्रदत मौलिक अधिकारों से वंचित हैं।
हैरत की बात यह है की एक लोकतांत्रिक देश में ये लोग भारतीय नागरिक तो हैं लेकिन
जम्मू कश्मीर के नागरिक नहीं हैं। इन्हें लोकसभा चुनाव में वोट देने का अधिकार तो
है लेकिन अपने राज्य की विधानसभा, पंचायत या अन्य चुनाव में
न वोट डालने का अधिकार है, न राज्य में सरकारी नौकरी पाने का,
न ही राज्य के कॉलेजों में दाखिला लेने का अधिकार है। यह प्रावधान
हमारे देश के नागरिकों के मानवाधिकार का हनन है, इसलिए भारत
सरकार तथा जम्मू कश्मीर सरकार को मिलकर इसे संशोधित करना चाहिए। कम से कम इन
नागरिकों, जिनकी 4-5 पीढ़ियां जम्मू
कश्मीर में रही है, को वहां के नागरिक का दर्जा तो मिलना ही चाहिए।
Monday, 25 February 2019
Tuesday, 20 November 2018
"देव उठनी" त्योहार
आज छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव पूर्व संध्या पर दीपावली जैसा
माहौल है। पटाखे, दीप, झालरों से पूरा शहर जगमगा रहा। अवसर है "देव उठनी" त्योहार का।
बिहार में दीपावली के बाद जो महत्व छठ पूजा का है वही महत्व यहां देव उठनी का है।
मान्यता है कि आषाढ़ एकादशी के दिन देव सुसुप्तावस्था में चले जाते हैं इसलिए इस
दिन से शुभ काम जैसे विवाह आदि बंद हो जाते हैं। कार्तिक एकादशी के दिन "देव
उठनी" त्योहार के बाद से ही सभी शुभ काम शुरू हो जाते हैं। इस दिन गन्ने से
मंडप बनाकर तुलसी का शालिग्राम से विवाह कराया जाता है।
Tuesday, 6 November 2018
सरकार चलाने वाले लोग देशभक्त या धर्मभक्त ?
जेएनयू में तथाकथित ‘देश विरोधी नारे
लगने’ की घटना के बाद देशद्रोही,
देशभक्त, राष्ट्रवाद शब्द विमर्श का मुद्दा बन गया था।
जेएनयू में इन मुद्दों पर अनेकों दिन तक खुले सत्र में चर्चा आयोजित हुए जिसमें प्रोफेसर
अपूर्वानंद के साथ-साथ देश भर के अकादमिक जगत के साथ-साथ सामाजिक, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने विचार प्रेषित किए। लगभग समस्त
मीडिया संस्थान भी इस विमर्श पर कई दिनों
तक पैनल बनाकर चर्चा करते रहे। इन चर्चाओं में देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटने वाले
गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाते नज़र आए कि पाकिस्तान हमारा शत्रु है। उसके प्रति हमदर्दी
दिखाने वाला भारतीय चाहे वह हिंदू, मुसलमान या किसी भी धर्म
का हो, देशद्रोही है। इस दौरान कई गड़े मुर्दे भी उखड़े जिसपर
जान-बूझकर विमर्श कर हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। जैसे भारत व
पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के समय भारतीय मुसलमानों की बड़ी संख्या द्वारा
पाकिस्तानी टीम को सपोर्ट करना, उनकी जीत पर पटाखे फोड़कर
जश्न मनाना, शाहिद अफरीदी, शोएब अख्तर
सहित अन्य पाकिस्तान के स्टार क्रिकेट खिलाड़ियों के प्रशंसक होने को मीडिया
पैनलिस्ट ने देशद्रोही कार्य करार दे दिया। ऐसा कर उन पैनलिस्टों ने एक धारणा बना दी
कि आपने यदि किसी भी मामले में पाकिस्तान का पक्ष लिया तो आप देशद्रोही करार दिये
जाएंगे। मुसलमानों से घृणा करने वाले इन नफरत के सौदागरों ने इस्लामी झंडे को
पाकिस्तानी झंडा बताकर उनके पाकिस्तानी समर्थक होने,
देशद्रोही होने का काफी दुष्प्रचार किया। मेरे कहने का ये तात्पर्य नहीं है कि हमारे
ही देश में रहकर हमारे ही देश के खिलाफ कोई ऐसा काम करे जिससे देश की सुरक्षा को खतरा
हो, को देशद्रोही नहीं कहा जाए बल्कि मैं ज़ोर देकर कहता हूँ कि
हमारे देश का कोई भी व्यक्ति चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान देश के इज्जत, प्रतिष्ठा की बेला में अपने देश भारत को छोड़कर यदि पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, नेपाल या
अन्य देशों का पक्ष ले, अपने देश की खुफिया सूचनाएँ दुश्मन देश
को पहुंचाए तो बेशक उन्हें देशद्रोही कहा जाए।
लेकिन ये नियम कानून सभी के लिए हो। किसी
को कोई रियायत नहीं मिले। सरकार भी खुद इसे अमल में लाए। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ
कि सरकार भी इस मुद्दे पर काफी ढुलमुल रही है। हाल ही में असम में चुनाव जीतने के
बाद केंद्र व कई राज्यों की बीजेपी सरकार जिस प्रकार पाकिस्तानी, बांग्लादेशी हिंदू नागरिकों के साथ व्यवहार कर रही है, उनकी देशभक्ति पर भी प्रश्नचिन्ह उठता है। हाल ही में गृह मंत्रालय ने सिटिज़न
एक्ट 2016 में संशोधन करते हुए देश के 7 राज्यों के गृह सचिवों व जिलाधिकारियों को
यह शक्ति दी है कि इस एक्ट के सेक्शन 6 के तहत पाकिस्तान,
बांग्लादेश व अफगानिस्तान से बिना वैध दस्तावेज़ के आए बौद्ध,
ईसाई, हिंदु, जैन, पारसी आदि अल्पसंख्यक धर्मावलम्बियों को इन देशों की सीमा से लगे राज्य भारतीय
नागरिकता के सर्टिफिकेट दे सकते हैं यदि वह 6 वर्ष भारत में रह चुका है। पहले यह
अवधि 11 वर्ष थी, 2016 में संशोधन के
बाद इसे घटाकर 6 वर्ष कर दिया गया।[i]
हैरत की बात यह है कि इसमें इस्लामी धर्मावलम्बी शामिल नहीं हैं। एक तरफ केंद्र
सरकार 1971 ई. के बाद भारतीय सीमा में बिना इजाजत आए बंग्लादेशी शरणार्थियों जिसमें
अधिकांश मुस्लिम हैं, को घुसपैठिए, देश
की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए भारतीय नागरिकता देने से इनकार कर असम, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से उन्हें वापस अपने देश बांग्लादेश भेजना
चाहती है तो वहीं हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने की बात
कर रही है। इसी प्रकार राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार पाकिस्तान से आए विस्थापित
हिंदू परिवारों के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए रियायति दर पर आवासीय भूमि आवंटित
करने की बात करती हैं। राजस्थान में पाकिस्तानी विस्थापितों के लिए काम करने वाली एक
स्वयंसेवी संस्था सीमांत लोक संगठन के अनुसार राजस्थान में कुल 5 लाख पाकिस्तानी हिंदू
विस्थापित बसे हैं।[ii] यहाँ
सवाल यह उठता है कि जब बिना वैध दस्तावेज़ के साथ हमारे देश में रह रहे बांग्लादेशी
यदि देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं तो इन 5 लाख हिंदू पाकिस्तानी के प्रति सरकार की
सोच इतनी सकारात्मक रखते हुए उन्हें अपने देश में क्यों बसाना चाहते हैं? जबकि ये 5 लाख विस्थापित हिंदू ऐसे देश पाकिस्तान से संबंधित हैं जिन्हें
हम दुश्मन देश मानते हैं। इस दृष्टि से तो इनसे देश की सुरक्षा को बांग्लादेशियों से
भी अधिक खतरा है। कोई भी आतंकी हिंदू शरणार्थी बनकर पाकिस्तान के लिए नापाक हरकतों
को अंजाम दे सकता है। पाकिस्तान के मुक़ाबले बांग्लादेश से तो ऐसी कोई शत्रुता ही
नहीं है। एक समुदाय/धर्मावलम्बी के साथ राष्ट्रीयता के आधार पर व्यवहार, तो दूसरे के साथ धार्मिकता के आधार पर व्यवहार ! सिर्फ इसलिए कि जिसे बाहर
भेजने की बात कर रहे हैं वे मुसलमान हैं जिन्हें सरकार की विचारधारा के लोग अपना
शत्रु समझते हैं। और जिसको बसाने की बात कर रहे हैं वे हिंदू हैं। उनके प्रति
हमदर्दी केवल इसलिए है कि दोनों का धर्म एक है।
जब पाकिस्तानियों व बांग्लादेशियों के
साथ उनकी राष्ट्रीयता नहीं बल्कि धर्म के आधार पर ही व्यवहार करना है तो फिर ये देशभक्ति
का ढोंग करने का क्या मतलब??? जिन बांग्लादेशियों के प्रति आप घृणा
सूचक शब्द घुसपैठिए प्रयुक्त करते हैं, यदि वह हिंदू बांग्लादेशी
हो, जिस पाकिस्तानी के खिलाफ आप दिनरात जहर उगलते हैं यदि वे
हिंदू पाकिस्तानी हों तो वह घुसपैठी, जासूस या आतंकी नहीं हो
सकता क्या? फिर उन्हें हमारे देश में बसने की पूरी इज्जत के
साथ इजाजत क्यों है? उन्हें वापस क्यों नहीं भेजा जाता।
यदि सरकार में बैठे लोग सचमुच
देशभक्त हैं तो किसी भी देश के नागरिक, चाहे वह अमेरिकी, बांग्लादेशी
या पाकिस्तानी हो, उसे उसकी राष्ट्रीयता के आधार पर
धार्मिकता की परवाह किए बिना उन्हें एक विदेशी के रूप में देखते हुए व्यवहार करना चाहिए।
सिटीजन एक्ट 1955 में फिर से संसोधन कर यह कानून बनाया जाय कि बिना वैध दस्तावेज़ के
भारत आए विदेशियों को बसने की इजाजत नहीं दी जा सकती। विशेष रूप से देश की सुरक्षा
को देखते हुए पाकिस्तान के लोगों को, चाहे वह किसी भी धर्म के
हों। नहीं तो सरकार में बैठे लोगों को खुल कर इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि वह
देशभक्त नहीं बल्कि देशभक्त की खाल ओढ़े हिंदू व संबंधित संप्रदाय के धर्मभक्त हैं।
और इस धर्मभक्ति के लिए देशभक्ति भी कुर्बान है। वैसे
आपकी इस धर्मभक्ति से एक बात तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान या बांग्लादेश के
मुसलमानों से हमदर्दी दिखाने वाले हमारे देश के मुसलमान और आपमें कोई अंतर नहीं
है। दोनों को अपने धर्मावलंबी प्रिय हैं चाहे वह किसी देश के हों। इसलिए अगली बार उनके पाकिस्तानी मुस्लिमों के प्रति
हमदर्दी दिखाने पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबां में झांक लेना।
साकेत बिहारी
अजीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन
[i] http://www.prsindia.org/uploads/media/Citizenship/Citizenship%20(A)%20bill,%202016.pdf
[ii] https://aajtak.intoday.in/story/vasundhra-govt-relaxed-land-allotment-policy-now-pak-hindu-migrants-can-purchase-land-in-rajasthan-1-1034901.html?fbclid=IwAR2-98sw6X6DU2urZTrywHSVv0icQ_1FbmG2GLSsz1FVxZVYvTolWgW-r20
Tuesday, 9 October 2018
गुजराती व हिंदी भाषियों के बीच तनाव
बिहार के
एक मजदूर ने अपने lust के वशीभूत होकर गुजरात में ठाकोर जाति के एक 14 महीने की बच्ची से बलात्कार किया। कोई शक नहीं कि बहुत ही घटिया व जघन्य
अपराध किया उसने। मुझे कोई हमदर्दी नहीं उस बलात्कार के आरोपी से। बहुत ही कठोर
सजा में हम भी मांग करते हैं, और वैसे भी पोक्सो एक्ट के तहत
उसे फांसी की सज़ा होनी ही है।
लेकिन इस एक मजदूर की गलती की सज़ा करोड़ों कामगारों को देना किसी भी
दृष्टि से जायज नहीं है। उस एक मजदूर के आधार पर आप लाखों, करोड़ों को जज नहीं कर सकते। आपके इस स्टैंड के आधार पर सोचें तो पिछले कुछ
वर्षों से मोदी टाइटल के आधे दर्जन गुजरातियों के भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह
सामने आए हैं, उस हिसाब से तो पूरा गुजराती समाज भ्रष्टाचारी
साबित हो जाता है। ऐसी स्थिति में यदि देश के सभी क्षेत्रों से गुजरातियों को भ्रष्टाचारी
का ठप्पा लगा समस्त उद्यमों से निकाल दिया जाए तो आपको या किसी भी गुजराती भाई को
भी ये ज्यादती लगेगी। फिर आप भी मेरी ही दलील देंगे कि कुछेक के आधार पर...
सर्वविदित है कि बलात्कार एक जघन्य अपराध है। लेकिन इसपर केवल
प्रवासी मजदूरों का पेटेंट नहीं है। इन प्रवासि मजदूरों पर उंगली उठाने से पहले
कभी अपने गिरेबां में भी झांक लीजिये। आत्म ग्लानि होने लगेगी। नेशनल क्राइम
रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015 में गुजरात में दर्ज मामलों में 99.4% पीड़िता के सगे संबंधी ही निकले। यानि आपके अपने ही सगे, संबंधी लोग आपके बहु बेटियों से बलात्कार करते रहे उस समय आपके मुंह से
इनका विरोध करने की एक आवाज़ नहीं निकली। गज़ब ...
यदि बलात्कारी होने की सज़ा किसी को खदेड़ना है तो इनसे पहले आपको अपने
गुजराती बलात्कारी सगे संबंधियों को पहले खदेडिये क्योंकि 2 वर्ष पहले वे इस जघन्य अपराध को अंजाम दे चुके हैं। नहीं तो ये राष्ट्रीय
एकता खंडित करने वाली गृहयुद्ध को बढ़ावा देने वाली पॉलिटिक्स बंद कीजिए। बाला
साहेब ठाकरे, राज ठाकरे बनना बंद कीजिए।
ये मत भूलिए कि आज यदि आपका state इतना विकसित
है तो इसमें आपसे भी ज्यादा इन प्रवासी मजदूरों के खून पसीने का योगदान है। गुजरात
जितना आपका है उतना ही इनका भी। ये अमन पसंद मजदूर हैं, इन्हें
केवल आजीविका कमाने से लेना देना होता है। ओवर ड्यूटी से इन्हें फुरसत कहाँ जो राह
चलते किसी का बलात्कार या छेड़छाड़ को अंजाम दें।
बाकी जिस सत्तारूढ़ सरकार से आपको शह मिल रही है आपकी विरोधी होने के
बाद भी वह केवल आपको अप्रत्यक्ष रूप से इसलिए सपोर्ट कर रही है ताकि मीडिया का
ध्यान राफेल सौदे से इधर आ सके।
Tuesday, 2 October 2018
निजी कंपनियां देश की संपत्ति कर रही बर्बाद
जरा
सोचिये
एक सरकार अरबों रुपये खर्च कर कोई जनोपयोगी योजना शुरू करती है।
योजना की शुरुआत करने में करोड़ों रुपयों की हेराफेरी की बात से इनकार नहीं किया जा
सकता।
लेकिन सत्ता बदलते ही दूसरी सरकार एक साजिश कर निजी स्वार्थ के लिए
उस जनोपयोगी योजना को बंद करवा देती है, उसके जगह पर कुछ
और योजना लाने, लागू करने की जुगत लगाती है ताकि इसी बहाने
वह भी करोड़ों की राशि का गबन कर सके।
या
निजी एम्बुलेंस सेवा देने वाले लोगों के इशारों पर जान बूझ कर इन
सेवाओं को बंद करवाया जाता है। और सत्ता में बैठे लोग अपने कमीशन की उगाही इन निजी
एम्बुलेंस कंपनियों से की जाती है।
हर तरफ से नुकसान केवल देश की जनता का होता है। हम जनता को इस
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने की आवश्यकता है नहीं तो ये भ्रष्ट नेता लोग
पूंजीपतियों के साथ मिलकर एकदिन हमारी आपकी लंगोटी भी खींच ले जाएगी।
किसानों पर बर्बर पुलिस कार्रवाई निंदनीय।
हम इस
मुगालता में जीते हैं कि पुलिस, सेना हमारी रक्षा के लिए होते
हैं। वास्तविकता यह है कि ये Real life कटप्पा हैं। सत्ता
यदि बोल दे कि किसान हमारी सत्ता के लिए खतरा हैं तो उन्हें अपने अधिकार, सुविधा की मांग कर रहे निहत्थे निर्दोष किसानों को लाठीचार्ज, आंसूगैस के गोले फायर कर रौंदते देर नहीं लगती। जैसा आज 23 सितंबर 2018 को अपनी मांग के लिए हरिद्वार से चलकर
दिल्ली आए किसानों के साथ हुआ। इन्हें दिल्ली में घुसने तक नहीं दिया गया।
अब सत्ता के दलाल दलील देंगे कि उन्हें बैरिकेट तोड़ने, कानून हाथ में लेने की क्या जरूरत थी ???
लेकिन इसका जवाब देने में उनके मुंह में दही जम जाएगा कि आखिर पिछले 4 वर्षों के दौरान सरकार इनको वे सुविधाएं क्यों नहीं दे रही जिससे ये किसान
आंदोलन करने को मजबूर हो रहे हैं। आखिर इन किसानों का कसूर क्या था जो दिल्ली की
सीमा में इन्हें घुसने नहीं दिया गया? लोकतंत्र में हर किसी
को अपनी मांग के लिए विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है। सोचने
वाली बात है कि आखिर क्या कारण है जो लगातार ये किसान सैकड़ों हज़ारों किलोमीटर
कष्टदायक यात्रा कर आपके संसद द्वार तक आते हैं, अपनी मांगों
से अवगत कराने के लिए आपसे मिलने की गुहार लगाते हैं, आपका
ध्यान आकर्षित करने के लिए मरे चूहे, कच्चे मांस खाते हैं,
मानव मूत्र से लेकर वृष्टा तक खाते हैं। आंदोलन की असफलता में फिर से
नया आंदोलन खड़ा करते हैं। बावजूद इसके आप इतने निर्दयी बने बैठे हैं कि आपके कान
पर जूं तक नहीं रेंगता।
आखिर पिछली सरकार से इनकी इच्छाएं पूर्ण नहीं हुई तभी तो मजबूर होकर
अपनी मांग पूरी करने के लिए आपको मौका दिया। लेकिन सत्ता में आकर अब आप भी वही काम
कर रहे हैं। तो फिर पिछली सरकार में और आपमें क्या अंतर है???? दोनों तो एक ही थाली के चट्टे बट्टे साबित हो रहे हैं।
इसमें कोई हैरत की बात नहीं होगी जो सत्ता के दलाल, गोबरबुद्धि लोग इन किसानों को किसी पार्टी, विचारधारा
से जोड़ते हुए इन्हें कांग्रेसी, वामपंथी, माओवादी समर्थक और न जाने क्या क्या साबित कर देंगे।
Thursday, 20 September 2018
आर्थिक आधार पर आरक्षण : केवल एक जुमला।
एक तरफ संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर बीजेपी के बड़े-बड़े नेता
सार्वजनिक मंचों से कहते नज़र आते हैं कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ पिछड़ा आरक्षण
खत्म नहीं किया जा सकता। तो दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री रामबिलास पासवान सहित हमारे
सांसद महोदय चिराग पासवान गरीब सवर्णों को भी आरक्षण देने अर्थात आरक्षण को आर्थिक
आधार पर लागू करने की पैरवी कर रहे हैं।
संघ प्रमुख की बात
को संविधान की समानता के अधिकार के आधार पर तो एकदम सत्य कहा जा सकता है। बाकी
सांसद जी की बातें आनेवाले 2019 चुनाव
के बाद बिल्कुल ऐसे ही जुमला साबित होंगी जैसे नरेंद्र मोदी जी की देश के प्रत्येक
नागरिकों को 15 लाख मिलने वाली बात, अरविंद
केजरीवाल की जनलोकपाल की बात, बाबा रामदेव के मोदी सरकार आने
के बाद 35-40 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल मिलने की बात, नीतीश
कुमार की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की बात। और अन्य नेताओं के वादे भी
आप जोड़ सकते हैं।
दरअसल आज जितने भी
नेता, मंत्री लोग आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू कर गरीब
सवर्णों को भी इसका लाभ
देने की बात करते हैं उनके लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र घूम लीजिये, वहाँ सवर्णों की भारी भरकम जनसंख्या देखकर आपको पता चल जाएगा कि सुरक्षित
सीट के प्रत्याशियों को ऐसा लोभ क्यों देना पड़ता है???दरअसल
उन सवर्ण वोटों को साधे रखने के लिए ये सवर्ण आरक्षण का शिगूफा छोड़ा गया है।
उनको उल्लू बनाकर
ये लोग केवल अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।
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